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Wednesday, November 10, 2010

जब ग़ज़ल मुश्किल हुई


अक्टूबर प्रतियोगिता की दूसरे पायदान की रचना एक ग़ज़ल है। इसके रचनाकार विनीत अग्रवाल की हिंद-युग्म पर यह दूसरी प्रकाशित रचना है। इससे पहले अगस्त माह मे उनकी एक गज़ल आठवें स्थान पर रही थी।

पुरस्कृत कविता: ग़ज़ल

हमसफर यूँ अब मेरी मुश्किल  हुई
राह जब  आसां हुई,  मुश्किल हुई

हम तो मुश्किल में सुकूं से जी लिए
मुश्किलों को पर बड़ी  मुश्किल हुयी

ख्वाब भी आसान  कब थे  देखने
आँख पर जब भी खुली, मुश्किल हुई

फिर अड़ा है शाम से जिद पे दिया
फिर हवाओं को बड़ी मुश्किल हुई

वो बसा है जिस्म की रग-रग में यूँ
जब भी पुरवाई चली, मुश्किल हुई

रोज़ दिल को हमने समझाया मगर
दिन ब दिन ये दिल्लगी मुश्किल हुई

मानता था  सच मेरी हर बात को
जब नज़र उस से मिली मुश्किल हुई

होश दिन में यूँ भी  रहता है कहाँ
शाम जब ढलने लगी मुश्किल हुई

क़र्ज़ कोई  कब तलक  देता रहे
हम से रखनी दोस्ती मुश्किल हुई

चाँद  तारे तो  बहुत ला कर दिए
उसने साड़ी मांग ली, मुश्किल हुई

नन्हे मोजों को  पड़ेगी  ऊन कम
आ रही है फिर ख़ुशी, मुश्किल हुई

रोज़   थोड़े  हम  पुराने  हो चले
रोज़ ही कुछ फिर नयी मुश्किल हुई

जो सलीका  बज़्म का आया  हमें
बात करनी और भी मुश्किल हुई

और सब   मंजूर थी   दुशवारियां
जब ग़ज़ल मुश्किल हुई, मुश्किल हुई
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पुरस्कार -  विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

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17 कविताप्रेमियों का कहना है :

रानीविशाल का कहना है कि -

खुबसूरत ग़ज़ल कही ...हर शेर बहुत अच्छा है !
बधाई

मुदिता का कहना है कि -

विनीत जी

फिर अड़ा है शाम से जिद पे दिया
फिर हवाओं को बड़ी मुश्किल हुई

बहुत उम्दा.....

क्या कहें ऐसी गज़ल की शान में
लफ़्ज़ों का टोटा पड़ा ,मुश्किल हुई .....

मुदिता का कहना है कि -

विनीत जी ,
अभी गज़लों की क्लास में कुछ पढ़ा ..जिससे ये अंदाज़ा हुआ कि आपकी गज़ल पर मेरी टिप्पणी को अगर उसी काफिये में कहा जाए तो ये होना चाहिए


क्या कहें ऐसी गज़ल की शान में
लफ़्ज़ों की भारी कमी मुश्किल हुई

ranjana का कहना है कि -

नन्हे मोजों को पड़ेगी ऊन कम
आ रही है फिर ख़ुशी, मुश्किल हुई

bahut behtreen likha hai apne. baar baar padhne ki ikcha ho rahi hai. har sher bahut umda.

कुलदीप "अंजुम" का कहना है कि -

vineet bhai
bahit bahut badhayi
bahut khushi huyi mujhe

अश्विनी कुमार रॉय का कहना है कि -

“और सब मंजूर थी दुशवारियां
जब ग़ज़ल मुश्किल हुई, मुश्किल हुई” आपको लिखने में आई दिक्कते, हमको मगर पढ़ने में ये मुश्किल हुई. विनीत जी आपने लिखा तो ठीक है मगर बार बार की मुश्किल कुछ ज्यादा मुश्किल पैदा कर रही है और किसी हद तक अखरती भी है. शायद मजमून अच्छा होने पर भी इसे पहला स्थान नहीं मिल पाया क्योंकि “लफज ढूँढने में थी आपको दुश्वारियां मगर जजों को फैसला करने में मुश्किल हुई” अश्विनी कुमार रॉय

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ का कहना है कि -

ग़ज़ल खूबसूरत है मगर मुश्किल कुछ ज्यादा हो गई है। बधाई।

Roshi का कहना है कि -

कल्पना

Roshi का कहना है कि -

कल्पना
बंद खडकी का पट खुला
मानो जीवन को मिली नै उडान
क्यूंकि उसका सरीर था निष्क्रिय
उस की कल्पना को मिले नए रंग
अम्बर नीला, बादल सफ़ेद और थे कई रंग
कैसा अम्बर ? कैसे बादल और कैसा इन्द्र धनुष का रंग
सोचता ही रहा , इतने बरसो से लेता हुआ और सक्रिय.

rachana का कहना है कि -

चाँद तारे तो बहुत ला कर दिए
उसने साड़ी मांग ली, मुश्किल हुई

नन्हे मोजों को पड़ेगी ऊन कम
आ रही है फिर ख़ुशी, मुश्किल हुई

रोज़ थोड़े हम पुराने हो चले
रोज़ ही कुछ फिर नयी मुश्किल हुई
mujhe ye sabhi bahut achchhe lage
badhai
rachana

Roshi का कहना है कि -
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Roshi का कहना है कि -

अहसास
जीवन एक नवजीवन का
चक्र है यह अदभुत इश्वेर का
स्रष्टि ने है फिर से दौराहा इतिहास
बेटी की कोख में पल रही है एक आस
याद आते हैं बो लम्हे जब हुआ था जन्म लाडली का
छोटी सी नाजुक सी गुडिया छाया सर्वत्र उल्लास
कब पली, बड़ी और था उस पर योवन छाया
माँ का आँचल छोड़ कब चल पड़ी बह काया
पिया का अपने पाने को साथ
आज वही नन्ही कलि एक पुष्प बनी
और खुद चल पड़ी मातृत्व के नाजुक पल की ओर
कल जिससे गुजारी थी माँ उसी अहसास की ओर
याद आता है हरपल वो लम्हा जो गुजरा था मैंने
एक हकीकत की साथ .

Vibha का कहना है कि -

"यदि प्रेम मै हो जाओ, सुख निश्चित ही मिल जायेगा

sada का कहना है कि -

जो सलीका बज़्म का आया हमें
बात करनी और भी मुश्किल हुई

बहुत ही सुन्‍दर पक्तियां ।

vineet का कहना है कि -

sabhi sudhi pathakon aur hind yugm parivaar kahrday se dhanyavaad

Anonymous का कहना है कि -

vieet ji, hamesha ki tarah awesome...
bahut bahut badhai aapko..


vineet mishra

Anonymous का कहना है कि -

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