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उम्र के धूप चढ़ल


 पिछले कुछ माहों मनोज सिंह भावुक की भोजपुरी ग़ज़लें आप यहाँ पढ़ चुके हैं। अक्टूबर माह मे इनकी ग़ज़ल चौथे स्थान पर रही है।

पुरस्कृत रचना: भोजपुरी ग़ज़ल

उम्र के धूप चढ़ल,   धूप  सहाते   नइखे
हमरा हमराही के  इ बात  बुझाते नइखे

मंजिले इश्क में कइसन इ मुकाम आइल बा
हाय ! हमरा से “आई.लव.यू” कहाते नइखे

देह अइसन बा कि ई आँख फिसल जाताटे
रूप अइसन बा कि दरपन में समाते नइखे

जब से देखलें हईँ  हम सोनपरी  के जादू
मन बा खरगोश भइल  जोश अड़ाते नइखे

कइसे सँपरेला  अकेले  उहां प  तहरा  से
आह! उफनत बा नदी, बान्ह बन्हाते नइखे

साथ में तोहरा जे देखलें रहीं सपना ओकर
याद आवत बा बहुत  याद ऊ जाते नइखे

हमरा डर बा कहीं पागल ना हो जाए ‘भावुक’
दर्द उमड़त बा  मगर आँख  लोराते नइखे
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पुरस्कार -  विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

एह दशहरा में कवनो पुतला ना,मन के रावण के तन जरावे के


सभी पाठकों को विजयादशमी की शुभकामनाएँ। इस बार दशहरा हम कुछ आंचलिक रंग मे मना रहे हैं। इस अवसर पर हम पाठकों के लिये ख्यात साहित्यकार मनोज सिंह ’भावुक’ की यह भोजपुरी ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहे हैं।
 जनवरी 1976 को सीवान (बिहार) में जन्मे और रेणुकूट (उत्तर प्रदेश ) में पले- बढ़े मनोज भावुक भोजपुरी के सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार हैं। पिछले 15 सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्थाओं के संस्थापक, सलाहकार और सदस्य हैं। तस्वीर जिंदगी के( ग़ज़ल-संग्रह) एवं चलनी में पानी ( गीत- संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्तके हैं। ‘तस्वीर जिन्दगी के’ तो इतना लोकप्रिय हुआ कि इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया जा चुका है और इस पुस्तक को वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है।
सम्प्रति: क्रियेटिव हेड, हमार टीवी, नोएडा
सम्पर्क:  09958963981


गज़ल  
फूल के अस्मिता बचावे के
कांट चारो तरफ उगावे के

ए जी ! बाटे बहार गुलशन में
आईं सहरा में गुल खिलावे के

ऊ जे तूफान के बुझा देवे
एगो अइसन दिया जरावे के

एह दशहरा में कवनो पुतला ना
मन के रावण के तन जरावे के

तय कइल ई बहुत जरूरी बा
माथ कहवां ले बा झुकावे के

आईं हियरा के झील में अपना
प्यार के इक कमल खिलावे के

काम अइसन करे के जवना से
पीठ पीछे भी मान पावे के

जिस्म जर जाई एक दिन ‘भावुक’
रूह के रूह से मिलावे के

कहाँ खो गइल अब ऊ धुन प्यार के


प्रतियोगिता की तीसरी कविता के रूप में हम मनोज भावुक की एक कविता प्रकाशित कर रहे हैं। मनोज भावुक भोजपुरी साहित्य और भाषा के लिए खूब काम कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविता- चिड़िया, हमारे घर आती थी कभी

बहुत नाच जिनिगी नचावत रहल
हँसावत, खेलावत, रोआवत रहल

कहाँ खो गइल अब ऊ धुन प्यार के
जे हमरा के पागल बनावत रहल

बुरा वक्त मे ऊ बदलिये गइल
जे हमरा के आपन बतावत रहल

बन्हाइल कहाँ ऊ कबो छंद में
जे हमरा के हरदम लुभावत रहल

उहो आज खोजत बा रस्ता, हजूर
जे सभका के रस्ता देखावत रहल

जमीने प बा आदमी के वजूद
तबो मन परिन्दा उड़ावत रहल

कबो आज ले ना रुकल ई कदम
भले मोड़ पर मोड़ आवत रहल

लिखे में बहुत प्राण तड़पल तबो
गजल-गीत 'भावुक' सुनावत रहल


प्रथम चरण मिला स्थान- पाँचवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- तीसरा


पुरस्कार- हिजड़ों पर केंद्रित रुथ लोर मलॉय द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'Hijaras:: Who We Are' के अनुवाद 'हिजड़े:: कौन हैं हम?' (लेखिका अनीता रवि द्वारा अनूदित) की एक प्रति।



सबसे बड़का शाप गरीबी


फरवरी माह की प्रतियोगिता से छठवीं रचना के तौर पर हम भोजपुरी के प्रसिद्ध युवाकवि मनोज भावुक की रचना प्रकाशित कर रहे हैं। मनोज भावुक की एक रचना जोकि बसंत के ऊपर थी, आप पढ़ चुके हैं।

पुरस्कृत कविता- सबसे बड़का शाप गरीबी

सबसे बड़का शाप गरीबी
सबसे बड़का पाप गरीबी

डँसे उम्र भर, डेग-डेग पर
बन के करइत साँप गरीबी

हीत-मीत के दर्शन दुर्लभ
जब से लेलस छाप गरीबी
साधू के भी चोर बनावे
हरे पुन्य-प्रताप गरीबी
जन्म कर्ज में, मृत्यु कर्ज में
अइसन चँपलस चाँप गरीबी

सुन्दर, स्वस्थ,सपूत अमीरी
जर्जर बूढ़ा बाप गरीबी
जे अलाय बा ओकरा घर में
पहुँचे अपने आप गरीबी

सूप पटकला से ना भागी
रोग, दलिद्दर, पाप, गरीबी
ज्ञान भरल श्रम के लाठी से
भागी अपने आप गरीबी
शब्दार्थ- बड़का- बड़ा वाला, करइत साँप- करैत साँप, बहुत जहरीला सर्प, हीत-मीत- हितैषी और मित्रगण,
जब से लेलस- जब से लिया, जब से अपने गिरफ्त में लिया, अइसन चँपलस चाँप गरीबी- गरीबी ने ऐसी चाँप कसी
जे- जो, अलाय- आलसी, बा- है, ओकरा- उसके, सूप- लड़की की बनी विशेष प्रकार की परात, बर्तन, पटकला से- पटकने से, दलिद्दर- दरिद्र,


प्रथम चरण मिला स्थान- द्वितीय


द्वितीय चरण मिला स्थान- छठवाँ


पुरस्कार- कवयित्री निर्मला कपिला के कविता-संग्रह 'सुबह से पहले' की एक प्रति

डड़ौंकी (एक भोजपुरी कविता)


उठल डड़ौकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

बड़कू कs बेटवा चिल्लायल, निन्हकू चच्चा भाग जा
गरजत हौ छोटकी कs माई, भयल सबेरा जाग जा
घर से निकलल घूमे-टहरे , चिंता धरल कपाल बा

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

घर में बिटिया सयान हौ, बेटवा बेरोजगार हौ
सुरसा सरिस बढ़ल मंहगाई, बेइमान सरकार हौ
काटत-काटत, कटल जिन्दगी, कटत न ई जंजाल बा ।

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा

हमके लागत बा दहेज में बिक जाई सब आपन खेत
जिनगी फिसलत हौ मुट्ठी से जैसे गंगाजी कs रेत
मन ही मन ई सोंच रहल हौ, आयल समय अकाल बा ।

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा।

कल कह देहलन बड़कू हमसे का देहला तू हमका
खाली आपन सुख की खातिर पैदा कइला तू हमका
सुनके भी ई माहुर बतिया काहे अटकल प्रान बा

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

ठक-ठक, ठक-ठक, हंसल डंड़ौकी, अब तs छोड़ा माया-जाल
राम ही साथी, पूत न नाती, रूक के सुन लs काल कs ताल
सिखा के उड़ना, देखाss चिरई, तोड़त माया जाल बा

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

कवि- देवेन्द्र कुमार पाण्डेय