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बस्तर के गाँव में


हिंद-युग्म के पुराने पाठक डाँ सुरेश तिवारी की कविताओं से पहले ही परिचित होंगे। मार्च 2010 के यूनिकवि रहे डॉ सुरेश की कविताएं हिंद-युग्म के मंच पर कई बार प्रकाशित हुई और सराही गयी हैं। उनकी पिछली कविता ’नदी बोलती है’ गत वर्ष के अक्टूबर मे प्रकाशित हुई थी। नवंबर प्रतियोगिता के माध्यम से उनकी हिंद-युग्म पर कुछ अरसे बाद वापसी हुई है। उनकी कविता ने इस बार दूसरा स्थान हासिल किया है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले से तअल्लुक रखने वाले डॉ सुरेश तिवारी की कविताओं मे अपनी मिट्टी के प्रति प्यार छलकता है तो उसी मिट्टी का दर्द भी शिद्दत से झलकता है। हिंसा और दमनचक्र से जूझते हुए मुल्क के इस हिस्से के लोगों की पीड़ा उनकी इस कविता से भी रिसती नजर आती है।

पुरस्कृत कविता: बस्तर के गाँव में...

बचपन में जब भी
आसमान के सीने में
हेलीकाप्टर या हवाई जहाज
जिसकी दहाड़ती आवाज
लगती गुंजने
गली में जमा हो जाते
बच्चे, जवान और बूढ़े
लगते आसमान को निहारने
जैसे ही किसी की पड़ती नजर
उठती उॅंगली
गुंजने लग जाती किलकारी
और उठ जाती कई उॅंगलियाँ.
आज भी...
मेरे घर के छत ऊपर से
गुजरता है हवाई जहाज
आती है हेलीकाप्टर की आवाज
लेकिन नहीं निकलते
बच्चे, जवान और बूढ़े
न ही गुंजती है किलकारी
न उठती है उॅंगलियाँ
वरन्
बच्चे दुबक जाते हैं
अपनी माँ की गोद में
माँ सहम जाती है डर से,

पिता का दिल दहलता है
अनजानी आशंका से
बूढ़ों की आँखें पथरा जाती है
दहशत से.
सबके सब
जान लेते हैं
बिना बताए ही...
कि फिर कहीं चली है गोली
फटा है कोई बम
और चिथड़ों के रूप में
फिर बिखरी है ला्शें
फिर उजड़ी है कोई माँग
यतीम हुआ है कोई बच्चा
या सूनी हुई है
किसी माँ की गोद.
कोई भी तो नहीं चाहता
कि भरे उड़ान
कोई हेलीकॉप्टर
हवाई जहाज
उसके घर की
छत के ऊपर से...
_______________________________________________________________
पुरस्कार- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

नदी बोलती है


बस्तर के समर्थ कवि डॉ॰ सुरेश तिवारी मार्च 2009 माह के यूनिकवि रह चुके हैं। आज हम इनकी एक लम्बी कविता प्रकाशित कर रहे हैं जो बहुत प्रसिद्ध भी रही है।

डॉ॰ सुरेश तिवारी
Dr Suresh Tiwari
अपनी बात- मनुष्य जब रोजमर्रा की जिंदगी से उब जाता है तब पर्यटन उसके ज्ञान, मनोरंजन, तफरीह के साथ-साथ जिज्ञासु मन को शांत करने का सबसे अच्छा उपाय होता है। यदि साधन सीमित हों, प्राकृतिक सौंदर्य को करीब से निहारना हो तो बस्तर हर कदम पर सैलानियों का स्वागत करता है। नैसर्गिक छटा के साथ-साथ अंधेरी गुफाओं का रहस्य, पुरातात्विक धरोहरों को समेटे सांस्कृतिक नगरियॉं, शैव, वैष्णव, बौद्ध तथा जैन धर्मों के प्राचीन सांस्कृतिक मिलन का अनूठा मिसाल बस्तर की कहानी खुद कहती है। बस्तर में विस्तारित घने वनप्रांतर में बांसों के झुरमुट, जिन्हें सूरज की किरणें भी भेद पाने में असहज महसूस करे, गगनचुंबी पहाड़ियॉं, जिनके घाटियों के दामन में अनेक खूबसूरत जलप्रपात, कल-कल निनादित नदियों का उद्दाम प्रवाह, झरने, चारों ओर फैली हरीतिमा और इनके बीच घास-लकड़ी से बने झोपड़ियॉं, जिनमें निवसित आदिम जीवनशैली - सैलानियों को चारुपाश में निबद्ध करती है।

बस्तर के वनवासियों में सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जहॉं लोकगीत तथा लोकनृत्य मुख्य हैं, वहीं शिल्प कलाओं के अंतर्गत बस्तर राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रखता है।

धातु शिल्प अंतर्गत लौह शिल्प में नगरनार क्षेत्र के कारीगरों की कारीगारी अद्वितीय है। वहीं कांस्य शिल्प में कोंडागांव तथा एर्राकोट दो प्रसिद्ध केंद्र हैं।

मृदा शिल्प अंतर्गत नगरनार क्षेत्र के हाथी देश-विदेश में बस्तर की शोभा बढ़ा रहे हैं, बस्तर का काष्ठ शिल्प तो बेजोड़ है।

इरिकपाल की कौड़ियों से बने वस्त्र कलाकृतियॉं अनूठे परंपरा के धरोहर हैं।

मोरपंख, सींग, साई कांटा, सीप, शीतल पौधा, घास आदि से भी सुंदर कलाकृतियॉं तैयार करने में वनवासी निपुण हैं।
सियाड़ी छाल की रस्सी से बनी चारपाई, तुम्बा से बनी कलाकृतियॉं भी पर्यटकों को मोहने में सक्षम है। पुरातात्विक दृष्टि से बस्तर अनुसंधान तथा शोध के लिये भरपूर अवसर देता है. बारसूर में चंद्रादिव्य मंदिर, मामा-भांजा मंदिर, बत्तीसा मंदिर, गणेशद्वय की विशालकाय प्रतिमा, नागमाता मंदिर, यत्र-तत्र बिखरे पुरावशेष, संग्रहालय की प्राचीन, अखंडित शिव-विष्णु की प्रतिमाएं शैव तथा वैष्णव धर्म के मानने वालों की सांस्कृतिक वैभवशाली नगरी होने का साक्ष्य देती है. भोंगापाल में बौद्ध चैत्यगृह तथा शिव मंदिर के पुरावशेष, कुरूसपाल से खुदाई में निकली महावीर स्वामी की पाषाण प्रतिमा, कोंडागांव के निकट सत्ताइस मंदिरों की श्रृंखला, अड़ेंगा में खुदाई से प्राप्त बत्तीस स्वर्ण मुद्राएं, जैतगिरी के निकट मुद्रा एवं मृदापात्रों के अवशेष, ढोडरेपाल, चिंगीतरई, समलूर, नारायणपाल, मधोता, केसरपाल, बस्तर आदि स्थानों पर मंदिर प्रतिमाएं, पुरावशेष ऐतिहासिक धरोहर है. आवश्यकता है तो इन्हें सहेजकर रखने की।

बस्तर नैसर्गिक सौदर्य का अथाह सागर है, समतल क्षेत्रवासियों के लिए जलप्रपात, गुफाएं, जंगल, घाटियॉं, वन्यप्राणी महज किताबी बातें हैं, वहीं बस्तर की सुरम्य वादियों में यह सब कुछ कदम-कदम पर सैलानियों का स्वागत करते हैं।
मिनी नियाग्रा के रूप में प्रसिद्ध चित्रकूट जलप्रपात, प्रपातों का समूह तीरथगढ, मनोहारी मिलकुलवाड़ा-हांदावाड़ा, अद्वितीय खुसेल, मलाजकुडुम, नोगोबागा, मुत्तेखड़का, चित्रधारा, कांगेर धारा, हाथीदरहा, मंडवा, फूलपाड़, सातधार चर्रेमर्रे, मल्गेर, बोग्तूम, लंकापल्ली जलप्रपात- सबकी अपने ढंग की अनूठी प्राकृतिक छटा है।
भूगर्भीय रहस्यों को समेटे विश्व के सातवें क्रम की बड़ी गुफा कोटमसर, अद्भूत आरण्यक गुफा, दण्डक, कैलाश, सकल नारायण, नड़पल्ली, उसूर, तुलार, रानीगुफा पर्यटकों को रोमांच का अनुभव कराती है।
बस्तर चारों तरफ घाटियों से घिरा हुआ है, प्रसिद्व केशकाल घाटी ,बंजाटिन घाटी, झीरम दरभा घाटी की सर्पीली सड़कें पर्यटकों को अनोखा आनंद देती है।
दंतेवाडा जगदलपुर, कांकेर, नारायणपाल, समलूर, चिंगीतरई, बड़ेडोंगर, गिरोला आदि प्रमुख धार्मिक स्थल हैं, जहॉं पर्वो को मनाने की विशिष्ट परंपराएं भी समाहित हैं. दंतेवाड़ा में होली पर्व पर गौर मार, आंवलामार, जगदलपुर में बस्तर का विश्वप्रसिद्व तथा सबसे लंबे 75 दिनों तक चलने वाला दशहरा पर्व, तुपकी का आनंद देते गोंचापर्व, बस्तर के धार्मिक, सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक गौरव गाथा के प्रतीक हैं।
बस्तर का वन सौंदर्य भी सैलानियों को आकर्षित करती है, बस्तर में ट्रेकिंग की अपार संभावनाएं हैं। स्थानीय लोग ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए मददगार साबित हो सकते हैं।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान देश का प्रथम घोषित बायोस्फियर क्षेत्र है, यहॉं की जैव विविधता से वनवासी परिचित हैं, भैंसा दरहा का मगरमच्छ अभयारण्य, झुंड के झुंड में विचरण करते राष्ट्रीय पक्षी मयुर, राजकीय पक्षी घोषित पहाड़ी मैना तथा अन्य संरक्षित प्राणी सालवनों के द्वीप कहे जाने वाले बस्तर की शोभा एवं श्रृंगार हैं।
बस्तर की जंगलो के औषधि पौधों से वनवासी भली भांति परिचित हैं, यहॉं के वनवासी कठिन रोगों का इलाज वनौषधियों द्वारा चुटकियों में कर लेते हैं, उनके इस ज्ञान के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता है।
इन सबके बाद भी बस्तर आज भीषण नक्सली कहर से जूझ रहा है. यहाँ की धरती खून से लाल हो रही है. धमाके की आवाज दहशत पैदा करता है. हैलीकाप्टर की आवाज एक और खूनी संघर्ष के बाद शवों का प्रतीक होता है. ऐसे में कलम के नोंक की स्याही और अपनी संवेदनाओं को बचाए रखने के लिये यहाँ साहित्यकार जूझ रहे हैं।
नदी बोलती है...
वाचाल हो जाती है...
प्रवाह के साथ,
कल-कल करती,
और धीमेपन में
गुनगुनाने लगती है.
यही है-
नदी के जीवंत होने का अहसास
जिससे जन्म लेते हैं
गीत संगीत
मानवता, सृजन, कल्पना,
और..
कोणार्क, ताज,
खजुराहों की परिकल्पना.

नदी के बोल तक
तिमिर का तिरोहण है तय,
और आलोक सदा रहेगा स्पंदित,
चाहे भीष्म की तरह आलोक-
बिंधा रहे
तिमिर-शर से,
और प्रतीक्षा करता रहे
उत्तरायण की.
लेकिन नदी
इस आलोक को
कभी मरने नहीं देगी.

नदी बोलती है...
नदी के बोल
जगाते हैं आशाएँ
गूँथते हैं ऋचाएँ- वाणी में.
और इस स्तुति को ही
नदी मान लिया हमने,
फिर स्थगित कर दी-एक परंपरा
नदी में स्तुति गान की.
नदी की पावनता-
उसके प्रवाह में है समाहित.
और स्वरुप है जननी का-
यही अधिष्ठात्री है कर्म की
प्रतिमान है- गति की,
प्रतीक है संकल्प की,
प्राण है- जिजीविषा की,
और...
अस्मिता है- मनुष्यत्व की,
फिर इस विस्तार में
कैसे समा सकती है- सिर्फ स्तुति.
नदी....
परे है उद्गम से
और.... सागर से भी,
नदी तो प्रवाह है
जो चट्टानों को तोड़,
धरती का सीना चीर कर
अपना पथ-
स्वयं निर्मित करती है.
कहीं निनादमय
कहीं मंथर,
लेकिन अविराम
और अविकल,
अन्यथा...
सीमित हो जाती,
गोमुख से निकलकर,
धरोहर बन जाती
किसी ताल या सरोवर का;
या विश्राम पाती
अथाह सागर के वक्ष स्थल में.
हो जाती मौन
और खो देती अपना अस्तित्व.

नदी....
जो अपने प्रवाह के कारण ही
नदी है.
निरंतर प्रवहमान...
इसीलिए नदी बोलती है
गुनगुनाती है
और
करती है
घोर निनाद भी...
समुद्र करती है गर्जन
लेकिन नदी...
करती है वार्तालाप
परिभाषित करती है-
मानव जीवन को.
नदी के तट पर बसे तीर्थ
इन तीर्थो पर पल्लवित पाखण्ड
रचते है षडयंत्र
मानव को मानव से
दूर रखने का.
नदी में प्रदूषण का विसर्जन
परिणाम है हमारी विकृत वृत्तियों का.
फिर भी नदी
अपवित्र नहीं होती
क्योंकि...
नदी में है प्रवाह,
और नदी तट के तीर्थ भी
जड़ नहीं हैं....
वरन्
पड़ाव हैं
मानवता के,
प्रवहमान यात्रा के.
जहाँ साक्षात गति गूंजती है,
और नदी की यही वाचालता
झकझोरने लगती है
मानव मन को.
देती है चिंतन
करती है बाध्य सोचने को,
आखिर...
नदी बोलती क्यों है.....

नदी...
देन है प्रकृति की,
तटनिष्ठ-
जिन पर आश्रित-
समाधिकार का भाव
इसीलिए....
कालिया नाग
यमुना से निष्काषित,
प्रतीक है-
जलराशि पर
एकाधिकार के क्षय का.
भारत की पावन धरा से
सिंधु-गंग उद्गमित हो,
पाक बंग में प्रवाहित है.
नदी की उदारता,
क्योंकि...
देश-राज्य की सीमाएँ-
अंकित नहीं धरती पर
वरन्
सिमटे हुए महज मानचित्र पर.,
और...
मानचित्र से पहले
है अस्तित्व- धरती का,
नदी का,
नदी में प्रवाह का.
इसीलिए नदी...
परे है.
इसी सीमा बंधन से.
अतीत से आगत तक
प्रवाहित है यह नदी-
देती है संदेश
सदा गतिशीलता का,
क्योंकि...
नदी बोलती है.
अतीत में इन्हीं तटों पर
बनते थे आश्रम,
पूर्ण-कुटीर,
और...
स्वागत करते थे
नदी के प्रवाह का,
आम्र, शाल और ताड़पत्रों के
वंदनवारों से...
इनके बीच
कर्म और साधना
करते थे परिष्कार
मानव का
और गढ़ते थे
सरयू तट पर राम को,
यमुना तट पर कृष्ण,
अर्जुन और एकलव्य को,
नदी के प्रवाह से ही
ओंकारेश्वर में शंकर
गढ़ दिए जाते थे
शंकराचार्य के रुप में,
और महिष्मति में
रेवा तट पर मंडनमिश्र
नदी के प्रवाह की ही देन है.
संपूर्ण कर्ममय मनीषा
जिसे
शायद इतिहास
कभी दोहरा सकेगा.

नदी बोलती है
अपने से,
अपनों से...
महानगरीय शब्द तो
फिसल जाते है,
लेकिन
नदी के बीच से बटोरे गए शब्द
बंध जाते हैं,
देते हैं उर्जा व प्राण-भाषा को.
इन्हीं शब्दों से रचित है
सरयू तट पर रामायण
गऊघाट पर सूरसागर
और वर्तमान में न जाने कितने गद्य और पद्य
साकेत और कामायानी के रुप में.

नदी बोलती है ......
नदी के बोल में
उसकी व्यथा नहीं
हमारी कथा होती है
जो सुनाती है
असमानता, अन्याय और
शोषण का गान.,
देती है सीख
और कहती है-
हे मानव
तुम वह बनो
जिसके लिए तुम अनुप्राणित हो,
सृजित हो, रचित हो.
तुम्हारा आज
कल से बेहतर हो.
तुम्हारा सृजन...
मानक बन सके- भविष्य के लिए
तुम बन सको- नींव का पत्थर
अघ्र्य बनो,
तुम्हारे अंतर में गूंजे-
कृष्ण की बाॅसुरी,
उच्चारित हो गीता,
करो जयघोष...
अपने भीतर के स्पंदन को,
अनमोल संवेदन को,
सार्थक कर दो.
बनो पाखी
और पंछी को दो उड़ान,
तुलसी का बिरवा बनकर
सुरभित कर दो मिट्टी का कण-कण.
इतना सब कुछ रहकर भी,
पीढ़ी दर पीढ़ी गुजार कर,
और...
इन पीढ़ियों के बीच
बहुत कम जन्म ले पाया मनुष्य.
जहाँ मानव संज्ञा मात्र न होकर
मानवता का हो स्पंदन.
और नदी के ये बोल
मुखरित हैं उस की कल-कल में.
उस दिन.
यह सब सार्थक होगा
और
इसीलिए..
नदी बोलती है,
अतीत से वर्तमान तक,
वर्तमान से भविष्य तक
बोलती ही रहेगी...
क्योंकि...
नदी बोलती है.

यूनिकवि- डॉ॰ सुरेश तिवारी

'पहली कविता' का दसवाँ अंक







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन (विशेषांक)




विषय - पहली कविता

अंक - अट्ठाइस (भाग-३)

माह - अगस्त २००९






हम लोग जहाँ 62वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं वहीं नये/पुराने कवियों की पहली कविताओं का दौर जारी है। पिछले महीने "पहली कविता" की दूसरी शृंखला शुरू करने की उद्घोषणा करने के बाद इसमें देश-विदेश से हमारे पाठकों का योगदान लगातार बढ़ रहा है। इस विशेष अंक में अब तक हम १६० से अधिक कवितायें प्रकाशित कर चुके हैं। इन विशेष कविताओं की अगली कड़ी लेकर हम हाजिर हैं।

जैसे जैसे हमें और कवितायें मिलती जायेंगी, हम 20-20 कविताओं के साथ आपके समक्ष उपस्थित होते रहेंगे। हमारे पाठकों ने हमें भूमिका भी लिख भेजी है जिसे हम कविता के साथ ही प्रकाशित कर रहे हैं। अलग अलग अनुभवों पर लिखी गईं वो चंद पंक्तियाँ आज हमारे इस मंच का हिस्सा बन रही हैं। हम आशा करते हैं इससे हमारे अन्य पाठकों को भी प्रेरणा मिलेगी और वे हमें कविता लिख भेजेंगे। चलिये पढ़ते हैं 20 कवियों की पहली कवितायें।
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उन दिनों प्रादेशिक चित्रगुप्त महासभा की प्रांतीय कार्यकारिणी की बैठक के लिए नागदा गया था. प्रांतीय संगठन मंत्री था. एक स्थानीय मित्र श्री रमेश सक्सेना के निवास पर समाचार पत्र पढ़ा. किसी समाचार के साथ शीर्षक था 'दर्पण मत तोड़ो'. यह मन को छू गये और एक गीत धीरे-धीरे कलम के सहारे कागज़ पर उतर गया. इसके पहले कुछ तुकबन्दियाँ ज़ुरूर की थीं पर वे याद नहीं. यह गी आठवें दशक के अंत में रचा गया होगा. यह मुझे हमेशा प्रिय रहा. बहुत कम स्वरचित रचनाएं याद हैं..यह उनमें ही है.
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दर्पण मत तोड़ो...

अपना बिम्ब निहारो दर्पण मत तोड़ो,
कहता है प्रतिबम्ब की दर्पण मत तोड़ो.
स्वयं सरह न पाओ, मन को बुरा लगे,
तो निज रूप संवारो,दर्पण मत तोड़ो....
शीश उठाकर चलो झुकाओ शीश नहीं.
खुद से बढ़कर और दूसरा ईश नहीं.
तुम्हीं परीक्षार्थी हो तुम्हीं परीक्षक हो,
खुद को खुदा बनाओ, दर्पण मत तोड़ो....
पथ पर पग रख दो तो मंजिल पग चूमे.
चलो झूम कर दिग्-दिगंत-वसुधा झूमे.
आदम हो इंसान बनोगे प्रण कर लो,
पंकिल चरण पखारो, दर्पण मत तोड़ो.
बांटो औरों में जो भी अमृतमय हो.
गरल कंठ में धारण कर लो निर्भय हो.
वरन मौत का कर जो जीवन पायें 'सलिल'.
इवन में उन्हें उतारो, दर्पण मत तोड़ो.

--संजीव वर्मा 'सलिल'


यह मेरी सबसे पहली कविता है जिसे मैंने ०७/१०/१९९१ को अपने सबसे छोटे भाई धीरज के लिए लिखी थी...उसके विद्यालय में कोई समारोह था, शायद हिंदी दिवस... उस वक़्त मैं कक्षा ११ का विद्यार्थी था...

स्वतंत्र हम-
भारत के जन-गण
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बापू नेहरू के
भारत में जीते हैं क्या?
सत्य-अहिंसा- पंचशील
पुस्तकेषु सिद्धांत हैं।
पदवी-पैरवी में है रेस
लाठी वाले की है भैंस।
मूल्यों का कोई मूल्य नहीं
कुर्सी के सब ग्राहक हैं।
समाजवादी- समाजसेवी
जग-जाहिर रंगे सियार है।
राजनेता धर्मवक्ता
रामराज्य के प्रवक्ता हैं
पर राम राज्य का साधन है।
कौन जनता का दुःख हरता है?
इन झंझटों में कौन फंसता है।
राजनीति और धर्म-
इन दो पाटों के बीच
केवल घुन ही पिसता है।

--नीरज कुमार


बात तब की है जब बारहवी कक्षा में पढ़ता था (सन २००१-०२ ). उस समय म०प्र० में बिजली बहुत कटती थी . मजबूरन पढाई लालटेन के उजाले में करनी पड़ती थी . एक दिन यूँ ही लालटेन के उजाले में कुछ शब्दों को पिरोया तो आर्श्चय का ठिकाना न रहा की मैंने एक कविता लिख डाली थी . दूसरे दिन स्कूल में जब दोस्तों को दिखाया तो किसी ने विश्वास न किया. फिर अपने आप को साबित करने के लिए मैंने फिर दूसरी कविता लिखने शुरू किया और दोस्तों के प्रोत्साहन से आज लगभग ३०० से भी अधिक कवितायेँ लिख चूका हूँ.

एक दिन मैं सड़क से जा रहा था।
मन में कुछ गुनगुना रहा था ।
इतने में एक सरकारी स्कूल मिला।
सोचा , चलो चलाये टाइम पास का सिलसिला
टीचर अंग्रेजी यूँ पढा रहे थे ,
मानो अंग्रेजी की धज्जिया उड़ा रहे थे।
बोले बच्चो होता है एल फॉर लालटेन
ये सुन मैं हो गया बैचैन
मैंने कहा एल फॉर लाइट के ज़माने में लालटेन पढा रहे हो,
क्या कंप्यूटर युग में भी टाईपराइटर चला रहे हो ।
टीचर बोले - एल फॉर लाइट ही नहीं रहेगी तो कंप्यूटर कंहा से चलेगा ?
जब तक होगी विद्युत कटौती तब तक हर बच्चा एल फॉर लालटेन ही पढेगा ।

--मुकेश पांडे "चन्दन"


एक छवि मेरे यादों में आई है
फिर से उसकी शक्ल सामने छाई है।
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मेरे सामने वाले प्रांगन में
कुछ बच्चे आते हैं अक्सर
शस्य श्यामला भारत माता
के कहलाते कनक िशखर
नंगे तन, सांवले रंग
सहज छबीले मतवाले अंग।
मिट्टी से मटमैले पट में
फिरते हैं ये मारे-मारे
इधर-उधर जा भाग दौड़
चुनते रहते बेमोल रतन
सिगरेट, शराब के खाली डब्बों में
बुनते रहते वे अपने सपने
और बचपन की सारी खुशियाँ वे,
कूड़ों के बीच गंवाते हैं।
अरमानों को रौंद बेच कर
रोटी का मोल चुकाते हैं।
निकले हैं कहॉं जाने को ये
पहुंचे हैं कहॉ मालूम नहीं
उनके भटकते कदमों को
मंजिल का निशां मालूम नहीं ।
अपना नहीं कोई उनका
जो है सब पराया है
हर तरफ उनके लिए बस
बेबसी का साया है।
मानवता के नाते बरबस
यूं ही सोचने लगता हूं
किसने छीना इनका बचपन
क्यों ये कूड़ों में बसते हैं
कल के भावी गौरव ये
क्या ऐसे ही बिखरे रहते हैं

--संदीप कुमार श्रीवास्तव


जब पहली कविता की ही बात है तो मैं वास्तव में अपनी पहली कविता भेज रहा हूँ। ये कविता मैंने तब लिखी थी जब मैं १२ साल का था और छठवीं में पढता था। मैं उस समय क्रिश्चियन इंटर कालेज में पढ़ता था, ये कालेज फर्रुखाबाद में है और ६ से १२ तक का है। हमारे कालेज में एक पत्रिका निकलती थी 'प्रकाश वाहक' उसके लिए छात्रों से रचनायें माँगी जाती थी। मैंने भी कविता लिखी और ज्योति स्वरूप अग्निहोत्री जो संपादक मंडल में थे के पास ले गया। मेरी खुशी का ठिकाना तब नहीं रहा जब उन्होंने पहली बार में ही मेरी कविता स्वीकार कर ली। तब से आज तक मैं सैकडो कविताये लिख चूका हूँ और बहुत सी पत्रिकयों और पत्रों में प्रकाशित भी हो चुकी हैं, पर वो ख़ुशी अलग ही थी

नाम मेरा है भ्रष्टाचार...
जहाँ न कोई आचार विचार
दुनिया भर में व्याप्त हूँ मैं
पर एक जगह अभिशप्त हूँ मैं,
रहना मना छोटे घर बार,
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,
पुलिस, डाक्टर ,नेता हो,
सारी दुनिया का चहेता हो ,
होगा मेरा आज्ञा कर ,
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,
इर्ष्या गुस्सा दादा दादी,
बेटा बेटी खून बर्बादी ,
चोरी चपलता रिश्तेदार,,
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,
रिश्वत बाई बीबी मेरी …।
धन से मेरी प्रीत घनेरी ,,,,
है भरा पूरा मेरा परिवार,,,,
नाम मेरा है भ्रष्टाचार
काले गोरे का भेद न मुझको
हार जीत का खेद न मुझको …
नीचे से ऊपर तक मेरी सरकार …॥
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,
ऊँचे नीचे वेतन भोगी,
छात्र अध्यापक या उद्योगी,
सब पर मेरा सामान अधिकार
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,

--प्रवीण शुक्ला


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आज एक और दिन दुखी होने का,
एक और दिन रोने का,
लोग खुश होते है,
उनके हँसने पर.
हमे तो,हमे तो अब उनकी हँसी भी
रोने को उकसाती है.

आज जब हम मिले
तो शायद लोगों को लगा की हम मिल रहे है.
पर शायद हम जुड़ा हो रहे थे;
और वो खफा हो रहे थे...

ग़लती शायद दोनो की थी,
या सिर्फ़ मेरी,
पर ग़लती तो ग़लती थी
प्रेम एक बंधन है,
पर ये एक जकड़न बन गया,
इन बेड़ियों से निकलना ही बेहतर था,
शायद यही भाग्य का
इशारा था

काश वो जहाँ भी जाए,
हमे याद ना कर पाए,
क्यूंकी कहीं हमारी याद
उनकी आँखो से ना बह निकले;
क्यूंकी कहीं हमारी याद
उनकी आँखो से ना बह निकले;
और एक नया 'अनूप' बन जाए."

--अनूप कुमार गुप्ता


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प्रो.चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध" जी की पहली रचना.... पुलिस पत्रिका वर्ष ३ अंक ११ नवम्बर १९४९ के पृष्ठ १ पर प्रकाशित यह रचना मिली ...पत्रिका के कोनो में दीमक लग रही थी ...शुक्रिया काव्य पल्लवन का कि अब यह रचना चिर सुसंचित रह सकेगी ....

आरक्षी दल के सिपाही से
चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध
सिपाही तुम स्वदेश की शान!

तुम पर आधारित जनता के अरमान
शांति व्यवस्था और सुरक्षा का तुम पर भार पड़ा है
तुम खुद को छोटा मत समझो, छोटे का अधिकार बड़ा है
तुम से है समाज संचालित, तुम समाज के प्राण
सिपाही तुम स्वदेश की शान!

बूंद बूंद जल के मिलने से सागर का निर्माण हुआ है
सच्चे सदा सिपाही दल से ही स्वदेश बलवान हुआ है
कर्म निष्ठ बन, धर्म निष्ठ बन राखो अपनी आन
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

सत्य धैर्य औ नीति निपुणता सदा तुम्हारा प् दिखलायें
किन्तु शत्रु के लिये निठुरता पौरुष तुम में आश्रय पाये
भारत के विद्रोही जग में रह न सकें सप्राण
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

वर्षों का फैला अंधियारा मानस मंदिर से मिट जाये
मातृ प्रेम का विषद दीप अब जन मन में प्रकाश फैलाये
मां का मान न घटने पाये, हो चाहे बलिदान
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

बस अपने कर्तव्य प् के तुम निधड़क राही बन जाओ
देख हठीली विपदाओ को भी
न तनिक तुम घबराओ
कर दो अंकित मेरु शिखर पर भी निज चरण निशान
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

राष्ट्र ध्वजा लहरा लहरा कर तुम से रोज कहा करती है
शाम सबेरे बिगुल तुम्हारी रोज पुकार यही करती है
कदम कदम बढ़े चलो भारत के अभिमान
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

--प्रो.चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध"


बचपन के दिनों से हो कुछ लिखने की आदत बनती जा रही थी-
देखी-सुनी चीजों के प्रति मासूम अभिव्यक्ति । पहली कविता , जिसे मैंने सुब्बू को याद करते हुए लिखा। पास में ही रहनेवाली वह तीन-चार साल की बच्ची मेरे पास अक्सर आया करती थी। एक दिन सुबह-सुबह सामूहिक रुदन की आवाज़ पर मैं दौड़ती हुई पहली बार सुब्बू के घर पहुँची-........ सुब्बू भगवान् को प्यारी हो गई थी। कई दिनों तक अन्यमनस्क रहने के बाद मैंने लिखा-

दो दिन के लिए
एक फूल खिला
दो पल हंसकर
मुरझा भी गया
यह जीवन एक तमाशा है
जाते-जाते समझा भी गया !
यही है दुनिया का क्रम देखो
कोई आता है,कोई जाता है
कोई हंसकर शीश उठाता है
कोई सर धुनकर पछताता है
जग है अद्भुत मायानगरी
यहाँ अपना और पराया क्या !
हम तो जाते हैं वो देखो
लाखों कलियाँ हैं निकल रही
वीरान न होता बाग़ कभी
दुनिया किसके हित विकल रही
मत सोच वृथा तू कर पगले
कैसी ममता ,कैसी माया !

--सरस्वती प्रसाद


सरिता

तुम कितनी हो चंचल
तुम कितनी हो चंचल
फिर भी हो तुम निश्छल
कितनी पावन व निर्मल
आज रुको पल दो पल
विश्राम करो क्षण दो क्षण
सरिता
इठलाकर,
बल खाकर कहती
चल हट
आज नहीं...
कल कल.
कल कल..
कल कल...
8 अगस्त 1973
--सुरेश तिवारी


बादलों के देश से

बारह वर्ष की थी
कक्षा में विषय मिला बादल
कविता लिखनी थी
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कुछ ने रुई के फाहों से सफ़ेद बादलों को चुना
मुझे उमड़ते-घुमडते काले बादल मन भाए
आज भी बड़े मित्रवत लगते हैं
बचपन से जानती हूँ इन्हें

पहाड़ों की कोख में जन्मी
प्रकृति प्रेम सहज था
आसान जान पड़ा लिखना
तुकबंदी ही कविता होती हैं
ऐसा कुछ भ्रम था
सुंदर तुक मिलान की भरपूर कोशिश
बन गई सहज सरल पहली कविता
पुरुस्कार स्वरुप मिला
प्रशस्ति-पत्र कलम व
प्रधानाचार्य के स्नेहिल शब्द
मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित हैं

"कलम प्रिय सखी साबित होगी लिखते रहना "
खुशी के क्षण बाँटना आसान है
दुख के पलों में लिखना भाता है मुझे
चाहे वो निरीह प्राणी के क्रंदन का हो
आज बादलों के देश से दूर
मीठी यादों को संजो
जब कुछ लिखना चाहती हूँ
अनायास ही होठ बुदबुदा उठते हैं
"कलम परम मित्र प्रिय सखी मेरी "
और कागज़ पर शब्द उकेरना आसान हो जाता है

--एम.ए.शर्मा ’सेहर’


ऐ मोहब्बत् अगर तू ना होती
तो मेरी जिन्दगी मे विरानिया ना होती
ना होता खुशियो का इन्तजार मुझे
क्योकि मेरी जिन्दगी में उदासी ना होती।

ना होता तुझसे बिछङने का डर
क्यो किं मै तेरे इन्तजार मे ना होता
ना बहते मेरे आंखो से अश्क के धारे
अगर मुझे तेरे जाने का गम ना होता।
ऐसा भी क्या हुआ कि तुमने मुझे ठुकरा दिया
जब पूछा मैने तो तुमने मुझे बेवफा ठहरा दिया।

ऐ मोहब्बत अगर तू ना होती
शरारत ना होती, शिकायत ना होती
नैनो मे किसी की नजाकत ना होती
ना होती बेकारी ना होते हम तन्हा
किसी को चाहने की तमन्ना ना होती
दिल भी ना होता तन्हा ना रोता दिवानो सा
अपनी ये हालत ना होती
ऐ मोहब्बत् अगर तू ना होती।।

--मिथिलेश दुबे


उस समय जब मैं स्नातक में था और मैं कुछ मायूस सा था, तब मेरे मन में कुछ लिखने का विचार आया और परिणामस्वरूप यह कविता बन गयी.यह मेरी पहली कविता है क्योंकि गद्य तो मैंने पहले लिखा हुआ था और कुछ शेर-ओ-शायरी भी की थी परन्तु कविता नहीं लिखी थी.
ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है
ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है
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लाख आएँगी मुश्किलें
तेरे इस सफर में

और अकेलेपन के लम्हे
डरायेंगे तुझे इस सफर में

ऐ राही तुझे नही डरना है
सिर्फ़ आगे बढ़ना है

आगे बढ़कर भी अगर
ना मिले मंजिलों के रास्ते

मत समझ लेना भूल कर
ये आखिरी हैं रास्ते
ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है ......

हमसफ़र बनकर आ भी जाए
अगर कोई इस सफर में

मत समझ लेना भूल कर
वो साथ निभाएगा तेरा हरा सफर में
ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है .....

मंजिलें तो बनी हैं पाने के लिए
उन्हें तो एक दिन मिलना ही है
पर ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है

--अनिल कान्त



तू सुबह की पहली किरणों मे
तू रात को तारों की चादर मे
फिर सुबह सुबह के ख्वाबों मे
रहती तू मेरी बातो मे
तू भंवरो की "गुंजन" में है
हर महक फूल मे तेरी है,
तू मौसम की अंगड़ाई मे भी ,
ये रंग कहे तू मेरी है....
ये जीवन मे उलझन है मेरी ,
या साँझ की हेराफेरी है,
शायद ना कह पाऊँ तुझे पर तू मेरी है बस मेरी है ..

--जयवर्धन तिवारी


आयो रे आयो रे, घनघोर सावन आयो रे
रिमझिम बूंदों का सागर, तपती धरा की प्यास बुझाने आयो रे
झुलसी कलियों में नव संचार, पुष्पों की मुस्कान खिलाने आयो रे
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माटी की सुगंध, भवरों का गुंजन, हर शाख पे नूतन ले आयो रे
कल-कल, चल-चल करती बुँदे, नदियों का कोलाहल ले आयो रे
नृत्य में लय, सुर में ताल, मृदंग बजाता आयो रे
कवियों में सृजन, संगीत में नव गीत सजाने आयो रे
योवन में तरंग, प्रेम में सतरंग, उमंगों में उल्लास ले आयो रे
चेतन मन में हर्षोल्लास, चंचल चितवन में मधु पराग भरने आयो रे
मृत जीवन के कण-कण में, प्राण रूपी अमृत भरने आयो रे
बन प्रेमिका सावन की, झुमो नाचो गाओ रे
हर बूंद पे गीत सजाओ रे
सावन की रिमझिम बूंदों का भी एक त्यौहार मनाओ रे
आयो रे आयो रे, घनघोर सावन आयो रे

--वीरेन्द्र अग्रवाल


मैंने अपनी लेखनी का सफर १९९३ यानी १५ साल कि उम्र से तय किया, सचमुच मेरे अन्दर ना जाने कोन सा दर्द है जिसे मैं आज तक खुद भी नहीं समझ पाया, मगर मैंने अपने दर्द को कलम का सहारा देकर कागज पर उतारना शुरू कर दिया, और ०९/०३/१९९५ में मैंने इस ग़ज़ल को लिखा, जिसे मैं रजिस्टर के पहले पन्ने पर आज तलक सँजोकर रखा हूँ. I

बहुत दिनों से बात जहन में,
ऐंसे पडी जैंसे चाँद ग्रहन में.
बहुत दिनों से बात जहन में,
फूल सघन थे रंग-बिरंगे,
मुश्क नहीं थी फिर भी चमन में.
बहुत दिनों से बात जहन में,
वो मजबूर था या अभिमानी,
शायद वक़्त रही हो महन में.
बहुत दिनों से बात जहन में,
जख्म थे ज्यादा जीवन थोडा,
रखते रहे हर सांस कफ़न में.
बहुत दिनों से बात जहन में,

--''कवि'' जगन्नाथ विश्वकर्मा


हे दोस्त....
गमो के समन्दर मे बहती हुई मेरी ज़िंदगी को सवारने के लिए,
तुम तिनका बनकर मेरे ज़िंदगी मे आए.
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तुमने मुझे इशारा किए अपना तन्हा हाथ मेरे तरफ बढाया.
मैने भी अपना बेबस हाथ तुम्हारे तन्हा हाथों मे देकर, अपने आप को मेहफ़ूज़ समझा.
कितना बेवकूफ था मै, बेवकूफ......
तुमने मेरे जख्मो को सहलाकर उन्हे मरहम लगाने का वादा किया.
मैने सोचा...औरो की तरह तुम भी अपना वादा तोड दोगे,
पर नहीं, मै गलत था....
तुम अपने वादे के पक्के हो...
तुमने मेरे जख्मो पर मरहम लगाया...पर...
पर तुम्हारे मरहम से मेरे जख्म और ताजा हो गए.
तुम मुझे अंधेरो की जंजीरों से छुडाकर रोशनी के महफिल मे लाये,
एक ऐसी महफिल, जिसकी रौनक तुम हो, सिर्फ तुम...
पर तुम्हारी इस महफिल की तपती रोशनी से मेरी खुदगर्जी जल कर राख होने लगी है....
ईससे तो कई ज्यादा अच्छा मेरा वो विरान अंधेरा था. कम से कम मै वहा आराम तो पाता था. झुठा ही सही, सकुन तो पाता था…..
मैने तुम्हे अपने ख्यालो की किताब के वो पन्ने पढकर सुनाएं...
जो पन्ने कभी मैने अपने आप को भी पढ सुनाए नही थे.
पर क्यूँ ? क्यूँ मै इस झमेले मे उलझ रहा हुं....
यह जानते हुए की इसका अंजाम मेरी बरबादी है...
सिर्फ बरबादी....
हां ! हां... मै इस झमेले मे उलझना चाहता हूँ...
मै बरबाद होना चाहता हूँ......बरबाद कर दो मुझे....
बरबाद कर दो....
हे दोस्त,, मैने तुम्हे तिनका समझा था... तिनका.....
मेरी डूबती हुई जिंदगी को सहारा देनेवाला तिनका....
पर नहीं.. मै गलत था... गलत था मै...
तुम तो सिर्फ एक आरी निकले...
मेरे चेहरे पर रेंगनेवाली तनहाई की जड काटनेवाली आरी....
सिर्फ एक आरी... आरी.............
तुम खुश रहो...........

--कवि जयेश मेस्त्रि


यह कविता मैनें नौवीं कक्षा में लिखी थी. अपने दोस्तो को समर्पित यह मेरी पहली कविता थी.

ऐ मित्र !
क्यों भटक रहे हो,
मंजिल की तलाश में ।
मंजिल ?
मंजिल तो तुम्हारे सामने है,
फिर क्यों भटक रहे हो तलाश में ।
कायरता त्यागो,
लकीर के फ़कीर मत बने रहो,
जगाओ अपने पुरूषत्व को,
सारे पंच तत्व है तुममें ।
बस !
एक बार देखो कोशिश करके,
अम्बर झुक जायेगा ,
कदमों में तुम्हारे ।
तुम्हीं हो नभ के तारे,
तुम्हीं हो वसुंधरा के पुत्र ।
गर्व करेगा सारा जनमानस,
ऐ भारत के धीर वीर ।
(22 जून 1999)

--चन्दन कुमार झा.


कैसे हों ?
वो रूठकर चल दिए , अब हम खुशगवार कैसे हों
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उजड़ चुका ये चमन , अब फिर सदाबहार कैसे हों ?
सावन गया घटाए बिखरी , अब बारिश कैसे हों
राहें अलग , रस्ते छूटे, अब साथ चलने की गुजारिश कैसे हों ?
वो हमारी, हम उनके हुनर की तारीफ किया करते थे
जब से गैर आये,हुस्न-अ-महफ़िल में हमारी फ़रमाइश कैसे हों ?
एक उन्ही के जख्मो ने हमें घायल कर दिया
आप सलाह न दे,अब कही और दिल्लगी कैसे हों ?
रोज घड़ी भर बतियाए बिना उन्हें चैन कहाँ था
मगर आज वो पास से गुजरे, तो पूछा भी नहीं ..कैसे हों ?

--कुलदीप जैन 'भावुक'


यह मेरी पहली कविता है जिसे मैंने जब बहरावी कक्षा मैं पढ़ती थी तब कलमबद्ध किया था. उस समय मेरे मामा जी की असामयिक मृत्यु से जब मेरी मामीजी का संसार उजड़ गया था और समाचार पत्रों मैं रोज नारी उत्पीडन की खबरें पढ़ कर जब मन ब्यथित हो गया तब मैंने यह कविता कलमबद्ध की थी.

नारी जीवन
नारी जीवन है क्या
रोना और रोना,
पाकर हर चीज़
खोना और खोना,
हंसाती है सबको
पर जाती है रुलाई
बनाती है सबको अपना
पर कहलाती है पराई,
जन्म देती है जग को
पर बन जाती है बला
रूप है दुर्गा का
पर समझी जाती है अबला
वो माँ है, बहन है,पत्नी है
पर कोई नहीं कहता वो अपनी है,
माँ बाप संग रह न पाई
ससुराल ह्रदय न समाई
तो फिर आखिर किसने है अपनाई,

--अर्डमोर अमेरिका
--अमिता कौंडल


जननी भारत माता
......
तेरी जय जय, तेरी जय जय
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संदीप कुमार श्रीवास्तव
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सरस्वती प्रसाद
सुरेश तिवारी
एम.ए.शर्मा ’सेहर’
मिथिलेश दुबे
अनिल कान्त
जयवर्धन तिवारी
वीरेन्द्र अग्रवाल
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जयेश मेस्त्रि
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तेरी जय जय, तेरी जय जय
रोज हैं खिलते गोद में तेरी, फूल हजारों ऐसे
अकबर, गांधी, भगत, जवाहर चांद सितारों जैसे
चांद सितारों जैसे जननी भारत माता
......
चाहे धर्म कोई भी हो, हैं सब भाई भाई
मां भारत की हैं संताने, है सब में तरुणाई
है सब में तरुणाई
जननी भारत माता
......
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम की आभा है न्यारी
भिन्न भिन्न भाषा औ प्रांतो की शोभा है प्यारी
की शोभा है प्यारी
जननी भारत माता
.....
गंगा यमुना ब्रह्मपुत्र और कावेरी का पानी
पी हम पानी वाले करते दुश्मन पानी पानी
दुश्मन पानी पानी
जननी भारत माता

--अंशलाल पंद्रे


रक़बा


सूरज की तपन से
गर्म हुई मिट्टी पर
पड़ती जब फुहार
आती है सोंधी-सी महक
बीज के भीतर का पेड़
सुगबुगाकर...
निकल पड़ता है आकाश छूने को
पत्तियों पर बनते मानचित्र
देने लगते हैं खजाने का पता
जब इन पत्तियों के ऊपर
‘टप’ से टपकता ‘पसीना’
ऊर्जा के इस विस्फोट से
खेतों में बिखर जाती चांदनी
ऊगने लगता सूरज
फिर भी...
आखिर तक
जान नहीं पाता किसान
कहाँ अस्त हो जाते हैं ये सूरज
न ही जान पाता है कि...
महाजन की बही में लगा
अंगूठा का निशान बड़ा है
या
उसके लहलहाते
फसलों से भरे
खेत का रकबा।

कविताकार- डॉ॰ सुरेश तिवारी

*रक़बा- क्षेत्रफल, अहाता

महके फिजां जो मैं अजल लिख दूँ


जमीं नम हो जाए जो जल लिख दूँ।
नक़ाब हट जाए तो ग़ज़ल लिख दूँ।

फलक पे चाँद आफताब रहे न रहे
उजाला हो जाए जो फ़ज़ल लिख दूँ।

पेशानी पे पैबस्त हो जाए शिकन
गर फिजां में महज़ मसल लिख दूँ।

ताबेदारी में खड़े रहीं दसों दिशाएँ
बस ये देर कि मैं अमल लिख दूँ।

झूमने लग जाए ये धरती भी सुरेश
महके फिजां जो मैं अजल लिख दूँ।

शब्दार्थ= पेशानी- मस्तक, ललाट, माथा, ताबेदारी- सेवा, नौकरी, अजल- सूखा, बिना जल

--यूनिकवि सुरेश तिवारी

आदमी होने पे वो शर्मिंदा है


वो आसमान में दिखा परिंदा है।
उड़ रहा है, शायद वो जिंदा है।

तल्खी-ए-ज़ीस्त महसूस किया
आदमी होने पे वो शर्मिंदा है।

ये जहाँ नहीं जागीर किसी की
मालिक वो खुदा तू करिंदा है।

औरों का गम देख भरे आँसू
वो इसी शहर का बाशिंदा है।

मस्जिद, मंदिर, गिरजा में दिखे
सच सुरेश वो आदमी चुनिंदा है।

शब्दार्थ- तल्खी-ए-ज़ीस्त- जीवन की कड़ुवाहट, ज़िदंगी की कड़ुवाहट, करिंदा- कर्मचारी

यूनिकवि डॉ॰ सुरेश तिवारी

कोंख में बिटिया


माँ
जब भी तुम
बकरी के छौने को
गोद में उठाती हो
तुम्हारे चेहरे पर
छलक आती है हँसी.
बड़े होकर ये छौने
बकरी बनकर वंश बढ़ाएँगे
और बकरों को
सौंप देती हो कसाई को
चंद रूपयों के बदले।

माँ
तुम खुश होती हो
टोकरी में अंडों पर
बैठी मुर्गी को देखकर
चूजों को पहचानने लगती हो
फुदकती है मुर्गियां आंगन में
और कुछ समय बाद
ये मुर्गे डालते हैं
कुछ और रूपये
तुम्हारी उसी थैली में.

मां...
गाय को गाभिन देखकर
इतराने लगती हो
बछड़े बड़े होकर
बंध जाते हैं
किसी और की आंगन में
और तुम्हारी थैली
कुछ और भारी हो जाती है.
मां....
मैं देख रही हूँ
यह सब
तुम्हारी कोंख से,
सुन रही हूँ
तुम सबकी बातें...
बैठे हैं सब,
बेटे की आस में,
मुझे जनमते ही सब
देंगे तुम्हें ताने
करेंगे तुम्हारी उपेक्षा,
और...
तुम सबकी आंख बचाकर
मुझे
अपनी गोद में छुपाये
बहाती रहोगी आंसू.
बिना स्कूल गये
जब मैं बड़ी हो जाऊँगी
कर दूँगी तुम्हारी
उस भारी थैली को हल्का.
और...
किसी और की आंगन में
बांध दी जाऊँगी
यही सब कुछ
दोहराने के लिये.
मां...
मैं नहीं देख सकती
तुम्हारा ये दुख
न सुन सकती हूं
सबकी उलाहना
कैसे सह पाऊँगी
तुम्हें दुख सहते देखना.
माँ...
सुन लो मेरी विनती
और रोक लो
मुझे इस दुनिया में आने से.
अपनी कोंख में ही
कर दो मेरा ध्वंस
मैं सह लूंगी सब कुछ
अपनी मां की खातिर.
पर मां...
मेरी एक सवाल का जवाब
जरूर देना
यदि तुम्हारी मां ने भी
यही सब कुछ किया होता
तो क्या तुम...
आज यहां होती?
या
ताने बुनने वाली की
माताओं ने यही किया होता
तो कैसी होती ये धरा...
कैसी होती ये सृष्टि
बस मुझे इतना ही बता
मां...
ओ मां...

यूनिकवि डॉ॰ सुरेश तिवारी



पहाड़ी कविता का मैदानी पाठक


हम हर महीने के पहले सोमवार को हिन्द-युग्म यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के परिणामों की उद्‍घोषणा करते हैं। मार्च २००९ की यूनिकवि प्रतियोगिता में कुल ४४ कवियों ने भाग लिया। हम इस प्रतियोगिता में आईं कविताओं से यूनिकविता चुनने के काम एक से अधिक चरणों में ५ से अधिक निर्णायकों की मदद से करते हैं। मार्च महीने की यूनिकविता चुनने में हमें पहले चरण में ३ जजों तथा दूसरे चरण में भी ३ जजों से सहयोग मिला। पहले चरण की निर्णय प्रक्रिया पूरी करने के बाद कुल २१ कविताओं को अंतिम चरण के ३ जजों को भेजा गया। कुल ६ जजों द्वारा दिये गये औसत अंकों के आधार पर डॉ॰ सुरेश तिवारी की कविता 'बस्तर के जंगलों में' को यूनिकविता चुना गया। अब तक २७ यूनिकवि चुने जा चुके हैं। छत्तीसगढ़ राज्य से हमें पहला यूनिकवि डॉ॰ सुरेश तिवारी के रूप में मिला है।

यूनिकविः डॉ॰ सुरेश तिवारी

16 मार्च, सन् 1958 को बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में जन्मे डॉ. सुरेश तिवारी एम.ए. (हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, समाजशास्त्र, इतिहास, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, लोक प्रशासन, ग्रामीण विकास (एमएआरडी), पीएचडी (समाजशास्त्र) एल.एल.बी.
आयुर्वेद रत्न, डी.एड., बी.एड. जैसी शिक्षा प्राप्त की है। इनकी ढेरों कृतियाँ पहले ही प्रकाशित हैं। जीवनयात्रा (कविता संग्रह)- स्मृति प्रकाशन, जगदलपुर, आओ सैर करें (बस्तर के पर्यटन स्थल) - स्मृति प्रकाशन, जगदलपुर, नदी बोलती है (कविता संग्रह)- विश्वभारती प्रकाशन, नागपुर, मॉँ दंतेश्वरी (ऐतिहासिक)- विश्वभारती प्रकाशन, नागपुर, टूटते बिखरते लोग (कहानी संग्रह)- विश्वभारती प्रकाशन, नागपुर।'

पुरस्कृत कविता- बस्तर के जंगलों में

मेरे बस्तर के जंगलों में
अभी भी पाये जाते हैं पेड़,
पेड़ों में है लकड़ियाँ,
लकड़ियों में बसी कई जिंदगी,
जिंदगी में जीवन की झलक.
चींटी से लेकर आदमी तक.
पेड़...
करते हैं प्रतीक्षा
कोसी, देवे, हिड़मे और जोगी का
जिन्हें देखते ही
खिल उठती है बाँछें
देती इन्हें उपहार.
पत्ते, दातून, सूखी लकड़ियाँ,
चार, चिरौंजी, लाख, धूप
इनके साथ उन्मुक्त मुस्कान,
प्राणवायु, उर्जा
और देती है इन्हें
दो जून की रोटी.
तन ढँकने को लंगोटी.
पेड़...
कोसा, देवा, मासो का
पदचाप पहचानते हैं.
हिड़मा के कुल्हाड़ी सजे कंधों को
पेड़ अच्छी तरह जानते हैं.
आज भी...
जोगा तलाशता है,
इन पेड़ों में - गाड़ी की डाँड़ी
नागर का जूड़ा
टंगिया का बेंठ
पर न जाने क्यों .
तपने लगी है
सावन में भी जेठ.
अब
लगने लगा है डर
बदलने लगे इनके भी तेवर
खो गया भोलापन
मोटीयाती हुई खाल में
उलझ गये ये लोग
शहरी वीरप्पन के जाल में
इसीलिये...
जंगलों में
रह गये हैं ठूंठ
जमीन की सतह से उठे हुये
दिखते हैं सब शाख से कटे हुये
झूठी पड़ गयी है-
सुरेश की वो पंक्तियाँ
जिनमें लिखा था
कि...
जिनकी जड़ें
जितनी गहरी होती है
वो पेड़
उतनी ही घनी छाँव देती है
पनाह पाती जिंदगी
एक-एक कर चले गये
पास के पेड़ों पर
और करने लगे हैं प्रतीक्षा
उस पेड़ की भी
ठूंठ में तब्दील हो जाने की
फिर भी ...
इन ठूंठों को है विश्वास
कि हांदा आयेगा
इन ठूंठों को सहलायेगा
और
इन सूखे ठूंठों से
फिर
एक नया कोपल
झाँकता नजर आयेगा.


प्रथम चरण मिला स्थान- तीसरा


द्वितीय चरण मिला स्थान- प्रथम


पुरस्कार और सम्मान- प्रशस्ति-पत्र, हिजड़ों पर केंद्रित रुथ लोर मलॉय द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'Hijaras:: Who We Are' के अनुवाद 'हिजड़े:: कौन हैं हम?' (लेखिका अनीता रवि द्वारा अनूदित) की एक प्रति।

इसके अतिरिक्त हम जिन अन्य १० कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे और जिन्हें हिजड़ों पर केंद्रित रुथ लोर मलॉय द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'Hijaras:: Who We Are' के अनुवाद 'हिजड़े:: कौन हैं हम?' (लेखिका अनीता रवि द्वारा अनूदित) की एक-एक प्रति भेंट करेंगे, उसके नाम हैं (दूसरे से ११वें स्थान तक की कविताओं के रचनाकारों के)-

मुकेश कुमार तिवारी
शीरिष खरे
मनोज भावुक
मुहम्मद अहसन
अरुण मित्तल अद्भुत
रश्मि प्रभा
मनु बंसल (मनु बेतखल्लुस)
दिनेश दर्द
आलोक सारस्वत
पूजा अनिल

मार्च महीने की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के दोनों खिताबों पर इस बार मध्य प्रदेश के प्रतिभागियों का ही कब्जा है। छत्तीसगढ़ राज्य भी मध्य प्रदेश की जमी का ही पुराना हिस्सा है। हालाँकि यूनिपाठक मूल मध्य प्रदेश से है और शहरी जमीं का वाशिंदा है। यह पाठक हिन्द-युग्म के सभी मंचों को बहुत शिद्दत से पढ़ता है और टिप्पणियों को हिन्द-युग्म के कवि भूपेन्द्र राघव की तरह छंद में देता है। और आजकल छंद-व्यवहार का हुनर भी सिखला रहा है। आप सभी समझ गये होंगे कि हम किसकी बात कर रहे हैं। जी हाँ, इस बार के यूनिपाठक हिन्द-युग्म पर दोक्षा की कक्षा चलाने वाले आचार्य संजीव सलिल हैं।

यूनिपाठक- संजीव सलिल


बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' एक व्यक्ति मात्र नहीं अपितु संस्था भी है. अपनी बहुआयामी गतिविधियों के लिए दूर-दूर तक जाने और सराहे जा रहे सलिल जी ने हिन्दी साहित्य में गद्य तथा पद्य दोनों में विपुल सृजन कर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है. गद्य में कहानी, लघु कथा, निबंध, रिपोर्ताज, समीक्षा, शोध लेख, तकनीकी लेख, तथा पद्य में गीत, दोहा, कुंडली, सोरठा, गीतिका, ग़ज़ल, हाइकु, सवैया, तसलीस, क्षणिका, भक्ति गीत, जनक छंद, त्रिपदी, मुक्तक तथा छंद मुक्त कवितायेँ सरस-सरल-प्रांजल हिन्दी में लिखने के लिए बहु प्रशंसित सलिल जी शब्द
साधना के लिए भाषा के व्याकरण व पिंगल दोनों का ज्ञान व् अनुपालन अनिवार्य मानते हैं. उर्दू एवं मराठी को हिन्दी की एक शैली मानने वाले सलिल जी सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखे जाने के महात्मा गाँधी के सुझाव को भाषा समस्या का एक मात्र निदान तथा राष्ट्रीयता के लिए अनिवार्य मानते हैं.
सलिल साहित्य सृजन के साथ-साथ साहित्यिक एवं तकनीकी पत्रिकाओं और पुस्तकों के स्तरीय संपादन के लिए समादृत हुए हैं. वे पर्यावरण सुधार, पौधारोपण, कचरा निस्तारण, अंध श्रद्धा उन्मूलन, दहेज़
निषेध, उपभोक्ता व नागरिक अधिकार संरक्षण, हिन्दी प्रचार, भूकंप राहत, अभियंता जागरण आदि कई क्षेत्रों में एक साथ पूरी तन्मयता सहित लंबे समय से सक्रिय हैं. ९ कृतियाँ प्रकाशित, २५ अप्रकाशित पाण्डुलिपियाँ, ८ पत्रिकाओं, १४ स्मारिकाओं और ९ पुस्तकों का सम्पादन। ११ संस्कृत स्तोत्र और २ अंग्रेज़ी काव्यकृतियों का हिन्दी काव्यनुवाद। ६० से अधिक सम्मान।

पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु २०० तक की पुस्तकें।

हम दो और पाठकों शन्नो अग्रवाल और संगीता पुरी की पठनीयता को नमन करते हुए हम हिजड़ों पर केंद्रित रुथ लोर मलॉय द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'Hijaras:: Who We Are' के अनुवाद 'हिजड़े:: कौन हैं हम?' (लेखिका अनीता रवि द्वारा अनूदित) की एक-एक प्रति भेंट कर रहे हैं।

इसके अतिरिक्त जिन अन्य ३३ कवियों ने प्रतियोगिता में भाग लेकर इस आयोजन को सफल बनाया, उनके नाम हैं-

संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
पिंकी वाजपेयी
सुरेन्द्र कुमार अभिन्न
अमन 'बस अमन '
आचार्य संजीव 'सलिल'
आकांक्षा पारे
अंकित
शिखा वार्ष्नेय
शन्नो अग्रवाल
निक्की सिंह
विपिन
श्यामल सुमन
प्रदीप वर्मा
मिथिलेश सिंह
हिमांशु कुमार पाण्डेय
गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’
सुनील कुमार 'सोनू'
ममता पंडित
दिगम्बर नासवा
कमलप्रीत सिंह
देवेन्द्र कुमार मिश्रा
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
मुकेश सोनी
प्रकाश गौड़ा
गौतम केवलिया
अभिनव झा
आलोक गौड़
विवेक रंजन श्रीवास्तव
पारूल माहेश्वरी
मंजु गुप्ता
ब्रह्मनाथ
शिवानी
सुधीर परवाना "बेजान"

आप सभी ने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया, हम आभारी है। निवेदन है कि अप्रैल २००९ की यूनिकवि तथा यूनिपाठक प्रतियोगिता में भी ज़रूर भाग लें। इससे संबंधित उद्‍घोषणा के लिए यहाँ देखें।