फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

खोल दो


बदलते सामाजिक परिवेश के बीच किसी लड़की के जीवन की विषमताएँ और अपनी पहचान का सतत संघर्ष अक्सर हिमानी दीवान की कविताओं का केंद्र-बिंदु होता है। हिमानी दीवान की एक कविता आप जुलाई माह मे पढ़ चुके हैं। अक्टूबर माह की प्रतियोगिता मे हिमानी की प्रस्तुत कविता तीसरे स्थान पर रही है।

पुरस्कृत कविता: खोल दो 


खोल दो का आग्रह
फिर मेरे सामने  है
क्योंकि अब वो मुझे
अपनी जंजीरों में जकड़ना चाहते हैं
मेरी उड़ान मंजूर है उन्हें
मगर वो उसकी दिशा बदलना चाहते है
मेरी आहटों का जिक्र भी भाता है उन्हें
और मेरे कदम बढ़ाने पर भी वो ऐतराज जताते है
उनकी मीठी सी बातों में एक तीखा सा पन है
छलकती सी आँखें छल का दर्पण है
सब कुछ छिपा कर जाने क्या बताना चाहते हैं
मेरे जवान दिल में बैठे बचपने को
वो हर रोज बहकाना चाहते है
मेरी बातों की तफसील से मतलब नहीं उन्हें
मेरे बदन की तासीर को आजमाना चाहते हैं
जो नाम हिमानी है
उसमे वो क्या आग जलाएंगे
बर्फ की इस नदी को कितना पिघलायेंगे
बारिश तो ठीक है मगर
बाढ़ का कहर क्या वो सह पाएंगे
सवाल उनके भी हैं सवाल मेरे भी
मैं वि्श्वास करने में यकीं रखती हूँ
उनके सवालों में है शक के घेरे भी
देखें अब हम
भाग खड़े होंगे वो
या इन हालातों को सुलझाएंगे???
______________________________________________________________
पुरस्कार -  विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।


एक अभागी लड़की


प्रतियोगिता की छठवीं कविता हिमानी दीवान की है। हिमानी दीवान पहली बार कविता-मंच पर प्रकाशित हो रही हैं। बैठक पर स्थाई तौर पर लिखती हैं। अपने बारे में बताते हुए कहती हैं- "ये जानते हुए भी की संघर्ष ही जीवन है, माँ ने एक सरल जीवन की योजना बनाई थी मेरे लिए। बारहवीं की पढ़ाई के बाद बीटीसी कराकर शादी करवा देने की एक सरल और सधी हुई योजना। लेकिन मेरे दिमाग पर बचपन से जो लेखिका बनने का फितूर था, वो पत्रकार बनने की परिणति के रूप में फूट पड़ा और घर पर किसी को बिना बताये पत्रकारिता का फार्म भर दिया और दाखिला मिल जाने पर घर में बताया। इकलौती संतान होने का फायदा कह सकते हैं इसे कि न चाहते हुए भी सहयोग और सहमति दोनों मिल गई। पिछले ही साल पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की है और तब से सपनों को जमीन देने की कोशिश में हूँ। फिलहाल गाजियाबाद के एक टेबलॉयड में अपने अरमानों को आकाश देने का प्रयास हो रहा है। दुनियादारी की तमाम विसंगतियों से जुड़े हो जाने के बावजूद भी गैरदुनियादार हो जाने की चाह में तमाम विषयों पर लिखना-पढ़ना जारी है।"

पुरस्कृत कविता: एक अभागी लड़की

बच्ची से बड़ी होती है वो
सीखती है घर के काम-काज
रोटियाँ बेलना
तवे पे डालना
तरकारी छीलना
पकाना
अक्सर
उँगली जल जाती है
कट जाती है
पर बात
आग और चाकू से आगे निकलकर
उसके ग्रहों की चाल पर चल जाती है

छत पर सूखते कपड़ों में
जब सब लत्ते रहते है अपनी जगह पर
और बस उसकी ही चुनरी उड़ जाती है
तो बात हवा के झोंको और तेज आँधी
को छोड
उसके नसीब के पन्नो को पलट आती है

वो भी बढ़ाती है कदम आगे
फासला कम भी हो जाता है मंजिलों का
मगर जब उसके ही रस्ते में हरे-भरे बूढ़े हो चुके
किसी पेड़ की शाख गिर जाती है तो
ये बात किसी प्रख्यात पंडित
तक पहुँच जाती है
सोलह, सात और एक सौ आठ
हर संख्या के उपवास रख चुकी है वो
अपनी पहुँच से पैर बाहर निकालकर
न जाने कितने मंदिरों की सीडियाँ
चढ़ चुकी है वो
मगर जब उसकी ही मन्नत अधूरी रह जाती है
तो बात भगवान के कच्चे कानों का नजर अंदाज कर
उसके कर्मों को कोस आती है

मौसम बदलते हैं हर बरस
मगर जब पतझड़ ही बस
उसके आँगन में रुक जाता है तो
बात मौसम से बदलकर
मुक़द्दर की तरफ मुड़ जाती है

फिर जब कभी किसी दिन सखियों के बीच
जिक्र होता है
उसकी प्रेम कहानी का तो
दिल की दहलीज से निकलकर
बात उसके हाथ की लकीरों तक पहुँच जाती है

एक लड़की
जब लड़की होने के साथ
एक अभागी लड़की बन जाती है
तब जिंदगी के सारे धागों में जैसे कोई
गिरह पड़
जाती है........
न कोई अदालत
न वकील
न सबूत
न गवाह
मुक़द्दर के इस मुक़दमे की सुनवाई
में हर बार होता है एक ऐतिहासिक फैसला
और फिर
जीते जी मरने की सजा सुनाई जाती है

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।