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यह देवालय का छल है


हिंद-युग्म के पाठक सत्यप्रसन्न जी से भली-भाँति परिचित हैं।  इनकी कविताएँ हिंद-युग्म पर लम्बे समय से प्रकाशित हो रही हैं और ये जून 2010 मे यूनिकवि भी रह चुके हैं। इनकी छांदस कविताओं को पाठकों की विशेष सराहना मिलती रही है और इनकी कविताएँ यूनिकवियों की प्रतिनिधि कविताओं के प्रकाशित संकलन ’संभावना डॉट कॉम’ का हिस्सा भी बनी हैं। इनकी पिछली कविता जुलाई माह मे प्रकाशित हुई थी। अक्टूबर माह मे इनकी प्रस्तुत कविता ग्यारहवें स्थान पर रही है।

कविता: यह देवालय का छल है ! 

            कितनी आशंकाएँ मन में;
            घेर रहे कितने संशय।
            मेरी ही परछाई मुझसे;
            पूछ रही मेरा परिचय।

                              फटते और बरसते हर पल;
                              भय के स्याह घने बादल।
                              जला रही खुद मेरी सांसें;
                              बनकर मुझको दावानल।

            हर रिश्ते पे शक होता है;
            संदेहों  में  हर   यारी।
            रात जाग कर करता हूँ मैं;
            अपनी   ही   पहरेदारी।

                              है उन्माद हवा में कैसा,
                              कितना ज़हरीला मौसम।
                              घोंप रहा है खंजर वो ही;
                              जो कल था मेरा हमदम।

            है निर्दोष आचमन जिसमें;
            केवल जल, तुलसीदल है।
            बता रहा भय मेरा मुझको'
            यह देवालय का छल है।

                              मैं रहता हूँ वहाँ; जहाँ है,
                              विश्वासों की बंद गली।
                              मेरे अपने हाथों में है;
                              मेरी ही ग़रदन पतली।

लड़कियाँ


बड़ी होती बेटियों पर प्रवेश सोनी की कविता अभी आपने पढ़ी है। प्रतियोगिता की दसवीं कविता भी कुछ ऐसी ही बात को जुदा अंदाज मे आगे बढ़ाने का प्रयास करती है। रचनाकार देवेश पांडे यूनिप्रतियोगिता के नियमित प्रतिभागी रहे हैं और उनकी कविताएँ पिछली प्रतियोगिताओं मे भी स्थान बनाती रही हैं। इनकी पिछली कविता जून माह मे प्रकाशित हुई थी। प्रस्तुत कविता लडकियों के जीवन मे उपस्थित रिक्त स्थानों को ’पतंग’ और ’छत’ के दो प्रतीकों के बहाने चित्रित करने की कोशिश करती है।

पुरस्कृत कविता: लड़कियाँ

(१)
सद्दी से 'जोत' बाँधती है
मांझा से उड़ाती है
बच्चों से ’छोडड्या’ लेकर
दूर आसमां में उड़ाती है

कभी इकतरफा भागे तो
कन्नी भी लगाती है
बड़ी सी पूँछ लटकाकर
खुद ही मुस्कराती है

पड़ी जो पेंच दूजे से
ढीलती है, लड़ाती है
अरे! वो काटा, वो काटा
करके ताली बजाती है

धीरे से झाखड में फसाती है
लाड़ से लाड़ी लाती है
बचाकर आँख लोगो से
वो ’कुटकी’ मार जाती है

कभी ठुनकी कभी शै दे
अंगुलियों पर नचाती है
वो लड़की सबसे छुप-छुपकर
पतंगे खूब उड़ाती है

***

(२)
सभ्य घरों में भाई के साथ
गली-क्रिकेट न खेलने को विवश की गयी
लड़कियाँ बैटमिंटन खेलने, रस्सी कूदने
छत पर जाती है

स्कूल-कालेजों के बंद रहने पर
इसको उसकी बातें बताने
उनकी सुनने अपनी सुनाने
नए सैण्डिल पहने पैर
अनायास ही छत की सीढ़ियाँ लाँघ जाते है

अपने ही वजह से टकराती साइकिले
और घर के चक्कर लगाते लड़कों को
ठोकर खाकर गिरते देखने,
एक दूसरे को कोहनी मारती लड़किया
अपने लड़की होने का अहसास पाने
छत पर जाती है

आस-पास के किसी छत पर
सुबह से शाम एक कोने में खड़े
किसी ‘विशेष’ बंदर को
अदरख का स्वाद चखाने
लड़किया छत पर जाती है

आफिस के काम को घर लाये
पति का ध्यान जब नई चूडियों पर नही जाता
तो बोझिल गृहस्थी की गाड़ी के पहियों में
ग्रीस डलवाने, लड़कियाँ छत पर जाती है

रोज सुबह सूरज को अर्ध्य देने,
घर के गीले कपडे सुखाने
और अपनी सूखी भावनाएँ आर्द्र करने
आचार-मुरब्बे को धूप दिखाने
और बतरस का खट्टा-मिट्ठा स्वाद लेने
लड़कियाँ छत पर जाती है

मुंडेर, खिड़कियाँ और छत
सभ्यता की चारदीवारी में बंद लड़कियों को
समाज से जोड़ने की कड़ी है ।
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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

बेटियाँ



प्रतियोगिता की नवीं कविता प्रवेश सोनी की है। हिंद-युग्म पर यह उनकी पहली प्रकाशित कविता है। अक्टूबर 1967 को जन्मी प्रवेश जी ने हायर सेकेंड्री की शिक्षा हासिल की है और सम्प्रति कोटा (राजस्थान) मे निवास करती हैं।



पुरस्कृत कविता: बेटियाँ

बचपन की छोड़ चपलता,
बेटियों हो जाती हे जब बड़ी...
माँ का दिल सूखा पत्ता हो जाता हे
लाड से दुलार से सहेजती है
सलोनी गुडिया को
कोई कहे पराया धन ...
तो दिल चाक-चाक हो जाता हे
ये तो है छुई-मुई
छू ना ले कोई इस कचनार को,
कहीं चटक  न जाये
रोक दो वक्त के प्रहार को
अंजाम के ख्याल से ही
माँ का दिल घबरा जाता है!
आ जाता अतीत आँखों में
थी वो भी किसी की लाडली
अपनी तरह
सपने सजाने संग किसी के
चली जायेगी यह लाडली
रिश्ते की देख नजाकत
माँ का दिल भर आता हे
बेटियों जब हो जाती हैं बड़ी
माँ का कद बौना हो जाता है !!!
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

रहस्यमयी प्रेम कथाओं वाले मित्र


अक्टूबर माह की आठवीं कविता आरसी चौहान की है। इससे पहले इनकी एक कविता सितंबर माह मे दूसरे स्थान पर रही थी।

पुरस्कृत कविता: रहस्यमयी प्रेम कथाओं वाले मित्र

हो सकता
कुछ चीजें लौटती नहीं जाकर वापस
पर बहुत सारी चीजें लौटती हैं
दिमाग में
जैसे- बचपन की धमाचौकड़ी
प्यार का पहला दिन, पिता का गुज़रना
और भी बहुत कुछ
बार-बार खुलती हैं स्मृति की किताबें
फड़फड़ाते हैं पन्ने
और उसमें दर्ज सारी कहानियां
अक्षरशः उग आती आंखों के सामने
और लहलहाने लगती
सपनों की फसल।

याद है जब पढ़ते थे मिडिल में
अधिकांशतः छोटे भलेमानुष
था एक लड़का प्रेम का जादूगर
दोपहर की छुटिटयों में बताता
लड़कियों के शरीर में आये उभार का रहस्य
कई-कई तरह की रहस्यमयी कथाएं
और हम विस्मित!
तो शुरू करते हैं पहली कथा से
एक था लड़का
बिल्कुल ललगड़िया बानर-सा
जो लड़को में बनरा के नाम से प्रसिद्ध
मुंह भी निपोरता वैसे ही
हम जिज्ञासावश पूछते खोद-खोद
वह बताता रस भरी बातें और कथा को
दूसरी ओर घुमाने का माहिर या यूं कहें प्यार की गाड़ी का अच्छा
ड्राइवर था वह
एक कथा से दूसरी कथा में घुसने का महारथी
महिनों तक घूमती रहती उसकी एक-एक कथा

फिर तो एक दिन उसको घेर कर हमने
सुनी एक और रस भरी दास्तान
कथा में एक थी लड़की और उसे
फंसाने की अनूठी तरकीब
अट्ठारह पोरों वाली दूब को जलाकर
उसकी भस्म अगर छिड़क दी जाए तो
खिंची चली आएगी तुम्हारे मनमाफिक
फिर मन में फूटते बुलबुले
चुनते अपने-अपने हिसाब से
क्लास की लड़कियां
और ढूंढते अट्ठारह पोरों वाली दूब
दूब भी ऐसी कि मिलती उससे
एक कम या एक अधिक पोरों वाली
महिनों तक घास में खोजते दूब और
दूब में अट्ठारह पोर
अट्ठारह पोरों की भस्म
भस्म से फंसी लड़की
लड़की का रहस्यमयी शरीर
एक अनछुआ एहसास
एक अनछुई गुदगुदी
और गर्म रगों में दौड़ती सनसनी
फिर हार-पाछ कर जाते उसकी शरण में
किसी अचूक नुस्खे की करते फरमाइश

धीरे-धीरे साल कैसे बीता
परीक्षा कैसे हुई सम्पन्न
सभी हुए कैसे पास
इसका पता ही न चला
वह आया था हम लोगों की जिन्दगी में
रहस्यों से भरा सिर्फ एक साल
आगे की पढ़ाई मे बिखरे इधर-उधर
बमुश्किल एकाध-साथी ही रह पाये साथ
पता चला वह चला गया पढ़ने बनारस
अब इन सारी चीजों से बेखबर
चलती रही पढ़ाई
मिलते रहे नये पुराने दोस्त
किसी ने पकड़ ली नौकरी
किसी ने खेती
किसी ने राजनीति की पूंछ
तो किसी ने हर गोल पाइप में तलाशना शुरू किया
कट्‌टा और बंदूक
मैं भी गाँव छोड़कर गया गोरखपुर
मऊ, बनारस, इलाहाबाद और
नौकरी लगते ही टिहरी
जहां एशिया का सबसे बड़ा कच्चा बांध
जिससे निकलती है चमचमाती बिजली
एक बार फिर चमकी मेरी आंखों में
बिजली

यहां वह मिडिल में पढ़ने वाला मित्र नहीं
बल्कि मिडिल में पढ़ाने वाला मित्र मिला
जो पहाड़ों में आया था अपनी
जवानी के दिनों में
छोड़ कर दुनियां का सारा तिलिस्म
उसे नहीं मालूम थी हॉलीवुड फिल्मों की
सिने तारिकाओं की प्रेम कहानियां या
ठंडे प्रदेशों में खुलेआम
प्रेम प्रसंगों में डूबे लोगों का रहस्य
वह जब भी मिलता आग्रह करता
देखने को वैसी ही फिल्में
जिसके आगे पानी भरती थी अप्सराएं
अब हमारे उसके बीच
कोई उम्र की सीमा नहीं थी
वह था तो मेरे बाप की उमर का
लेकिन इस उम्र में फूटने लगे थे
जवानी के कल्ले,
हम युवा मित्रों के बीच
आने लगा बाल रंगाकर
जैसे कोई सांड सींग कटा कर
घुमता हो बछड़ों में
हम सबकी बातें सुनता गौर से
पैदा हुए नए सूर-कबीरों के दोहों पर
खिलखिलाता खूब और करता पैरवी
कि शामिल होने चाहिए ये दोहे
’सेक्स एजुकेशन’ की किताबों में
हम मुस्कुराते और पीटते अपना सिर
वह भरता आहें और कहता
हमने नाहक गुजार दी अपनी
जिन्दगी के अड़तालीस साल
सहलाता अपना चेहरा जैसा
 बन चुका चिकना सिर
और सिर के पिछले हिस्से में
कौवे के घोंसले की तरह उलझे बालों में
फिराता अपनी अंगुलियाँ

एक दिन उसकी अनुपस्थिति में
उसकी प्रेम कहानी का हुआ यूँ लोकार्पण
कि वह आया था बीस-बाईस की उम्र में
छोड़ कर अपना भरा-पूरा परिवार
और आया तो यहीं का होकर रह गया
उसे ऐसा लगा कि यहां के लोग
हमसे जी रहे हैं सौ साल पीछे
फिर तो यहां की आबो-हवा ने पहले तो
उसका दिल जीता
नदी, पहाड झरने
सबके सब उतरते चले गये
दिल में उसके
सिर्फ उतरी नहीं थी तो एक पहाड़ी
औरत
जो उसी स्कूल में पढ़ाती थी हमउम्र
उसने किया अथक प्रयास और
फिसला तो फिसलता ही गया
पहाड़ी ढलानों पर बिछे चीड़ के पत्तों पर
ढूंगों की तरह
जहां स्वयं को भी नहीं देख पा
रहा था वह
फिर तो उसके भीतर प्रेम का पहला बीज
अंखुआने से पहले ही लरज गया
और अब महसूसता हूँ
कि इन्हीं उठापटक के बीच
चलता है जीवन
ढ़हते- ढिमलाते बनते हैं रिश्ते
और इन्हीं रिश्तों के जंगलों में
लौटता है जीवन
बसता है घर
फुदकती हैं चिड़ियाँ
और ठंडी बयार चलने लगती है एक बार फिर।
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

कंकरीट के जंगल में


प्रतियोगिता की सातवीं कविता धर्मेंद्र कुमार सिंह की है। धर्मेंद्र जी की हिंद-युग्म पर यह दूसरी प्रकाशित कविता है। इससे पहले सितंबर माह मे इनकी कविता ’कवि और अधिकारी’ आठवें स्थान पर रही थी। प्रस्तुत कविता शहरीकरण के साथ समाज मे कृत्रिमता के प्रति बढ़ती स्वीकार्यता की ओर इशारा करती है।

पुरस्कृत कविता: कंकरीट के जंगल में

कंकरीट के जंगल में
उगते प्लास्टिक के पेड़।

हरे रंग हैं, भरे अंग हैं,
नकली फल भी संग-संग हैं;
इनके हैं अंदाज अनूठे,
हमसे इनको देख दंग हैं;
मृत हरियाली की तस्वीरों
से लगते ये पेड़।

बिना खाद के बिन मिट्टी के
बिन पानी के हरे भरे हैं,
सूर्य रश्मि बिन, खुली हवा बिन
भी सुगंध से तरे तरे हैं;
सब कुछ है पर एक अदद
आत्मा विहीन ये पेड़।

रोज सुबह ही सुबह रसायन से
मल मल कर धोए जाते,
चमक दमक जो भी दिखती है
उसे रसायन से हैं पाते,
चमक रहे बाहर से,
अंदर-अंदर सड़ते पेड़।

भूल गए मौसम परिवर्तन
वातानुकुलित कमरों में ये,
खुद कटकर इक बेघर को घर
देने का भी सुख भूले ये,
केवल कमरों में सजने को
ही जिन्दा ये पेड़ ।
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क्रान्ति बीज लो


जया पाठक की एक कविता पिछली प्रतियोगिता मे छठे पायदान पर रही थी और खासी सराही भी गयी थी। उनकी प्रस्तुत कविता ने अक्टूबर मे फिर छठा स्थान प्राप्त किया है।

पुरस्कृत कविता: क्रान्ति बीज लो

कुछ दिन होते हैं
विघटन
और उस से उपजी
क्रान्ति के बीच
उन दिनों...
बच्चे बच्चे नहीं रह पाते
पैदा होते ही
जवान हो जाते हैं.
फिर उन दिनों जवानी भी
नहीं रह पाती
जवान
अकस्मात् बोझिल बुढ़ापा हो जाती है

उन दिनों
आदमी समझ नहीं पाता
हाथ फैलाना ज्यादा अच्छा है
या मुट्ठी भींच कर अनजान चेहरों पर जड़ देना
उन दिनों
बाहर विज्ञान नहीं होता
भीतर अध्यात्म नहीं होता
कला नहीं होती
होता है सिर्फ बेकार कोलाहल
जिसे कोई सुन भी नहीं पाता

उन दिनों
समझ नहीं आता
इंसान इंसान है
या तंत्र
(या यन्त्र)
या मरी हुयी अपनी संवेदना की लाश

उन दिनों
बाहरी सूरज तो जलता है
लेकिन भीतरी सूरज जलाता है
(ओह...बुझा हुआ सूरज वह भी!)
चिंता मत करो...
यदि यह दिन ऐसे दिनों में से एक है
तो समय बदलने वाला है समझो
जलप्लावन के बाद
नदी की तराई में
कछार लगी हो मानो
पुराना सब गल गया है
उपजाऊ ज़मीन है
क्रान्ति बीज लो....

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तुम कब आओगे पता नहीं


सुधीर गुप्ता चक्र की कविता अक्टूबर माह मे पाँचवें पायदान पर रही है। इनकी एक कविता जुलाई माह मे भी शीर्ष दस मे रही थी। प्रस्तुत कविता प्रतीक्षा जैसे बहुप्रचिलित विषय को किसी इंजीनियर जैसी संवेदनाओं से परखने की कोशिश करती है।

पुरस्कृत कविता: तुम कब आओगे पता नहीं

तुम
कब आओगे
पता नहीं।
साठ डिग्री तक
पैरों को मोड़कर
और 
पीठ का
कर्व बनाकर
दोनों घुटनों के बीच
सिर रखकर
एक लक्ष्य दिशा की ओर
खुले हुए स्थिर पलकों से
बाट जोहती हूँ तुम्हारी
तुम
कब आओगे
पता नहीं।
दोनों पलकों के बीच
तुम्हारे इंतजार का
हाइड्रोलिक प्रेशर वाला जेक
पलक झपकने नहीं देता।
दूर दृष्टि का
माइनस फाइव वाला
मोटा चश्मा चढ़ा होने पर भी
बिना चश्मे के ही
दूर तक
देख सकती हूँ मैं तुमको
लेकिन
तुम
कब आओगे
पता नहीं।
एकदम सीधी
और
शांत होकर चलने वाली
डी सी करण्ट की तरह
ह्रदय की धड‌कन का प्रवाह
तुम्हारे आने की संभावना से
ऊबड़-खाबड़
ए सी करण्ट में बदलकर
ह्रदय की गति को
अनियंत्रित कर देता है
लेकिन
जब संभावना भी खत्म हो जाती है
तब लगता है
ज्यामिति में
अनेक कोण होते हैं
इसलिए
क्यों न लम्बवत होकर
एक सौ अस्सी डिग्री का कोण बनाऊं
और
थक चुकी आंखों को
बंद करके सो जाऊं
क्योंकि
तुम
कब आओगे
पता नहीं।
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उम्र के धूप चढ़ल


 पिछले कुछ माहों मनोज सिंह भावुक की भोजपुरी ग़ज़लें आप यहाँ पढ़ चुके हैं। अक्टूबर माह मे इनकी ग़ज़ल चौथे स्थान पर रही है।

पुरस्कृत रचना: भोजपुरी ग़ज़ल

उम्र के धूप चढ़ल,   धूप  सहाते   नइखे
हमरा हमराही के  इ बात  बुझाते नइखे

मंजिले इश्क में कइसन इ मुकाम आइल बा
हाय ! हमरा से “आई.लव.यू” कहाते नइखे

देह अइसन बा कि ई आँख फिसल जाताटे
रूप अइसन बा कि दरपन में समाते नइखे

जब से देखलें हईँ  हम सोनपरी  के जादू
मन बा खरगोश भइल  जोश अड़ाते नइखे

कइसे सँपरेला  अकेले  उहां प  तहरा  से
आह! उफनत बा नदी, बान्ह बन्हाते नइखे

साथ में तोहरा जे देखलें रहीं सपना ओकर
याद आवत बा बहुत  याद ऊ जाते नइखे

हमरा डर बा कहीं पागल ना हो जाए ‘भावुक’
दर्द उमड़त बा  मगर आँख  लोराते नइखे
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खोल दो


बदलते सामाजिक परिवेश के बीच किसी लड़की के जीवन की विषमताएँ और अपनी पहचान का सतत संघर्ष अक्सर हिमानी दीवान की कविताओं का केंद्र-बिंदु होता है। हिमानी दीवान की एक कविता आप जुलाई माह मे पढ़ चुके हैं। अक्टूबर माह की प्रतियोगिता मे हिमानी की प्रस्तुत कविता तीसरे स्थान पर रही है।

पुरस्कृत कविता: खोल दो 


खोल दो का आग्रह
फिर मेरे सामने  है
क्योंकि अब वो मुझे
अपनी जंजीरों में जकड़ना चाहते हैं
मेरी उड़ान मंजूर है उन्हें
मगर वो उसकी दिशा बदलना चाहते है
मेरी आहटों का जिक्र भी भाता है उन्हें
और मेरे कदम बढ़ाने पर भी वो ऐतराज जताते है
उनकी मीठी सी बातों में एक तीखा सा पन है
छलकती सी आँखें छल का दर्पण है
सब कुछ छिपा कर जाने क्या बताना चाहते हैं
मेरे जवान दिल में बैठे बचपने को
वो हर रोज बहकाना चाहते है
मेरी बातों की तफसील से मतलब नहीं उन्हें
मेरे बदन की तासीर को आजमाना चाहते हैं
जो नाम हिमानी है
उसमे वो क्या आग जलाएंगे
बर्फ की इस नदी को कितना पिघलायेंगे
बारिश तो ठीक है मगर
बाढ़ का कहर क्या वो सह पाएंगे
सवाल उनके भी हैं सवाल मेरे भी
मैं वि्श्वास करने में यकीं रखती हूँ
उनके सवालों में है शक के घेरे भी
देखें अब हम
भाग खड़े होंगे वो
या इन हालातों को सुलझाएंगे???
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जब ग़ज़ल मुश्किल हुई


अक्टूबर प्रतियोगिता की दूसरे पायदान की रचना एक ग़ज़ल है। इसके रचनाकार विनीत अग्रवाल की हिंद-युग्म पर यह दूसरी प्रकाशित रचना है। इससे पहले अगस्त माह मे उनकी एक गज़ल आठवें स्थान पर रही थी।

पुरस्कृत कविता: ग़ज़ल

हमसफर यूँ अब मेरी मुश्किल  हुई
राह जब  आसां हुई,  मुश्किल हुई

हम तो मुश्किल में सुकूं से जी लिए
मुश्किलों को पर बड़ी  मुश्किल हुयी

ख्वाब भी आसान  कब थे  देखने
आँख पर जब भी खुली, मुश्किल हुई

फिर अड़ा है शाम से जिद पे दिया
फिर हवाओं को बड़ी मुश्किल हुई

वो बसा है जिस्म की रग-रग में यूँ
जब भी पुरवाई चली, मुश्किल हुई

रोज़ दिल को हमने समझाया मगर
दिन ब दिन ये दिल्लगी मुश्किल हुई

मानता था  सच मेरी हर बात को
जब नज़र उस से मिली मुश्किल हुई

होश दिन में यूँ भी  रहता है कहाँ
शाम जब ढलने लगी मुश्किल हुई

क़र्ज़ कोई  कब तलक  देता रहे
हम से रखनी दोस्ती मुश्किल हुई

चाँद  तारे तो  बहुत ला कर दिए
उसने साड़ी मांग ली, मुश्किल हुई

नन्हे मोजों को  पड़ेगी  ऊन कम
आ रही है फिर ख़ुशी, मुश्किल हुई

रोज़   थोड़े  हम  पुराने  हो चले
रोज़ ही कुछ फिर नयी मुश्किल हुई

जो सलीका  बज़्म का आया  हमें
बात करनी और भी मुश्किल हुई

और सब   मंजूर थी   दुशवारियां
जब ग़ज़ल मुश्किल हुई, मुश्किल हुई
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अक्टूबर माह की प्रतियोगिता के परिणाम


आज अक्टूबर माह की यूनिप्रतियोगिता के परिणाम ले कर हम उपस्थित हैं। हमारी मासिक कविता प्रतियोगिता का यह छियालिसवाँ निर्बाध आयोजन था। प्रतिभागियों की निरंतरता हमारे लिये बहुत उत्साहजनक बात रहती है। इस बार भी प्रतियोगिता के तमाम नियमित प्रतिभागियों ने अपनी रचनाएँ हमें भेजीं थी। वहीं कई नये नाम भी इस प्रतियोगिता से जुड़े।

अक्टूबर माह के लिये कुल 52 रचनाएं शामिल की गयीं, जिन्हे 2 चरणों मे आँका गया। प्रथम चरण के 2 निर्णायकों के दिये अंकों के आधार पर हमने उन कविताओं को अलग कर दिया जिन्हे कोई अंक प्रा्प्त नही हुआ थ। इस तरह कुल 17 कविताएँ दूसरे चरण मे गयीं। दूसरे चरण के निर्णायकों के दिये अंको मे पहले चरण का औसत जोड़ कर कविताओं का क्रम निर्धारित किया गया। इस माह के परिणाम की सबसे महत्वपूर्ण बात रही  कि निर्णायकों ने एक यूनिकवियत्री को चुना है। अपर्णा भटनागर की कविता ’क्या अंत टल नही सकता’ सबसे अधिक अंक ले कर यूनिकविता बनने मे सफल रही। अपर्णा भटनागर पिछले कुछ महीनों से प्रतियोगिता मे नियमित भाग ले रही हैं और उनकी कविताएं पाठकों द्वारा काफ़ी सराही जाती रही हैं। सितंबर माह मे उनकी एक कविता ग्यारहवें पायदान पर रही थी।

यूनिकवियत्री: अपर्णा भटनागर

अपर्णा जी का जन्म 6 अगस्त 1964 को जयपुर (राजस्थान) मे हुआ। इन्होने हिंदी और अंग्रेजी मे परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। अभी का निवास-स्थान अहमदाबाद (गुजरात) मे है। इन्होने 2009 तक दिल्ली पब्लिक स्कूल मे हिंदी विभाग मे कोआर्डिनेटर पद पर कार्य किया है। मनुपर्णा के नाम से भी लिखने वाली अपर्णा पिछले कुछ समय से अंतर्जाल के साहित्यिक परिवेश मे सक्रिय हुई हैं और इनकी रचनाएँ कई अन्य जगहों पर भी प्रकाशित हैं। एक काव्य-संग्रह ’मेरे क्षण’ भी प्रकाशित हुआ है।
 यहाँ प्रस्तुत उनकी कविता अनगिनत समस्याओं से घिरे हमारे विश्व को एक नये आशावादी नजरिये से परखने की कोशिश करती है और दुनिया के लिये जरूरी तमाम खूबसूरत चीजों के बीच जीवन के बचे रहने की उत्कट इच्छा को स्वर देती है।
सम्पर्क: 23, माधव बंग्लोज़ -2, मोटेरा, अहमदाबाद (गुजरात)

यूनिकविता: क्या अंत टल नहीं सकता ?

इस संसार के अंत से पहले
देखती हूँ कई झरोखे सानिध्य के
खुले हैं
अनजाने प्रेम की हवाएं बहने लगी हैं
खोखली बांसुरियों ने बिना प्रतिवाद के
घाटियों की सुरम्य हथेलियों में
सीख लिया है बजना ..
मछलियाँ सागर की लहरों पर
फिसल रही हैं
उन्मत्त
कि मछुआरों ने समेट लिए हैं जाल !
अपने चेहरों पर सफ़ेद पट्टियाँ रंगे
कमर पर पत्ते कसे
जूड़े में बाँस की तीलियाँ खोंसे
युवा-युवतियों ने तय किया है
इस पूर्णिमा रात भर नृत्य करना ...
माँ अपने स्तन से बालक चिपकाये
बैठी है चुपचाप
आँचल में ममता के कई युग समेटे ..
अचानक खेत जन्म लेने लगे हैं
गाँव किसी बड़े कैनवास पर
खनक रहे हैं ..
शहरों का धुआँ
चिमनियों में लौट गया है
अफगनिस्तान में ढकी आतंकी बर्फ पिघल रही है
सहारा के जिप्सी पा चुके हैं नखलिस्तान
साइबेरिया के निस्तब्ध आकाश में पंख फैलाये उड़ रहे हैं रंगीन पंछी
लीबिया की पिचकी छाती
धड़क रही है साँसों के संगीत से
उधर दूर पश्चिम में सूरज तेज़ी से डूब रह है
अतल सागर रश्मियों में
और दरकने लगा है पूर्णिमा का चाँद
कांच की किरिच-किरिच ..
लपक कर एक बिजली कौंधती है ..
आह ! क्या अंत टल नहीं सकता ?
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पुरस्कार और सम्मान-   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों को समयांतर पत्रिका की वार्षिक सदस्यता देंगे तथा उनकी कविता यहाँ प्रकाशित की जायेगी उनके क्रमशः नाम हैं-

विनीत अग्रवाल
हिमानी दीवान
मनोज भावुक
सुधीर गुप्ता ’चक्र’
जया पाठक श्रीनिवासन
धर्मेंद्र कुमार सिंह
आरसी चौहान
प्रवेश सोनी
देवेश पांडे


हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त जिन दो अन्य कवियों की कविता प्रकाशित करेंगे उनके नाम हैं-

सत्यप्रसन्न
शील निगम

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 30 नवंबर 2010 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। शीर्ष 17 कवियों के नाम अलग रंग से लिखित है।

मंजू महिमा भटनागर
विकास गुप्ता
आलोक उपाध्याय
योगेंद्र शर्मा व्योम
डॉ भूपेंद्र सिंह
नूरैन अंसारी
सचिन कुमार जैन
मंजरी शुक्ल
धीरज सहाय
पूजा तोमर
डा अनिल चड्डा
रंजना डीन
प्रेम वल्लभ पांडेय
अश्विनी कुमार राय
अनिरुद्ध यादव
राम डेंजारे
विवेक मिश्र
विवेक शर्मा
डा राजीव श्रीवास्तव
धर्मेंद्र मन्नू
अशोक शर्मा
सनी कुमार
सीमा सिंहल ’सदा’
जितेंद्र जौहर
आकर्षण कुमार गिरि
कैलाश जोशी
मृत्योंजय साधक
डा नूतन गैरोला
अजय दुरेजा
सुतीक्षण प्रताप कौशिक
शिप्रा साह
जोमयिर जिनि
दीपक कुमार
कमलप्रीत सिंह
स्नेह ’पीयूष’
संगीता सेठी
मनोज शर्मा ’मनु
प्रकाश पंकज
अजय सोहनी
अम्बरीष श्रीवास्तव
साधना डुग्गर

नोट- जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं कि यूनिपाठक/यूनिपाठिका का सम्मान हम वार्षिक पाठक सम्मान के तौर पर सुरक्षित रख रहे हैं। वार्षिक सम्मानों की घोषणा दिसम्बर 2010 में की जायेगी और उसी महीने हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव 2010 में उन्हें सम्मानित किया जायेगा।