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Friday, July 09, 2010

परहेज़ करना कोई गीत गाने से


प्रतियोगिता की चौथी कविता एम वर्मा की है। इनका जुड़ाव हिंद-युग्म से काफ़ी पुराना है और इनकी कविताएँ हमेशा निर्णायकों और पाठकों का ध्यान आकृष्ट कराने मे सफ़ल रही हैं। एम वर्मा फ़रवरी माह के यूनिकवि रहे हैं तथा पिछली प्रतियोगिता मे भी इनकी कविता दसवें स्थान पर रही थी। कवि ही नही वरन्‌ एक नियमित पाठक के तौर पर भी हिंद-युग्म पर इनकी सक्रियता सराहनीय रही है। इनकी कविताएँ मूलतः सामयिक विषयों पर केंद्रित होती हैं और सामाजिक विसंगतियों के प्रति मुखर विरोध कविताओं मे साफ़ नज़र आता है।

पुरस्कृत कविता

सुनो !
मैने खिड़कियाँ बन्द कर दी है
तुम खोलना मत
और सुनो !
ऊँची आवाज में
तुम बोलना मत,
यूँ तो इस कमरे में
तुम्हारे साँस लेने के लिये
पर्याप्त हवा है
पर जब दम घुटने लगे तो
ऊपर वाले रोशनदान को
थोड़ा सा खोल लेना,
और हाँ !
इस कमरे में
यहाँ से वहाँ तक जहाँ चाहों
बेझिझक डोल लेना,
तुम संकोच मत करना
फ्रिज़ में रखी चीजे खाने से
बस्स, परहेज़ करना
कोई गीत गाने से,
लौटकर जब आऊँगा तो
तुम्हें मैं
बाहर की दुनिया के बारे में बताऊँगा
और तुम्हारे लिये
सूर्य रश्मियों से ढँके
ऊँचे पहाड़ की तस्वीरें लाऊँगा

ओ प्यारी बेटी !
ओ प्यारी बेटियाँ !

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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

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22 कविताप्रेमियों का कहना है :

Deepali Sangwan का कहना है कि -

pita ke man ke dar ko dikhati hai aapki rachna, ek pita apni beti ko duniya ki har buri cheez se bachana chahta hai, par iske liye use kaid karne ki kya jarurat hai, use kyun nahi itna strong banate ki koi uske samne na tik sake.
Yaahi soch to badalni hai...

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

Deepaliji ne baat jaha chodi,wahi se uthata hu..ye rachna behtarin hai par sirf aadhi hai,aadha sach likha jana baaki hai

Jyoti का कहना है कि -

सुन्दर रचना
दोहरे मानसिकता ... भ्रम का वातावरण और छद्म प्यार लड़कियों के लिये
बहुत खूबसूरती से इस मानसिकता को उकेरा है
बेटियों की स्वतंत्रता कमरे की हद तक ही क्यों है ???

M VERMA का कहना है कि -
This comment has been removed by the author.
Razia का कहना है कि -

जबरद्स्त व्यंग्य रचना
बेटियों को सब्जबाग दिखा कर यूँ ही भ्रम में रखा जाता है
रोशनी शायद इनके लिये है ही नही.
बहुत खूब

sumita का कहना है कि -

मर्मस्पर्शी तरीके से एक पिता की मजबूरी को बयां करती रचना...बधाई वर्मा जी!!!

डॉ टी एस दराल का कहना है कि -

रूढ़िवादिता का सुन्दर चित्रण किया है , कविता के माध्यम से ।
शुक्र है कि अब यह सोच बदलने लगी है ।

Deepali Sangwan का कहना है कि -

muaaf kijiyega, main razia ji se ek sawaal poochna chahti hun
razia ji aapko is rachna mein vyang kahan mila?

Suman का कहना है कि -

nice

Razia का कहना है कि -

@Deepali Sangwan
लौटकर जब आऊँगा तो
तुम्हें मैं
बाहर की दुनिया के बारे में बताऊँगा
यह व्यंग्य नहीं तो और क्या है? बेटियों को कैद रखने के लिये सब्जबाग दिखाना
बेटियों के लिये तो झरोखे से बाहर की दुनिया दुर्लभ है (अपवादों को छोड़ दें तो. वैसे भी जो खुद को स्वतंत्र समझती हैं उनके हकीकत पर भी गहराई से नज़र डालने की जरूरत है.
बेटियों और बेटों में अंतर को कौन नकार सकता है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक का कहना है कि -

बहुत सुन्दर रचना!
--
वहाँ भी इस कमेंट को पेस्ट कर देते हैं!

निर्मला कपिला का कहना है कि -

लडकी के लिये समाज मे कितने बन्धन है बहुत सहज स्वाभाविक ढंग से लिखा है बेशक अधूरा है मगर इस अधूरे मे गहरे जा कर देखें तो निचोड यही निकलता है। चाहे कहने वाला पिता हो या पति। लेखिका को बधाई

राजकुमार सोनी का कहना है कि -

वर्मा साहब तो हमेशा ही शानदार लिखते हैं
मैं उन्हें पढ़ता हूं.
काफी गंभीर लेखन है उनका
बधाई
एक अच्छी रचना पढ़ पाया.

वाणी गीत का कहना है कि -

परहेज करना गीत गाने से ...मगर कैसे ...
दर्द, ख़ुशी कैसे भी व्यक्त तो होगा ना ...
बेटियों को समर्पित बहुत ही अच्छी कविता ..!

Ekta का कहना है कि -

शानदार रचना
सब्जबाग देखती बेटियाँ शायद सच को पहचानते हुए भी न पहचानने का एहसास कराती है
विसंगतियाँ उकेरती सम्पूर्ण रचना

Ekta का कहना है कि -

@ Deepali Sangwan
पूरी रचना व्यंग्य ही है क्योंकि बेटियाँ आभासी दुनिया को ही सच मानने के लिये मजबूर कर दी जाती है.

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

सुनो !
मैने खिड़कियाँ बन्द कर दी है
तुम खोलना मत
और सुनो !
ऊँची आवाज में
तुम बोलना मत,
....बहुतही सुंदर रचना!

Deepali Sangwan का कहना है कि -

ekta ji, n razia ji

ye kavita vyang hai ya nhi, kavi ne kis man sthiti mein ye kahi hai, iska jawaab khud wo hi de sakte hain
haan is vishay par main kafi kuch kehna chahungi, par yahan nahi, baithak par kahungi.. Discussion wahin karenge

धर्मेन्द्र कुशवाहा का कहना है कि -

सशक्त रचना

दीपक 'मशाल' का कहना है कि -

वर्मा जी की कवितायें हमेशा ही सोचने पर मजबूर कर देती हैं.

sada का कहना है कि -

बेहतरीन शब्‍द रचना ।

सुलभ § Sulabh का कहना है कि -

वर्मा जी को नियमित पढता आया हूँ, इनकी कविता में बहुत संवेदना भरी होती है
व्यस्तता और इन्टरनेट से दूरी के चलते, नियमित पठन नही हो पा रहा है.
हिन्दयुग्म पर प्रकाशित रचना प्राय इमेल फीड से पढ़ लेता हूँ. वर्मा जी को बहुत बधाई!
धन्यवाद !

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