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पिता के पास लोरियाँ नही होती



(पितृ-दिवस पर विशेष)

पिता, मोटे तने और गहरी जड़ों वाला
एक वृक्ष होता है
एक विशाल वृक्ष
और मां होती है
उस वृक्ष की छाया
जिसके नीचे बच्चे
बनाते बिगाड़ते हैं
अपने घरौंदे।
पिता के पास
दो ऊंचे और मजबूत कंधे भी होते हैं
जिन पर च़ढ़ कर बच्चे
आसमान छूने के सपने देखते हैं ।
पिता के पास एक चौड़ा और गहरा
सीना भी होता है
जिसमें जज्ब रखता है
वह अपने सारे दुख
चेहरे पर जाड़े की धूप की तरह फैली
चिर मुस्कान के साथ।
पिता के दो मजबूत हाथ
छेनी और हथौड़े की तरह
दिन रात तराशते रहते हैं सपने
सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए,
इसके लिए अक्सर
वह अपनी जरूरतें
और यहां तक की अपने सपने भी
कर देता है मुल्तवी
और कई बार तो स्थगित भी।
पिता, भूत वर्तमान, और भविष्य
तीनों को एक साथ जीता है
भूत की स्मृतियां
वर्तमान का भार और बच्चों में भविष्य .
पिता की उंगली पकड़ कर
चलना सीखते बच्चे
एक दिन इतने बड़े हो जाते हैं
कि भूल जाते हैं रिश्तों की संवेदना
सड़क, पुल और बीहड़ रास्तों में
उंगली पकड़ कर तय किया कठिन सफर।
बाहें डाल कर
बच्चे जब झूलते हैं
और भरते हैं किलकारियां
तब पूरी कायनात सिमट आती है उसकी बाहों में,
इसी सुख पर पिता कुरबान करता है
अपनी पूरी जिन्दगी,
और इसी के लिए पिता
बहाता है पसीना ताजिन्दगी
ढोता है बोझा, खपता है फैक्ट्री में
पिसता है दफ्तर में
और बनता है बुनियाद का पत्थर
जिस पर तामीर होते हैं
बच्चों के सपने
पर फिर भी पिता के पास
बच्चों को बहलाने और सुलाने के लिए
लोरियां नहीं होती।

कवि: बी एस कटियार

पिता, पापा, डैडी, अब्बा, बाऊजी, बाबूजी और कविताएँ







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन (विशेषांक)




विषय - विश्व पितृ दिवस

चित्र - मुकेश सोनी

अंक - सत्ताइस

माह - जून २००९






चाहें कोई भी देश हो, संस्कृति हो माता-पिता का रिश्ता सबसे बड़ा माना गया है। भारत में तो इन्हें ईश्वर का रूप माना गया है। यदि हम हिन्दी कविता जगत की कवितायें देखें तो माँ के ऊपर जितना लिखा गया है उतना पिता के ऊपर नहीं। कोई पिता कहता है, कोई पापा, अब्बा, बाबा, तो कोई बाबूजी, बाऊजी, डैडी। कितने ही नाम हैं इस रिश्ते के पर भाव सब का एक। प्यार सबमें एक। समर्पण एक।

विश्व पितृ दिवस की शुरुआत २०वीं सदी के प्रारम्भ में बताई गई है। कुछ जानकारों के मुताबिक ५ जुलाई १९०८ को वेस्ट वर्जेनिया के एक चर्च से इस दिन को मनाना आरम्भ किया गया। रुस में यह २३ फरवरी, रोमानिया में ५ मई, कोरिया में ८ मई, डेनमार्क में ५ जून, ऑस्ट्रिया बेल्जियम के लोग जून के दूसरे रविवार को और ऑस्ट्रेलिया व न्यूज़ीलैंड में इसे सितम्बर के पहले रविवार और विश्व भर के ५२ देशों में इसे जून माह के तीसरे रविवार को मनाया जाता है। सभी देशों इस दिन को मनाने का अपना अलग तरीका है।

एक पुराने भजन की चार पंक्तियाँ याद आ जाती हैं:

पिता ने हमको योग्य बनाया, कमा कमा कर अन्न खिलाया
पढ़ा लिखा गुणवान बनाया, जीवन पथ पर चलना सिखाया
जोड़ जोड़ अपनी सम्पत्ति का बना दिया हक़दार...
हम पर किया बड़ा उपकार....दंडवत बारम्बार...

परन्तु आज के दयनीय हालात पर कुछ समय पहले मैंने कहीं एक बूढ़े पिता की व्यथा में ये पंक्ति पढ़ी थी। बचपन में मैंने अपने चार बेटों को एक कमरे में पाला पोसा, अब इन चार बेटों के पास मेरे लिये एक कमरा भी नहीं है!!
न जाने क्यों हम इतने कठोर हो जाते हैं।

हिन्दयुग्म ने पिछले वर्ष भी विश्व पितृ दिवस मनाया था। अगर पिछली बार के काव्यपल्लवन की कवितायें भी मिलायें तो हिन्दयुग्म पर अब तक करीबन ४० कवितायें पिता को समर्पित करी जा चुकी हैं।
अभी हाल ही में हिन्दयुग्म के अतिथि कवि हरेप्रकाश उपाध्याय द्वारा पिता पर लिखी हुई एक कविता प्रकाशित हुई थी।

हिन्दयुग्म के पसंदीदा कवियों में से एक गौरव सोलंकी की कविता 'पिता से' सबसे ज्यादा पसंद की गई कविताओं में शामिल है। 'पिता से' कविता के बाद हिन्द-युग्म के पाठकों ने गौरव को दिल में बसा लिया। इसी कविता को शैलेश भारतवासी ने अपनी आवाज़ भी दी।

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मुकेश कुमार तिवारी
तरूण सोनी ’तनवीर’
मुहम्मद अहसन
दीपाली तिवारी
डा. कमल किशोर सिंह
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
शामिख फ़राज़
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रेणु दीपक
नील श्रीवास्तव
अम्बरीष श्रीवास्तव
सजीवन मयंक
नीलम प्रभा
डॉ॰ सुरेश तिवारी
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अन्य कविताओं में शामिल है गिरिराज जोशी की 'पापा! आप समझ रहे हैं ना' जिसे ४१ टिप्पणियाँ प्राप्त हुई और खूब सराहा गया। मनीष वंदेमातरम् ने अपनी एक क्षणिका में पिता को खेत में खड़ी फसल कहा। तुषार जोशी ने 'ओ बाबा कितने, प्यारे हो तुम' में अपनी सरल लेखनी से पिता पर कलम चलाई
शोभा महेन्द्रू ने पुरूष के एक महान चेहरे के रूप में 'एक पिता' को बताया, निखिल आनंद गिरि ने अपने 'पापा के नाम' कवितानुमा एक खत लिखा है और पिता के प्रति अपनी सारी संवेदनाएँ व्यक्त करने की कोशिश की है। अवनीश एस. तिवारी ने भी कुँवारी बेटी के पिता की चिंताओं व भावनाओं को कविता द्वारा प्रस्तुत किया|

आज फिर हम लेकर आयें अपने पाठकों की पिता को समर्पित कवितायें। इस बार हमारे साथ एक छोटे से नन्हे कवि सीतापुर से आठवीं कक्षा के नील श्रीवास्तव भी जुड़ रहे हैं। छोटा सा बचपन अपने पापा के बारे में क्या सोचता है जरूर पढ़ें।
हिन्द-युग्म के सभी पाठकों को पितृ दिवस की बधाइयाँ। यदि आपके मन में भी कुछ भाव आ रहे हों या कोई वाकया याद आ रहा हो तो टिप्पणी कर हमारे साथ जरूर बाँटें।
अपने विचार ज़रूर लिखें


वो,
शख्स जो मुझे बात बात पर
डाँटता था
या मेरी शैतानियों से तंग आकर
कभी मारता भी था
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मुकेश कुमार तिवारी
तरूण सोनी ’तनवीर’
मुहम्मद अहसन
दीपाली तिवारी
डा. कमल किशोर सिंह
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अनु केवलिया
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सुरिंदर रत्ती
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वो,
कभी अच्छे मूड़ में हो तो
घुमानए भी ले जाता था
यदि तनख्वाह के बाद घर लौटा है
तो कुछ भी मांग लो ना नही कहता था

मैं,
कभी खंगालने लगूं उसकी जे़ब
या खोल लूँ ऑफिस का बैग
नाराज हो जाता था

मेरी,
कोई बात अच्छी लगी हो तो
बाँहों में भर लेता
या कभी मेरे बालों में
अपनी खुरदुरी उंगलियाँ फिराता
या कभी रोने लगता
मुझे अपने सीने से लगाकर

जैसे,
एक बेनाम सा रिश्ता था
हम दोनों में
या कोई कशिश थी
जो बांधकर रखती थी

हम,
दोनों में
अक्सर किसी न किसी बात पर
हो जाती थी तकरार
अगर मैं नाराज हूँ तो मनाता भी नही था

पूरा,
बचपन बीत गया
खिलौने से दूर
बस, आग ही पलती रही मेरे सीने में
मैं,
जिन्दगी भर अभिशप्त रहा
आग को अपने सीने में
सहेजे जीते रहने के लिये


गलियाँ छूटी, मुहल्ला छूटा
फिर छूटते गये दोस्त
और वो शख्स भी

अब,
वो शख्स
आता है मेरे ख्वाबों में
मेरे सीने की आग नापता है
और शोलों की चमक में
खोजता है अपने आप को

मैंने,
बहुत बार कोशिश की
कि, मैं नाम दे सकूं हमारे रिश्ते को
या कोई पहचान दे सकूं
ठीक से तो कुछ याद आता नही
हाँ, माँ किसी मौके पर कुछ
कहा था हमारे रिश्ते के बारे में

--मुकेश कुमार तिवारी



उस इन्सान की इबादत,
उसकी दुआओं का
फल हूँ मै।
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मुकेश कुमार तिवारी
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सुरिंदर रत्ती
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नील श्रीवास्तव
अम्बरीष श्रीवास्तव
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डॉ॰ सुरेश तिवारी
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जिसने मुझे बनाया है,
उसकी छाया,
उसका प्रतिरूप हूँ मैं।
वो अथाह सागर हैं,
महज
एक कतरा ही हूँ मैं।
फिर क्यूँ ?
समझते हो मुझे महान!
महान! मैं नहीं,
वो इन्सान हैं
जिसकी सन्तान हूँ मैं।।

--तरूण सोनी ’तनवीर’


पिता का रूप

तेरी आँखों की सच्चाई मेरी ज़ंजीरें
तेरे चेहरे का भोलापन मेरी बेडी
तेरी सांसें , जिंदगी का हासिल मेरी
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सुरिंदर रत्ती
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नील श्रीवास्तव
अम्बरीष श्रीवास्तव
सजीवन मयंक
नीलम प्रभा
डॉ॰ सुरेश तिवारी
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तेरे थके पाँव की मंजिल ,मेरा कान्धा ;
मैं खुद से भाग सकता हूँ,
जिंदगी से भाग सकता हूँ
मगर जाऊं गा कहाँ तुझ से भाग कर !

तपती धूप की शिद्दत,
बर्फ सी ठंढी हवाएं ,
तेज़ ओ तुन्द तूफां के झक्कड़ ,
दुनिया के काले नाग और कंटीले रास्ते ;
मुझे हिफाज़त करनी है तेरी एक नाज़ुक पौध की मानिंद ,
तेरी उम्र को सींचूं गा मै अपने रगों के खून से ,
अपने फ़िक्र ओ फ़न से ;
खाद दूँ गा तेरी जड़ों को
अपने पसीने की बूंदों से ;
तुझे बढ़ता देखूँ गा मैं
एक मुस्तहकम दरख्त की मानिंद ,
वो दरख्त कि जिस में
इल्म की शाखें हों ,
अक़ीदे के फूल हों,
फ़राएज़ के फल हों ;
खिदमत का साया हो,
और सब्र ओ सुकूं के बर्ग हों
वो दरख्त जो सूख कर भी जिंदगी बख्शे ;

मैं तुझ में ढूंढूं गा वो इंसा
जिस में अज़्म हो
किरदार हो,
हिम्मत हो;
जो मेरी उन जंगों को जीत ले ,
जिन्हें मैं हार आया था न जाने कितने साल पहले

नहीं, मेरे बेटे नहीं !
अभी तुम्हे मेरे काँधे पर बहुत दूर जाना है
.................................................
हासिल- उपलब्धि
फ़िक्र ओ फ़न - चिंता एवं कला
मुस्तहकम - मज़बूत
इल्म - ज्ञान
अक़ीदे - विश्वास, आस्था
फ़राएज़ - कर्तव्य
खिदमत - सेवा
बर्ग- पत्ते
अज़्म- निश्चय
किरदार - चरित्र
--मुहम्मद अहसन


पिता
एक ऐसा किरदार
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मुकेश कुमार तिवारी
तरूण सोनी ’तनवीर’
मुहम्मद अहसन
दीपाली तिवारी
डा. कमल किशोर सिंह
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
शामिख फ़राज़
एम.ए.शर्मा ’सहर’
अमित साहू
अनु केवलिया
संगीता सेठी
नितिन अग्रवाल
मंजु गुप्ता
सुरिंदर रत्ती
रेणु दीपक
नील श्रीवास्तव
अम्बरीष श्रीवास्तव
सजीवन मयंक
नीलम प्रभा
डॉ॰ सुरेश तिवारी
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जो दे जीवन को आधार
करता है भरण-पोषण
उठाये कन्धो पर हमारा भार
पिता
एक ऐसा व्य‌क्तित्व
जो दिखता है सख्त
किन्तु है कोमल ह्रदय
जीवन के पग-पग पर
हमको दिलाता विजय
पिता
एक नाम जो जरूरी है
यही हमारी पह्चान की धुरी है
यूँ तो जन्म देती है माँ
पर वो भी इस नाम के बिना अधूरी है
पिता
एक अटूट हिस्सा जीवन का
साथी हमारे बालपन का
मेला हो या हो भारी भीड़
दिखाये हमें दुनिया की तस्वीर
पिता
जिसके कांधों पर चढ़ इतराते हम
कभी घोड़ा बना उसे इठ्लाते हम
बनकर बच्चा हमारे साथ
मिलाता वो कदम से कदम

--दीपाली तिवारी


अधिक प्रशंसा तनिक प्रतारण ,
उपदेश नहीं बस स्वयं उदहारण
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मुकेश कुमार तिवारी
तरूण सोनी ’तनवीर’
मुहम्मद अहसन
दीपाली तिवारी
डा. कमल किशोर सिंह
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
शामिख फ़राज़
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अनु केवलिया
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नितिन अग्रवाल
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नील श्रीवास्तव
अम्बरीष श्रीवास्तव
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नीलम प्रभा
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सीमित शिकायत जग ,जीवन से ,
क्रोधित नहीं किसी भी कारण .
मृदुभाषी सन्यासी जैसे
कार्य कुशल कर्तब्य परायण .
धर्मालु धर्मांध नहीं पर ,
करते प्रतिदिन प्रभु गुण गायन ,
स्थितप्रज्ञ मर्मज्ञ पिता जी !
नर में लगते एक नारायण .
--डा. कमल किशोर सिंह


पिता को कितना था रूलाया?
पिता बनकर समझ आया।
क्रोध मेरा,
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मुकेश कुमार तिवारी
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दीपाली तिवारी
डा. कमल किशोर सिंह
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
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मंजु गुप्ता
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रेणु दीपक
नील श्रीवास्तव
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सजीवन मयंक
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उन्होंने झेला,
जेब में न था,
एक धेला,
माँगों का था,
बस झमेला
जब मैंने
आँसू बहाया,
दिल मैंने,
कितना दुखाया?
पिता बनकर समझ आया।
अभाव,
उन्होंने,
खुद थे झेले,
मुझको दिखाये,
फिर भी मेले,
मेरी मुस्कराहट की खातिर,
अपने दु:ख थे,
उन्होंने ठेले।
उनको,
कितना था रूलाया?
पिता बनकर समझ आया।
रोया, रूठा, भाग छूटा,
फिर भी
उन्होंने,
न,
तनिक कूटा,
ढूढ़कर वापस ले आये
आँसू पौंछ,
माँ से मिलाये,
खाया न कुछ भी,
बिना खिलाये।
जिद कर,
कितना सताया?
पिता बनकर समझ आया।
पढ़े, लिखें,
आगे बढ़े हम
कर्म उत्तम,
करते रहे हम,
चाह थी बस,
उनकी इतनी,
पूरी कर पाये हैं कितनी?
मारा क्यों था?
मुझमें जूता।
मारकर क्यों था मनाया?
पिता बनकर समझ आया।
भले ही घर से निकालूँ,
भले ही उनको मार डालूँ,
समझेंगे नहीं,
फिर भी पराया,
कहेंगे नहीं,
मुझको सताया।
कितना था ऊधम मचाया?
पिता बनकर समझ आया।
चाहते हैं मुझको कितना?
काश!
तब मैं समझ पाता,
दिल नहीं,
उनका दु:खाता।
ऋण नहीं है,
जो चुकाऊँ,
रकम दे पीछा छुड़ाऊँ।
मेरा नहीं कुछ,
जो दे पाऊँ,
चरणों में खुद को चढ़ाऊँ।
मैंने केवल गान गाया,
पिता बनकर समझ आया।
--संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


यूँ तो ऊँगली थाम के मुझको चलते थे बाबा मेरे
जब बड़ा सा नाला आता कंधे मुझे चढाते थे बाबा मेरे
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मुकेश कुमार तिवारी
तरूण सोनी ’तनवीर’
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कुछ यूँ छोटी छोटी बातें मुझको सिखाते थे बाबा मेरे
लिखने से पहले हाशिया छुड़वाते थे बाबा मेरे
जब आँगन की ईंटों से टकराके मैं गिर जाता
ईंटों को खूब फिर चिल्लाते थे बाबा मेरे
रोता था आंसुओं से जब भी मेरे हर आंसू का मोल लगाते
फिर ढेर सारा खट्टा मीठा चूरन दिलवाते थे बाबा मेरे
जब साईकल सीखते पे गिरता था बार बार मैं
तब दोबारा उठने की हिम्मत ताक़त बन जाते थे बाबा मेरे.
--शामिख फ़राज़



माता की ममता पिता का दुलारा
प्यार हम तुझसे बेशुमार करते हैं..
कंधे पर बैठाकर कुछ ख्वाब संजोये
सीना तान के फिर इज़हार करते हैं..
शिकवे गिले क्या करें इनसे
जहाँ ये हमारा आबाद करते हैं ..
खालीपन सूनापन जब महसूस होता है
इन लम्हों को फिर हम याद करते हैं..
ये मेरी बगिया के सुन्दर फूल
ये जान ये दिल तुम्हें निसार करते हैं..
--एम.ए.शर्मा ’सहर’



काश...... आज आप हमारे साथ होते
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हमारे सर पर आपके दोनों हाथ होते
आपकी हँसी , आपकी जिन्दादिली
मुश्किलों में भी वो हँसी - ठिठोली
आज भी मुझको याद आती है ...
काश के हम आपको कभी न खोते
काश आज आप हमारे साथ होते ................
मुझे डर लगता है आपको याद करना
मैं खुद में ही उलझा रहना चाहता हूँ
चाहता हूँ किसी पल आपका ख्याल न आये
आपकी तस्वीर से मैं नजरें चुराता हूँ
क्योंकि, मैं जानता हूँ , आपकी याद मैं सह नहीं पाउँगा
आपको याद करूँगा तो, आपके बिना रह नहीं पाउँगा
अब तो हम आपको दिल की गहराइयों में हैं संजोते
काश आज आप हमारे साथ होते ................
मेरी हर सफलता की चमक आपके चेहरे पर दिखती
मेरी निराशाओं में आप ही तो हौसला देते
मुझसे ज्यादा मेरी खुशियों की चिंता आपको सताती
आज भी हर ख़ुशी आपका अहसास है दिलाती
लगता है मेरे हर पल में आप सदा होते
तो, दुःख में भी हम कभी नहीं रोते
काश आज आप हमारे साथ होते ................
पर मैं जानता हूँ कि मैं अकेला नहीं हूँ
आज भी आप कहीं न कहीं बस रहे हो यहाँ
आपकी आँखें शायद आज भी देखती होंगी
कि, आपके बिन हम तड़प रहें है यहाँ
इसलिये , जैसे गए थे आप अचानक ,
वैसे ही वापिस आ जाइये
क्योंकि, मैंने सुना है इश्वर के यहाँ चमत्कार भी है होते
मैं राह देखूंगा आपकी हर पल , जागते या सोते
" पापा" आ भी जाओ तोड़कर 'जीवन-मरण' के समझौते ...................

--अमित साहू


अन्तिम इच्छा
पुत्र का जन्म पिता के लिए
खुशियों की सौगात लाया,
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पिता ने प्यार से पुत्र को गोद में लिया
और बाहों में झूला झुलाया !
अंगुली पकड़ चलना सिखाया
अपने हाथों से हर इक निवाला खिलाया,
अक्षरों से पुत्र की पहली मुलाकात करवाई
काँधे पे बिठा कर ये दुनिया दिखाई !!
पिता ने अपनी मेहनत-मशक्कत से
पुत्र के लिए इक महल बनवाया,
बड़े अरमान से पिता ने उस महल में
पुत्र की हर सुख-सुविधा को जुटाया !
पुत्र की ओर देख पिता मन ही मन में बोला-
'कोई आशा नहीं रखता हूँ तुमसे,
मगर ये उम्मीद जरूर है दिल में
कि हमारे दिए संस्कार व्यर्थ नहीं जायेंगे !
आने वाले वक़्त में यही संस्कार तुम्हें
एक नेक-दिल और अच्छा इन्सान बनायेंगे,
कलियुग की इन संगदिल पथरीली राहों पे
तुम्हें संभल कर चलना सिखायेंगे !!
हम जानते हैं की एक आशा ही
इंसान के सब दुखों की जननी है,
हमें भी तुमसे अपने बुढापे के लिए
कोई बड़ी भारी आशा नहीं रखनी है !
हम तुमसे अपने आने वाले बुढापे में
दो मीठे बोलों की उम्मीद जरूर रखते हैं,
वृद्ध-आश्रम के फैले हुए लम्बे दालानों की बजाय
घर के एक छोटे कमरे में ज्यादा जी सकते हैं !!
उस वक़्त हमारे लड़खड़ाते क़दमों को
तुम्हारी मज़बूत बाँहों का सहारा मिल जाये,
हमारे बुढापे की तन्हाइयों को
तुम्हारे दो मीठे बोलों का सहारा मिल जाये !
कभी हम भी तुम्हारे बच्चों के साथ
अपना बिसरा हुआ बचपन दोहराना चाहेंगे,
बस....और आखिरी वक़्त तुम्हारे घर से
तुम्हारे ही कन्धों पे जाना चाहेंगे !!'

-- अनु केवलिया


बाबा तुम्हारे कन्धों पर चढ़ कर
न जाने कितने मेले मगरे देखे
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संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
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न जाने कितनी दुनिया देखी
बाबा तुमने मुझे दिखाई दुनिया
जब मुझे समझ भी नहीं थी
दुनियादारी की

कभी दायें कंधे
कभी बाएँ कंधे
कभी दोनों टाँगे
एक-एक कंधे पर रखकर
मैं लेता रहा आनंद
दुनिया के नजारों का

और जब मैं ज़मीन पर
चलने लायक हुआ तो
तुमने उतार दिया ज़मीन पर
लेकिन मैं चला नहीं ज़मीन पर
आसमान पर उड़ने लगा

तुमसे दूर...दूर...इतना दूर हो गया
कि तुम्हारे गहरे अनुभवों को भी
दरकिनार कर दिया
जब-जब घर में
टी. वी.,फ्रिज,कंप्यूटर,माईक्रो
जैसे उपकरणों ने दस्तक दी
मैंने उनसे दूर रहने की
हिदायत देते हुए कहा
तुम नहीं समझोगे बाबा
नए ज़माने की चीज़ों को

मुझे कंधे पर बैठा कर
दुनिया दिखाने वाले बाबा
मैंने खींच दिए परदे
तुम्हारे कमरे के आगे
ताकि ड्राइंग रूम में बैठे
मेरे दोस्तों को
तुम्हारी भनक भी न पड़े

तुम्हे हर चीज़ तुम्हारे कमरे में ही
पहुंचाने की ज़िम्मेदारी ले ली
ताकि तुम बाहर के
कमरों में आकर
हमें दखल न दो

मै तुम्हारे सिरहाने बैठ कर
दवाएं देता रहा
और तुम्हारे प्राण उड़ने की
करता रहा प्रतीक्षा

जिंदगी को अपने कंधो पर
दिखाने वाले बाबा
मैं तुम्हे नहीं बैठा पाया
अपने कन्धों पर
जीते जी कुछ नहीं कर पाया
तुम्हारे लिए
बस अंत समय में
''कन्धा'' ही दे पाया तुम्हे |

--संगीता सेठी


एक पिता की यही कहानी
पिता परमेश्वर पिता है ज्ञानी, पिता विद्वान, पिता विज्ञानी,
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एक वृक्ष की एक कहानी लादे फल खड़ा अभिमानी,
सुर-मुर नदिया सी बहती है ऐसी उसकी जवानी,
लहरों में भी सीधा चलता है, हाथ में दो घूँट पानी,
दो सवालो में तय करता अपनी आगे की जिंदगानी,
दो सवालो में रह जाता उसकी आँखों का वो पानी ,
दो खंजर से ही वो मरता वरना मौत उसे कहाँ आनी,
एक पिता की यही कहानी, एक पिता की यही कहानी |

--नितिन अग्रवाल


हर पल प्रहर गुजर कर
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दिन महीने वर्ष बनकर
आया है पर्वों का पर्व
महापर्वराज पितृ दिवस

पितृ दिवस पर होता हर्ष
विश्व पिताओं को दूं बधाई
पिता पालक जनक बन
देते जीवन को नव जीवन

हो वात्सल्यस्वरूप की खान
दुखहर्ता सुखकर्ता सा है नाम
न्यौछावर रहता है तन मन
ऐसे पिता होते सदा महान

--मंजु गुप्ता


माँ पवित्र पूज्य, पिता भी भगवान,
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सारे तीरथ चरणों में, घर बसे भगवान
वो खुशकिस्मत जिनको, इनका आधार मिला,
पायी असीम कृपा, और बहुमूल्य सामान
संस्कृति की धरोहर, सौंप देंगे तुमको,
आने वाली पीढियों को, देंगे कुछ इनाम
पुत्र श्रवण कुमार मिले, जीवन हो सफल,
पिता की मेहनत का फल, बुढ़ापे में आराम
चलना, फिरना, पढ़ना, लिखना, सब तो सिखाया,
पिता, गुरू, मित्र भी, उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम
पिता तो पिता है, न आस रखे बच्चों से,
देना-देना सीखा बस, प्रेम है निष्काम
समृद्ध हों धनवान हों, बच्चे हमारे "रत्ती"
पिता की यही कामना, वो सच में हैं महान

--सुरिंदर रत्ती


जब जब जन्म दिया
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पुत्र को माँ ने
एक अनोखी डोर बाँधी पिता ने
दुनिया मे नाम कराने का,
एक सफल मुकाम दिलाने का,
सपना पाल लिया
बिन कहे पिता ने ,
जब जब उंगली पकड़
आगे बढ़ने को
कदम बढ़वाए हैं
मेरा हाथ थामेगा एक दिन
कुछ ऐसे ख्वाब सजाए हैं ,
जब जब चोट खाई पुत्र ने
अनदेखी पीड़ा का दंश
झेला है पिता ने
घर के किसी कोने ने
देखा है हर वो आँसू
जो क्रोध वश हो
जिगर के टुकड़े को
मारने पर
पिता की आँखों ने बहाया है,
कैसे निर्मम हो सकती हैं
वो आँखें ,
जिन्होने दो नन्ही आँखों को
ख्वाब देखना सिखाया है ,
ये बात वो क्यू नही जानते
जो रंजिश की तलवार चलाते हैं ,
कैसे भूल जाता है उनका दिल
वो पल ,
वो लम्हे ,
जब काँटा बेटे को लगा था
और पाँव उनका सूज गया था ...

--रेणु दीपक


पापा बहुत अच्छे ....
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मुझे बहुत प्यार करते ....
जब भी मैं गलती करता ....
वे मुझको डांट भी देते ....
और तो और ...
मेरा छोटा भाई....
जब शैतानी करता .....
तो पापा साथ-साथ.....
मुझको भी डांटते हैं ....
मेरे पापा.....
मेरे साथ खूब खेलते हैं .....
मेरे पापा ....
हर कठिन घड़ी में ....
मुझको....
हिम्मत बंधाते हैं ....
मैं अपने पापा का .....
खूब रखता ख्याल .....
और करता .....
उनको बहुत प्यार ......
--नील श्रीवास्तव


मेरे पापा
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मेरे अस्तित्व के बारे में,
जैसे ही लगी भनक
सुनते ही माँ के कंगन की खनक
वे उछले खुशी से और
माँ को अपने अंक में भींचा
कहने लगे हुआ आज अंकुरित
जिसे इतने दिनों से सींचा
और मचलकर बोले
दो ना मुझे एक बेटा
जिसे कंधे पर बिठा कर अपने
मैं लौट चलूँ बचपन को,

यह सुनते ही
माँ की सुन्दर सी पलकें
लाज के बोझ से और भी हुई भारी
हर्ष मिश्रित भय से वे कुछ सहमी बेचारी
साथ साथ रक्तिम हुए कपोल
और मुँह से फूटे ये बोल
ना बाबा ना
मुझे तंग करने के लिए
एक तुम ही हो काफी
वो भी तो होगा तेरा ही साथी
यदि आया बेटा तो
होगा तो तुम्हारे ही जैसा
वो भी चाहेगा खूब पैसा
मैं तो लाऊंगी एक प्यारी सी गुड़िया
जो महकायेगी अपना आंगन
बनेगी मेरी परछाई
संग संग करेगी तुम्हारी खिचाई
फिर दोनों संग-संग
लौट चलेंगे बचपन को,
यह सुनते ही गरजे पिता
नहीं चाहिए मुझे बेटी
इतनी भी नहीं है
हमारी अकल खोटी
हमेशा से हमारे खानदान में
पहले बेटा ही होता आया है
ये मैंने अपने बाप से विरासत में पाया है
नहीं देख सकता मैं
होते हुए तुम्हारा ये अपमान
यदि जनोगी एक बेटा
तो पाओगी अपनों से भी सम्मान ,

सुनते ही माँ हुई हतप्रभ
अहसास वेदना का उनकी
गर्भ में मैंने किया सहमकर
फिर भी दिखाई अपनी प्रतिक्रिया
मैंने उचक-उचककर
परन्तु इच्छानुसार पिता की
लायक बेटा ही तो बनना
बनी थी मेरी विवशता |

पलने लगा गर्भ में मैं
पापा मुझको अनुभव करते
माँ के पेट से कान लगाकर
मुझसे प्यारी बातें करते
माँ की पीर दूर करने को
कितने मुझको गीत सुनाते
जैसे ही मैं थोडा हिलता
पापा फ़ौरन खुश हो जाते
बड़े जतन से बड़े प्यार से
माँ का वो पेट सहलाते
माँ की सेहत की खातिर वो
नियमित माँ का चेक-अप कराते
काट-काट कर फल खिलाते
अपने हाथों जूस पिलाते
जब भी माँ उदास हो जातीं
माँ के सच्चे साथी बनते |

कुछ-कुछ सहमे पिता हमारे
अस्पताल में थे बेचारे
जैसे सुना कि आया बेटा
सुनकर फूले नहीं समाये
फ़ौरन ही लड्डू बंटवाए
अस्पताल में नोट लुटाये
माँ को वार्ड में लेकर आये
घबराहट में अपने बेटे को
ओ0 टी0 में ही भूल के आये
पर जैसे ही मैं आया याद
पापा ने मुझे दिया सहारा
मेरे पास ही समय गुजारा |

शल्यक्रिया से था मैं आया
मेरी माँ को भी समझाया
रखना अवश्य अपना ध्यान
उठाना मत भारी सामान
कैसे माँ काम निपटाती
कैसे घर में खाना पकातीं
अपनों नें जब किया किनारा
आखिर पापा बने सहारा
घर का सारा करते काम
संग में रखते माँ का ध्यान ,

घंटों पापा मुझे खिलाते
मुझको अपनी गोद उठाते
मेरा सारा काम निबटाते
लोरी तक वो मुझे सुनाते
व्यवसाय की भी जिम्मेदारी
वो भी संग में लगती भारी
माँ के सारे नाज उठाते
हाथों से मुझको नहलाते
जॉन्सन बेबी सोप लगाते
मुझको अपने गले लगाते
मेरी एक किलकारी सुनकर
अपने गम सारे भूल जाते |

थोडा बड़ा हुआ मैं जैसे
माँ के आँचल में सोता था
जैसे हाथ लगाते माँ को
फौरन जोर से मैं रोता था
फिर से दोनों मुझे सुलाते
खीझते थोड़ा मुझ पर पापा
करवट वो लेकर सो जाते
उठकर सुबह चूमते मुझको
कांधे पर मुझको बैठाते
मुझको पापा खूब घुमाते
सुनकर मेरी तोतली बोली
झुककर वो घोड़ा बन जाते
माँ बोलती टिक-टिक-टिक-टिक
पापा मुझको सैर कराते
जब मैं बिस्तर गीला करता
इस्तरी करके उसे सुखाते,

जब बीमारी मुझे लग जाती
माँ के संग जागते पापा
सुबह सुबह को बड़े प्यार से
स्कूल मुझे ले जाते पापा
तरह तरह से मुझे हँसाकर
गाना मुझे सुनते पापा
आत्मविश्वास बढ़ाने को मेरा
संग में दौड़ लगाते पापा
कभी किसी से ना वो डरते
बड़े वीर थे मेरे पापा
शैतानी प्रिय शौक था मेरा
खूब पिटाई करते पापा
फिर समझाते वो मुझको
शैतानी तो नहीं है अच्छी
पढना-लिखना यदि अपनाओ
सफल व्यक्ति तुम बन सकते हो
माँ तो पढ़ना-लिखना सिखाती
अक्षर अक्षर ज्ञान कराती
मेरी पढ़ाई को ले करके
बेफिक्र हो चले मेरे पापा
उनसे सीखा सब कुछ मैंने
आदर्श मेरे हैं मेरे पापा |

सब कुछ अब तो पास में अपने
संग में आज नहीं माँ-पापा
उनके ना रहने पर ही
उनकी कीमत पता चली है
उन्हें याद कर-कर के
कतरा-कतरा हूँ मैं रोता
किसी बुजुर्ग का बनूँ सहारा
मन में अपने चाह यही है
यदि मैं ऐसा ही कर पाऊँ
यही तो उनको श्रद्धांजलि है |

क्योंकि आज
चार बच्चों को पालता है एक पिता
लेकिन चार बेटे मिलकर भी
एक पिता को पाल नहीं पाते ||

-अम्बरीष श्रीवास्तव


घर आंगन में बरगद की छाया से छाये बाबूजी।
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नन्हीं गुड़िया पूछ रही है क्या ले आये बाबूजी ।।
गुडिया पप्पू की पढ़ाई की उचित व्यवस्था करना है ।
इसीलिये घर के गहने गिरवी रख आये बाबूजी ।।
बाबूजी ने दिया सहारा तब तो मैं चलना सीखा ।
अगर कभी मैं गिरा उठाने झट से आये बाबूजी ।।
कम पैसों में घर का खर्चा अम्मा कैसे ढोती है ।
तीस बरस हो गए अभी तक समझ न पाये बाबूजी ।।
राम रहीम सभी के घर में बाबूजी आते जाते ।
एक दिया दीवाली पर हर घर दे आये बाबूजी ।।
सारी उम्र नौकरी करके बाबूजी ने क्या पाया ।
इस युग में भी बा-इज्जत वापिस घर आये बाबूजी ।।

--सजीवन मयंक


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तेरे आशीषों की छाँव तले
ये लता हर पल फूले-फले
कहीं भूले से ये छाँव हटे ना
सुख की ये शारदीय धूप हटे ना
प्यार के उजले ये बादल छंटे ना .....
भाग हमारा हम हैं तुम्हारे
तेरी आँखों के चाँद -सितारे
बचपन बीता आई जवानी
पर इस मीठे सागर का ये पानी
अपनी दुआओं से कभी भी घटे ना.....
ठहरे न दुःख तेरी आंखों के आगे
रोज एक सुख करवट लिए जागे
ऊँचा आकाश है मन्दिर ऊँचा
पर कब हमने इनको है पूजा
सरे किस्मत तेरे दर से उठे ना ....
जीवन-पात्र मेरा खाली रह जाता
पिता के रूप में जो तुम्हें नहीं पाता
इसके आगे नहीं निष्कर्ष कोई
दूसरा नहीं मेरा आदर्श कोई
और कहीं पे कभी हम तो झुके ना.....
हृदय फलक पर चित्र तुम्हारा
बड़े ही मन से ज़िन्दगी ने उतारा
एक-एक पल का रंग संजोया
भावों की तूलिका को इसमें डुबोया
बाद मेरी मृत्यु के भी चित्र ये हटे ना ....

--नीलम प्रभा


छोटा-सा मेरा घर
सुखी परिवार
इस परिवार की घनी छाँह-मेरी मां
मजबूत जड़- मेरे पापा
जिस पेड़ की जड़ जितनी मजबूत होती है.
उस पेड़ की छांह उतनी ही घनी होती है.
पापा...
जिम्मेदारियों को
कंधों पर उठाते हैं.
कभी बच्चों के साथ
बच्चा बन जाते हैं.
घोड़ा बन पीठ पर बिठाते हैं
दादा- नाना बन
कहानियां सुनाते हैं.
कभी शिक्षक बन पढ़ाते हैं.
कभी मां बन दुलराते हैं.
वे गीता कुरान की तरह पवित्र हैं
पापा...
मेरे पापा मेरे सबसे अच्छे मित्र हैं

--डॉ॰ सुरेश तिवारी


पिता को समर्पित होगा आगामी काव्य-पल्लवन


छोटे से बच्चे को चलना सिखाता है पिता..अपने काँधे पर बैठा कर घुमाता है एक पिता..बाज़ार से मनपसंद खिलौने दिलवाता है पिता। बच्चे के बड़े होने में जितना योगदान एक माँ होता है उतना ही एक पिता का भी। न हम माँ को भुला सकते हैं और न ही पिता को। माता-पिता अपने बच्चे के सबसे बड़े शिक्षक होते हैं। परन्तु आज के समय में जब एक पिता अपने बच्चे को चलना सिखाते हुए, साइकिल चलाना सिखा कर जितना गर्व महसूस करता है वृद्धावस्था में वही बेटा अपने बूढ़े बाप के साथ दो कदम चलने में भी शरमाता है। पिछले वर्ष 8 जून को हिन्द-युग्म ने इस अवसर पर एक विशेष अंक का प्रकाशन किया था। उस अंक में 25 कवियों की पिता-विषयक कविताओं को तो संकलित किया ही गया था, साथ ही साथ 10 पुरानी कविताओं का भी संयोजन हुआ था।

इस वर्ष 21 जून को विश्व पिता दिवस है। विश्व के अधिकतर देश इसे मना रहे हैं। हिन्द-युग्म सभी पिताओं को इस बार का काव्यपल्लवन समर्पित कर रहा है। मुकेश सोनी द्वारा प्राप्त इस चित्र से पिता-पुत्र का वो रिश्ता झलकता है जिसे हम इस मंच के जरिये सम्मानित करना चाह रहे हैं।



आप सभी से निवेदन है कि इस रिश्ते को समर्पित अपनी एक मौलिक व अप्रकाशित रचना हमें 19 जून तक kavyapallavan@gmail.com पर अवश्य भेज दें। इस बार का काव्यपल्लवन आखिरी को गुरुवार को नहीं बल्कि 21 जून 2009 को प्रकाशित होगा। इस विशेषांक को और भी अधिक विशेष बनाने के लिये इसमें अवश्य भाग लें।

पिता, बाबा, पापा पर विशेष संकलन



हिन्दी कविता माँ की महिमा, माँ का गुणगान जिस आवृत्ति से करती दिखती है, उतनी भारी संख्या में पिता पर नहीं बिछती। यदि काव्य-पल्लवन की कविताओं को भी जोड़ लिया जाय तो हिन्द-युग्म के संग्रहालय में लगभग 1500 कविताएँ हैं जिसमें हमारे खोजे पिता से संबंधित मात्र 10 कविताएँ मिलीं। हिन्द-युग्म के कविता मंच का इतिहास लगभग 2 वर्ष पुराना है। पिता को सीधे संबंधित पहली कविता कवि गिरिराज जोशी ने 17 जून 2007 को 'पापा! आप समझ रहे हैं ना' शीर्षक से प्रकाशित की थी, जिसको लोगों ने खूब सराहा था। 41 प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुई थीं।

इसके कुछ ही दिनों के बाद गौरव सोलंकी ने एक कविता
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विनय के॰ जोशी
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
रचना श्रीवास्तव
कमला भंडारी
महक
तपन शर्मा
गोविन्द शर्मा
सीमा सचदेव
सुनील कुमार सोनू
विवेक रंजन श्रीवास्तव
कमलप्रीत सिंह
देवेन्द्र पाण्डेय
श्यामसखा 'श्याम'
आशीष जैन
डॉ॰ अनिल चड्डा
डॉ॰ श्री कृष्ण मित्तल
देवेन्द्र कुमार मिश्रा
डा. महेंद्रभटनागर
अनिरुद्ध सिंह चौहान
पूजा अनिल
मंजू महिमा भटनागर
मीना जैन
बेला मित्तल
धर्म प्रकाश जैन
पंखुड़ी कुमारी
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पब्लिश की 'पिता से'। 'पिता से' कविता के बाद हिन्द-युग्म के पाठकों ने गौरव को दिल में बसा लिया। हिन्द-युग्म के ही यूनिकवि रह चुके अभिषेक पाटनी टिप्पणी करके लिखते हैं कि वे गौरव की यह कविता समय निकालकर खुराक की तरह पढ़ते रहते हैं या यूँ कहिए की खाते रहते हैं।

अभिषेक पाटनी का कहना है कि -
गौरव भाई...मैं इस एक एहसास के बिना पला-बढ़ा हूं...बावजूद इसके...जब भी आता हूं एक बार पढ़ लेता हूं...हां अपनी मां के लिए मेरे पास कुछ ऐसे ही भाव हैं...ये अलग बात है कि वह भारत की आम मांओं की तरह...तनिक कम पढ़ी-लिखी गृहणी हैं...खैर बेइजाजत या बाइजाजत मैं इस कविता को बार-बार पढ़ने जरूर आता हूं....


विश्व दीपक ने लिखा कि गौरव की यह कविता पढ़कर उनकी आँखों में आँसू आ गये। एक बेनामी टिप्पणीकारा ने जो लिखा वो सच में पठनीय है।

Anonymous का कहना है कि -
कहाँ से शुरू करूँ समझ नही आ रहा, गौरव जी ने ये कविता लिखकर अनजाने मे मुझ पर एहसान किया है,मेरा अपने पापा से हमेशा से सबसे ज्यादा लगाव रहा है, और तालमेल इतना गहरा की हम आँखों से एक दूसरे की बात समझ लेते हैं, पापा पहले आर्मी मे थे, इस कविता मे जिस हिम्मती नौजवान की बात की गई है, वैसे प्रत्यक्ष देखा है मैने अपने पिता को, और आज विशेषकर पिछले 3-4 महीने से अस्वस्थ हैं ,मधुमेह, रक्तचाप और न जाने कितनी छोटी-छोटी बीमारियों ने जैसे उन्हे जैसे थका सा दिया है, मै उनके काफी करीब रही हूँ जानती हूँ कि अगर मैने धीरज खोया तो उन्हे सबसे ज्यादा तकलीफ होगी, इसलिये उनके सामने कभी खुदको परेशान नही दिखा पाई हमेशा हिम्मत देती रही की परेशान होने की बात नही है सब ठीक हो जायेगा। कभी ये नही कह पाई की पापा प्लीज़ जल्दी ठीक हो जाऒ मुझे आपको बीमार देखकर अच्छा नही लग रहा, आज ये कविता पढते वक्त कब आँखों से आँसू निकले पता नही, खुलकर, फूट-फूटकर खूब रोयी जितना मै रो सकती थी, लग रहा था जैसे 4 महीने से जो कुछ घुटन अन्दर जम गई थी वो बाहर निकल गई हो, अब अपनेआप को काफी हलका महसूस कर रही हूँ। बहुत बहुत धन्यवाद।


शैलेश भारतवासी ने इसे अपनी आवाज़ भी दी। वाराणसी की शीला सिंह कहती हैं कि पिता पर इतनी बढ़िया कविता उन्होंने आज तक नहीं पढ़ी।

मनीष वंदेमातरम् ने अपनी एक क्षणिका में पिता को खेत में खड़ी फसल कहा। तुषार जोशी ने 'ओ बाबा कितने, प्यारे हो तुम' में अपनी सरल लेखनी से पिता पर कलम चलाई तो मोहिन्दर कुमार ने अपनी कविता 'बाबुल बिटको' में विवाह के बाद विदा होती बेटी के प्रति पिता की भावनाओं को चित्रित किया।

कवि श्रीकांत मिश्र कांत ने पिता को को सम्बोधित करते हुए कहा कि 'ओ पिता! लगा है एक युग मुझे, पहचानने में तुम्हें'। हाल ही में विपुल शुक्ला ने भी बाबा (पिता) पर लेखनी चलाई।
'पहली कविता' पर आधारित विशेष काव्य-पल्लवन के दूसरे भाग में विजयशंकर चतुर्वेदी की प्रथम कविता 'बीड़ी सुलगाते पिता' प्रकाशित हुई, जिसे लोगों ने खूब सराहा। इतना कि कइयों ने उसे उनकी पहली कविता मानने से इंकार कर दिया। कविता की अंतिम पंक्तियाँ देखें-

कठिन दिनों में
जब-जब जरूरत होगी हमें आग की
हम खोज निकालेंगे बीड़ी सुलगाते पिता.


कल कवयित्री शोभा महेन्द्रू ने पुरूष के एक महान चेहरे के रूप में 'एक पिता' को बताया, वहीं आज यूनिकवि निखिल आनंद गिरि ने अपने 'पापा के नाम' कवितानुमा एक खत लिखा है और पिता के प्रति अपनी सारी संवेदनाएँ व्यक्त करने की कोशिश की है।

खैर यह तो हुई हमारे संग्रहालय की बात। 'पिता दिवस' के विशेष अवसर पर हिन्द-युग्म को लगातार कविताएँ प्राप्त हो रही हैं।। हम सभी की कविताएँ एक-एक करके प्रकाशित कर रहे हैं। हिन्द-युग्म के मुखपृष्ठ का हैडर को पिता के वात्सल्य का रूप दिया है डिजाइनर राहुल पाठक ने तो 'मेरेकविमित्र' के हैडर को सजाया है प्रशेन क्यावल की कम्पनी वेब एंड मीडिया ने। हिन्द-युग्म के सभी पाठकों को पितृ दिवस की बधाइयाँ। आपके पास भी पिता के लिए कुछ शब्द हों तो hindyugm@gmail.com पर भेजें।
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धीर गंभीर
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फिर एक दिन
एहसास हुआ
मैं तो
अपने पिता सा
न बन पाया
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मुझ सा बन गया।
हम जो नहीं है
वह ही सच है
हम जो है
वह भ्रम है।
हर बेटा अपनी उम्र के
पचासवें बरस में
यह कविता लिखता है
यही जीवन क्रम है |


--विनय के जोशी


काश!

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उस वात्सल्यमयी डांट को,
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अनिरुद्ध सिंह चौहान
पूजा अनिल
मंजू महिमा भटनागर
मीना जैन
बेला मित्तल
धर्म प्रकाश जैन
पंखुड़ी कुमारी
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बेटा समझ पाता,
बाप की रोक-टोक को,
अपनी लुका-छिपी और नोंक-झोंक को.

काश!
बेटा समझ पाता,
प्रताड़ना के नेह को,
नाराज़ होकर नहीं तजता गेह को.

काश!
बेटा समझ पाता,
अंशी किस तरह सींच रहा अंश को,
भूलकर भी न करता, भावनाओं के ध्वंस को.

काश!
बेटा समझ पाता,
उन गालियों के अम्बार को,
दामन में भर लेता स्नेह के भंडार को.

काश!
बेटा समझ पाता,
कांटे चुनती छांह को,
कभी नहीं, जाता झटक कर बांह को.

काश!
बेटा समझ पाता,
बाप के उर के ताप को,
कोई बेटा नहीं तजता अपने ही बाप को.

--संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


पिता का रूप

जन्म देती है माँ चलना सिखाते हैं पिता
हर कदम पे बच्चों के रहनुमा होते हैं पिता
फूलों से लहराते ये मासूम बच्चे
प्यारी सी इस बगिया के बागबान होते हैं पिता
कष्ट पे हमारे दुखी होते है बहुत
अश्क आंखों से बहे न बहे पर दिल में रोते हैं पिता
धुप गम की हम तक न पहुँचे कभी
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विनय के॰ जोशी
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
रचना श्रीवास्तव
कमला भंडारी
महक
तपन शर्मा
गोविन्द शर्मा
सीमा सचदेव
सुनील कुमार सोनू
विवेक रंजन श्रीवास्तव
कमलप्रीत सिंह
देवेन्द्र पाण्डेय
श्यामसखा 'श्याम'
आशीष जैन
डॉ॰ अनिल चड्डा
डॉ॰ श्री कृष्ण मित्तल
देवेन्द्र कुमार मिश्रा
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अनिरुद्ध सिंह चौहान
पूजा अनिल
मंजू महिमा भटनागर
मीना जैन
बेला मित्तल
धर्म प्रकाश जैन
पंखुड़ी कुमारी
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साया बन सामने खड़े होते हैं पिता
पूरी करने को सारी इच्छाएँ हमारी
काम के बाद भी काम करते हैं पिता
गलतियों पे हमारी डाँटते हैं हमें
डाँट के ख़ुद भी दुखी होते हैं पिता
रो के जब सो जाते हैं हम
पास बैठ देर तक निहारते हैं पिता
जीवन में आती हैं जब दो राहें कभी
सही राह का इशारा कर देते हैं पिता
लड़खड़ाये जो कभी कदम हमारे
आपनी बांहों मे थाम लेते हैं पिता
देने को अच्छा मुस्तक्बिल हमें
पूँजी जीवन भर की हम पे लुटा देते हैं पिता
खुश रहें बेटियाँ दुनिया में अपनी
कर्ज ले के भी बेटी का घर बसाते हैं पिता
निभाने को रीत इस दुनिया की
भरे दिल से बेटी को विदा कर देते हैं पिता
उन्हें छोड़ जब दूर बस जाते हैं हम
चीजें देख हमारी ख़ुद को बहलाते हैं पिता
यहाँ आके ये भी न सोचते हैं हम
के जब न दिया तो क्या खाते हैं पिता
पहले समझ न पाए उन के प्यार को हम
आज हुआ अहसास जब ख़ुद बने हैं पिता
माँ कहती रही पर माना नहीं हमने
बहती रहीं अँखियाँ जब चले गए पिता

--रचना श्रीवास्तव


पापा मेरे पापा

करती हूँ आपसे प्यार बहुत
पर कह नहीं मैं पाती हूँ
कहूँ भी तो कैसे कहूँ ?
कर नहीं पाई हूँ अभी तक आपके
उन सपनों को पूरा
जो देखे थे आपने मेरे लिए
जानती हूँ की
मन ही मन दुखी हैं
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विनय के॰ जोशी
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आप मेरे लिए
देखा है मैंने उस दुःख ,उस दर्द को
टूट गए हैं मेरी विफलताओं से आप
फिर भी मुस्कुराते हैं
की कहीं मैं भी न टूट जाऊं
पापा मेरा वायदा है आपसे आज
नहीं टूटने दूंगी आपकी उम्मीदों को, आशाओं को
क्यूंकि देखा है मैंने हमेशा
आपकी मेहनत, आपकी हिम्मत को
न दिन का चैन, न रात ही आराम किया
आठों पहर बस हमारे लिए ही काम किया .
देखा है मैंने उस चमक को
पकी आंखो में आते हुए
जब भी मैं पास होती थी और
उन आँसुओ को भी
जब मैं बीमार पड़ती थी
मुझे याद है हर लम्हा, हर वो पल
जब आप मेरे साथ खड़े थे .
कभी डांटना, कभी मनाना,
कभी हँसाना, कभी रुलाना
और फिर अपने हाथों से खाना खिलाना
हाँ पापा सब याद है मुझे
पूरी कोशिश करुँगी, करती रहूँगी
आपके सपनों को पूरा करने की
जो देखे थे आपने मेरे लिए
पर अगर पास न हो पाऊं
तो दुखी न होना
भले ही मैं कुछ बन न पाऊं
पर जिंदगी का जो पाठ आपने मुझे पढ़ाया है
नहीं भूलूंगी उसे कभी
और उसी के बल
एक अच्छा इंसान बन जरूर दिखाउंगी
न छोड़ूगी साथ आपका जीवन भर
लाठी की जगह आपका सहारा
मैं बन जाऊँगी
न होने दूँगी आपका बुढ़ापा नीरस
फिर से आपकी वही छोटी सी
गुड़िया मैं बन जाऊँगी।
और एक अच्छी बेटी होने के
सारे फ़र्ज़ निभाऊँगी

--कमला भंडारी


स्पर्श

दुनिया में कदम रखा
तब अजनबी हाथों में खुद को पाकर
बहुत रोया दिल
आपका हल्का सा स्पर्श गालों पर
मुस्कान छाई थी झूले में
मुझे याद है
आप ही थे न बाबा जिन्होंने
माँ से भी पहले
गोद में उठाया था
सहलाया था |

रात के सपने कभी
डर बन आते आँखों में
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आपके स्पर्श की एक थपकी
माथे पर और
नींद भी खुद चलकर आती
अलसाई सी सोने के लिए
हमारे साथ |

ये कदम भी चलना सीखे
आपकी उंगली पकड़कर
लड़खड़ाए ज़रूर, मगर गिरे नहीं
रुके नई, चलते रहे हरदम
कब आपने उंगली छोड़ी न मालूम
और हम बिना सहारे खड़े है आज
आपसे बहोत दूर
केवल उस स्पर्श के बल पर |

चाहे हम जितने बड़े हो जाए
आपके ममता का स्पर्श
हमेशा महसूस करेंगे
भावनाओ में
अब भी ज़रूरत है
उस स्पर्श के छाँव की
और जीवन भर रहेगी…|

--महक


नहीं भूलता हूँ मैं
तुम्हारा वो बचपन में डाँटना
तुम चाहते थे
कि मैं बोलूँ सच हमेशा
वो उँगली पकड़कर
जो चल देता था मैं साथ तुम्हारे
कभी किराने का सामान
तो कभी सब्ज़ी लाने
थक जाता था
तो उठा लेते थे गोद में,
लोग देखा करते थे मुझे
जब घूम-घूम कर
तब तेल बाती से
उतारा करते थे 'नज़र' मेरी।

याद है अभी भी
वो लगाना 'ओडोमॉस'
हाथ पैरों पर
ताकि न काँटे कोई मच्छर,
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विनय के॰ जोशी
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
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नहीं पता चलने दिया मुझे कभी
कि स्कूल की फीस के लिये
आते हैं पैसे कहाँ से
जबकि मुझे पता था कि
नहीं मिली है तंख्वाह कई महीनों से
चोट की वजह से
नहीं जा पाये थे तुम दफ्तर!!

नहीं करने देते हो
साफ-सफाई कभी घर की,
डर लगता है तुम्हें
मेरी धूल की 'एलर्जी' से,
आज भी मुझे देते हो
वही बचपन वाला प्यार,
लाड़-दुलार
क्योंकि मैं जानता हूँ
कि मैं रहूँगा
उम्र मे उतना ही छोटा,
हर ज़रूरत पूरी हुई है
अब तक मेरी
'जरूरत' बनने से पहले ही!!

आज भी लगे रहते हो
उन्हीं अखबारों की 'हेडलाइंस' में
और मेहनत करते हो वैसी ही
जैसे करते थे २५ बरस पहले
मेरे पैदा होने के समय,
मैं चाहता हूँ
कि गिनता रहूँ तुम्हारे साथ
आसमान में
तारों के अनगिनत समूहों को,
पहनता रहूँ तुम्हारे लिये
सिलवाई शर्टों को,
करता रहूँ वो बातें
जिन्होंने दिया है दुनिया को
आज का 'तपन',
खो जाना चाहता हूँ
फिर उन्हीं पंचतंत्र की
अनगिनत कहानियों में
जो सुनाया करते थे मुझे सुलाने के लिये,
बनना चाहता हूँ सहारा तुम्हारा
हमेशा के लिये,
चलना चाहता हूँ तुम्हारे साथ-साथ
जैसे चला करता था कभी
उँगली पकड़कर,
बोलो न(?)
पूरी करोगे ये इच्छायें मेरी ?

--तपन शर्मा


मेरे पापा मेरी इच्छा

मेला गया मैं दोस्त के साथ,
पिता भी थे उसके साथ,
पापा के संग मस्ती में था वो,
मस्ती में उसकी,
धमाल मचा रहा था मैं भी,
आगे आइसक्रीम का ठेला था,
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विनय के॰ जोशी
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जिद्दी बेटा पापा का,
आइसक्रीम की माँग कर रहा था,
एक मिली उसको और दूसरी मुझको,
मीठी थी आइसक्रीम, पर मुझे स्वादिष्ट न लगी,
झूले का घेरा पास ही था,
झूलने का मजा अब उसे लेना था,
पापा ने उसके,
दोनों को बिठाया झूले पर,
वो चीखे ही जा रहा था,
चीख नहीं निकली मेरी,
बस, उसी को देखे जा रहा था,
खिलौने की दुकान थी नजदीक,
आई उसे खिलौनो की अब तरकीब,
पापा! ट दिलाओ, पापा! चाँद दिलाओ।
चीख-चीखकर माँगे जा रहा था,
पापा ने उसके,
दिलाये उसे खिलौने खूब सारे,
पापा! कितने अच्छे, कितने प्यारे,
अब मुझसे पूछा उन्होंने,
कौन सा लोगे बेटा!
खिलौने बहुत सुन्दर हैं प्यारे-प्यारे,
देखा मैंने दुकान के अन्दर,
कहीं चाँद, कहीं तारे और कई सारे बन्दर,
देव, ईश्वर के खिलौने थे अति सुन्दर,
तभी मेरी नज़र गई,
कोने में पड़े, धूल से बिगड़े,
जोकर पर, जो आधा था ढक्कन के अन्दर,
मेरे पापा की तरह,
वो हँस रहा था,
और मुझे भी हँसा रहा था,
मैंने कहा-अंकल!
मुझे वो चाहिए जॉकर,
जो मेरे पापा की भाँति,
मुझे प्यार दे रहा था।

--गोविन्द शर्मा


प्यारे पापा

प्यारे पापा सच्चे पापा,
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संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
रचना श्रीवास्तव
कमला भंडारी
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गोविन्द शर्मा
सीमा सचदेव
सुनील कुमार सोनू
विवेक रंजन श्रीवास्तव
कमलप्रीत सिंह
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श्यामसखा 'श्याम'
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डॉ॰ अनिल चड्डा
डॉ॰ श्री कृष्ण मित्तल
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बच्चों के संग बच्चे पापा|
करते हैं पूरी हर इच्छा,
मेरे सबसे अच्छे पापा|

पापा ने ही तो सिखलाया,
हर मुश्किल में बन कर साया |
जीवन जीना क्या होता है,
जब दुनिया में कोई आया |

उंगली को पकड़ कर सिखलाता,
जब पहला क़दम भी नहीं आता |
नन्हे प्यारे बच्चे के लिए ,
पापा ही सहारा बन जाता |

जीवन के सुख-दुख को सह कर,
पापा की छाया में रह कर |
बच्चे कब हो जाते हैं बड़े,
यह भेद नहीं कोई कह पाया |

दिन रात जो पापा करते हैं,
बच्चे के लिए जीते मरते हैं |
बस बच्चों की ख़ुशियों के लिए,
अपने सुखो को हर्ते हैं |

पापा हर फ़र्ज़ निभाते हैं,
जीवन भर क़र्ज़ चुकाते हैं |
बच्चे की एक ख़ुशी के लिए,
अपने सुख भूल ही जाते हैं |

फिर क्यों ऐसे पापा के लिए,
बच्चे कुछ कर ही नहीं पाते |
ऐसे सच्चे पापा को क्यों,
पापा कहने में भी सकुचाते |

पापा का आशीष बनाता है,
बच्चे का जीवन सुखदाई ,
पर बच्चे भूल ही जाते हैं ,
यह कैसी आँधी है आई |

जिससे सब कुछ पाया है,
जिसने सब कुछ सिखलाया है |
कोटि नम्न ऐसे पापा को,
जो हर पल साथ निभाया है |

प्यारे पापा के प्यार भरे'
सीने से जो लग जाते हैं |
सच्च कहती हूँ विश्वास करो,
जीवन में सदा सुख पाते हैं |

--सीमा सचदेव


पिता जी

आपकी अंगुलियों के सहारे
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संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
रचना श्रीवास्तव
कमला भंडारी
महक
तपन शर्मा
गोविन्द शर्मा
सीमा सचदेव
सुनील कुमार सोनू
विवेक रंजन श्रीवास्तव
कमलप्रीत सिंह
देवेन्द्र पाण्डेय
श्यामसखा 'श्याम'
आशीष जैन
डॉ॰ अनिल चड्डा
डॉ॰ श्री कृष्ण मित्तल
देवेन्द्र कुमार मिश्रा
डा. महेंद्रभटनागर
अनिरुद्ध सिंह चौहान
पूजा अनिल
मंजू महिमा भटनागर
मीना जैन
बेला मित्तल
धर्म प्रकाश जैन
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हमने चलना शुरू किए.
कदम-कदम पर आपने ऊर्जा दी
तभी आज हमने बड़े हुए।

आज हमने जो कुछ पाया
बस आपकी दुआ है,
दीपक जलाये आपने हृदय में
तभी जिंदगी आज रौशन हुई है।

पानी या मिट्टी भला क्या जाने
किस आकार में उसे ढलना है,
धागा या फूल भला क्या जाने
किस गले का हार उस बनना है।

एक कुशल कुंभकार या बागबां सा
हमको गर्विला रूप आपने दिये है,
धूप में छाया, बारिश में छतरी,
जाड़े में कंबल की जगह आपने लिये हैं।

जब कभी हाथ जोड़ा हूँ कुदरत के सामने
माँगता हूँ भीख मैं आपकी सलामती के लिए,
नहीं चाहिये धन-दौलत या कुछ और
करता हूँ प्रार्थना उनसे, सिर्फ आपकी खुशी के लिए।

- सुनील कुमार सोनू


एक पिता की वसीयत

माना कि मौत पर वश नहीं अपना
पर प्रश्न है कि क्या जिंदगी सचमुच अपनी है ?
हर नवजात के अस्फुट स्वर
कहते हैं कि ईश्वर इंसान से निराश नहीं है
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हमें जूझना है जिंदगी से और
बनाना है जिदगी को जिंदगी
इसलिये मेरे बच्चों
अपनी वसीयत में
देकर तुम्हें चल अचल संपत्ति
मैं डालना नहीं चाहता
तुम्हारी जिंदगी में बेड़ियाँ
तुम्हें देता हूँ अपना नाम
ले उड़ो इसे स्वच्छंद
खुले आकाश में जितना ऊपर उड़ सको
सूरज की सारी धूप
चाँद की सारी चाँदनी
हरे जंगल की शीतल हवा
और झरनों का निर्मल पानी
सब कुछ तुम्हारा है
इसकी रक्षा करना
इसे प्रकृति ने दिया है मुझे
और हाँ किताबों में बंद
ज्ञान का असीमित भंडार
मेरे पिता ने दिया था मुझे
जिसे हमारे पुरखो ने संजोया है
अपने अनुभवों से
वह सब भी सौंपता हूँ तुम्हें
बाँटना इसे जितना बाँट सको
और सौंप जाना कुछ और बढ़ाकर
अपने बच्चों को
हाँ एक दंश है मेरी पीढ़ी का
जिसे मैं तुम्हें नहीं देना चाहता
वह है सांप्रदायिकता का विष
जिसका अंत करना चाहता हूँ मैं
अपने सामने अपने ही जीवन में।

--विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'


प्रिय पिता ,
आदरणीय तो आप हैं ही
परन्तु इस आदर के साथ
मेरे मन में आप के प्रति खौफ नहीं बैठा
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मैं आपको जानता हूँ तबसे
जबसे मैंने अपने आस-पास को
पहचानना शुरू किया था
और बोलना प्रारम्भ करते ही
तुतलाते से शब्दों में
पा ...पा का संबोधन दिया था
और बड़ा हुआ धीरे-धीरे
आप के आदर्श स्वरूप तले
समय समय पर आप द्वारा
दी गयी नसीहतों को
मैं ने यथासंभव
हकीकत में बदलने का प्रयास किया
परिश्रम और संजीदगी
का अनुप्रेरण
आज मेरे जीवन का
अभिन्न अंग बन गया है
आप के असीम प्यार के साथ
फटकार से सहम ज़रूर जाता
लेकिन प्रत्यक्ष में कुछ नहीं कह्ता
मैं समझ सकता हूँ
की आप के लिए मैं
आज भी वही नन्हा सा
अबोध बालक हूँ
जिसे ज़िंदगी की सच्चाइयों
और हकीकतों के प्रति
आगाह किया जाना ज़रूरी है
आप की अपनी ज़िंदगी के अनुभव के अनुसार
आप मेरे परम मित्रों में से हैं
इस बात का मुझे यदा-कदा गर्व हो आता है
सभी सुख-दुःख हँसी और खुशी
बांटे हैं आप ने मुझ से
परन्तु मेरे अलावा भी तो
आप पर दायित्वों का बोझ है
आप के सारे प्यार का भाजन बन
आप पर एकाधिकार तो नहीं जता सकता न -
मेरे हिस्से से कहीं ज़्यादा प्यार
और खुशियाँ -मुझे दीं है आपने
एक परम हितैषी के रूप में
फिर नाराज़ होने का हक भी तो है आपको
परन्तु क्रोध का ज्वार उतर जाने पर
आपने पुनः अपने आपको
सहेजा और स्वीकारा है
ऐसा करने का साहस तो बहुत बार
अनन्य मित्र भी नहीं करते
आप ने मेरे आंसुओं-मेरी निराशा को
बड़े क़रीब से देखा और समझा है
और इसके निवारण के उपाय
अपनी पूरी संवेदनशीलता के साथ
सभी व्यहवारिक रूपों में सुझाये हैं
आप की मेहनत भरी सींच से
आज इस पेड़ पर फल आए हैं
जो कभी आप तक पहुँच पाते हैं
आपके शुभाशीषों की छाया में
मैं निरंतर
प्रगति की राह पर अग्रसर होता
अपने कर्तव्यों से कभी न डिग जाऊं
आशीर्वाद दें।।

--कमलप्रीत सिंह


पिता

चिड़ियाँ चहचहाती हैं
फूल हँसते हैं
सूरज निकलता है
बच्चे जगते हैं
बच्चों के खेल-खिलौने होते हैं
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मुट्ठी में दिन
आंखों में कई सपने होते हैं
पिता जब साथ होते हैं।

पिता जब नहीं होते
चिड़ियाँ चीखती हैं
फूल चिढ़ाते हैं
खेल-खिलौने कुछ नहीं रहते
सपने धूप में झुलस जाते हैं
बच्चे
मुँह-अंधेरे काम पर निकल जाते हैं
सूरज पीठ-पीठ ढोते
शाम ढले
थक कर सो जाते हैं।

पिता जब होते हैं
तितलियाँ
उंगलियों में ठिठक जाती हैं
मेंढक
हाथों में ठहर जाते हैं
मछलियाँ
पैरों तले गुदगुदाती हैं
भौंरे
कानों में सरगोशी से
गुनगुनाते हैं
इस उम्र के अनोखे जोश होते हैं
हाथ डैने
पैर खरगोश होते हैं
पिता जब साथ होते हैं।

पिता जब नहीं रहते
जीवन के सब रंग तेजी से बदल जाते हैं
तितलियाँ, मेंढक, मछलियाँ, भौंरे
सब होते हैं
लेकिन इस मोड़ पर
बचपने कहीं खो जाते हैं
जिंदगी मुट्ठी से रेत की तरह
फिसल जाती है
पिता जब नहीं रहते
उनकी बहुत याद आती है।

पिता के होने और न होने में
एक फर्क यह भी होता है
कि पिता जब साथ होते हैं
समझ में नहीं आते
जब नहीं होते
महान होते हैं।

--देवेन्द्र पाण्डेय


पिता

पिता
जब तक रहे
मैं
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उनसे डरता रहा
क्यों ?
ठीक से कहना
मुमकिन नहीं है
शायद
उसका कारण
जाने-अनजाने में
माँ, रही थी
कहती रही माँ
मेरे पूरे बचपन
व किशोरावस्था में
‘आने दो तुम्हारे पिता को घर
फिर देखना’
हालांकि
याद नहीं कि
माँ ने उन्हें कभी कहा भी या नहीं
मगर
माँ का यह कहना
ही काफी था
और मैं
पिता से डरता रहा
सायास उनके सामने आने से
जितना बच सकता था
बचता रहा

अब
जब पिता, नहीं रहे
तो
जाना मैंने
कि उनका वह
अनुशासन ही
तो है, मेरी सफलता का
असली राज़
और
उनकी बरगदी छाया ने
कब
होने दिया
असफलता की
धूप का अहसास

अब
वक्त बदल गया है
बेटा, मेरा इकलौता
बेटा
न तो मुझसे डरता है
न ही
मुझे मानता है
वट वृक्ष ही मुझे
उसका
संसार तो हैं
उसके हम उम्र दोस्त
पर मैं
अबकी बार
नहीं ठगा जाऊंगा

अब मैं
बन रहा हूं फिर से
किशोर
और सीख रहा हूं
नेट-सर्फिंग
अपने बेटे से
हालांकि
खीज उठता है
बेटा सीखने की मेरी धीमी गति से
मैं
सीख रहा हूं
अपने बेटे-गुरु से
ब्रेक डांस के स्टेप्स
ठीक वैसे ही
जैसे उसने
सीखा था
मेरी उंगली पकड़ कर चलना
बहुत मज़ा आ रहा है
मुझे
बेटे का बेटा बनकर
धीरे-धीरे
मिट रहा है
जेनरेशन -गैप

--श्यामसखा‘श्याम’


पिता हैं वे मेरे

पिता हैं वे मेरे
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पर दोस्त से लगते हैं।
हर पल मेरे साथ साए से बने रहते हैं।
दर्द में, खुशी में या किसी डर में
मैं सदा उनकी उंगली थामे रहता हूं।

पिता हैं वे मेरे
पर प्यार जैसे लगते हैं।
जब कभी लगाते हैं गले से
लगता है मैं मैं ना रहा।
गले मिलकर भूल जाता हूं सारा जहां।

पिता हैं वे मेरे
लगते हैं गुरु जैसे।
जब-तब डांट देते हैं मुझे
लगता है सीख रहा हूं दुनिया की गणित
बताते हैं क्या भला है क्या बुरा।

पिता हैं वे मेरे
लगते हैं पुत्र से मेरे।
जब कभी जरूरत होती है
मैं ही देता हूं उन्हें सहारा।
सुनता भी हूं उनकी बात पूरी।

पिता हैं वे मेरे
लगता है हर रिश्ते से परे
बस वे पिता हैं मेरे।

--आशीष जैन


जलता ही रहूँगा!

ऐ मेरे पूज्य पिता
तुम्हें जब
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अंतिम समय
मैंने
चिता पर सोये देखा
तो इस एहसास ने
कि अब मैं
तुम्हें देख न पाऊँगा
जीवन भर
और
कोई शिकायत
नहीं कर पाऊँगा
ता-उम्र
मेरे अंतर्मन को
झकझोर दिया
और मैं अवश
तुम्हारे पार्थिव शरीर को
मिट्टी में लीन होते
देखता ही रहा
पर वो शिकायतें
जो तुम
अपने मन में ही
ले कर चल दिये
उन्हें
कैसे जान पाऊँगा मैं
पर फिर भी
एहसास तो हो ही रहा है
कि तुम तो
मेरी शिकायतें सुनते रहे
और दूर करते रहे
मेरी कमियों को
नज़र-अंदाज करके
मुझे सीने से लगा
मेरी ज़रूरतें पूरी करने में
ता-उम्र लगे रहे
मैं तो
तुम्हे बदले में
कुछ दे नहीं पाया
सिवा इस अंतिम अग्नि के
शायद इसी उम्मीद में
कि तुम मुझे
कभी तो माफ कर दोगे
पर इस अंतिम आग की गर्मी
जलाती ही रहेगी
मुझे ता-उम्र !
और मैं
जलता ही रहूँगा ता-उम्र !!

--डा0 अनिल चड्डा


बापू को नमन

पिता के रूप में राष्ट्रपिता का स्मरण करता हूँ
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आजादी की सांस ले रहा हूँ नमन करता हूँ

हे युग पुरुष अगर तुम आज होते
हम एक-दूसरे के कांधे पर सिर रख रो रहे होते

क्या आजादी का परचम इस लिए लहराया था
देश में काले अंग्रेजों का शासन क्या तुमने चाहा था?

तुझे आज अफ्रीका भी नमन करता है
वंशवाद, रंगभेद छोड़ वह लोकतंत्र में विचरता है

नमन करता हूँ तेरी गोलमेज सम्मेलन की तस्वीर को
नीलों से संग्राम और जेल की तदबीर को

चौरीचौरा पे तूने अहिंसा का सन्देश दिया
तेरी हिम्मत थी जो तूने आन्दोलन वापिस लिया

'हे राम!' के तेरे शब्द आज भी गूंजते कान में
कwन याद करता गोडसे स्वर्ग से क्षमादान दे

सत्य अहिंसा बकरी चरखा तेरे निशान थे
पूरे देश के भ्रमण ने दिए तुझे अनुमान थे

तिलक गोखले पटेल नहरू ने तुझे सरहाया था
अंग्रेजों को तेरे असहयोग आन्दोलन ने थर्राया था

प्यारे बापू - देख तेरे चेले तुझे भूल गए
खादी भूली चरखा भूला गाय बैल बछड़ा भूल गए

जाति नस्ल आतंक का बवंडर छा गया है
देश कर्जदार हो गया किसान आत्महत्या कर रहा है

हे बापू आज पितृदिवस पर हम तुम्हें नमन करते हैं
हे बापुओं के बापू तेरे आशीर्वाद की कामना रखते हैं।

-डॉ॰ श्री कृष्ण मित्तल


निछावर

बाप मताई नें न समझो,
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मूढ़े मोरें धर दयो ।
जनम मोरो कर्जा चुकावे भयो ।।

कर्जा लेकें पालोपोसो,
भारी कर्जा कर दयो ।
कर्जा में जब भारी गुथ गये,
गाने घर है धर दयो ।।
जनम मोरो---------------



भये सियाने होश समारी,
हमें रयो न गयो ।
हल्के-हल्के भाई-वहिन हाँ,
जुम्मे अपने कर लयो ।।
जनम मोरो------------------

पढाओ-लिखाओ ब्याव कराओ,
एक सें दो कर दयो।
नाम बडे और दर्शन छोटे,
घर में ऐसो कर दयो ।।
जनम मोरो------------------

शान शौकत रखवे,
मोये गाने दर दयो ।
मैं जब जब कछू बोलो चालो,
तार-तार कर दयो ।।
जनम मोरो------------------

भाई का है फ़र्ज बताकें,
मोसे ऐसो कह दयो ।।
कुल अपने की लाज बचावे,
मैं सहमों सो रह गयो ।।
जनम मोरो------------------

घर के मुखिया पे जो बीते,
धर सामने दयो ।
बाप-मतारी के करमन नें,
बँधुआ मोहाँ कर दयो ।।
जनम मोरो------------------

भये सियाने भाई-वहिन जब,
बोले मोहाँ का कर दयो ।
बाप मतारी ताने देवें,
वहुयें कहें सब धर लयो ।।
जनम मोरो------------------

ऐसो सब को कहवो,
मन में मोरें गढ गयो ।
जी के लानें मैनें अपनो
जीवन निछावर कर दयो ।।
जनम मोरो------------------

बच्चे मोसें पूछें दद्दा,
मोहाँ का कर दयो ।
जबाब उन्हें मैं दे न पाओ
दिल पै पथरा धर लयो ।।
जनम मोरो------------------

--देवेन्द्र कुमार मिश्रा


पिता के नाम कुछ चतुष्पद्यियाँ
[१]
तुम गये जगत से रवि-किरणों पर चढ़ कर
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देकर कभी न भरने वाला सूनापन,
पाने बहुमूल्य तुम्हारी निर्भर छाया
अब तरसेंगे हतप्राण विकल हो प्रतिक्षण!

[२]
तुम गये कि जग-जीवन से उल्लास गया
लगता जैसे जीवन में कुछ सार नहीं,
नश्वर सब, हर वस्तु पराई है जग की
अपना कहने को अपना घर-बार नहीं!

[३]
हे दुर्भाग्य! पिता को छीन लिया तुमने
पर, मेरा जीवन-विश्वास न छीनो तुम,
चारों ओर दिया भर शीतल गहरा तम
पर, अरुण अनागत की आस न छीनो तुम!

--डा. महेंद्रभटनागर


पिता

जनम दिया इक जननी मां ने ,पाला एक पिता ने है,
एक आध था एक पोन था ,कुल मिलाके मैं अपूर्ण था ,
कड़ी धूप मैं छाओं का एहसास पिता है ।
जीवन की दौड़ मैं एक ठाओं पिता है,
रोके कोई रास्ता तो, नया मार्ग पिता है,
रोके जीवन की साँस तो ताजी साँस पिता है।
भटकती हो सन्तान तो मार्ग दिखाता पिता है।
प्यास से तड़पती सन्तान की, शीतल बूँद पिता है।।

--अनिरुद्ध सिंह चौहान


लौट आओ तुम बाबा

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अब कोई गुड़िया, बिट्टू नहीं जाते,
दौड़कर दरवाजा खोलने को ,
तरस गया है यह दरवाजा
अब वो खिलखिलाहट सुनने को....

तुम लौट आओ बाबा,
तुम्हारी कुर्सी अब भी खाली है,
माँ रख देती है सुबह का ताज़ा अखबार ,
और भूल जाती है कि
चूल्हे पे चढ़ा आई है चाय का पानी,
खौलता रहता है पानी,
बरसती रहती हैं आँखें....

तुम लौट आओ बाबा,
अब दूध वाला भी नहीं पूछता
कि बाबूजी कहाँ हैं और
दादी के मोटे चश्मे के भीतर
अब भी तुम्हारी तस्वीर टंगी रहती है,
पनीली नज़र को याद ही नहीं कुछ और...

तुम लौट आओ बाबा
बगिया के फूलों को अब भी लगता है कि
तुम आओगे, और अपने स्नेहिल स्पर्श से,
नन्ही कलियों को सहलाओगे....

मैं कह नहीं पाती इनसे कि
बाबा अब नहीं आयेंगे ....
तुम लौट आओ बाबा ,
बस एक बार ,
तुम लौट आओ बाबा

--पूजा अनिल


पिता क्या है?

पिता,
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जो गम पीता है,
खुशियाँ बाँटता है,
जो अपने लिये नहीं,
हमारे लिए जीता है,
वह है पिता.

बनने की कोशिश में,
कल्पवृक्ष अपने बच्चों का,
करता रहता अपने को स्वाहा,
पहना कर नए कपड़े,
खुद फटे कपड़ों में जो है जीता ,
वह है पिता.

निभाते हुए अपने फ़र्ज़,
नहीं करते अपने को बयाँ,
नीचे रह कर भी जो,
बच्चे को ऊपर उठाता है,
वह है पिता.

जीवन को जीने की कला,
मुसीबतों से करना सामना,
सिखाते हुए
अल्लादीन का चिराग जो बन जाता ,
वह है पिता.

एक ठोस आधार,
विचारों का सन्सार,
अनुशासन का जो अहसास है दिलाता,
वह है पिता.

--मंजू महिमा भटनागर


बाबूजी

खोजती तुमको यहाँ-वहाँ
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कहीं न दिखते बाबूजी !
चुपके से चल दिये शायद
माँ से मिलने बाबूजी !

बड़े से फोटो फ्रेम में
झाँकता चेहरा तुम्हारा बाबूजी !
आदर्श जो थे कभी तुम्हारे
बन गये वो मेरे बाबूजी !

मेरे घर न आये तुम
मन में साध रह गई बाबूजी !
तुम्हारा दुलार, तुम्हारा प्यार
याद बनकर रह गई बाबूजी !

आज की दुनिया कितनी बदली
पर बिटिया बिलकुल न बदली
तुमसे ही तो सीखा था
सादगी से रहना बाबूजी !

जब कभी कठिन समय आ जाता
घबराकर मन व्याकुल हो जाता
सच कहती हूँ उस क्षण मुझको
बहुत खलती है कमी तुम्हारी बाबूजी !

तुमने सिखाया लिखना-पढ़ना
बस पढ़ती-लिखती रहती हूँ
आरती के दीपक की लौ में
दिखती छवि तुम्हारी बाबूजी।

--मीना जैन


डीयरेस्ट पापा

'पापा वी लव'
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अंग्रेज़ी के ये तीन शब्द
कह जाते कथा अनंत
भावों को करते अभिव्यक्त !

'लव' में केवल प्यार नहीं
है आदर और आभार
जब भी सोचा इश्वर को
आप हो जाते साकार !

'पा' मूर्त रूप पावन का
निहित है कल्याण हमारा
'पा' पारसमणि जैसा
करते हैं उद्धार हमारा

पापा सबके होते हैं
पर आप जैसा कोई नहीं
सुख-दुःख में स्वयं व्यथी
आपसे बढ़कर कोई नहीं

चिंताओं से मुक्त हो जाते
सुनते जब आपकी बात
व्याधि स्वयं उपचार बन जाता
पाकर आपका सान्निध्य और साथ !

शब्दकोश में शब्द हैं कम
क्या बयां करूं हृदय के उदगार
न ही कोई रंग तूलिका जानू
जो चित्रित कर दे मन की बात !

प्रार्थना यही निश दिन करूं
जीवन में रहे सदा आपका साथ
चाह जीवन में कुछ कर सकूं
जो आपको दे खुशियाँ अपार

सदैव आपसे पाते हैं
दिया कभी न कोई सौगात
आज भी याचक बनकर
मंगाते आपका आशीर्वाद !

बस अर्ज यही ईश से
रखे आपको स्वस्थ सबल
आप जियें हजारों साल
और बने हमारे जीवन का संबल

--बेला मित्तल


आप नहीं हैं

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यह सच है
अंकगणित की भाषा में
आप अकृत और शून्य हैं
किंतु आप एक अत्यधिक प्रभावशाली अंक हैं
और वह एक सशक्त प्रतिच्छाया की तरह
चल रहा है
सदैव मेरे साथ साथ
मैं आपको देखता हूँ
शुभ चन्दन की भांति
अपने शैशव की अनेक आयामों की स्मृतिओं में
मैं आपको अपने सामने खड़ा हुआ पाता हूँ
फलों से लदे दरख्त की तरह
मैं दौड़ता हूँ
भूमि से सागर की ओर
और अतिक्रूर घोरतम जंगलों से पर्वत श्रंखला की तरफ
और समूचे रास्तों पर
मैं आपको खड़े हुये पाता हूँ
हाथों में आशावादी रेखाचित्रों को लिये हुए
आप उस संयुक्त अंक के काल्पनिक भाग हैं
जिसको आप और मैं पूर्ण करते हैं
और जिससे न आपको या मुझको
अलग किया जा सकता
मैं जानता नहीं
इस अमूर्त्त की संरचना में
मै आपका कैसे वर्णन करूँ
यदि मैं एक असंतत वास्तविक अंक हूँ
आप मेरे अचेत विचारों के संसार के सुन्दर संयोजन में अनंत हैं।

--धर्म प्रकाश जैन


जी चाह रहा

बचपन के वो सुगंध अब तक
जिन्दगी को महकाते हैं
पापा आप हर कदम पे
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हर वक्त ही याद आते हैं

सौ रुपये ज्यादा मांगने पे
आपके सौ सवाल याद आते हैं
जब महीना रह जाता
और पैसे ख़त्म हो जाते हैं

कहीं जाने से पहले क्यों होती
थी इतनी सारी जांच-पड़ताल
समझ आया जब नजदीक से देखी
लोगों की नीयत और दुनिया के ढंग-चाल

पढ़ाई के वक्त टीवी बंद नहीं होता
तो शायद ये रस्ते खुले न होते
वक्त पे काम करने को डाँट न पड़ती
तो शायद हम वक्त से बहुत पीछे पड़े होते

पैसे को कभी पोस्ट नहीं किया
बहाने से शायद ख़ुद आते थे
होस्टल मे औरों के पैसे तो बहुत
पर हर महीने पापा नहीं आते थे

अब पैसे तो पहली को आ जाते
पर कोई साथ नहीं आता है
जाने इन्सान कुछ पाने की
इतनी बड़ी कीमत क्यों चुकाता है

अब तो सुबह और रात होती है
काम में शाम का पता ही नहीं चलता
पर वो शाम कभी यादों से नहीं जाती
जब आपके बहाने खाते थे अपनी पसंद का नाश्ता

अब सोने से पहले
कोई नहीं कहता कहानी सुनाने को
सुनाने भी लगती तो कोई
हर पंक्ति के बाद हामी नहीं भरता

गर्म दूध ठंढा होते-होते
आंख लग गई और सवेरा हो गया
अवचेतन मन को इंतज़ार था
आप माँ से हमे उठवाओगे शायद

अब हर मौसम हर फल मिलने लगे
पर वो मौसम का पहला फल न मिला
वक्त से करूँ मैं इसकी शिकायत या
अपनी उम्र से करूँ मैं इसका गिला

अक्सर ही खाने के समय अपनी वो
अधजली अधफुली रोटी याद आती है
जिसे आपने बड़े चाव से खाया था
जब सबने उसे भारत का नक्शा बताया था

सुबह फुलवारी में पानी डालने को जी चाह रहा
रात को आपकी उंगली बजाने को जी चाह रहा
आपके दोस्तों के लिए चाय बनने को जी चाह रहा
जो किया था बेमन से मन से करने को जी चाह रहा

आज फिर से अतीत में गोते लगाने को जी चाह रहा
चलती ट्रेन से भागती सड़क पे रुक जाने को जी चाह रहा

--पंखुड़ी कुमारी