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Thursday, November 18, 2010

क्रान्ति बीज लो


जया पाठक की एक कविता पिछली प्रतियोगिता मे छठे पायदान पर रही थी और खासी सराही भी गयी थी। उनकी प्रस्तुत कविता ने अक्टूबर मे फिर छठा स्थान प्राप्त किया है।

पुरस्कृत कविता: क्रान्ति बीज लो

कुछ दिन होते हैं
विघटन
और उस से उपजी
क्रान्ति के बीच
उन दिनों...
बच्चे बच्चे नहीं रह पाते
पैदा होते ही
जवान हो जाते हैं.
फिर उन दिनों जवानी भी
नहीं रह पाती
जवान
अकस्मात् बोझिल बुढ़ापा हो जाती है

उन दिनों
आदमी समझ नहीं पाता
हाथ फैलाना ज्यादा अच्छा है
या मुट्ठी भींच कर अनजान चेहरों पर जड़ देना
उन दिनों
बाहर विज्ञान नहीं होता
भीतर अध्यात्म नहीं होता
कला नहीं होती
होता है सिर्फ बेकार कोलाहल
जिसे कोई सुन भी नहीं पाता

उन दिनों
समझ नहीं आता
इंसान इंसान है
या तंत्र
(या यन्त्र)
या मरी हुयी अपनी संवेदना की लाश

उन दिनों
बाहरी सूरज तो जलता है
लेकिन भीतरी सूरज जलाता है
(ओह...बुझा हुआ सूरज वह भी!)
चिंता मत करो...
यदि यह दिन ऐसे दिनों में से एक है
तो समय बदलने वाला है समझो
जलप्लावन के बाद
नदी की तराई में
कछार लगी हो मानो
पुराना सब गल गया है
उपजाऊ ज़मीन है
क्रान्ति बीज लो....

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

‘सज्जन’ धर्मेन्द्र का कहना है कि -

जलप्लावन के बाद
नदी की तराई में
कछार लगी हो मानो
पुराना सब गल गया है
उपजाऊ ज़मीन है
क्रान्ति बीज लो....

सुन्दर प्रस्तुति, बधाई

डा श्याम गुप्त का कहना है कि -

हुज़ूर , अपने देश में ये क्रान्ति-बीज, जमीन , विघटन आदि नकारात्मक भाव , बस्तुस्थिति कहां होती हैं---यह योरोपीय-रूसी व कम्यूनिस्ट भाव है- -किसी अन्ग्रेज़ी या रूसी कविता की भाव नकल लगती है।

रानीविशाल का कहना है कि -

सुन्दर प्रस्तुति

सदा का कहना है कि -

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

M VERMA का कहना है कि -

बेहतरीन प्रस्तुति

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