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कोंख में बिटिया


माँ
जब भी तुम
बकरी के छौने को
गोद में उठाती हो
तुम्हारे चेहरे पर
छलक आती है हँसी.
बड़े होकर ये छौने
बकरी बनकर वंश बढ़ाएँगे
और बकरों को
सौंप देती हो कसाई को
चंद रूपयों के बदले।

माँ
तुम खुश होती हो
टोकरी में अंडों पर
बैठी मुर्गी को देखकर
चूजों को पहचानने लगती हो
फुदकती है मुर्गियां आंगन में
और कुछ समय बाद
ये मुर्गे डालते हैं
कुछ और रूपये
तुम्हारी उसी थैली में.

मां...
गाय को गाभिन देखकर
इतराने लगती हो
बछड़े बड़े होकर
बंध जाते हैं
किसी और की आंगन में
और तुम्हारी थैली
कुछ और भारी हो जाती है.
मां....
मैं देख रही हूँ
यह सब
तुम्हारी कोंख से,
सुन रही हूँ
तुम सबकी बातें...
बैठे हैं सब,
बेटे की आस में,
मुझे जनमते ही सब
देंगे तुम्हें ताने
करेंगे तुम्हारी उपेक्षा,
और...
तुम सबकी आंख बचाकर
मुझे
अपनी गोद में छुपाये
बहाती रहोगी आंसू.
बिना स्कूल गये
जब मैं बड़ी हो जाऊँगी
कर दूँगी तुम्हारी
उस भारी थैली को हल्का.
और...
किसी और की आंगन में
बांध दी जाऊँगी
यही सब कुछ
दोहराने के लिये.
मां...
मैं नहीं देख सकती
तुम्हारा ये दुख
न सुन सकती हूं
सबकी उलाहना
कैसे सह पाऊँगी
तुम्हें दुख सहते देखना.
माँ...
सुन लो मेरी विनती
और रोक लो
मुझे इस दुनिया में आने से.
अपनी कोंख में ही
कर दो मेरा ध्वंस
मैं सह लूंगी सब कुछ
अपनी मां की खातिर.
पर मां...
मेरी एक सवाल का जवाब
जरूर देना
यदि तुम्हारी मां ने भी
यही सब कुछ किया होता
तो क्या तुम...
आज यहां होती?
या
ताने बुनने वाली की
माताओं ने यही किया होता
तो कैसी होती ये धरा...
कैसी होती ये सृष्टि
बस मुझे इतना ही बता
मां...
ओ मां...

यूनिकवि डॉ॰ सुरेश तिवारी