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स्नोवा आई लव यू का विरहगीत गाने वालो, जवाब दो


परिचय और चित्र के अभाव में हम फरवरी माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की तीसरी कविता प्रकाशित नहीं कर सके थे। इस कविता के रचयिता आशुतोष कुमार आशुतोष माधव के नाम से कविताएँ लिखते हैं। 1 अप्रैल 1983 को वाराणसी में जन्मे आशुतोष वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय से 'आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के प्रदेय का अनुशीलन' विषय पर पीएचडी कर रहे हैं। कवि की छोटी कक्षाओं से ही हिन्दी में विशेष रुचि रही। कवि ने 2006 में स्नाकोत्तर में सर्वोच्च अंक (83॰1 प्रतिशत) लाकर बीएचयू से स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। अखिल भारतीय नवोदित साहित्यकार परिषद् की पत्रिका- ‘हिन्दी नवसृजन’ का सम्पादन एवं प्रकाशन के अतिरिक्त आशुतोष बहुत से शोधकार्यों और लेखन में सक्रिय हैं।

पुरस्कृत कविताः अथातो स्नोवा

बलवान समय
आज उस समाज को जी रहा है
जहाँ,
जीवन की सम्भावनाएँ/स्पृहाएँ
नाश्ते की तश्तरी में उतर रही हैं
सजाती हैं खाने के थाल,
जहाँ,
मोतियाबिन्द के मरीज- एक आत्मीय बुजुर्ग को
जन्मदिन पर
छोटे फाण्ट की किताबें
गिफ़्ट करने का रिवाज है.
जहाँ,
भाषा, विवेक, करुणा वगैरह
कला की कापी में इस्तेमाल किए जा सकने वाली
कोई चीज हैं और
बीएसपी*, अभी भी बुनियादी मुद्दा है.
जहाँ,
अध्यापक, प्रश्नाकुलता की पौध को
रौंदने वाला उद्भ्रांत जीव है और पाठशालाएँ दुःस्वप्न
(हाँ मिड-डे-मील की बात दीगर है).
जहाँ,
प्रोफेसर को लिखते-पढ़ते देख
होती है ठीक वैसी ही हैरानी जैसे
मीडियाकर के लिए एक घटनाविहीन दिन, जैसे
एक पोस्टकार्ड का मिलना.
जहाँ,
बूढ़े स्त्रीचिन्तक-इंटलेक्चुअल्स के गटर से निकली
नारीवादी बहसों का महाविस्तार
पहुँचता है-माला डी या फिर आई-पिल तक.
और जहाँ,
आदमी को सूँघकर
तौली जाती है उसकी सृजनधर्मिता
चमड़ी का गोरा होना रखता है मायने
बनता है छप सकने की वजह.
ऐसे जन्तु-जगत में
स्नोवा बार्नो की पर्देदारी;
अस्ति-नास्ति, उसका आदि-मध्य-अवसान!
जैसे हो इस सरल व्याकरण का कोई असहज अपवाद!!
आखिर क्यों मचती है इतनी
ऊभ-चूभ
आसन्नप्रसवा के अन्तर्मन की सी.
चिन्ता मत करो आस्तिको!
मुझे पता है कि
बलवान समय दर्ज कर लेता है
ऐसी हलचलें भी
चुपचाप.
लेकिन,
स्नोवा आई लव यू का विरहगीत गाने वालो
जवाब दो
कि तुम पर मोनालिसा हँस क्यों रही है
लगातार.
(* बिजली, सड़क, पानी)


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

शब्दों की बातें


अब हम शीर्ष 10 कविताओं के बाद की कविताओं की बात करते हैं। 11वीं कवि दिगम्बर नासवा की है। फरीदाबाद, हरयाणा के रहने वाले 48 वर्षीय दिगम्बर नासवा पिछले 10 वर्षों से संयुक्त अरब अमीरात में कार्यरत हैं। बचपन से गीत, संगीत, लिखने का शौक था, जो कॉलेज आते-आते जुनून में बदल गया। पिछले कुछ वर्षों से अपने ब्लॉग पर लिखते हैं।

पुरस्कृत कविताः शब्द कथा

शब्दकोश से निकले
कुछ शब्द
बूढ़े बरगद के नीचे
बतियाने लगे
इक-दूजे को अपना
दुखड़ा सुनाने लगे
इंसानियत बोली
मैं तो बस
किस्से कहानियों में ही पलती हूँ
हाँ कभी-कभी
नेताओं के भाषणों में भी मिलती हूँ
लोगों से अब नही मेरा संबंध
दुर्लभ प्रजाति की तरह
मैं भी लुप्त हो जाऊँगी
शब्दकोश के पन्नों में
हमेशा के लिए सो जाऊँगी
तभी करुणा के रोने की आवाज़ आई
सिसकते-सिसकते उसने ये बात बताई
पहले तो हर दिल पर मैं करती थी राज
क्या कहूँ
बच्चों के दिल में भी नहीं रही आज
इतने में दया, सम्मान और लज्जा भी बोले
जबसे जमाने की बदली है चाल
हमारा भी है यही हाल
धीरे-धीरे चाहत ने भी दिल खोला
प्रेम, प्रीत, प्रणय स्नेह
ऐसे कई शब्दों की तरफ से बोला
यूँ तो हर दिल में हम रहते हैं
मतलब नज़र आए तो
झरने से बहते हैं
स्वार्थ की आड़ में
अक्सर हमारा प्रयोग होता है
ऐसे हालात देख कर
दिल बहुत रोता है
तभी चुपचाप बैठे स्वाभिमान ने हुंकारा
पौरुष, हिम्मत और जोश को पुकारा
सब की आँखों में आ गये आँसू
मिल कर अपने अस्तित्व को धितकारा
तभी कायरता ने दी सलाह
बोली काट दो अपने-अपने पंख
नही तो देर-सवेर सब मर जाओगे
शब्दकोश की वीथियों में
नज़र भी नही आओगे
इतने में गुंडागर्दी और मक्कारी मुस्कुराए
शोरशराबे के साथ बीच सभा में आए
बोले हमारे देव झूठ का है ज़माना
तुम शब्दकोश से बाहर मत आना
इंसानों के बीच हमारा है बोलबाला
वो देखो सत्य का मुँह काला
ये सुनते ही इंसानियत घबराई
करुणा के दिल में दहशत छाई
चाहत ने गुहार लगाई
स्वाभिमान ने टाँग उठाई
सब की आत्मा
शब्दकोश में जा समाई

जीने भर का जी चुका हूँ मैं


कवि सत्यप्रसन्न समकालीन बोध की छांदस कविताएँ लिखते हैं। आज हम उनकी जो कविता प्रकाशित कर रहे हैं, उसने फरवरी माह की प्रतियोगिता में दसवाँ स्थान बनाया और थोड़ा बहुत तुक की तरफ झुकाव भी है।

पुरस्कृत कविताः जी चुका हूँ मैं

शिथिल नहीं हुईं पेशियाँ,
नासिका रंध्रों की
अभी तक।
पहचान ही लेती हैं वे;
देह गंध तुम्हारी
अभी भी।
मंद नही हुई है तनिक भी;
श्रवण शक्ति
अभी तक;
सुन ही लेते हैं कान,
ख़नक तुम्हारी चूड़ियों की
अभी भी।
दृष्टि में भी दम-खम
इतना तो बाकी है
अभी तक;
कि दिख ही जाती है,
तुम्हारे माथे पर
बार- बार झुक आती वो
एक लट चाँदी की,
जिसे जब तब हटाने की
अपनी नाकाम कोशिश में,
लगा बैठती हो;माथे पर
बेसन या आटा
अभी भी।
स्पर्श की संवेदना भी;
महफ़ूज़ है अभी तक;
कि; काँपतें हैं ओंठ मेरे
अल सुबह
तुम्हारी तर्जनी के
प्रथम हस्ताक्षर से
अभी भी।
लरज़ते नहीं हैं पाँव;
उठ ही जाते हैं,
दृढ़ता से
लेकर सहारा तुम्हारे कंधे का
अभी तक।
और चढ़ जाते हैं सीढ़ियाँ
देवालय की;
करने साक्षात्कार ईश्वर से;
रोज शाम,
अभी भी।
इसीलिये तो जिंदा है
चहल क़दमी साँसों की
अभी तक,
वर्ना जीने भर के लिये तो;
कब का जी चुका हूँ मैं।


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

कुछ नहीं होना हमेशा बना रहता है


प्रतियोगिता की नौवीं कविता हिन्द-युग्म पर लम्बे अरसे से सक्रिय प्रदीप वर्मा की है।

पुरस्कृत कविताः कुछ नहीं होना

दिन भर
पीछे लगी रहती है
कुछ बातें

कुछ बातें
परेशां करती रहती हैं
दिन भर

दिन भर
कहीं-कहीं से
कुछ गुम गया-सा
लगता है

ढूँढ़ता रहता हूँ
गुम गए कुछ को
यहाँ-वहाँ
दिन भर

खाली दिन
खाली मन
खाली कागज़-सा
बीत जाता है

कुछ नहीं होना
हमेशा बना रहता है
कुछ नहीं होना
कभी मिटता नहीं


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

माँ अब लौट चलें


फरवरी 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता मंजू भटनागर 'महिमा' की है। मंजू भटनागर की कविताएँ इससे पहले काव्य-पल्लवन के माध्यम से प्रकाशित होती रही हैं। लेकिन यह पहला मौका है जब इनकी कविता यूनिकवि प्रतियोगिता के शीर्ष 10 में चुनी गई है। मंजू भटनागर गुजरात की प्रगतिशील कवयित्री व्यंग लेखिका एवं अनुवादिका हैं। इनका जन्म 30 जुलाई 1948 को कोटा (राजस्थान) में हुआ। ये एम॰ ए॰ फिल हैं तथा कई साहित्यिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं। 'शब्दों के देवदार' और 'बोनसाई संवेदनाओं के सूरजमुखी' आप के प्रकाशित काव्य-संग्रह हैं। साहित्यालोक ने आपको डॉ. पी.सी. शर्मा काव्य पुरस्कार देकर सम्मानित किया है।

पुरस्कृत कविताः माँ अब लौट चलें

मैं जानती हूँ माँ,
कि तुम मुझे बहुत प्यार करती हो।
तभी तो यहाँ आई हो।
माँ! इस दुनिया में ,
जहाँ तुम्हें सदैव अपने,
औरत होने का कर्ज़ चुकाना पड़ा है,
अपनी इच्छाओं को सुलाना पड़ा है,
हर पल इस अहसास को जीवित रखना पड़ा है
कि तुम एक लड़की हो/ एक औरत हो
तुम पुरूष की अनुगामिनी हो,
तुम एक भोग्या हो,खर्चे की पुड़िया हो।
मै जानती हूँ माँ,
जब तुम पैदा हुई थीं,
तब थाली नहीं बजी थी।
तुम्हारे होने की खबर ,
शोक सभा में तब्दील हो गई थी।

तुम्हारी दादी ने कहा था पिता से,
’खर्चा करने को तैयार हो जा,
अभी से बचाना शुरू कर,’
यही बात मेरी दादी ने भी कही थी,
मेरी बड़ी दीदियों के जन्म पर
क्या लड़के के पैदा होने में दर्द नहीं होता?
क्या लड़के को पालने में खर्च नहीं होता?

जानती हूँ माँ!
कितना सहा है तुमने अपने वक्ष पर
समाज के कटु-व्यंग्यों के तीरों को।
इसीलिए
तुम आज यह सब कर रही हो,
तुम चाहती हो कि मुझे वह सब न झेलना पड़े
जो तुमने और दीदियों ने झेला है।
तुम चाहती हो कि मेरा जन्म मातम के माहौल मे न हो,
इसीलिए तुम यहाँ आई हो न माँ?
पिता की आँखों में भी ,
मुझे यही कातरता नज़र आ रही है\
तुम्हारी आँखों में तैरते अनकहे शब्दों के कण
तुम्हारे चेहरे की उदासी,
बार-बार सबकी निगाहें बचा,
पेट पर अपना स्नेह भरा स्पर्श देना,
बार-बार प्रभु से क्षमा-याचना,
मुझसे बार-बार माफी माँगना,
यह जता रहा है कि
माँ, तुम मुझसे कितना प्यार करती हो।
मैं, तुम्हारी बेबसी को समझ रही हूँ,
यह भी जानती हूँ कि तुम यहाँ,
आई नहीं , लाई गई हो
तुम्हें बाध्य किया है इस जग ने,
तुम्हारे अनुभवों और तकलीफों ने,
पर, तनिक सोचो माँ!
डरो नहीं,मैं उतनी कमज़ोर नहीं,
जो इस दुनिया का सामना नहीं कर पाऊँगी,
मुझे बस एक बार–बस एक बार,
इस धरती पर आने तो दो माँ,
मैं विश्वास दिलाती हूँ ,
मैं तुम्हें इस तरह घुट-घुट कर मरने नहीं दूँगी
मैं औरतों को एक नई सोच दूँगी।

उनकी आँखों में नए सपने दूँगी।
तुम्हारी कोख में रहकर,
मैंने तुम्हारी वेदना को समझा है, जाना है।
तुम्हारी हर सोच, तुम्हारा हर आक्रोश
तुम्हारी बेचैनी, तुम्हारी हर बेबसी को
जिसे तुमने महसूसा है,
मैं वाणी दूँगी
बस! एक बार--- थोड़ा सा विद्रोह कर दो,
मुझे तुम्हारी कोख का कर्ज़ चुकाने दो माँ,
लौट चलो माँ, यहाँ से एक बार
मैं जानती हूँ माँ!
तुम मुझे बहुत प्यार करती हो।


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

आने वाले दिनों में


फरवरी माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की दूसरी कविता इस प्रतियोगिता में पहली बार हिस्सा ले रहे अतुल चतुर्वेदी की है। 31 जुलाई 1965 को मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) में जन्मे अतुल ’राजस्थान में समकालीन हिन्दी व्यंग्य’ विषय पर शोधरत कर रहे हैं। हिन्दी व्याख्याता के पद पर राजसेवा में कार्यरत अतुल का एक कविता संग्रह (एक टुकड़ा धूप- 1998) तथा दो व्यंग्य संग्रह (गणतंत्र बनाम चेंपा-2005, घोषणाओं का वसंत- 2009) प्रकाशित हैं। राजस्थान पत्रिका, दैनिक नवज्योति, साहित्य अमृत, जनसत्ता, अहा! जिन्दगी, नई दुनिया सण्डे, दैनिक भास्कर, आजकल, इतवारी पत्रिका, नवभारत टाइम्स, ब्लिटज, सरिता, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, अमर उजाला, वर्तमान साहित्य, मधुमती, वागर्थ, इन्टरनेट पत्रिका अनुभूति एवं अभिव्यक्ति आदि पत्र-पत्रिकाओं में अनेक व्यंग्य एवं कई कविताएँ तथा आलेख निरंतर प्रकाशित। आकाशवाणी केन्द्र-कोटा, आकाशवाणी केन्द्र-जयपुर, जयपुर दूरदर्शन से निरन्तर प्रसारण। प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘‘काव्य मधुबन’’ के अध्यक्ष, विकल्प, भारतेन्दु समिति, राजस्थान साहित्य अकादमी के प्रतिनिधि व्यंग्य संग्रह ‘‘रेत के रंग’’ में शामिल। शिक्षा विभाग राजस्थान के काव्य संकलनों 1997, 1998 में शामिल। मदर इण्डिया अकेडमी द्वारा श्रेष्ठ युवा साहित्यकार के रूप में तथा डॉ0 रतन लाल शर्मा स्मृति सम्मान-03 से सम्मानित।


पुरस्कृत कविताः आने वाले दिनों में

नहीं गाया जाएगा कोई कोरस
बंदिश कोई नहीं सुनेगा ध्रुपद की
ठहर कर निहारेगा नहीं शिल्प-सौन्दर्य
शहर के सबसे खूबसूरत किले का
ये सब गुजरे जमाने की बातें होंगी
आने वाले दिनों में
पढे़ नहीं जायेंगे उपन्यास
महाकाव्य बाँचे नहीं जायेंगे
किताबें सिर्फ शोभा पायेंगी
प्रबंधन और वास्तु की
जबकि ढेर सारी अशांति बिखरी होगी
हमारे विचारों और शब्दों में
आने वाले दिनों में
बचेगी नहीं जगह बुजुर्गों और पौधों को
जगह नींद को भी नहीं बची होगी
और निर्मल हँसी तो दिखेगी कभी-कभी बारिश-सी
अटे पड़े होंगे घर भौतिक संसाधनों से
पटी पड़ी होंगी गलियां धूर्त्ताओं से
चप्पे-चप्पे पर नंगा फलदार चाकू लिए
दुर्घटनाएं टहल रही होंगी
तब ऐसे दिनों में
स्वप्न कहाँ कुचले पड़े होंगे
कहाँ पड़े होंगे कहकहे
किस्से, ठहाके कहाँ पड़े होंगे
आने वाले दिनों में
बचेगा भी आदमी
या रोबोट ही बचेंगे
कुछ बचेगा भी
या सब क्षरित हो जाएगा
जैसे झर रहा है प्लास्टर दादा जी की बैठक का


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

माँ-बाप में झगड़ा था असर और कहीं था


नवम्बर 2009 के यूनिकवि रवीन्द्र शर्मा 'रवि' ग़ज़ल-प्रेमी पाठकों की पहली पसंद हैं। इनके ग़ज़लें पाठकों और निर्णायकों का ध्यान एक साथ खींचतीं हैं। फरवरी 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में इनकी एक ग़जल ने आठवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता

वो राह कोई और सफ़र और कहीं था
ख्वाबों में जो देखा था वो घर और कहीं था

मैं हो न सका शहर का इस शहर में रह के
मैं था तो तेरे शहर में पर और कहीं था

कुछ ऐसे दुआएं थीं मेरे साथ किसी की
साया था कहीं और शज़र और कहीं था

बिस्तर पे सिमट आये थे सहमे हुए बच्चे
माँ-बाप में झगड़ा था असर और कहीं था

इस डर से कलम कर गया कुछ हाथ शहंशाह
गो ताज उसी का था हुनर और कहीं था

था रात मेरे साथ 'रवि' देर तलक चाँद
कमबख्त मगर वक़्त ए सहर और कहीं था


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

वरना कौन धारण करेगा तुम्हारे बेटों के भ्रूण


संगीता सेठी बहुत लम्बे समय से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं और यूनिकवि प्रतियोगिता में लगातार हिस्सा लेती रहती है। फरवरी माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में इनकी कविता ने सातवाँ स्थान बनाया। संगीता सेठी एक सफल कहानीकार भी हैं। हाल ही में इनकी एक कहानी ने 'मेरी सहेली' पत्रिका की वार्षिक कहानी लेखन प्रतियोगिता में पहला स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता: आने दो बेटियों को धरती पर

आने दो बेटियों को धरती पर
मत बजाना थाली चाहे
वरना कौन बजाएगा
थालियाँ कांसे की
अपने भाई-भतीजों के जन्म पर

आने दो बेटियों को धरती पर
मत गाना मंगल गीत चाहे
वरना कौन गाएगा गीत
अपने वीरों की शादी में

आने दो बेटियों को धरती पर
मत देना कोई विश्वास उन्हें
वरना कैसे होंगे दर्ज अदालत में
घरेलू हिंसा के मामले

आने दो बेटियों को धरती पर
मत देना कोई आशीर्वाद उन्हें
वरना कौन देगा गालियाँ
माँ-बहन के नाम पर

आने दो बेटियों को धरती पर
मत देना दान-दहेज़ उन्हें
वरना कैसे जलाई जाएँगी बेटियाँ
पराए लोगों के बीच

आने दो बेटियों को धरती पर
पनपने दो भ्रूण उनके
वरना कौन धारण करेगा
तुम्हारे बेटों के भ्रूण
अपनी कोख में


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

अकेलेपन से दोस्ती


डॉ॰ अनिल चड्डा न हारने वाले लोगों में से हैं। हिन्द-युग्म की यूनिकवि प्रतियोगिता में लगभग हर बार ही हिस्सा लेते हैं, और परिणामों से विचलित भी नहीं होते। फरवरी माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी इन्होंने भाग लिया और छठवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता: मैने अकेलेपन से दोस्ती कर ली

अकेलापन
द्वार पर बिना दस्तक दिये ही
मेरे घर में घुस आया
और जबरन मेरे साथ
बिस्तर पर लेट गया
मैंने लाख कोशिश की
उसे धक्के दे कर
घर से निकालूँ
पर वो
विचित्र प्राणी की तरह
मुझसे चिपका ही रहा
मैं बालकनी में जा
कुर्सी पर बैठ
लोगों की आवाजाही देखने लगा
शायद अकेलापन
मुझमें से निकल
खुद भी हवाखोरी में
मशगूल हो जाये
पर
लोगों की अफरा-तफरी
देखते ही बनती थी
किसी को बात करने की तो क्या
रुकने की भी फुर्सत नहीं थी
लोग अकेले ही
दौड़े ही चले जा रहे थे
अनजानी मंजिल की ओर
अपने-अपने में ही मस्त
मुझे लगा
इनको तो पहले से ही
अकेलेपन ने जकड़ रखा था
फिर मेरा अकेलापन
कैसे दूर करेंगे
मैं अकेलेपन के साथ ही
कमरे में लौट आया
पर अकेलापन घर के
हर कोने तक
मेरे साथ चला आता था
कौन बाँटता मेरा अकेलापन
बीवी किटी पार्टी में व्यस्त थी
बेटा-बहू काम पर गये थे
और बच्चे स्कूल
वापिस आ कर भी
उन्हें मेरे लिये फुर्सत कहाँ
वो व्यस्त थे
अपने ही कामों में
खेलने-खिलाने में
सीरियल के मोह में
और मैं
अकेला ही भटकता रहूँगा
अपने ही घर में
मैंने चाहा
पड़ोसी की मदद लूँ
पर वो भी तो
इसकी छाया से ग्रसित
इसी लड़ाई में जूझ रहा था
फिर मेरी क्या सहायता करता
सो मैंने
अकेलेपन से ही
दोस्ती कर ली
मेरे अकेलेपन ने
मुझे समझा दिया था
कि आजकल के दौर में
इससे जूझना व्यर्थ था।


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

तसले में उम्मीद पकाओ


प्रतियोगिता की आगे की कविताओं की तरफ़ बढ़ते हैं। आलोक उपाध्याय 'नज़र' हिन्द-युग्म के ऐसे कवियों में से हैं जो छंद में अपनी बात रखते हैं और निर्णायकों का ध्यान खींचते हैं। फरवरी २०१० की यूनिकवि प्रतियोगिता में इनकी कविता ने चौथा स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता: माँ की आँखें गीली-गीली

बच्चों के इशारे पेट तरफ़
मजदूर चले फिर सेठ तरफ़

तसले में उम्मीद पकाओ
मत देखो सूखे खेत तरफ़

प्यार की राहें और भी थीं
क्यूँ आये तुम रेत तरफ़

माँ की आँखें गीलीं-गीलीं
चले जो हम परदेस तरफ़

सारी दुनिया दुश्मन अपनी
हम-तुम दोनों एक तरफ़

मयख़ाने में जश्‍न मनेगा
उठा तू अँगुली शेख़ तरफ़

चाँद की सूरत बिकने वाली
हम भी देखें जेब तरफ़

नंगेपन को मत ले आना
आना जब इस देस तरफ़


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

कृष्णकांत- फरवरी 2010 के यूनिकवि


हिन्द-युग्म की फरवरी माह की यूनिकवि प्रतियोगिता स्तर के हिसाब से बहुत सफल रही क्योंकि अंतिम चरण में हमें यूनिकविता चुनने में बहुत परेशानी हुई। उल्लेखनीय है कि हिन्द-युग्म की यह प्रतियोगिता पिछले 38 महीनों से हर माह आयोजित हो रही है। फरवरी 2010 माह की यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए कुल 43 कविताएँ प्राप्त हुईं। बहुत से प्रतिभागियों समयांतर पत्रिका में प्रकाशित पिछले यूनिकवियों की कविताओं को देखकर इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। निर्णय दो चरणों में कराया गया। पहले चरण में 2 जजों द्वारा दिये गये अंकों के आधार पर 22 कविताओं को दूसरे चरण में भेजा गया और दूसरे चरण में तीन जजों ने 22 कविताओं में से कृष्णकांत की कविता को यूनिकविता चुना।

यूनिकवि- कृष्णकांत

उत्तर प्रदेश राज्य के गोंडा जिले के छोटे से गाँव में जन्मे कृष्णकांत ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में परास्नातक किया है। फिलहाल बहुत से अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लिख रहे हैं। कृष्णकांत की एक-एक कहानी 'लम्ही' और 'परिकथा' में प्रकाशित हुई है। कृष्णकांत की कुछ कविताएँ भी 'परिकथा' और 'वाक्' में प्रकाशित हो चुकी हैं। कवि इन दिनों हैदराबाद में रहकर मीडिया की बारीकियाँ सीख रहे हैं।

पुरस्कृत कविता- तेजू सपने देख रहा है

कथरी-कंबल साट के लेटा
माघ की रैना गुरगुर करता
तेजू सपने देख रहा है.........

बीते माघ फाग आयेगा
फूलों से लहराती फसलों में
जीवन-रस भर जायेंगे
ढलती ठंड तपेगी धरती
खेत सुनहले हो जायेंगे
सरसों अलसी अरहर गेहूं
ढो-ढोकर सब घर लायेंगे
रोटी दोनों जून पकेगी
बच्चे जी भर-भर खायेंगे
फसल है अच्छी खाने भर का
खेत में अपने हो जायेगा
और करूंगा मजदूरी जो
वो सबका सब बच जायेगा
लल्लू की अम्मा को भी
कह दूँगा रोज काम पर जाये
साथ लगा दूँगा बच्चों को
ताकि कुछ ज्यादा धन आये
चाहेंगे भगवान अगर तो
अंगना में पाहुन आयेंगे
अबकी बार बड़ी बिटिया के
हाथ में हल्दी लगवायेंगे

कथरी-कंबल साट के लेटा
माघ की रैना गुरगुर करता
तेजू सपने देख रहा है........।

पुरस्कार और सम्मान- समयांतर, की ओर से पुस्तकें तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे तथा उन्हें विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की ओर से पुस्तकें प्रेषित की जायेंगी, उनके नाम हैं-

अतुल चतुर्वेदी
आशुतोष माधव
आलोक उपाध्याय ’नजर’
मंजू महिमा
अनिल चड्डा
संगीता सेठी
रवीन्द्र शर्मा 'रवि'
प्रदीप वर्मा
सत्यप्रसन्न


हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त भी बहुत सी उल्लेखनीय कविताओं का प्रकाशन करते हैं। इस बार हम निम्नलिखित 2 कवियों की कविताएँ भी एक-एक करके प्रकाशित करेंगे-

दिगंबर नासवा
गोपाल दत्त देवतल्ला


उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 5 अप्रैल 2010 तक अनयत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

इस बार बहुत से पाठकों ने लगभग एक जैसी ही संख्या में कमेंट किया इसलिए हम यूनिपाठक चुनने की बजाय 2 पाठकों को समयांतर की ओर से पुस्तकें भेजेंगे। वे हैं प्रवीण पाण्डेय और सुमीता केशवा। हम अपने बाकी पाठकों से यह निवेदन करते हैं कि कृपया कविताओं को गंभीरता से पढ़ें और उसपर समीक्षात्मक टिप्पणी करें। इससे हमारा प्रोत्साहना तो होता ही है, कवि को पाठक की सच्ची प्रतिक्रिया भी प्राप्त होती है। हमें भी यूनिपाठक चुनने में आसानी होगी।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। इस बार शीर्ष 12 कविताओं के बाद की कविताओं का कोई क्रम नहीं बनाया गया है, इसलिए निम्नलिखित नाम कविताओं के प्राप्त होने से क्रम से सुनियोजित किये गये हैं।

मनसा ’आनंद’
अभिषेक पाठक
हिमानी दीवान
नजर द्विवेदी
पारुल माहेश्वरी
स्नेह ’पीयूष’
मृत्युंजय श्रीवास्तव ’साधक’
दीपक कुमार
प्रिया
रामप्रकाश अनंत
बोधिसत्व कस्तुरिया
कमल सिंह
आशीष पंत
रेणु दीपक
पद्म सिंह
ब्रजेंद्र श्रीवास्तव ’उत्कर्ष’
अंकुर त्यागी
तरुण ठाकुर
रतन कुमार शर्मा
नीलम अरोड़ा
राम निवास ’इंडिया’
मनीष जैन
देवेश पाण्डेय
अजय दुरेजा
आनंद गुप्ता
अभिजीत शुक्ला
नीरज वशिष्ठ
लोकेंद्र राजपूत
कविता रावत
अरविंद कुरील
संध्या पडनेकर