फटाफट (25 नई पोस्ट):

Monday, April 20, 2009

आदमी होने पे वो शर्मिंदा है


वो आसमान में दिखा परिंदा है।
उड़ रहा है, शायद वो जिंदा है।

तल्खी-ए-ज़ीस्त महसूस किया
आदमी होने पे वो शर्मिंदा है।

ये जहाँ नहीं जागीर किसी की
मालिक वो खुदा तू करिंदा है।

औरों का गम देख भरे आँसू
वो इसी शहर का बाशिंदा है।

मस्जिद, मंदिर, गिरजा में दिखे
सच सुरेश वो आदमी चुनिंदा है।

शब्दार्थ- तल्खी-ए-ज़ीस्त- जीवन की कड़ुवाहट, ज़िदंगी की कड़ुवाहट, करिंदा- कर्मचारी

यूनिकवि डॉ॰ सुरेश तिवारी

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

10 कविताप्रेमियों का कहना है :

परमजीत बाली का कहना है कि -

बहुत बढिया रचना है बधाई।

manu का कहना है कि -

sunder rachnaa,,,

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

achchhee rachna.

तपन शर्मा का कहना है कि -

bahut sahi...

Arun Mittal "Adbhut" का कहना है कि -

Achchi Gajal hai... Abhi "waah...!" ke sher aaye hain, "Aahh....!" ke sher aana baaki hai. Lata hai kaafiya aapne thoda mushkil le liya hai.....

fir bhi achha laga ........ badhai

रश्मि प्रभा का कहना है कि -

kaafi achhi lekhni

मुकेश कुमार तिवारी का कहना है कि -

डॉ. सुरेश जी,

तल्खी-ए-ज़ीस्त महसूस किया
आदमी होने पे वो शर्मिंदा है।

कितना अच्छा ख्याल है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

अनिल कान्त : का कहना है कि -

bahut khoob

Priya का कहना है कि -

मस्जिद, मंदिर, गिरजा में दिखे
सच सुरेश वो आदमी चुनिंदा है।
...............waha bhi give n take ka formula chalta hain.....atti uttam

Rohit का कहना है कि -

औरों का गम देख भरे आँसू
वो इसी शहर का बाशिंदा है।
bahut umda Suresh Sir. choo gayee dil ko, ab kahan aisa hota hai??

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)