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Monday, June 15, 2009

रक़बा


सूरज की तपन से
गर्म हुई मिट्टी पर
पड़ती जब फुहार
आती है सोंधी-सी महक
बीज के भीतर का पेड़
सुगबुगाकर...
निकल पड़ता है आकाश छूने को
पत्तियों पर बनते मानचित्र
देने लगते हैं खजाने का पता
जब इन पत्तियों के ऊपर
‘टप’ से टपकता ‘पसीना’
ऊर्जा के इस विस्फोट से
खेतों में बिखर जाती चांदनी
ऊगने लगता सूरज
फिर भी...
आखिर तक
जान नहीं पाता किसान
कहाँ अस्त हो जाते हैं ये सूरज
न ही जान पाता है कि...
महाजन की बही में लगा
अंगूठा का निशान बड़ा है
या
उसके लहलहाते
फसलों से भरे
खेत का रकबा।

कविताकार- डॉ॰ सुरेश तिवारी

*रक़बा- क्षेत्रफल, अहाता

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

Manju Gupta का कहना है कि -

महाजन की बही में लगा
अंगूठा का निशान बड़ा है
या
उसके लहलहाते
फसलों से भरे
खेत का रकबा।
Saskt rachna hai aur pratiko ka prayogh kiya hai.Kisan ki lachari aur mehanat ke fal ka sandesh milta hai.Badhayi.........
Manju Gupta.

मुहम्मद अहसन का कहना है कि -

यह कविता शुरू तो बहुत अच्छे तरीके से हुई थी और सलीके से आगे बढ़ रही थी, लेकिन लगता है आधी कविता पार कर के कवि उलझ गया कि अब क्या करे और फिर उस ने कविता को समाजियत के पुराने घिसे पिटे ढर्रे पर मोड़ दिया .

उसके लहलहाते
फसलों से भरे
खेत का रकबा।

इस की व्याकरण पूरी तरह गलत है. यह हो गा ,

उस की लहलहाती
फसलों से भरा
खेत का रकबा

neeti sagar का कहना है कि -

कवि ने कविता को गर्मी के बाद की बारिश के साथ शुरू किया ! फिर जब किसान अपने खेतों में फसल की शुरुआत करता है! मुझे शुरू में व्याकरण की ओर ध्यान नहीं गया क्योकि पढने में कुछ अलग नहीं लगा !

Priya का कहना है कि -

kavita nisandeh badiya hain.... par aaj ke parivehs mein fit nahi baithti.....prarabh sakaratmak soch ke saath hota hain aur ant nirashajank.....aaj ka kisaan mahajan jaise nahi balki anya tarah ki samayaon se joojh raha hain

Nirmla Kapila का कहना है कि -

मुझे ये कवित अच्छी लगी किसान के सच को बाखुबी नये अंदाज़ मे ब्यान किया है सुन्दर आभार्

mohammad ahsan का कहना है कि -

i agree with priya.

Shamikh Faraz का कहना है कि -

महाजन की बही में लगा
अंगूठा का निशान बड़ा है
या
उसके लहलहाते
फसलों से भरे
खेत का रकबा।

गज़ब की कविता. बधाई.

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

मुझे इस कविता में वे सारी बातें दिखीं जो एक सफ़ल कविता में होनी चाहिए। और रही बात "महाजन" की तो गाँवों में स्थिति कुछ खास नहीं बदली है, जो हाल आजादी से पहले था,अमूमन वही है अभी भी। जिनकी यह शिकायत है कि कविता "सकारात्मक" सोच से शुरू होती है और अंत होते-होते "नकारात्मक" हो जाती है,तो यह कविता को देखने का उनका एक नज़रिया मात्र है। क्या यह कहीं लिखा है कि "दुखांत" कविता की हरेक पंक्ति दु:ख में हीं लिपटी होनी चाहिए। इस कविता को जहाँ तक मैं मैं समझ पाया हूँ, उसके अनुसार "किसान जब अपने फ़सलों को लहलहाता देखता है तो एक माँ की तरह उसमें भी ममत्व के भाव जाग उठते हैं और उसके अंदर खुशी की लहर दौड़ जाती है, लेकिन जब महाजन का कर्ज चुकाने के कारण उसको अपने उन्हीं फ़सलों की बलि देनी होती है तो उसी माँ की तरह वो टूट जाता है,जो मजबूरीवश अपने बच्चे को बेच आई हो।" चूँकि ऐसा समाज में होता है इसलिए हम इस स्थिति को नकार नहीं सकते।

अंत में फिर से सुरेश जी को एक अच्छी और सच्ची कविता लिखने के लिए ढेरों बधाईयाँ।

-विश्व दीपक

Ambarish Srivastava का कहना है कि -

अच्छी रचना !
किसान के प्रति एक सच्चा कवि ही कोमल भावनाएं रख सकता है |
कविता का व्याकरण तो सुधर सकता है पर किसान के साथ हो रहे अन्याय को कैसे रोकेंगे ?

manu का कहना है कि -

(उस की लहलहाती,,)
ही सही शब्द हैं,,,
वैसे कविता अच्छी लगी,,

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