फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

मी लार्ड! इसे सजा दीजिए


एम वर्मा पिछले एक वर्ष से लगातार प्रकाशित हो रहे हैं। जनवरी 2010 के यूनिकवि भी रह चुके हैं। जुलाई माह की प्रतियोगिता में इनकी कविता ने चौथा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता- यह गुनाहगार है

मी लार्ड!
यह जो आदमी खड़ा है
ताउम्र यह
खुद ही के खिलाफ लड़ा है;
यह कातिल है
अपनी ही भावनाओं का,
इसने अपने सपनों को
अनाहूत सा भगा दिया;
फिर भी यदि सपने आये तो
खुद ही को जगा दिया,
इसने कड़वे घूट पीने का
खुद को आदी बना दिया है
और आज देखिये स्वयं को
स्वयं के खिलाफ
प्रतिवादी बना दिया है
मी लार्ड!
मेरे पास गवाह भी हैं
जो यह साबित कर देंगे कि
यह लड़ा ही नहीं
उन तमाम सम्भावनाओं के लिये
जिसे यह हासिल कर सकता था
यह कतराता रहा
अपने इर्द-गिर्द;
अपने आस-पास देखने से
खुद को वंचित रखा
भोर की उजास देखने से,
यह गुनहगार है
स्वयंभू ताकतों के खिलाफ
न लड़ने के लिये
और फिर खुद के माथे पर
सलीब जड़ने के लिये
मी लार्ड!
अब जबकि
इसका जुर्म साबित चुका है
इसे सजा दीजिये
जीजिविषा और हक के साथ
ताउम्र जीने के लिये।

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

परहेज़ करना कोई गीत गाने से


प्रतियोगिता की चौथी कविता एम वर्मा की है। इनका जुड़ाव हिंद-युग्म से काफ़ी पुराना है और इनकी कविताएँ हमेशा निर्णायकों और पाठकों का ध्यान आकृष्ट कराने मे सफ़ल रही हैं। एम वर्मा फ़रवरी माह के यूनिकवि रहे हैं तथा पिछली प्रतियोगिता मे भी इनकी कविता दसवें स्थान पर रही थी। कवि ही नही वरन्‌ एक नियमित पाठक के तौर पर भी हिंद-युग्म पर इनकी सक्रियता सराहनीय रही है। इनकी कविताएँ मूलतः सामयिक विषयों पर केंद्रित होती हैं और सामाजिक विसंगतियों के प्रति मुखर विरोध कविताओं मे साफ़ नज़र आता है।

पुरस्कृत कविता

सुनो !
मैने खिड़कियाँ बन्द कर दी है
तुम खोलना मत
और सुनो !
ऊँची आवाज में
तुम बोलना मत,
यूँ तो इस कमरे में
तुम्हारे साँस लेने के लिये
पर्याप्त हवा है
पर जब दम घुटने लगे तो
ऊपर वाले रोशनदान को
थोड़ा सा खोल लेना,
और हाँ !
इस कमरे में
यहाँ से वहाँ तक जहाँ चाहों
बेझिझक डोल लेना,
तुम संकोच मत करना
फ्रिज़ में रखी चीजे खाने से
बस्स, परहेज़ करना
कोई गीत गाने से,
लौटकर जब आऊँगा तो
तुम्हें मैं
बाहर की दुनिया के बारे में बताऊँगा
और तुम्हारे लिये
सूर्य रश्मियों से ढँके
ऊँचे पहाड़ की तस्वीरें लाऊँगा

ओ प्यारी बेटी !
ओ प्यारी बेटियाँ !

_______________________________________________________

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

एक चिड़िया मरी पड़ी थी


एम वर्मा हिन्द-युग्म के अत्यधिक सक्रिय पाठक-कवियों में से हैं। एकबार हिन्द-युग्म के यूनिकवि भी रह चुके हैं। मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता ने दसवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता: एक चिड़िया मरी पड़ी थी

बलखाती थी
वह हर सुबह
धूप से बतियाती थी
फिर कुमुदिनी-सी
खिल जाती थी
गुनगुनाती थी
वह षोडसी
अपनी उम्र से बेखबर थी
वह तो अनुनादित स्वर थी
सहेलियों संग प्रगाढ़ मेल था
लुका-छिपी उसका प्रिय खेल था
खेल-खेल में एक दिन
छुपी थी इसी खंडहर में
वह घंटों तक
वापस नहीं आई थी
हर ओर उदासी छाई थी
मसली हुई
अधखिली वह कली
घंटों बाद
शान से खड़े
एक बुर्ज के पास मिली
अपनी उघड़ी हुई देह से भी
वह तो बेखबर थी
अब कहाँ वह भला
अनुनादित स्वर थी
रंग बिखेरने को आतुर
अब वह मेहन्दी नहीं थी
अब वह कल-कल करती
पहाड़ी नदी नहीं थी
टूटी हुई चूड़ियाँ
सारी दास्तान कह रही थीं
ढहते हुए उस खंडहर-सा
वह खुद ढह रही थी
चश्मदीदों ने बताया
जहाँ वह खड़ी थी
कुछ ही दूरी पर
एक चिड़िया मरी पड़ी थी

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

कोखजने का दम तोड़ना


एम वर्मा कई बार हिन्द-युग्म की प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं और लगभग हर बार ही इनकी कविताओं ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया है। जनवरी 2010 के यूनिकवि सम्मान से सम्मानित हैं। अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में इनकी कविता ने दूसरा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविताः कोखजने का दम तोड़ना

मैंने देखा है
अपने जवान पश्नों को
उन बज्र सरीखे दीवारों से टकराकर
सर फोड़ते हुए
जिसके पीछे अवयस्क बालाएँ
अट्टहासों की चहलकदमी के बीच
यंत्रवत वयस्क बना दी जाती है
और
बेशरम छतें भरभराकर ढहती भी नहीं हैं

मैनें देखा है
आक्सीजन की आपूर्ति बन्द कर देने के कारण
अपने नवजात, नाजुक और अबोध
प्रश्नों को दम तोड़ते हुए
अक्सर मैं इनके शवों को
कुँवारी की कोख से जन्मे शिशु-सा
कंटीली झाड़ियों के बीच से उठाता हूँ

बहुत त्रासद है
कोखजने को दम तोड़ते हुए देखना
और फिर खुद ही दफनाना
हिचकियाँ भी तो प्रश्नों का रूपांतरण ही हैं
तभी तो मैं इन्हें जन्म ही नहीं लेने देता
और आँसुओं की हर सम्भावना का
गला घोट देता हूँ

जी हाँ! यही सच है
अब मैं अपने तमाम प्रश्नों का गला
मानस कोख में ही घोट देता हूँ
मेरा अगला कदम
उस कोख को ही निकाल फेंकना है
जहाँ से इनका जन्म सम्भावित है


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

वह सूरज के निकलने का सपना देखेगा


मार्च माह की प्रतियोगिता की नौवीं कविता एम वर्मा की है। एम वर्मा लम्बे समय से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं और फरवरी 2010 का यूनिकवि सम्मान पा चुके हैं।

पुरस्कृत कविताः सफर जो अभी बाकी है

नीम अन्धेरे
जागा
आँख मलते-मलते
भागा
रक्त पिपासु
काली लपलपाती जीभ-सी
सड़क
वह भागता रहा
फिर भी
बेधड़क
गुजरा वह
कभी अन्धेरे सुरंग से
टकराया फिर
किसी दबंग से
गंतव्य क्या है?
मंतव्य क्या है?
किसी सवाल का जवाब नहीं
आँखों में कोई ख्वाब नहीं
समुन्दर की तलहटी खंगाला
खो गया जब भीड़ में
खुद की उँगली पकड़
खुद ही को निकाला
सिक्के उछालकर
खरीदा खुद को
कभी खुद को
सिक्के-सा उछाला
तय नहीं
क्या किस्सा है
भीड़ उसके अन्दर है
या वह भीड़ का हिस्सा है

सूरज अस्ताचल को है
अब वह लौटेगा
दरवाजे से बात करेगा
फिर अन्दर हो लेगा
कुछ खा-पीकर
कुछ देर में सो लेगा

वह सूरज के निकलने का
सपना देखेगा
सफर जो अभी बाकी है


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

चौथे साल की पहली यूनिप्रतियोगिता के परिणाम


हिन्द-युग्म की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता अपने चौथे वर्ष में प्रवेश कर गई है। जनवरी 2007 से प्रतिमाह अनवरत रूप से यह प्रतियोगिता आयोजित हो रही है। इस प्रतियोगिता से धीरे-धीरे साहित्य-जगत में एक प्रतिष्ठित स्थान बना लिया है। हिन्द-युग्म ने 19वाँ विश्व पुस्तक मेला में यूनिकवियों को सम्मानित करने के लिए एक समारोह भी आयोजित कर चुका है। वर्ष 2008 में यूनिपाठकों को सम्मानित किया जा चुका है।

अक्सर इस प्रतियोगिता के परिणाम नये महीने के पहले या दूसरे सोमवार को प्रकाशित हो जाते हैं, लेकिन हिन्द-युग्म की 19वें विश्व पुस्तक मेला में भागीदारी से हर वेबप्रस्तुति में थोड़ा विलम्ब हुआ, इसके लिए हम अपने पाठकों और प्रतिभागियों से क्षमाप्रार्थी हैं।

जनवरी 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए हमें कुल 48 कविताएँ प्राप्त हुईं। निर्णय 2 चरणों में 6 जजों (प्रथम चरण में 3 जज और द्वितीय चरण में 3 जज) द्वारा कराया गया। प्रथम चरण के बाद 29 कविताओं को दूसरे चरण के जजों को भेजा गया। सभी 6 जजों द्वारा मिले अंकों के औसत के हिसाब से एम वर्मा की कविता 'कबूतर तुम कब सुधरोगे?' को यूनिकविता चुना गया।

यूनिकवि- एम॰ वर्मा

एम॰ वर्मा की एक कविता अक्टूबर 2009 की यूनिकवि प्रतियोगिता में पाँचवाँ स्थान बना चुकी है। एम. वर्मा का जन्म वाराणसी के एक कृषक परिवार में हुआ। सम्पूर्ण शिक्षा वाराणसी में हुई (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम. ए.(हिन्दी), बी. एड.)। शुरू से ही कविताओं का शौक रहा। साथ ही नाटकों में भाग भी लेते रहे। ऊहापोह की जिन्दगी और शादी, फिर बच्चे और अंततोगत्वा दिल्ली में ‘राजकीय विद्यालय’ में अध्यापक बन बैठे। बच्चों के बीच बच्चा बन जाने की आदत छोड़े नहीं छूटती जिसके कारण गुरूत्तर शिक्षकीय दायित्व को मजे लेकर निभा रहे हैं। थियेटर का शौक अभी भी जिन्दा है। कभी-कभार नाटकों में भाग लेते रहते हैं। ‘जश्ने बचपन’ में ‘नीली छतरी’ में अभिनय करना इनके लिए अविस्मरणीय बन गया है। कविताएँ लिखना बदस्तूर जारी है। इन्होंने भोजपुरी रचनाएँ भी लिखी। दिल्ली में हिन्दी अकादमी द्वारा आयोजित ‘रामायण मेले’ में भोजपुरी रचना पुरस्कृत हो चुकी है। ब्लॉगजगत का सफर बहुत पुराना नहीं है। मई 2009 से ब्लॉग में रचनाओं को पिरोना प्रारम्भ किया। बदस्तूर जारी सफर कहाँ तक है, ये नहीं जानते।

पुरस्कृत कविता- कबूतर तुम कब सुधरोगे?

कबूतर!
तुम कब सुधरोगे ?
आख़िर तुम क्यों कभी
मन्दिर के अहाते में उतरते हो
तो कभी
मस्ज़िद के आले में ठहरते हो?
क्या तुम्हें पता नहीं है
इनका आपस में
कोई वास्ता नहीं है,
मन्दिर से मस्ज़िद तक
या मस्ज़िद से मन्दिर तक
कोई रास्ता नहीं है।

अरे! अगर तुममें
इतनी भी अक्ल नहीं है,
तो क़्यों नहीं तुम हमसे सीखते हो?
क्यों नहीं तुम भी रट लेते हो।
हमारी बौद्धिक पुस्तकों की भाषा,
जिनमें हमें बताया गया है-
मन्दिर में हिन्दू पूजा करते हैं,
मस्ज़िद में मुसलमाँ सजदा करते हैं
जिनमें यह नहीं बताया गया है
ईद, होली भारत का प्रमुख त्यौहार है
वरन जो बतलाता है
ईद मुसलमानों का त्यौहार है
और
होली, दीवाली हिन्दुओं का है पर्व।

अरे! हमसे सीखो
हम अपना धर्म बचाने के लिए
क्या नहीं करते हैं,
कभी बारूद बनकर मारते हैं
तो कभी बारूद से मरते हैं।
एक तुम हो-
जिसे आनी चाहिए शरम
तुम्हें अब तक ये सलीका नहीं आया
कि पहचान सको अपना धरम।

तुम कहाँ थे जब
मन्दिर हथौड़ा लिए खड़ा था,
मस्ज़िद ख़ंजर लिये
हर राह में अड़ा था?
तुम तो सबक लो
हमारी उन्नत सभ्यता से
हम बेशक खुद को नहीं जानते हैं,
पर अपना-अपना धरम
बखूबी पहचानते हैं।

अरे तुम तो
उस दिन से डरो
जब तुम मरोगे!
उस दिन भी क्या तुम
यही करोगे?
कबूतर तुम कब सुधरोगे?


पुरस्कार और सम्मान- समयांतर, की ओर से पुस्तकें तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे तथा उन्हें विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की ओर से पुस्तकें प्रेषित की जायेंगी, उनके नाम हैं-

रवीन्द्र शर्मा रवि
अखिलेश कुमार श्रीवास्तव
अरविंद श्रीवास्तव
उमेश्वर दत्त निशीथ
मृत्युन्जय ’साधक’
तरुण ठाकुर
अनवर सुहैल
सुमिता केशवा
अनुपमा मोंगा


हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त भी बहुत सी उल्लेखनीय कविताओं का प्रकाशन करते हैं। इस बार हम निम्नलिखित 3 कवियों की कविताएँ भी एक-एक करके प्रकाशित करेंगे-

सुरेंद्र अग्निहोत्री
मेयनुर
संगीता सेठी


उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 10 मार्च 2010 तक अनयत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

विमल कुमार हेड़ा हिन्द-युग्म को 1 साल से भी ज्यादा पढ़ रहे हैं, परंतु टिप्पणियाँ निरंतर नहीं भेज पाते थे। जनवरी 2010 में इन्होंने हिन्द-युग्म न कि खूब पढ़ा, बल्कि कमेंट भी किया। इसलिए हम विमल कुमार हेड़ा को जनवरी 2010 का यूनिपाठक चुन रहे हैं।

यूनिपाठक- विमल कुमार हेड़ा

जन्म तिथिः 15 जून 1969
जन्म स्थान: ग्राम- धमाना, जिला - चित्तोड़गढ़ ( राजस्थान )
शिक्षाः बी. कोम तथा बी. ए.
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.) से
व्यवसायः सर्विस
क्लर्क (असिस्टेन्ट ग्रेड.-3)
राजस्थान परमाणु बिजलीघर, रावतभाटा (राज.)
लेखन कार्यः विगत लगभग 14 वर्षों से कविता लेखन
रूचिः कविता लिखना एवं पढ़ना एवं साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेना।
साहित्यः स्थानीय पत्र पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन।


पुरस्कार और सम्मान- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की ओर से पुस्तकें तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र।

इस बार हमने दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान के विजेता पाठकों के लिए हमने क्रमशः विनोद कुमार पाण्डेय, निर्मला कपिला और सफरचंद को चुना है। इन तीनों विजेताओं को भी विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की ओर से पुस्तकें भेंट की जायेगी।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। इस बार शीर्ष 13 कविताओं के बाद की कविताओं का कोई क्रम नहीं बनाया गया है, इसलिए निम्नलिखित नाम कविताओं के प्राप्त होने से क्रम से सुनियोजित किये गये हैं।

अर्पिता नायक
दिलशेर ’दिल’
साबिर अली ’घायल’
दीपक कुमार
रोशन कुमार
विनोद कुमार पांडेय
रविकांत अनमोल
प्रियंका सिंह
कमल किशोर सिंह
भावना सक्सेना
विजय सिंह
चंद्रकांत सिंह
कमल प्रीत सिंह
अजय दुरेजा
शशि सागर
गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’
हिमानी दीवान
मनसा आनंद ’मानस’
अभिषेक ताम्रकार
अर्जुन सिंह
डॉ श्याम गुप्त
कविता रावत
डॉ अनिल चड्डा
अनिरुद्ध यादव
अम्बरीष श्रीवास्तव
मनीष जैन
आलोक गौर
अजीत पांडेय
उमेश चंद्र
अनामिका (सुनीता)
अनु केवलिया
रवीश रंजन
बोधिसत्व कस्तुरिया
अरविंद कुरील
देवेश पांडे

तुम अपनी मुट्ठियाँ हवा में लहराकर तो देखो


प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता के रचनाकार एम. वर्मा का जन्म वाराणसी के एक कृषक परिवार में हुआ। सम्पूर्ण शिक्षा वाराणसी में हुई (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम. ए.(हिन्दी), बी. एड.)। शुरू से ही कविताओं का शौक रहा। साथ ही नाटकों में भाग भी लेते रहे। ऊहापोह की जिन्दगी और शादी, फिर बच्चे और अंततोगत्वा दिल्ली में ‘राजकीय विद्यालय’ में अध्यापक बन बैठे। बच्चों के बीच बच्चा बन जाने की आदत छोड़े नहीं छूटती जिसके कारण गुरूत्तर शिक्षकीय दायित्व को मजे लेकर निभा रहे हैं। थियेटर का शौक अभी भी जिन्दा है। कभी-कभार नाटकों में भाग लेते रहते हैं। ‘जश्ने बचपन’ में ‘नीली छतरी’ में अभिनय करना इनके लिए अविस्मरणीय बन गया है। कविताएँ लिखना बदस्तूर जारी है। इन्होंने भोजपुरी रचनाएँ भी लिखी। दिल्ली में हिन्दी अकादमी द्वारा आयोजित ‘रामायण मेले’ में भोजपुरी रचना पुरस्कृत हो चुकी है। ब्लॉगजगत का सफर बहुत पुराना नहीं है। मई 2009 से ब्लॉग में रचनाओं को पिरोना प्रारम्भ किया। बदस्तूर जारी सफर कहाँ तक है, ये नहीं जानते।


पुरस्कृत कविता- शिनाख़्त करो खुद की

शहर के इन रेंगते वाहनों के बीच
शिनाख़्त करो खुद की
जीजिविषा से परे
हर पल डरे-डरे
मुट्ठी में रेत लिये
क्या तुम खुद ही के ख़िलाफ़
खड़े नहीं हो जाते हो?
अपने ही कद से
बड़े होने की कोशिश में
चौराहों के आदमख़ोर जंगल में
ख़ुद का कद -
और बौना नहीं पाते हो?

हुलिया ये है कि
तुम्हारा तो कोई हुलिया ही नहीं है
तन्दूर से गुर्दे तक
तुम कहीं भी पाए जा सकते हो
हर सच के एवज़ में
तुम झुठलाए जा सकते हो.
ज़मीर पर खड़े होने के ज़ुर्म में
तुम जमीन से काट दिए गये हो
बोटियों की शक्ल में तुम
चन्द लोगों में बाँट दिए गये हो.
उम्र से तो तुम
ख़ुद की शिनाख़्त कर ही नहीं सकते
क्योंकि तुम हर उम्र के हो,
पर हमेशा तुम
अपने उम्र से बड़े दिखते हो
अपने लहू से
कारपेट रंगते बच्चे से लेकर
अपने खोये बच्चे को तलाशते
अनगिन झुर्रियों वाले बाप के बीच
तुम्हारी कोई भी उम्र हो सकती है.
तुम्हारे पैरों की बिवाईयों सा
फटा-चिथड़ा है तुम्हारा लिबास
जब तुम सपने देखते हो
तुम्हें लगता है कि अपने देखते हो
त्रासदी ये है कि
तुम्हारा कोई सपना ही नहीं है
तुम्हारे इर्द-गिर्द
तुम्हारा कोई अपना ही नहीं है.
हक़ीकत है कि
तुम्हारी कई पीढ़ियाँ भटक रही हैं
तलाशती हुई खुद को
हुलिया, उम्र और लिबास से
क्योंकि वे परे हैं
जीजिविषा, आस्था और विश्वास से
तुम्हारी शिनाख़्त तो
ख़ुद ब ख़ुद हो जायेगी
जब तुम शिनाख़्त कर लोगे उनकी
जो तुम्हें तुमसे ही बांट रहे हैं
तुम्हारे ही हाथों तुम्हें ही काट रहे हैं

आसमाँ की बुलन्दियों पर
तुम्हारी पहचान उभरेगी
तुम अपनी मुट्ठियाँ
हवा में लहराकर तो देखो


पुरस्कार- रामदास अकेला की ओर से इनके ही कविता-संग्रह 'आईने बोलते हैं' की एक प्रति।