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Wednesday, November 11, 2009

तुम अपनी मुट्ठियाँ हवा में लहराकर तो देखो


प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता के रचनाकार एम. वर्मा का जन्म वाराणसी के एक कृषक परिवार में हुआ। सम्पूर्ण शिक्षा वाराणसी में हुई (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम. ए.(हिन्दी), बी. एड.)। शुरू से ही कविताओं का शौक रहा। साथ ही नाटकों में भाग भी लेते रहे। ऊहापोह की जिन्दगी और शादी, फिर बच्चे और अंततोगत्वा दिल्ली में ‘राजकीय विद्यालय’ में अध्यापक बन बैठे। बच्चों के बीच बच्चा बन जाने की आदत छोड़े नहीं छूटती जिसके कारण गुरूत्तर शिक्षकीय दायित्व को मजे लेकर निभा रहे हैं। थियेटर का शौक अभी भी जिन्दा है। कभी-कभार नाटकों में भाग लेते रहते हैं। ‘जश्ने बचपन’ में ‘नीली छतरी’ में अभिनय करना इनके लिए अविस्मरणीय बन गया है। कविताएँ लिखना बदस्तूर जारी है। इन्होंने भोजपुरी रचनाएँ भी लिखी। दिल्ली में हिन्दी अकादमी द्वारा आयोजित ‘रामायण मेले’ में भोजपुरी रचना पुरस्कृत हो चुकी है। ब्लॉगजगत का सफर बहुत पुराना नहीं है। मई 2009 से ब्लॉग में रचनाओं को पिरोना प्रारम्भ किया। बदस्तूर जारी सफर कहाँ तक है, ये नहीं जानते।


पुरस्कृत कविता- शिनाख़्त करो खुद की

शहर के इन रेंगते वाहनों के बीच
शिनाख़्त करो खुद की
जीजिविषा से परे
हर पल डरे-डरे
मुट्ठी में रेत लिये
क्या तुम खुद ही के ख़िलाफ़
खड़े नहीं हो जाते हो?
अपने ही कद से
बड़े होने की कोशिश में
चौराहों के आदमख़ोर जंगल में
ख़ुद का कद -
और बौना नहीं पाते हो?

हुलिया ये है कि
तुम्हारा तो कोई हुलिया ही नहीं है
तन्दूर से गुर्दे तक
तुम कहीं भी पाए जा सकते हो
हर सच के एवज़ में
तुम झुठलाए जा सकते हो.
ज़मीर पर खड़े होने के ज़ुर्म में
तुम जमीन से काट दिए गये हो
बोटियों की शक्ल में तुम
चन्द लोगों में बाँट दिए गये हो.
उम्र से तो तुम
ख़ुद की शिनाख़्त कर ही नहीं सकते
क्योंकि तुम हर उम्र के हो,
पर हमेशा तुम
अपने उम्र से बड़े दिखते हो
अपने लहू से
कारपेट रंगते बच्चे से लेकर
अपने खोये बच्चे को तलाशते
अनगिन झुर्रियों वाले बाप के बीच
तुम्हारी कोई भी उम्र हो सकती है.
तुम्हारे पैरों की बिवाईयों सा
फटा-चिथड़ा है तुम्हारा लिबास
जब तुम सपने देखते हो
तुम्हें लगता है कि अपने देखते हो
त्रासदी ये है कि
तुम्हारा कोई सपना ही नहीं है
तुम्हारे इर्द-गिर्द
तुम्हारा कोई अपना ही नहीं है.
हक़ीकत है कि
तुम्हारी कई पीढ़ियाँ भटक रही हैं
तलाशती हुई खुद को
हुलिया, उम्र और लिबास से
क्योंकि वे परे हैं
जीजिविषा, आस्था और विश्वास से
तुम्हारी शिनाख़्त तो
ख़ुद ब ख़ुद हो जायेगी
जब तुम शिनाख़्त कर लोगे उनकी
जो तुम्हें तुमसे ही बांट रहे हैं
तुम्हारे ही हाथों तुम्हें ही काट रहे हैं

आसमाँ की बुलन्दियों पर
तुम्हारी पहचान उभरेगी
तुम अपनी मुट्ठियाँ
हवा में लहराकर तो देखो


पुरस्कार- रामदास अकेला की ओर से इनके ही कविता-संग्रह 'आईने बोलते हैं' की एक प्रति।

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

संगीता पुरी का कहना है कि -
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संगीता पुरी का कहना है कि -

अच्‍छी रचना .. एम वर्मा जी को बधाई !!

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

आसमाँ की बुलन्दियों पर
तुम्हारी पहचान उभरेगी
तुम अपनी मुट्ठियाँ
हवा में लहराकर तो देखो
ek sandesh deti prerana se bhari kavita..badhayi

MANOJ KUMAR का कहना है कि -

प्रवाहमान भाषा और रोचक शैली के साथ ही प्रतीक और यथार्थ के सोने में सुगंध वाले योग के कारण यह रचना काफी आकर्षित करती है।

Priya का कहना है कि -

मुट्ठी में रेत लिये
क्या तुम खुद ही के ख़िलाफ़
खड़े नहीं हो जाते हो?
अपने ही कद से
बड़े होने की कोशिश में
चौराहों के आदमख़ोर जंगल में
ख़ुद का कद -
और बौना नहीं पाते हो?

Bitter Truth

ख़ुद की शिनाख़्त कर ही नहीं सकते
क्योंकि तुम हर उम्र के हो,
पर हमेशा तुम
अपने उम्र से बड़े दिखते हो

adverse circumstances

आसमाँ की बुलन्दियों पर
तुम्हारी पहचान उभरेगी
तुम अपनी मुट्ठियाँ
हवा में लहराकर तो देखो

ending with positive attitude :-)

Apoorv का कहना है कि -

व्यथित करती है यह संवेदनापूर्ण कविता.....

Devendra का कहना है कि -

कविता बहुत प्रभावित करती है शब्द संयोजन, भाव गज़ब का है लेकिन मुझे लगता है कि कुछ पंक्तियों ने कविता के अर्थ को सीमित कर दिया जैसे--
--जब तुम शिनाख्त कर लोगे उनकी
जो तुम्हें तुमसे ही बांट रहे हैं
तुम्हारे ही हाथों तुम्हें ही काट रहे हैं-

वाणी गीत का कहना है कि -

आसमाँ की बुलन्दियों पर
तुम्हारी पहचान उभरेगी
तुम अपनी मुट्ठियाँ
हवा में लहराकर तो देखो
कितने मुट्ठियाँ ना लहरा उठी होंगी इस प्रेरक कविता से ...!!

sada का कहना है कि -

आसमाँ की बुलन्दियों पर
तुम्हारी पहचान उभरेगी
तुम अपनी मुट्ठियाँ
हवा में लहराकर तो देखो

प्रेरणात्‍मक रचना, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

Sumita का कहना है कि -

बहुत अच्छी अभिव्य्क्ति है.सुन्दर रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई!

Aarjav का कहना है कि -

अनअस्तित्व की त्रासदी !
सुन्दर कविता ! शब्दों का फ्लो कविता को और रुचिकर बना देता है !

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