काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन (विशेषांक)
विषय - विश्व पितृ दिवस
चित्र - मुकेश सोनी
अंक - सत्ताइस
माह - जून २००९
चाहें कोई भी देश हो, संस्कृति हो माता-पिता का रिश्ता सबसे बड़ा माना गया है। भारत में तो इन्हें ईश्वर का रूप माना गया है। यदि हम हिन्दी कविता जगत की कवितायें देखें तो
माँ के ऊपर जितना लिखा गया है उतना पिता के ऊपर नहीं। कोई पिता कहता है, कोई पापा, अब्बा, बाबा, तो कोई बाबूजी, बाऊजी, डैडी। कितने ही नाम हैं इस रिश्ते के पर भाव सब का एक। प्यार सबमें एक। समर्पण एक।
विश्व पितृ दिवस की शुरुआत २०वीं सदी के प्रारम्भ में बताई गई है। कुछ जानकारों के मुताबिक ५ जुलाई १९०८ को वेस्ट वर्जेनिया के एक चर्च से इस दिन को मनाना आरम्भ किया गया। रुस में यह २३ फरवरी, रोमानिया में ५ मई, कोरिया में ८ मई, डेनमार्क में ५ जून, ऑस्ट्रिया बेल्जियम के लोग जून के दूसरे रविवार को और ऑस्ट्रेलिया व न्यूज़ीलैंड में इसे सितम्बर के पहले रविवार और विश्व भर के ५२ देशों में इसे जून माह के तीसरे रविवार को मनाया जाता है। सभी देशों इस दिन को मनाने का अपना अलग तरीका है।
एक पुराने भजन की चार पंक्तियाँ याद आ जाती हैं:
पिता ने हमको योग्य बनाया, कमा कमा कर अन्न खिलाया
पढ़ा लिखा गुणवान बनाया, जीवन पथ पर चलना सिखाया
जोड़ जोड़ अपनी सम्पत्ति का बना दिया हक़दार...
हम पर किया बड़ा उपकार....दंडवत बारम्बार...
परन्तु आज के दयनीय हालात पर कुछ समय पहले मैंने कहीं एक बूढ़े पिता की व्यथा में ये पंक्ति पढ़ी थी। बचपन में मैंने अपने चार बेटों को एक कमरे में पाला पोसा, अब इन चार बेटों के पास मेरे लिये एक कमरा भी नहीं है!!
न जाने क्यों हम इतने कठोर हो जाते हैं।
हिन्दयुग्म ने
पिछले वर्ष भी विश्व पितृ दिवस मनाया था। अगर पिछली बार के काव्यपल्लवन की कवितायें भी मिलायें तो हिन्दयुग्म पर अब तक करीबन ४० कवितायें पिता को समर्पित करी जा चुकी हैं।
अभी हाल ही में हिन्दयुग्म के अतिथि कवि
हरेप्रकाश उपाध्याय द्वारा
पिता पर लिखी हुई एक कविता प्रकाशित हुई थी।
हिन्दयुग्म के पसंदीदा कवियों में से एक
गौरव सोलंकी की कविता
'पिता से' सबसे ज्यादा पसंद की गई कविताओं में शामिल है। 'पिता से' कविता के बाद हिन्द-युग्म के पाठकों ने गौरव को दिल में बसा लिया। इसी कविता को शैलेश भारतवासी ने
अपनी आवाज़ भी दी।
अन्य कविताओं में शामिल है
गिरिराज जोशी की
'पापा! आप समझ रहे हैं ना' जिसे ४१ टिप्पणियाँ प्राप्त हुई और खूब सराहा गया।
मनीष वंदेमातरम् ने अपनी
एक क्षणिका में पिता को खेत में खड़ी फसल कहा।
तुषार जोशी ने
'ओ बाबा कितने, प्यारे हो तुम' में अपनी सरल लेखनी से पिता पर कलम चलाई
शोभा महेन्द्रू ने पुरूष के एक महान चेहरे के रूप में
'एक पिता' को बताया,
निखिल आनंद गिरि ने अपने
'पापा के नाम' कवितानुमा एक खत लिखा है और पिता के प्रति अपनी सारी संवेदनाएँ व्यक्त करने की कोशिश की है।
अवनीश एस. तिवारी ने भी
कुँवारी बेटी के पिता की चिंताओं व भावनाओं को कविता द्वारा प्रस्तुत किया|
आज फिर हम लेकर आयें अपने पाठकों की पिता को समर्पित कवितायें। इस बार हमारे साथ एक छोटे से नन्हे कवि सीतापुर से आठवीं कक्षा के नील श्रीवास्तव भी जुड़ रहे हैं। छोटा सा बचपन अपने पापा के बारे में क्या सोचता है जरूर पढ़ें।
हिन्द-युग्म के सभी पाठकों को पितृ दिवस की बधाइयाँ। यदि आपके मन में भी कुछ भाव आ रहे हों या कोई वाकया याद आ रहा हो तो टिप्पणी कर हमारे साथ जरूर बाँटें।
अपने विचार ज़रूर लिखें
वो,
शख्स जो मुझे बात बात पर
डाँटता था
या मेरी शैतानियों से तंग आकर
कभी मारता भी था
वो,
कभी अच्छे मूड़ में हो तो
घुमानए भी ले जाता था
यदि तनख्वाह के बाद घर लौटा है
तो कुछ भी मांग लो ना नही कहता था
मैं,
कभी खंगालने लगूं उसकी जे़ब
या खोल लूँ ऑफिस का बैग
नाराज हो जाता था
मेरी,
कोई बात अच्छी लगी हो तो
बाँहों में भर लेता
या कभी मेरे बालों में
अपनी खुरदुरी उंगलियाँ फिराता
या कभी रोने लगता
मुझे अपने सीने से लगाकर
जैसे,
एक बेनाम सा रिश्ता था
हम दोनों में
या कोई कशिश थी
जो बांधकर रखती थी
हम,
दोनों में
अक्सर किसी न किसी बात पर
हो जाती थी तकरार
अगर मैं नाराज हूँ तो मनाता भी नही था
पूरा,
बचपन बीत गया
खिलौने से दूर
बस, आग ही पलती रही मेरे सीने में
मैं,
जिन्दगी भर अभिशप्त रहा
आग को अपने सीने में
सहेजे जीते रहने के लिये
गलियाँ छूटी, मुहल्ला छूटा
फिर छूटते गये दोस्त
और वो शख्स भी
अब,
वो शख्स
आता है मेरे ख्वाबों में
मेरे सीने की आग नापता है
और शोलों की चमक में
खोजता है अपने आप को
मैंने,
बहुत बार कोशिश की
कि, मैं नाम दे सकूं हमारे रिश्ते को
या कोई पहचान दे सकूं
ठीक से तो कुछ याद आता नही
हाँ, माँ किसी मौके पर कुछ
कहा था हमारे रिश्ते के बारे में
--मुकेश कुमार तिवारी
उस इन्सान की इबादत,
उसकी दुआओं का
फल हूँ मै।
जिसने मुझे बनाया है,
उसकी छाया,
उसका प्रतिरूप हूँ मैं।
वो अथाह सागर हैं,
महज
एक कतरा ही हूँ मैं।
फिर क्यूँ ?
समझते हो मुझे महान!
महान! मैं नहीं,
वो इन्सान हैं
जिसकी सन्तान हूँ मैं।।
--तरूण सोनी ’तनवीर’
पिता का रूप तेरी आँखों की सच्चाई मेरी ज़ंजीरें
तेरे चेहरे का भोलापन मेरी बेडी
तेरी सांसें , जिंदगी का हासिल मेरी
तेरे थके पाँव की मंजिल ,मेरा कान्धा ;
मैं खुद से भाग सकता हूँ,
जिंदगी से भाग सकता हूँ
मगर जाऊं गा कहाँ तुझ से भाग कर !
तपती धूप की शिद्दत,
बर्फ सी ठंढी हवाएं ,
तेज़ ओ तुन्द तूफां के झक्कड़ ,
दुनिया के काले नाग और कंटीले रास्ते ;
मुझे हिफाज़त करनी है तेरी एक नाज़ुक पौध की मानिंद ,
तेरी उम्र को सींचूं गा मै अपने रगों के खून से ,
अपने फ़िक्र ओ फ़न से ;
खाद दूँ गा तेरी जड़ों को
अपने पसीने की बूंदों से ;
तुझे बढ़ता देखूँ गा मैं
एक मुस्तहकम दरख्त की मानिंद ,
वो दरख्त कि जिस में
इल्म की शाखें हों ,
अक़ीदे के फूल हों,
फ़राएज़ के फल हों ;
खिदमत का साया हो,
और सब्र ओ सुकूं के बर्ग हों
वो दरख्त जो सूख कर भी जिंदगी बख्शे ;
मैं तुझ में ढूंढूं गा वो इंसा
जिस में अज़्म हो
किरदार हो,
हिम्मत हो;
जो मेरी उन जंगों को जीत ले ,
जिन्हें मैं हार आया था न जाने कितने साल पहले
नहीं, मेरे बेटे नहीं !
अभी तुम्हे मेरे काँधे पर बहुत दूर जाना है
.................................................
हासिल- उपलब्धि
फ़िक्र ओ फ़न - चिंता एवं कला
मुस्तहकम - मज़बूत
इल्म - ज्ञान
अक़ीदे - विश्वास, आस्था
फ़राएज़ - कर्तव्य
खिदमत - सेवा
बर्ग- पत्ते
अज़्म- निश्चय
किरदार - चरित्र
--मुहम्मद अहसन
पिता
एक ऐसा किरदार
जो दे जीवन को आधार
करता है भरण-पोषण
उठाये कन्धो पर हमारा भार
पिता
एक ऐसा व्यक्तित्व
जो दिखता है सख्त
किन्तु है कोमल ह्रदय
जीवन के पग-पग पर
हमको दिलाता विजय
पिता
एक नाम जो जरूरी है
यही हमारी पह्चान की धुरी है
यूँ तो जन्म देती है माँ
पर वो भी इस नाम के बिना अधूरी है
पिता
एक अटूट हिस्सा जीवन का
साथी हमारे बालपन का
मेला हो या हो भारी भीड़
दिखाये हमें दुनिया की तस्वीर
पिता
जिसके कांधों पर चढ़ इतराते हम
कभी घोड़ा बना उसे इठ्लाते हम
बनकर बच्चा हमारे साथ
मिलाता वो कदम से कदम
--दीपाली तिवारी
अधिक प्रशंसा तनिक प्रतारण ,
उपदेश नहीं बस स्वयं उदहारण
सीमित शिकायत जग ,जीवन से ,
क्रोधित नहीं किसी भी कारण .
मृदुभाषी सन्यासी जैसे
कार्य कुशल कर्तब्य परायण .
धर्मालु धर्मांध नहीं पर ,
करते प्रतिदिन प्रभु गुण गायन ,
स्थितप्रज्ञ मर्मज्ञ पिता जी !
नर में लगते एक नारायण .
--डा. कमल किशोर सिंह
पिता को कितना था रूलाया?
पिता बनकर समझ आया।
क्रोध मेरा,
उन्होंने झेला,
जेब में न था,
एक धेला,
माँगों का था,
बस झमेला
जब मैंने
आँसू बहाया,
दिल मैंने,
कितना दुखाया?
पिता बनकर समझ आया।
अभाव,
उन्होंने,
खुद थे झेले,
मुझको दिखाये,
फिर भी मेले,
मेरी मुस्कराहट की खातिर,
अपने दु:ख थे,
उन्होंने ठेले।
उनको,
कितना था रूलाया?
पिता बनकर समझ आया।
रोया, रूठा, भाग छूटा,
फिर भी
उन्होंने,
न,
तनिक कूटा,
ढूढ़कर वापस ले आये
आँसू पौंछ,
माँ से मिलाये,
खाया न कुछ भी,
बिना खिलाये।
जिद कर,
कितना सताया?
पिता बनकर समझ आया।
पढ़े, लिखें,
आगे बढ़े हम
कर्म उत्तम,
करते रहे हम,
चाह थी बस,
उनकी इतनी,
पूरी कर पाये हैं कितनी?
मारा क्यों था?
मुझमें जूता।
मारकर क्यों था मनाया?
पिता बनकर समझ आया।
भले ही घर से निकालूँ,
भले ही उनको मार डालूँ,
समझेंगे नहीं,
फिर भी पराया,
कहेंगे नहीं,
मुझको सताया।
कितना था ऊधम मचाया?
पिता बनकर समझ आया।
चाहते हैं मुझको कितना?
काश!
तब मैं समझ पाता,
दिल नहीं,
उनका दु:खाता।
ऋण नहीं है,
जो चुकाऊँ,
रकम दे पीछा छुड़ाऊँ।
मेरा नहीं कुछ,
जो दे पाऊँ,
चरणों में खुद को चढ़ाऊँ।
मैंने केवल गान गाया,
पिता बनकर समझ आया।
--संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
यूँ तो ऊँगली थाम के मुझको चलते थे बाबा मेरे
जब बड़ा सा नाला आता कंधे मुझे चढाते थे बाबा मेरे
कुछ यूँ छोटी छोटी बातें मुझको सिखाते थे बाबा मेरे
लिखने से पहले हाशिया छुड़वाते थे बाबा मेरे
जब आँगन की ईंटों से टकराके मैं गिर जाता
ईंटों को खूब फिर चिल्लाते थे बाबा मेरे
रोता था आंसुओं से जब भी मेरे हर आंसू का मोल लगाते
फिर ढेर सारा खट्टा मीठा चूरन दिलवाते थे बाबा मेरे
जब साईकल सीखते पे गिरता था बार बार मैं
तब दोबारा उठने की हिम्मत ताक़त बन जाते थे बाबा मेरे.
--शामिख फ़राज़
माता की ममता पिता का दुलारा
प्यार हम तुझसे बेशुमार करते हैं..
कंधे पर बैठाकर कुछ ख्वाब संजोये
सीना तान के फिर इज़हार करते हैं..
शिकवे गिले क्या करें इनसे
जहाँ ये हमारा आबाद करते हैं ..
खालीपन सूनापन जब महसूस होता है
इन लम्हों को फिर हम याद करते हैं..
ये मेरी बगिया के सुन्दर फूल
ये जान ये दिल तुम्हें निसार करते हैं..
--एम.ए.शर्मा ’सहर’
काश...... आज आप हमारे साथ होते
हमारे सर पर आपके दोनों हाथ होते
आपकी हँसी , आपकी जिन्दादिली
मुश्किलों में भी वो हँसी - ठिठोली
आज भी मुझको याद आती है ...
काश के हम आपको कभी न खोते
काश आज आप हमारे साथ होते ................
मुझे डर लगता है आपको याद करना
मैं खुद में ही उलझा रहना चाहता हूँ
चाहता हूँ किसी पल आपका ख्याल न आये
आपकी तस्वीर से मैं नजरें चुराता हूँ
क्योंकि, मैं जानता हूँ , आपकी याद मैं सह नहीं पाउँगा
आपको याद करूँगा तो, आपके बिना रह नहीं पाउँगा
अब तो हम आपको दिल की गहराइयों में हैं संजोते
काश आज आप हमारे साथ होते ................
मेरी हर सफलता की चमक आपके चेहरे पर दिखती
मेरी निराशाओं में आप ही तो हौसला देते
मुझसे ज्यादा मेरी खुशियों की चिंता आपको सताती
आज भी हर ख़ुशी आपका अहसास है दिलाती
लगता है मेरे हर पल में आप सदा होते
तो, दुःख में भी हम कभी नहीं रोते
काश आज आप हमारे साथ होते ................
पर मैं जानता हूँ कि मैं अकेला नहीं हूँ
आज भी आप कहीं न कहीं बस रहे हो यहाँ
आपकी आँखें शायद आज भी देखती होंगी
कि, आपके बिन हम तड़प रहें है यहाँ
इसलिये , जैसे गए थे आप अचानक ,
वैसे ही वापिस आ जाइये
क्योंकि, मैंने सुना है इश्वर के यहाँ चमत्कार भी है होते
मैं राह देखूंगा आपकी हर पल , जागते या सोते
" पापा" आ भी जाओ तोड़कर 'जीवन-मरण' के समझौते ...................
--अमित साहू
अन्तिम इच्छापुत्र का जन्म पिता के लिए
खुशियों की सौगात लाया,
पिता ने प्यार से पुत्र को गोद में लिया
और बाहों में झूला झुलाया !
अंगुली पकड़ चलना सिखाया
अपने हाथों से हर इक निवाला खिलाया,
अक्षरों से पुत्र की पहली मुलाकात करवाई
काँधे पे बिठा कर ये दुनिया दिखाई !!
पिता ने अपनी मेहनत-मशक्कत से
पुत्र के लिए इक महल बनवाया,
बड़े अरमान से पिता ने उस महल में
पुत्र की हर सुख-सुविधा को जुटाया !
पुत्र की ओर देख पिता मन ही मन में बोला-
'कोई आशा नहीं रखता हूँ तुमसे,
मगर ये उम्मीद जरूर है दिल में
कि हमारे दिए संस्कार व्यर्थ नहीं जायेंगे !
आने वाले वक़्त में यही संस्कार तुम्हें
एक नेक-दिल और अच्छा इन्सान बनायेंगे,
कलियुग की इन संगदिल पथरीली राहों पे
तुम्हें संभल कर चलना सिखायेंगे !!
हम जानते हैं की एक आशा ही
इंसान के सब दुखों की जननी है,
हमें भी तुमसे अपने बुढापे के लिए
कोई बड़ी भारी आशा नहीं रखनी है !
हम तुमसे अपने आने वाले बुढापे में
दो मीठे बोलों की उम्मीद जरूर रखते हैं,
वृद्ध-आश्रम के फैले हुए लम्बे दालानों की बजाय
घर के एक छोटे कमरे में ज्यादा जी सकते हैं !!
उस वक़्त हमारे लड़खड़ाते क़दमों को
तुम्हारी मज़बूत बाँहों का सहारा मिल जाये,
हमारे बुढापे की तन्हाइयों को
तुम्हारे दो मीठे बोलों का सहारा मिल जाये !
कभी हम भी तुम्हारे बच्चों के साथ
अपना बिसरा हुआ बचपन दोहराना चाहेंगे,
बस....और आखिरी वक़्त तुम्हारे घर से
तुम्हारे ही कन्धों पे जाना चाहेंगे !!'
-- अनु केवलिया
बाबा तुम्हारे कन्धों पर चढ़ कर
न जाने कितने मेले मगरे देखे
न जाने कितनी दुनिया देखी
बाबा तुमने मुझे दिखाई दुनिया
जब मुझे समझ भी नहीं थी
दुनियादारी की
कभी दायें कंधे
कभी बाएँ कंधे
कभी दोनों टाँगे
एक-एक कंधे पर रखकर
मैं लेता रहा आनंद
दुनिया के नजारों का
और जब मैं ज़मीन पर
चलने लायक हुआ तो
तुमने उतार दिया ज़मीन पर
लेकिन मैं चला नहीं ज़मीन पर
आसमान पर उड़ने लगा
तुमसे दूर...दूर...इतना दूर हो गया
कि तुम्हारे गहरे अनुभवों को भी
दरकिनार कर दिया
जब-जब घर में
टी. वी.,फ्रिज,कंप्यूटर,माईक्रो
जैसे उपकरणों ने दस्तक दी
मैंने उनसे दूर रहने की
हिदायत देते हुए कहा
तुम नहीं समझोगे बाबा
नए ज़माने की चीज़ों को
मुझे कंधे पर बैठा कर
दुनिया दिखाने वाले बाबा
मैंने खींच दिए परदे
तुम्हारे कमरे के आगे
ताकि ड्राइंग रूम में बैठे
मेरे दोस्तों को
तुम्हारी भनक भी न पड़े
तुम्हे हर चीज़ तुम्हारे कमरे में ही
पहुंचाने की ज़िम्मेदारी ले ली
ताकि तुम बाहर के
कमरों में आकर
हमें दखल न दो
मै तुम्हारे सिरहाने बैठ कर
दवाएं देता रहा
और तुम्हारे प्राण उड़ने की
करता रहा प्रतीक्षा
जिंदगी को अपने कंधो पर
दिखाने वाले बाबा
मैं तुम्हे नहीं बैठा पाया
अपने कन्धों पर
जीते जी कुछ नहीं कर पाया
तुम्हारे लिए
बस अंत समय में
''कन्धा'' ही दे पाया तुम्हे |
--संगीता सेठी
एक पिता की यही कहानीपिता परमेश्वर पिता है ज्ञानी, पिता विद्वान, पिता विज्ञानी,
एक वृक्ष की एक कहानी लादे फल खड़ा अभिमानी,
सुर-मुर नदिया सी बहती है ऐसी उसकी जवानी,
लहरों में भी सीधा चलता है, हाथ में दो घूँट पानी,
दो सवालो में तय करता अपनी आगे की जिंदगानी,
दो सवालो में रह जाता उसकी आँखों का वो पानी ,
दो खंजर से ही वो मरता वरना मौत उसे कहाँ आनी,
एक पिता की यही कहानी, एक पिता की यही कहानी |
--नितिन अग्रवाल
हर पल प्रहर गुजर कर
दिन महीने वर्ष बनकर
आया है पर्वों का पर्व
महापर्वराज पितृ दिवस
पितृ दिवस पर होता हर्ष
विश्व पिताओं को दूं बधाई
पिता पालक जनक बन
देते जीवन को नव जीवन
हो वात्सल्यस्वरूप की खान
दुखहर्ता सुखकर्ता सा है नाम
न्यौछावर रहता है तन मन
ऐसे पिता होते सदा महान
--मंजु गुप्ता
माँ पवित्र पूज्य, पिता भी भगवान,
सारे तीरथ चरणों में, घर बसे भगवान
वो खुशकिस्मत जिनको, इनका आधार मिला,
पायी असीम कृपा, और बहुमूल्य सामान
संस्कृति की धरोहर, सौंप देंगे तुमको,
आने वाली पीढियों को, देंगे कुछ इनाम
पुत्र श्रवण कुमार मिले, जीवन हो सफल,
पिता की मेहनत का फल, बुढ़ापे में आराम
चलना, फिरना, पढ़ना, लिखना, सब तो सिखाया,
पिता, गुरू, मित्र भी, उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम
पिता तो पिता है, न आस रखे बच्चों से,
देना-देना सीखा बस, प्रेम है निष्काम
समृद्ध हों धनवान हों, बच्चे हमारे "रत्ती"
पिता की यही कामना, वो सच में हैं महान
--सुरिंदर रत्ती
जब जब जन्म दिया
पुत्र को माँ ने
एक अनोखी डोर बाँधी पिता ने
दुनिया मे नाम कराने का,
एक सफल मुकाम दिलाने का,
सपना पाल लिया
बिन कहे पिता ने ,
जब जब उंगली पकड़
आगे बढ़ने को
कदम बढ़वाए हैं
मेरा हाथ थामेगा एक दिन
कुछ ऐसे ख्वाब सजाए हैं ,
जब जब चोट खाई पुत्र ने
अनदेखी पीड़ा का दंश
झेला है पिता ने
घर के किसी कोने ने
देखा है हर वो आँसू
जो क्रोध वश हो
जिगर के टुकड़े को
मारने पर
पिता की आँखों ने बहाया है,
कैसे निर्मम हो सकती हैं
वो आँखें ,
जिन्होने दो नन्ही आँखों को
ख्वाब देखना सिखाया है ,
ये बात वो क्यू नही जानते
जो रंजिश की तलवार चलाते हैं ,
कैसे भूल जाता है उनका दिल
वो पल ,
वो लम्हे ,
जब काँटा बेटे को लगा था
और पाँव उनका सूज गया था ...
--रेणु दीपक
पापा बहुत अच्छे ....
मुझे बहुत प्यार करते ....
जब भी मैं गलती करता ....
वे मुझको डांट भी देते ....
और तो और ...
मेरा छोटा भाई....
जब शैतानी करता .....
तो पापा साथ-साथ.....
मुझको भी डांटते हैं ....
मेरे पापा.....
मेरे साथ खूब खेलते हैं .....
मेरे पापा ....
हर कठिन घड़ी में ....
मुझको....
हिम्मत बंधाते हैं ....
मैं अपने पापा का .....
खूब रखता ख्याल .....
और करता .....
उनको बहुत प्यार ......
--नील श्रीवास्तव
मेरे पापा
मेरे अस्तित्व के बारे में,
जैसे ही लगी भनक
सुनते ही माँ के कंगन की खनक
वे उछले खुशी से और
माँ को अपने अंक में भींचा
कहने लगे हुआ आज अंकुरित
जिसे इतने दिनों से सींचा
और मचलकर बोले
दो ना मुझे एक बेटा
जिसे कंधे पर बिठा कर अपने
मैं लौट चलूँ बचपन को,
यह सुनते ही
माँ की सुन्दर सी पलकें
लाज के बोझ से और भी हुई भारी
हर्ष मिश्रित भय से वे कुछ सहमी बेचारी
साथ साथ रक्तिम हुए कपोल
और मुँह से फूटे ये बोल
ना बाबा ना
मुझे तंग करने के लिए
एक तुम ही हो काफी
वो भी तो होगा तेरा ही साथी
यदि आया बेटा तो
होगा तो तुम्हारे ही जैसा
वो भी चाहेगा खूब पैसा
मैं तो लाऊंगी एक प्यारी सी गुड़िया
जो महकायेगी अपना आंगन
बनेगी मेरी परछाई
संग संग करेगी तुम्हारी खिचाई
फिर दोनों संग-संग
लौट चलेंगे बचपन को,
यह सुनते ही गरजे पिता
नहीं चाहिए मुझे बेटी
इतनी भी नहीं है
हमारी अकल खोटी
हमेशा से हमारे खानदान में
पहले बेटा ही होता आया है
ये मैंने अपने बाप से विरासत में पाया है
नहीं देख सकता मैं
होते हुए तुम्हारा ये अपमान
यदि जनोगी एक बेटा
तो पाओगी अपनों से भी सम्मान ,
सुनते ही माँ हुई हतप्रभ
अहसास वेदना का उनकी
गर्भ में मैंने किया सहमकर
फिर भी दिखाई अपनी प्रतिक्रिया
मैंने उचक-उचककर
परन्तु इच्छानुसार पिता की
लायक बेटा ही तो बनना
बनी थी मेरी विवशता |
पलने लगा गर्भ में मैं
पापा मुझको अनुभव करते
माँ के पेट से कान लगाकर
मुझसे प्यारी बातें करते
माँ की पीर दूर करने को
कितने मुझको गीत सुनाते
जैसे ही मैं थोडा हिलता
पापा फ़ौरन खुश हो जाते
बड़े जतन से बड़े प्यार से
माँ का वो पेट सहलाते
माँ की सेहत की खातिर वो
नियमित माँ का चेक-अप कराते
काट-काट कर फल खिलाते
अपने हाथों जूस पिलाते
जब भी माँ उदास हो जातीं
माँ के सच्चे साथी बनते |
कुछ-कुछ सहमे पिता हमारे
अस्पताल में थे बेचारे
जैसे सुना कि आया बेटा
सुनकर फूले नहीं समाये
फ़ौरन ही लड्डू बंटवाए
अस्पताल में नोट लुटाये
माँ को वार्ड में लेकर आये
घबराहट में अपने बेटे को
ओ0 टी0 में ही भूल के आये
पर जैसे ही मैं आया याद
पापा ने मुझे दिया सहारा
मेरे पास ही समय गुजारा |
शल्यक्रिया से था मैं आया
मेरी माँ को भी समझाया
रखना अवश्य अपना ध्यान
उठाना मत भारी सामान
कैसे माँ काम निपटाती
कैसे घर में खाना पकातीं
अपनों नें जब किया किनारा
आखिर पापा बने सहारा
घर का सारा करते काम
संग में रखते माँ का ध्यान ,
घंटों पापा मुझे खिलाते
मुझको अपनी गोद उठाते
मेरा सारा काम निबटाते
लोरी तक वो मुझे सुनाते
व्यवसाय की भी जिम्मेदारी
वो भी संग में लगती भारी
माँ के सारे नाज उठाते
हाथों से मुझको नहलाते
जॉन्सन बेबी सोप लगाते
मुझको अपने गले लगाते
मेरी एक किलकारी सुनकर
अपने गम सारे भूल जाते |
थोडा बड़ा हुआ मैं जैसे
माँ के आँचल में सोता था
जैसे हाथ लगाते माँ को
फौरन जोर से मैं रोता था
फिर से दोनों मुझे सुलाते
खीझते थोड़ा मुझ पर पापा
करवट वो लेकर सो जाते
उठकर सुबह चूमते मुझको
कांधे पर मुझको बैठाते
मुझको पापा खूब घुमाते
सुनकर मेरी तोतली बोली
झुककर वो घोड़ा बन जाते
माँ बोलती टिक-टिक-टिक-टिक
पापा मुझको सैर कराते
जब मैं बिस्तर गीला करता
इस्तरी करके उसे सुखाते,
जब बीमारी मुझे लग जाती
माँ के संग जागते पापा
सुबह सुबह को बड़े प्यार से
स्कूल मुझे ले जाते पापा
तरह तरह से मुझे हँसाकर
गाना मुझे सुनते पापा
आत्मविश्वास बढ़ाने को मेरा
संग में दौड़ लगाते पापा
कभी किसी से ना वो डरते
बड़े वीर थे मेरे पापा
शैतानी प्रिय शौक था मेरा
खूब पिटाई करते पापा
फिर समझाते वो मुझको
शैतानी तो नहीं है अच्छी
पढना-लिखना यदि अपनाओ
सफल व्यक्ति तुम बन सकते हो
माँ तो पढ़ना-लिखना सिखाती
अक्षर अक्षर ज्ञान कराती
मेरी पढ़ाई को ले करके
बेफिक्र हो चले मेरे पापा
उनसे सीखा सब कुछ मैंने
आदर्श मेरे हैं मेरे पापा |
सब कुछ अब तो पास में अपने
संग में आज नहीं माँ-पापा
उनके ना रहने पर ही
उनकी कीमत पता चली है
उन्हें याद कर-कर के
कतरा-कतरा हूँ मैं रोता
किसी बुजुर्ग का बनूँ सहारा
मन में अपने चाह यही है
यदि मैं ऐसा ही कर पाऊँ
यही तो उनको श्रद्धांजलि है |
क्योंकि आज
चार बच्चों को पालता है एक पिता
लेकिन चार बेटे मिलकर भी
एक पिता को पाल नहीं पाते ||
-अम्बरीष श्रीवास्तव
घर आंगन में बरगद की छाया से छाये बाबूजी।
नन्हीं गुड़िया पूछ रही है क्या ले आये बाबूजी ।।
गुडिया पप्पू की पढ़ाई की उचित व्यवस्था करना है ।
इसीलिये घर के गहने गिरवी रख आये बाबूजी ।।
बाबूजी ने दिया सहारा तब तो मैं चलना सीखा ।
अगर कभी मैं गिरा उठाने झट से आये बाबूजी ।।
कम पैसों में घर का खर्चा अम्मा कैसे ढोती है ।
तीस बरस हो गए अभी तक समझ न पाये बाबूजी ।।
राम रहीम सभी के घर में बाबूजी आते जाते ।
एक दिया दीवाली पर हर घर दे आये बाबूजी ।।
सारी उम्र नौकरी करके बाबूजी ने क्या पाया ।
इस युग में भी बा-इज्जत वापिस घर आये बाबूजी ।।
--सजीवन मयंक
तेरे आशीषों की छाँव तले
ये लता हर पल फूले-फले
कहीं भूले से ये छाँव हटे ना
सुख की ये शारदीय धूप हटे ना
प्यार के उजले ये बादल छंटे ना .....
भाग हमारा हम हैं तुम्हारे
तेरी आँखों के चाँद -सितारे
बचपन बीता आई जवानी
पर इस मीठे सागर का ये पानी
अपनी दुआओं से कभी भी घटे ना.....
ठहरे न दुःख तेरी आंखों के आगे
रोज एक सुख करवट लिए जागे
ऊँचा आकाश है मन्दिर ऊँचा
पर कब हमने इनको है पूजा
सरे किस्मत तेरे दर से उठे ना ....
जीवन-पात्र मेरा खाली रह जाता
पिता के रूप में जो तुम्हें नहीं पाता
इसके आगे नहीं निष्कर्ष कोई
दूसरा नहीं मेरा आदर्श कोई
और कहीं पे कभी हम तो झुके ना.....
हृदय फलक पर चित्र तुम्हारा
बड़े ही मन से ज़िन्दगी ने उतारा
एक-एक पल का रंग संजोया
भावों की तूलिका को इसमें डुबोया
बाद मेरी मृत्यु के भी चित्र ये हटे ना ....
--नीलम प्रभा
छोटा-सा मेरा घर
सुखी परिवार
इस परिवार की घनी छाँह-मेरी मां
मजबूत जड़- मेरे पापा
जिस पेड़ की जड़ जितनी मजबूत होती है.
उस पेड़ की छांह उतनी ही घनी होती है.
पापा...
जिम्मेदारियों को
कंधों पर उठाते हैं.
कभी बच्चों के साथ
बच्चा बन जाते हैं.
घोड़ा बन पीठ पर बिठाते हैं
दादा- नाना बन
कहानियां सुनाते हैं.
कभी शिक्षक बन पढ़ाते हैं.
कभी मां बन दुलराते हैं.
वे गीता कुरान की तरह पवित्र हैं
पापा...
मेरे पापा मेरे सबसे अच्छे मित्र हैं
--डॉ॰ सुरेश तिवारी