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Thursday, July 16, 2009

पहली कविताओं की दूसरी पारी







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन (विशेषांक)




विषय - पहली कविता

अंक - अट्ठाइस (भाग-१)

माह - जुलाई २००९







पहली कविता मानसून की पहली बारिश की तरह है जिसमें नहाने के बाद हम खुशी से झूम उठते हैं। मानसून की बारिश तो कम हुई पर आज हमारे पाठकों की कविताओं की बारिश हम जरूर कर रहे हैं। पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी हमें बड़ी संख्या में "पहली" कवितायें प्राप्त हुई हैं। आज हम 20 कविताओं से इस खास आयोजन की शुरुआत करने जा रहे हैं। जैसे जैसे हमें कवितायें मिलती जायेंगी, हम 20-20 कविताओं के साथ आपके समक्ष उपस्थित होते रहेंगे। हमारे इस आयोजन की घोषणा होने पर आप लोगों की यादें जरूर ताज़ा हुई होंगी जब आप लोगों ने पहली बार कलम चलाई होगी। हमारे पाठकों ने हमें भूमिका भी लिख भेजी है जिसे हम कविता के साथ ही प्रकाशित कर रहे हैं। अलग अलग अनुभवों पर लिखी गईं वो चंद पंक्तियाँ आज हमारे इस मंच का हिस्सा बन रही हैं। हम आशा करते हैं इससे हमारे अन्य पाठकों को भी प्रेरणा मिलेगी और वे हमें कविता लिख भेजेंगे। चलिये पढ़ते हैं 20 कवियों की पहली कवितायें।
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हमें आप अपनी "पहली कविता" kavyapallavan@gmail.com पर भेज सकते हैं।

आपको हमारा यह आयोजन कैसा लग रहा है और आप इसमें किस तरह का बदलाव देखना चाहते हैं, कॄपया हमें ईमेल के जरिये जरूर बतायें।

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साइक्लोन - मेरी पहली हिंदी कविता
जुलाई -१९७२
आयु- २० वर्ष

उन्ही दिनों एक और कविता लिखी गयी थी वियतनाम युद्ध पर, संभवतः पहली कविता वही थी,वह सुरक्षित नहीं रह सकी, और मैं इसी को पहली कविता मानता हूँ. इस का भी मूळ कागज़ फट-चिट गया था, १९८० के आस पास इस को दूसरे कागज़ पर साफ़ साफ़ लिख कर संजोया गया.
२००१ में अपनी पुस्तक ' जंगल, अक्स और साए' के प्रकाशन के समय जब कविताओं को काल क्रम के अनुसार क्रम बद्ध किया तो यह पुस्तक की अंतिम कविता थी, यानी मैं ने इसी को अपनी पहली कविता माना था. इस के पश्चात भी अन्यत्र मैं इसी को ही अपनी पहली कविता के तौर पर संदर्भित करता रहा हूँ.
इतना साफ़ साफ़ याद है कि यह विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र की प्रयोगशाला में लिखी गयी थी और यह भौतिक शास्त्र के सिद्धांतों से काफी प्रभावित दिखती है.
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अनगिनत सवाल
जिन के अनगिनत जवाब
और जब ये जवाब
खुद सवाल बन जाते हैं ;
ऐसा लगता है, ये सब
दूर किसी पहाड़ी स्थल पर
पहाड़ियों से टकरा टकरा कर
एक ही ध्वनि की
टूटती हुई
सैकडों प्रतिध्वनियाँ हैं
और इन परेशान प्रतिध्वनियों का एक साइक्लोन
किसी शून्य केंद्र के चारो ओर चकरा रहा है;
जिस में मैं स्वयं
किसी तिनके के समान ,
विश्राम रहित , निश्चेत ,
अनिश्चित मार्ग में घूमता हुआ,
सोच रहा हूँ,
कहीं यह शून्य मेरे अपने ही मन के
किसी कोने में तो नहीं!!

--मुहम्मद अहसन





एक बार मैं अपने शहर के एक काफी व्यस्त इलाके से गुज़रा तो मैने देखा कि ग्रामीणों की एक बहुत लम्बी लाइन लगी हुई थी जिससे मार्ग अवरुद्ध हो रहा था तथा कुछ पुलिस वाले उनपर लाठियाँ चला चला कर उन्हें नियंत्रित करने प्रयास कर रहे थे फिर मैंने रूककर एक व्यक्ति से पूछा कि भाई यह कैसी लाइन लगी है, उसने बताया कि यह अपने किसान भाई हैं जो खाद क्रय करने का प्रयास कर रहें हैं | यह देखकर मैं चौंका कि ओह...... ! ये तो अपने अन्नदाता हैं , आज इनकी यह दुर्गति....... ! अरे .....! खाद व बीज तो हम सबको इनके खेत पर पहुँचाना चाहिए जबकि ये सब इसके लिए अपना अमूल्य समय गंवाते हुए लाइन में तो लगे हैं हीं अपितु पुलिस की लाठियाँ भी खा रहें हैं इसी पीड़ा को दिल में संजोये मैं अपने घर आ गया|

उस दिन रात्रि में मैं सो न सका और कलम उठाकर मैंने किसानों की पीड़ा एक कविता के रूप में कागज पर उतार दी, इससे मुझे कुछ राहत मिली और तब बड़ी मुश्किल से मैं सो पाया |
यही मेरी पहली कविता बन गयी और तभी से मेरे काव्यमय जीवन का सफर प्रारंभ हुआ |
हालाँकि मेरे यहाँ के कुछ लोगों को काफी आश्चर्य होता है कि एक भवन डिजायन करने वाला वास्तुशिल्प-अभियंता समानांतर रूप से काव्य-रचना के क्षेत्र में कैसे आ सकता है ?

वस्तुतः सच ही है कि :-
भीगीं पलकें, भीगा दामन,
सुलगती सांसें दहकती छाती |
विरह अग्नि होठों पे आह,
कविता वहां जनम है पाती ||

"संपन्न किसान"
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अधनंगा बदन कृशकाय है काया,
भरपेट अन्न न उसने पाया
दो बीघे का उस पर भार
संसाधन से है लाचार
कस कर कमर परिश्रम करता
मेहनत से वो कभी न डरता .......

साहूकार उसे धमकाता
चौकीदार आँख दिखाता
मेंड़ खेत की करती तंग
जैसे सरहद पर हो जंग
खाद-बीज भी उस पर भारी
लाइन लगाने की लाचारी
मेहनत कर वो फसल उगाता
लेकिन लाभ बिचौलिया पाता.......

कहने को सरकारी योजनायें
लाभ उसको मिल न पाए
उसका खेत सड़क में जाता
मुआवजा तक वो न पाता
घर में उसके होता फांका
कर्जा कभी चुका न पाता........

आत्महत्या उसकी नियति बेचारी
घर तक उसका है सरकारी
उसके दुःख की ना कोई सीमा
नहीं है उसका कोई बीमा
ऐसा है संपन्न किसान
अपना भारत देश महान
इसका केवल यही निदान
शिक्षा अपनायें सभी किसान .........

--अम्बरीष श्रीवास्तव





सन याद नहीं
बस तारीख याद है, -- १८ अप्रैल ,,,शायद ८७ या ८८ था,,, बस दो ही लाइन हुयी थीं...लिखी कहें नहीं ,,बस मन में आयीं थीं,,
फिर दो लाईने और हुईं...इनके ७-८ महीने बाद... एक जनवरी को,,,,नया साल था वो,,,
लोग अक्सर लिखते हैं छपने के लिए... ( और एक मैं के लिखा छुपाने के लिए...)
शुक्र है हिंद-युग्म का ....के मैं भी अपनी बात कहने के लिए एक दोस्ताना माहौल पा सका,,
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क्यूं अलविदा तू ऐसे मुझे कह गया ए दोस्त,
जैसे के गुजरे साल न आते हैं लौट कर,
और .....
ये साल भी भुला न सकेगा तेरा ख़याल
आती रहेगी याद तेरी लौट-लौट कर

--मनु ’बेतखल्लुस’



ये है मेरी पहली कविता ............माँ कोई ख़याल नहीं एक हकीकत है ,मैं क्या बताऊंगी ?
सभी जानते हैं ...............
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बाल चंद्र ने कहा
निशा माँ मुझे उठा लो,
चमकते-दमकते
सितारों से जड़े
अपने आँचल में
चन्द्रिका करों का लेकर आश्रय
चाँद बढ़ने लगा--
डगमगा कर,
फ़िर-फ़िर संभलने लगा
मानो उसे आवश्यकता हो
अपने सहज और संपूर्ण
विकास के लिए,
माँ के आँचल की
शीतल छाँव की!

--ज्योत्स्ना





सोलहवें बसंत के किनारे लिखा था.......

आओ तुम्हे एक कहानी सुनाऊँ....
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मैं वक़्त हूँ
आओ तुम्हे एक कहानी सुनाऊँ
एक छोटी सी लड़की की,
जो पूरे घर की प्यारी थी
नाम के अनुरूप-भोली,चंचल,बुलबुल गौरैया थी
कभी इधर कभी उधर ऐसे भागती थी
जैसे मनमोहक तितली!
बातें बनाती थी
गीत सुनाती थी...
पक्षियों का समूह हार हार जाता था
सपनो में उसके कोई मानसरोवर आता था
राजहंसिनी के अंदाज़ में कहती थी वो लड़की-
मुक्त हाथों मोतियों की खैरात बाटूंगी...
देखते ही देखते सोलहवां बसंत सामने था
और विस्मित थी आँखें
कहाँ है मानसरोवर,किधर है मोती
यहाँ तो घात प्रतिघातों की कहानी है
हँसते हँसते अचानक आँखें भर जाती हैं
सामने की दृश्यावलियां
शून्य में बदल जाती हैं!
उसने जानना चाहा
इस पार और उस पार का रहस्य क्या हैं
किन परदों के पीछे सत्य छुपा है
प्रत्येक आदि का अंत कहाँ है
किसी देव दुर्लभ नियामत के पीछे उपेक्षा और घृणा के दंश क्यूँ हैं
देखते ही देखते सुपरिचित चहरे अजनबी क्यूँ बन जाते हैं?
प्रश्नों के इस भंवर में वह लड़की खो गयी
मानसरोवर को सपनाते हुए मोतियों से दूर हो गयी
विरक्त भिक्षुणी सी अपनी सोच उसने दोहराई
जैसे खुद से कह रही हो-
"बुद्धं शरणम गच्छामि
संघम शरण गच्छामि"
मैं वक़्त हूँ,
कहानी को इसी मोड़ पे छोड़ता हूँ
कुछ वर्षों बाद फिर कहूँगा......
शायद तब तक,लौट आये उसकी चंचलता उसका भोलापन सारे जीवंत शोक अंदाज़
वह पद्मावती हो जाये
"जायसी की पद्मावती"
मानसरोवर चल कर उसके पास आये
कोई 'पद्मावत' लिखे
हाँ एक महाकाव्य-
उस लड़की के नाम
मैं सम्पूर्णतया उसका हो जाऊँ
उसके सारे प्रश्नों का समाधान हो जाये
कहीं कोई कमी न रह जाये
उसके भीतर और बाहर से
उसका समझौता हो जाये!!!

--रश्मि प्रभा




मैंने अपनी पहली ग़ज़ल आज से लगभग ८ वर्ष पहले लिखी थी. तब से अब तक मैं लगभग ४० ग़ज़ल,१० गीत और 50 "४ लाइनर " लिख चुका हूँ.
पर ज़िन्दगी की जुस्तजू ने आज तक कुछ छपवाने का मौका ही नही दिया, अब जब गम -ऐ -रोज़गार बस में है तो सोचता हूँ अपनी बातें सबको बताने का समय आ गया है.
मूल रूप से मैं जबलपुर का रहने वाला हूँ ये रचना मैंने कॉलेज के दिनों में लिखी थी.मेरी क्लास का माहौल बहुत ही शायराना हुआ करता था.और उस माहौल ने मुझे भी शायर बना दिया.पर क्यों लिखी थी ये मुझे ख़ुद समझ नही आया क्योकि उन दिनों हालात ऐसे नही थे जैसे ग़ज़ल में दिख रहे है.

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चुपके से खयालों में आकर तुम मुझको सताया करती थी.
मैं तनहा बैठ के रोता था जब यादें आया करती थी.

पल पल हर पल उन पलों की यादे वो पल इस पल तक याद है.
मैं तुम्हे देख कुछ कहता था और तुम मुस्काया करती थी.

कितने प्यारे प्यारे दिन थे कितना हसीं था वो मौसम ,
'आशीष कहाँ हो' कहकर जब तुम मुझे बुलाया करती थी.

उन बातों को सोच के तुम शायद अब भी हँस लेती हो,
गुड्डे गुडियों की शादी में जब मुझसे लड़ जाया करती थी.

कई बातें करनी थी तुमसे वो शाम ही शायद छोटी थी ,
जब तक तुमसे कुछ कह पता वो ख़त्म हो जाया करती थी.

जिस दिन तुम बिछड़ी थी मैं रेत के महल बनाये थे ,
टूटे महल कई दिन तक मुझको रेत चिढाया करती थी.

चली गई तुम दूर बहुत यादों में आना कम न किया,
जब सोता था अक्सर मुझसे मिलने आया करती थी.

जितना भूलना चाहा तुमको उतना ही तुम याद आई ,
हर मौसम हर एक हवा तेरी याद दिलाया करती थी.

--आशीष कुमार श्रीवास्तव



क्या कहूँ क्या दिल में दबा रखा है
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तेरे दिये आंसुओं को आंखों में छुपा रखा है
तूने कभी देखा ही नही गौर से इसमें
दिल में तेरे लिये इक घर बना रखा है
तमन्ना थी कभी कि मेरी हम दम बने तू
पर तूने किसी और को ही अपना हमसफर बना रखा है
कभी हमारे बारे में भी सोचा लिया होता
जिसने सिर्फ़ तुझे ही अपनी ज़िन्दगी बना रखा है

--योगेश गाँधी





यह कविता मैंने सितम्बर १९८० में लिखी थी जब मैं १० वीं कक्षा में पढ़ती थी कविता के सन्दर्भ में और भी है बहुत कुछ ...कुछ यादें ...कुछ किस्से ...
ऐ देशवासिओं इन्हें संभालो
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ऐ देशवासिओं
इन्हे संभालो
इन नन्हे नाज़ुक बच्चों को
जो बच्चे भूखे मरते हैं
जो बच्चे घर-घर फिरते हैं
जो बच्चे अंधियारे में है
ऐ देशवासिओं
इन्हें संभालो
यही देश की आन है
यही देश की शान है
यह मत सोचो
चंद अमीर बच्चों की
मुस्कानों से यह देश चमक उठेगा

--संगीता सेठी




सच कहा आपने एक कवि के लिए उसकी सबसे पहली कविता न केवल बहुत महत्वपूर्ण होती है बल्कि सम्पूर्ण जीवन के लिए एक मीठी सी स्मृति भी होती है. मैं अपनी पहली कविता आपको भेजते हुए बिलकुल भी हिचकिचाहट का अनुभव नहीं कर रही हूँ क्यों कि येः कविता मेरे ह्रदय के बहुत करीब रही है हमेशा से. इस कविता को मैंने तब लिखा था जब मैं दसवी कक्षा कि परीक्षा देने के उपरांत परिणामों की प्रतीक्षा कर रही थी. ये एक गीत है जिसे गुनगुनाया भी जा सकता है. कविता 'दो आँखों' पर लिखी गई है और कविता ये बताती है कि वो आँखें अब मेरे पास तो नहीं हैं पर मुझे बहुत याद आती हैं.
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दो आँखें

दो आँखें
मुझे छुप छुप देखती
दो आँखें
मेरी आँखों से मिलती
दो आँखें
मुझे देख के झुकती
दो आँखें..
मुझे प्यार सिखाती
मुझे पास बुलाती
मुझे याद हैं आती... दो आँखें....
किसने समझी , किसने जानी
दो आँखों की सच्ची कहानी
थोडा सा बादल, थोडा सा पानी
दो आँखों की है ये कहानी


दो आखों ने
जीना सिखाया
दो आँखों ने
जग ये दिखाया
दो आखों ने
अपना बनाया
दो आँखें...
हमराज़ बताती
हमसे राज़ भी छुपाती
छुप छुप के बरसती..दो आँखें..
दो आँखें जब मुझे रूठी
ऐसा लगा जैसे दुनिया छूटी
रिश्तों की ये डोर क्यूँ टूटी
मेरी खुशियाँ किसने लूटी


दो आँखें
अब जाने कहाँ हैं
दो आँखें
अब मुझसे जुदा हैं
"वो " आँखें
अब मेरी कहाँ हैं
वो आँखें..
मुझे पल पल तडपाती
मुझे रह रह के रुलाती
मुझे याद हैं आती...वो आँखें..!!

--दीपाली "आब"



माँ अब अक्सर
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खामोश रहा करती है
भटकती रहती है शून्यता
उसके चेहरे पर
एकदम शांत
निस्तब्ध
पूछ ही बैठा
एक दिन जिज्ञासा के सबब
एकाएक ये कैसा परिवर्तन
विचारो का इस भांति विसर्जन
अब न ही कोई विरोध
न ही कोई प्रतिरोध
कोई हलचल क्यों नहीं
कोई चर्चा क्यों नहीं
जैसे ख़त्म हो गयी हो
सृजनान्त्मकता
आत्मा की मौलिकता
क्या मान बैठी हो हार ?
बुदबुदा उठे उनके होठ
कुछ अनमने पन से
कि हालात नहीं बदले तरीका बदल गया है
अब मेरे जीने का सलीका बदल गया है
अब नहीं शब्दों कि मनुहार है
बस मौन ही प्रतिकार है
हाँ अब मौन ही प्रतिकार है

--कुलदीप यादव



मेरी पहली कविता मैंने सन १९७२ में लिखी थी|जब यह कविता मैंने लिखी तो मेरे चाचा जी को दिखाई तब उन्होंने इसमें सुधार किया था वो यह की "कामना "के स्थान पर मैंने "आरजू "लिखा था |

कामना
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कामना यही है की!
अंधे की लाठी बन जाऊ ,
और किसी को राह दिखा पाऊ|

नन्हा सा रुमाल बनकर ,
किसी दुखी के आंसू पोच पौ |

यदि दीपक बन जाऊ तो,
जन जन का अंधकार हर पाऊ|

विशाल सागर बन जाऊ ,
तो सब कुछ सहती जाऊ|

किसी बेसहाय का आसरा बनकर ,
अपने आप को भूल जाऊ |

--शोभना चौरे





मुझे बचपन से कविता का कुछ ख़ास शौक नहीं था । जब मैंने २००५ में अध्यापन कार्य आरम्भ किया तो उस समय मैं इतिहास की अध्यापिका थी । मेरे विद्यालय में अचानक हिंदी की अध्यापिका की तबियत ख़राब हो जाने से विद्यालय के मैनेजर महोदय ने मुझे हिंदी की कक्षा लेने को कहा । उन्हीं दिनों काव्य पढ़ाते-पढ़ाते मुझे कविता में रूचि होने लगी । तब मैंने भारत के महान कवियों की कविताएँ पढ़ीं, जिससे मुझे प्रेरणा मिली कि साहित्य से व्यक्ति का चरित्र निर्माण होने के साथ-साथ उसमें निखार भी आता है । उसी समय अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में विद्यार्थियों से हिंदी बोलने पर दंड दिए जाने की खबर सुन कर मुझे क्रोध भी आया और दुःख भी हुआ । तभी मेरे अन्तःकरण में इस पहली कविता ने जन्म लिया । इस कविता में काव्य की सुन्दरता तो नही है परन्तु इसमें छिपी मेरी भावना व्यक्त है । इसे मैंने जब ब्लॉग बनाया तब सबसे पहले लिखा । मुझे तब ब्लॉग के बारे में भी कुछ ख़ास पता नहीं था । काफी सालों पहले समाचार पत्रों में पढ़कर जानकारी प्राप्त हुई जनवरी २००८ में जब घर में नेट लगा तब मैं काफी कोशिशों के बाद ब्लॉग बना पाई उसी समय 'गौरव सोलंकी' जी की कम्युनिटी की सदस्यता ग्रहण की उन्होंने ही सर्वप्रथम मेरी कविता पर प्रतिक्रिया लिखी जो मेरे स्क्रैप बुक में है ।
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हाय रे! हिंदी

हाय रे! हिंदी तू अपनों में ही पराई हुई
तेरे देश में तेरे ही अपने तुझे बोलने पर शर्माते हैं
तुझे बोलने पर तेरे अपनों पर जुर्माना लगता है
तेरे नौनिहाल तुझे बोलने पर अपराधी बनते हैं
तुझे बोलने वाले जीविका के लिए भटकते हैं
क्यों किया तुझे पराया अपनों ने
तू महासागर है हिंद का
फिर भी हम दूसरों का पानी क्यों भरते हैं
हाय रे! हिंदी तू ........

--अर्चना तिवारी






बात सन 1969 की है जब मैं सातवीं में पढ्ता था। मां गांव में रहती थी और मैं पिता जी के साथ कस्बे मैं,मां के घास काटती बार नदी मे बह कर स्वर्ग सिधार जाने से मैं लगभग टूट सा गया था,अपनी कापी के पन्नों में कुछ
लिखना मेरी आदत सी बन गयी थी,पिता जी की पुरानी डायरियों में कुछ लिखना और उनकी डांट खाना रोजमर्रा की बात थी.पहली कविता या मन के उदगार मां के लिये थे जिस की प्रति पिता जी नें क्रौध वश इस लिये फाड़ दी क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि मैं अपना समय नाहक व्यर्थ करूं...उस रचना की हल्की सी याद है जो अपनी मां को समर्पित कर रहा हूं...
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मैं अकेला हूं मां तू मुझसे से कितनी दूर है,
क्या खता मुझसे से हुई जो मिलने को मजबूर है,

याद कर वो दिन् जो मुझ को लौरी दे कर सुलाती थी,
मन मेरा बहलाने को कहानियां तू सुनाती थी,

जागता ही मैं रहूं क्या तुझ को ये मंजूर है।....
कैसे भूलूं पल, जंहा को छौड कर जब तू गयी,

कर अन्धेरा इस जहां में,उस जंहा में खो गयी,
अब उजाला बन के वापिस मुझ को लेने आओ तुम,

मां की ममता की झलक इस दुनिया को दिखलाओ तुम,
वर्ना तढ्फना यूं मेरा क्या तुझे मंजूर है।
मै अकेला..............

--'अमर पथिक.'




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झरोखा

झरोखे से देख रहा हूँ
मेरी जिंदगी में
खुशियों की बहार आ रही है,
असमंजस में है मन
की द्वार खोल स्वागत करूँ
या लौटा दूँ इन्हें
हवाओं का रुख ले आया है जिन्हें
गलती से मेरी जिंदगी में !

--नीलेश माथुर





82 मे लिखी थी ...........
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ये मेरी मात्र कल्पना ही तो है
की मैं विश्व के लोगों के
हृदयों से पत्थर निकाल कर
एक बुत बनाऊं
और दफ़न कर दूं
गहराईयों मे
सदियों बाद ...
खुदाई मे जब वे
अवशेष मिलेयेंगे
तो लोग ! एक दिन !!
अपने अतीत के बचपने पर
या पिछडेपन की सभ्यता पर
विचारेयेंगे अवश्य ही ........
बहुत शांतिप्रिय हूँ शायद यही कारण रहा होगा .......

--रेणु अग्रवाल




अपनी प्रिय सखी के रूठे मौन पर खुद को बहलाया था , और कहा कि " मौन भी एक संवाद है "
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मौन भी एक संवाद है

कुदरत का यह एक अलग अंदाज़ है ,
कभी मन सूखा, और बाहर बारिश है !
जानती हूँ "मौन भी एक सवांद है " ,
तो चलो मौन जियें थोड़ा, बाहर तो शोर-ही-शोर है !!
यूँ तडपाती है दोनों, इक तेरी जुदाई, दूसरी तेरी याद ,
अच्छी फंसी मैं, बाहर तो दलदल ही दलदल है !!!

--प्रीती मेहता




जीवन की आपाधापी से गुजरते ख्याल....
जीवन की डगर बहुत कठिन है,
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सहयात्री मिलते नहीं
जो मिलते हैं-
कुछ कदम चलकर थक जाते हैं
सोचती हूँ...
चलो यही जीवन है !

--रेणु सिन्हा





यूँ ही अनमनेपन में कुछ शब्द पन्नों पर उतर गए ...........
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प्रतीक्षा
जाने कब से
मैंने उसके आने की प्रतीक्षा की थी
उसके आते ही
मैं नदी बन गई.......
पर,उसकी आँखों की लक्ष्मण रेखा !
मैं पलभर में खामोश चित्र बनकर रह गई,
निस्तेज आँखों से उस रेखा को देखा
और अपनी जेहन में जब्त हो गई,
लहरों-सी बातें
मौन हो गयीं
अचानक सारी प्रतीक्षा ख़त्म हो गई !!!

--मंजुश्री




मैंने ये पहली कविता यूँ कहिये कि "तुकबंदी" रश्मि दी की कविताओं को देख कर, पढ़ कर जोश में की थी..............यानि मेरी कोशिश का मुख्य जरिया रश्मि दी की कविता थी............इन्होंने ही मुझे उत्साहित किया, जिस कारण मैंने ये रचना की थी....बेशक शायद इस रचना की एक अच्छे कवि के सामने जरा - सी भी अहमियत ना हो..........फिर भी "दी" ने मुझे बराबर उत्साहित किया............
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जिन्दगी की राहें

जनम के बाद बचपन में ढूध के लिए रोना......
फिर खेलने के लिए रोना.......
फिर बाहर जाने के लिए रोना.......
यही तो थीं बचपन की राहें.............
स्कूल में मास्टर साहेब की छड़ी के कारण रोना
दोस्तों से झगड़े के कारण रोना.....
रास्ते में या खेल में गिरने के कारण रोना........
हाँ यही तो थीं बचपन की राहें.......
कॉलेज में कम मार्क्स पाने का रोना........
प्रैक्टिकल और अटेनडेंस पूरा ना होने का रोना........
कॉलेज छूटने पे भी फिल्म छूटने का रोना.......
यही तो थी......जवानी की राहे........
ऑफिस में अधिक काम का रोना......
घर पे बच्चों की सही पढ़ाई ना होने का रोना......
बीवी की मुस्कान ना लौटा पाने का रोना.........
यही तो है भाई.............जिंदगी की राहें....

--मुकेश कुमार सिन्हा




मासूम दिनों की सुनामी को लिखा ताकि गुबार निकल जाये और मासूमियत पर आंच ना आए

आज यही कहना है !!
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बचपन का वह लम्हा –
जहाँ नींद की परियां लोरी गाने को आती हैं,
मैंने नहीं देखा!
मैंने नहीं देखा,
काठ के घोड़े के संग –अपने दादा को घोड़ा बनते,
उस पर मुझ जैसे नौसिखिये सवार के हाथ में चाबुक देख कर,
दादी को खिलखिलाते !
मैं ‘उस व्यक्ति’ की ऊँगली थाम कर चली नहीं ,
कभी लड़ी नहीं,
कभी मचली नहीं,
कभी जिद्द नहीं ठानी !
कभी प्यार से उसने पास बुलाया नहीं,
कभी हाथ थाम कर पास बिठाया नहीं,
कभी नहीं सुनाई कोई ऐसी कहानी –
जो मुझे सपनों के मेले में घुमाती !
होश सँभालने के बाद से या उसके पहले से ही,
मैंने ‘घर’ में केवल ‘डर’ देखा ,
गालियाँ सुनी (जिसका अर्थ नहीं मालूम था)
आँखों से अंगारे बरसते देखे
सहमी माँ की आँखों में आंसूं देखे
बात-बेबात चीज़ों को तहस-नहस होते देखा
यह भी सुना…………………………….
‘धूल फांकने’ की नौबत आयेगी ‘तब देखना’!
अपमान का दर्द मेरे छोटे से मन को भी होता रहा
और बहुत जल्दी ही –
मैं रोटी की कीमत पहचानने लगी!
समय अपनी चाल से सरकता रहा
यही सब देखते - सुनते मैं 12 साल की हो गई
बहुत सारी उम्मीदें मर चुकी थी
अपमान की आग से केवल माँ ही नहीं गुजरी ,
हम भी शामिल थे !
फिर भी,
अपनी सीमित सोच लिए हम हंसते रहे,
खेलते रहे ........
दूसरों के पिता को देख कर –मन करता था –
काश! हम भी यह सब पाते ,
पर अब मैं सहजता से कहती हूँ –
मुझे ‘पिता’ नाम से चिढ़ है .......
लोग गलत नहीं कहते –
किसी लड़की का कोई ‘घर’ नहीं होता
पर मैं, अपने को समर्थ बना कर
निश्चित ही,
अपना घर बनाउंगी
क्योंकि,“अपना घर अपना होता है,
अपने घर के आँगन में मन सपनों के मोती बोता है”

--खुशबू प्रियदर्शिनी


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25 कविताप्रेमियों का कहना है :

Disha का कहना है कि -

सभी की रचनायें काबिले तारीफ है.
मजा आ गया

Shayaar का कहना है कि -

Jitna maza sabki pehli kavitayen padhkar aya utna hi maza unki bhumikayen bhi. Kaise sabne lekhan ka safar shuru kiya jaanne ki jigyasaa rehti hai. Isi liye kavitaon ke sath sath bhumikayen bhi mazedar lagin.

Meri or se sabhi ko hardik badhai.

--Gaurav Sharma 'Lams'

RAMANUJ DUBEY का कहना है कि -

sari rachnaie aapne aap mai bemisal hai.........sabhi kaviyo ko hardik badhae...........

Shamikh Faraz का कहना है कि -

फिलहाल मैंने सिर्फ यही पढ़ा है कि क्यों आम लोग कवी बन गए और वहां पहुंचे जहाँ रवि भी नहीं पहुँच पाता. इसलिए अभी सिर्फ सभी लोगों को मुबारकबाद ही दूँगा.किसकी कोंन सी पंक्तियाँ अच्छी लगीं यह मैं बाद में बताऊंगा.

Manju Gupta का कहना है कि -

पहले बीस भाग्यशाली कवियों को बधाई .बेमिसाल प्रतिभा कविता में है

manu का कहना है कि -

अभी पूरा नहीं पढ़ सका हूँ..
पर कविताओं के साथ कविताओं की बात पढने में बड़ा मजा आया...
क्या मैं अगली बार अपनी (एक और) पहली कविता भेज सकता हूँ....
:)))

M.A.Sharma "सेहर" का कहना है कि -

यह विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र की प्रयोगशाला में लिखी गयी थी ...

ये तो अपने अन्नदाता हैं , आज इनकी यह दुर्गति..

लोग अक्सर लिखते हैं छपने के लिए... ( और एक मैं के लिखा छुपाने के लिए...)

माँ कोई ख़याल नहीं एक हकीकत है

वह पद्मावती हो जाये
"जायसी की पद्मावती"
मानसरोवर चल कर उसके पास आये
कोई 'पद्मावत' लिखे
हाँ एक महाकाव्य-
उस लड़की के नाम


कई बातें करनी थी तुमसे वो शाम ही शायद छोटी थी ,
जब तक तुमसे कुछ कह पता वो ख़त्म हो जाया करती थी.


तूने कभी देखा ही नही गौर से इसमें
दिल में तेरे लिये इक घर बना रखा है


यह मत सोचो
चंद अमीर बच्चों की
मुस्कानों से यह देश चमक उठेगा


थोडा सा बादल, थोडा सा पानी
दो आँखों की है ये कहानी


माँ अब अक्सर खामोश रहा करती है

हिन्दयुग्म का बेहद सराहनीया प्रयास ...
सभी के लिए बहुत यादगार पल होतें हैं ये ..
दिल से कहा सभी ने...
बधाई !!!!

शेष कल !!:))

karuna का कहना है कि -

पहली कविता
अहसन की कविता में कहीं शून्य मेरे अपने ही मन में ,
किसी कोने में तो नहीं ",
बहुत गूढ़ अर्थ को ली हुई पंक्तियाँ ,बधाई |
अम्बरीश की किसान के जीवन को दर्शाती एक ज्वलंत समस्या बधाई |
मनु ने दोस्त की जुदाई को दिल से उकेरा है |
ज्योत्सना ने चाँद के माध्यम से मं| के महत्व और आवश्यकता का सजीव वर्णन किया है |
रश्मि ने वक़्त की अभिव्यक्ति अच्छी की है |
आशीष की पहली कविता दर्द भरी पर अच्छी है |
योगेश की पहली कविता बहुत भावुकता से भरी है |
संगीता की गरीबों के प्रति अच्छी अभिव्यक्ति है |
दीपाली ने आँखों में रहस्य वाद का पुट डाला है |
अमर व कुलदीप की माँ के ऊपर लिखी कविता मं को छू गई |
शोभना ,अर्चना ,नीलेश व रेनू की कविताएँ अच्छी व मार्मिक हैं |
प्रीती की मौन भी एक संवाद है छोटी पर सारगर्भित कविता लगी |
रेनू, मंजूश्री व मुकेश की रचना में जीवन की झलक दिखी
खुशबु ने बचपन का मार्मिक कष्ट झेला जो कविता बनकर फूटा |
आप सभी को बधाई

राज भाटिय़ा का कहना है कि -

सभी कवियो को खुब सारी बधाई

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

पहले प्यार की तरह ही पहली कविता भी निश्चय ही अच्ची लगेगी हर किसी को,कई प्रयास वाकई इमान्दार दिखे जैसे मनु की दो जमा दो लाइने,कुछ बचकाने भी लगे जैसे किसानो का लाइन में लगकर पुलिस वालों से पिटना.....

शोभना चौरे
मंजु श्री
दीपाली आब
खुश्बू प्रियदर्शनी
की कविताएं भी पसन्द आईं/ श्याम सखा श्याम

sada का कहना है कि -

सभी रचनायें बहुत ही खूबसूरती के साथ लिखी गई हैं, और सभी रचनाकार बधाई के पात्र हैं, आपका आभार् व्‍यक्‍त करना चाहूंगी जो आपने सबको एकत्र किया और हम तक पहुंचाया ।

devendra का कहना है कि -

पहली कविताओं की दूसरी पारी-----
लगता है हिन्दयुग्म पहली कविताओं का ऐसा संकलन बनाने जा रहा है जिसमें हिन्दी के सभी कवि अपना नाम लिखाना चाहेंगे----बधाई।
-देवेन्द्र पाण्डेय

Deep का कहना है कि -

@ Ahsan ji..


कहीं यह शून्य मेरे अपने ही मन के
किसी कोने में तो नहीं!!

pehli kavita mein hi kaafi gehrai hai, shunya to man mein hi hota hai, bas use samajhne mein logon ko poori zindagi lag jaati hai, aapne to pehli kavita mein hi dhoond liya.
badhai.
khoobusrat rachna.

Deep का कहना है कि -

@ Ambrish ji


आत्महत्या उसकी नियति बेचारी
घर तक उसका है सरकारी
उसके दुःख की ना कोई सीमा
नहीं है उसका कोई बीमा
ऐसा है संपन्न किसान
अपना भारत देश महान
इसका केवल यही निदान
शिक्षा अपनायें सभी किसान .........

soch ko salaam...
[:)]

Deep का कहना है कि -

@ Manu ji

ये साल भी भुला न सकेगा तेरा ख़याल
आती रहेगी याद तेरी लौट-लौट कर


yaadein hoti hi hain aisi, kabhi bhi sataane chali aati hain.
sundar rachna.

..
@ ALL
baaki sabki rachna padh kar sabhi ko ek ek karke review dena main jaruri samajhti hun, fir aaungi padhne.
sabhi ko badhai.

Shamikh Faraz का कहना है कि -

मैं फिर आया हु कुछ कविताओं पे comment करने सबसे पहले अहसान जी.
सोच रहा हूँ,
कहीं यह शून्य मेरे अपने ही मन के
किसी कोने में तो नहीं!!
बहुत ही ज़बरदस्त फिलोसफी है. गज़ब.

Shamikh Faraz का कहना है कि -

अम्बरीश जी यह लाइन सबसे अच्छी लगी.

अधनंगा बदन कृशकाय है काया,
भरपेट अन्न न उसने पाया
दो बीघे का उस पर भार
संसाधन से है लाचार
कस कर कमर परिश्रम करता
मेहनत से वो कभी न डरता .......

Shamikh Faraz का कहना है कि -

चुपके से खयालों में आकर तुम मुझको सताया करती थी.
मैं तनहा बैठ के रोता था जब यादें आया करती थी.

पल पल हर पल उन पलों की यादे वो पल इस पल तक याद है.
मैं तुम्हे देख कुछ कहता था और तुम मुस्काया करती थी.

कितने प्यारे प्यारे दिन थे कितना हसीं था वो मौसम ,
'आशीष कहाँ हो' कहकर जब तुम मुझे बुलाया करती थी.


मेरे पास तारीफ़ के लिए लफ्ज़ नहीं है. दुसरे शेअर का पहला मिस्रा बहुत ही गज़ब का है. काश ये ग़ज़ल मैं कह पाता. बहुत ही लाजवाब.

Shamikh Faraz का कहना है कि -

दो आँखें
अब जाने कहाँ हैं
दो आँखें
अब मुझसे जुदा हैं
"वो " आँखें
अब मेरी कहाँ हैं
वो आँखें..
मुझे पल पल तडपाती
मुझे रह रह के रुलाती
मुझे याद हैं आती...वो आँखें..!!


दीपाली जी की "इन्तेज़ार एक ठण्ड है." कविता मुझे अभी तक याद है.
वैसे वो दो आँखे थी कौन. हा हा हा.

Shamikh Faraz का कहना है कि -

झरोखे से देख रहा हूँ
मेरी जिंदगी में
खुशियों की बहार आ रही है,
असमंजस में है मन
की द्वार खोल स्वागत करूँ
या लौटा दूँ इन्हें
हवाओं का रुख ले आया है जिन्हें
गलती से मेरी जिंदगी में !

पूरी कविता ही सुन्दर है.

Shamikh Faraz का कहना है कि -

ये मेरी मात्र कल्पना ही तो है
की मैं विश्व के लोगों के
हृदयों से पत्थर निकाल कर
एक बुत बनाऊं
और दफ़न कर दूं
गहराईयों मे
सदियों बाद ...
खुदाई मे जब वे
अवशेष मिलेयेंगे
तो लोग ! एक दिन !!
अपने अतीत के बचपने पर
या पिछडेपन की सभ्यता पर
विचारेयेंगे अवश्य ही ........
बहुत शांतिप्रिय हूँ शायद यही कारण रहा होगा .......

बहुत ही ख़ूबसूरत आपकी शुरुआत बहुत ही अच्छी है. "यह मेरी मात्र कल्पना ही तो है."

Shamikh Faraz का कहना है कि -

आपकी लाइन पर एक शेअर याद आ रहा है मुझे. कुछ कुछ आपकी कविता की पहली पहली लाइन से मिलता जुलता है.

आओ हम बैठें खामोश कुछ देर तक
गुफ्गू का एक तरीका यह भी.

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -

पहली कविताओं की दूसरी पारी ....... किसे भूलूं,किसे याद करूँ !

Ambarish Srivastava का कहना है कि -

सर्वप्रथम हिंदयुग्म को काव्य पल्लवन के माध्यम से कवियों की पहली रचनायें प्रकाशित करने के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद व हार्दिक बधाई |
१ १ २ १ १ २ २ १ २, २ २ १ १ २ २ १
पहली कविता यूँ सजी, मानो पहला प्यार |
हिंदयुग्म पर आ गयी , शीतल सुखद बयार ||
२ १ २ १ १ १ २ १ २, २ १ १ १ १ १ १ २ १
सबकी पहली कवितायेँ पढ़कर बस मजा आ गया और उनकी भूमिकाएं तो और भी मजेदार रहें | सभी को बहुत-बहुत हार्दिक बधाई |
सभी टिप्पणीकारों को बहुत-बहुत धन्यवाद साथ साथ विशेषकर "दीप जी "शामिख फ़राज़ जी", "सदा जी", दिशाजी और मंजू जी को बहुत-बहुत धन्यवाद , साथ करुना जी के टिप्पणी लेखन का तरीका प्रभावशाली लगा | उन्हें भी बहुत बहुत धन्यवाद |
आदरणीय श्याम सखा "श्याम" जी,
आपकी यह टिप्पणी -
"पहले प्यार की तरह ही पहली कविता भी निश्चय ही अच्ची लगेगी हर किसी को,कई प्रयास वाकई ईमानदार दिखे जैसे मनु की दो जमा दो लाइने,कुछ बचकाने भी लगे जैसे किसानो का लाइन में लगकर पुलिस वालों से पिटना....."
अत्तयंत प्रभावशाली लगी" आपको बहुत-बहुत धन्यवाद |
वैसे भी मैं काव्य क्षेत्र में आपके समक्ष बच्चा ही हूँ और सच्चाई सिर्फ बच्चे ही बयां कर पाते हैं | धन्यवाद |

आभार सहित सादर,
अम्बरीष श्रीवास्तव

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