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मानसिकता का आरक्षण



प्रतियोगिता की तेरहवीं कविता चारू मिश्रा 'चंचल' की है। लखीमपुर (उ प्र) की रहने वाली चारु ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में डिग्री हासिल की है। इन दिनों स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता मे व्यस्त हैं। 'परिंदे', 'वाक', 'परिकथा' और 'गुफ्तगू' आदि पत्रिकाओं में कई कवितायेँ प्रकाशित हो चुकी है।  हिंद-युग्म पर यह उनकी पहली रचना है।

कविता: मानसिकता का आरक्षण 

मुस्कराता है वह
और हम भी
खिलखिलाते है
उसके साथ-साथ
तब
जब
उसकी हरकतें करती है
हमारा मनोरंजन।
 बावजूद इसके
आज तक
हमने कभी भी
न तो उसे अपने हाथों से छुआ
और न ही कभी उसे
अपनी मानसिकता में ''अरक्षित'' घरौंदे में जगह दी !

इसलिए
हमेशा ही वह
आता है
जाता है
लेकिन बस
चौखट तक
बहुत कुछ-
सीख चुका है वह
शायद
अब तक

तभी तो
आगे कदम बढ़ाने से डरता है
और हमेशा ही कनखियों से
दरवाजे पर खड़ा खड़ा
टुकुर-टुकुर निहारता है
उन रंगीन दुनियावी लफ्जों को
जो अक्सर ही उछलते है
उसके  सामने
पूरे कमरे में।

तब
जब
हम पढ़ रहे होते है
अपने टीचर से
किताबी पहाडा
तब वह
पढ़ रहा होता है
जिंदगी की असली पढ़ाई !
(सुना है नवनियुक्त झाड़ू वाले का छोकरा है वह)


भूख



दिसंबर प्रतियोगिता की चौदहवीं रचना राजेश पंकज की है। हिंद-युग्म पर यह उनकी दूसरी कविता है। इससे पहले इनकी एक कविता जुलाई माह प्रतियोगिता के अंतर्गत प्रकाशित हो चुकी है।

कविता: भूख


भूख कल थी,
भूख है अब,
भूख तो कल भी रहेगी.....
कैसा वह दिन,
अजब होगा सोचिए,
भूख न जिस दिन रहेगी....।
मोह, लिप्सा व क्षुधा,
काम, प्रेम, आसक्ति के
कितने ही अवतरण लेकर...।
भूख ही पलती रही
घृणा, ईर्ष्या, द्वेष और
लोभ के आवरण लेकर....।
देवासुर संग्राम क्या था?
राम का बनवास क्या था?
सीता-हरण, लंका विजय के
गर्भ में संत्रास क्या था?
यह चिरंतन सत्य है
प्रगति और खोज का आधार है...।
भूतली पर, भूगर्भ और आकाश में,
ऊर्जा के स्रोत और प्रकाश में,
झलकता बस भूख का संसार है...।
भूख न होती तो आदि पुरूष
अग्नि, चक्र को, क्या खोज पाता?
भूख के कारण ही कान्हा,
नाचता, मुरली बजाता...।
भूख के कारण ही भक्ति,
भूख के कारण ही भय है,
भूख ही देती है शक्ति,
भूख ही देती विजय है।
भूख बिन सब ज्ञान कैसा?
तपस्या और ध्यान कैसा?
धर्म कैसा, कर्म कैसा,
भूख बिन विज्ञान कैसा?
भूख कल थी,
भूख है अब,
भूख तो कल भी रहेगी.....
कैसा वह दिन,
अजब होगा सोचिए,
भूख न जिस दिन रहेगी....।


पिछले दशकों में



हिंद-युग्म के पाठकों के लिये संगीता सेठी का नाम नया नही है। उनकी कविताएं लभगग हर प्रतियोगिता का हिस्सा होती हैं और प्रकाशित भी होती रहती हैं। अक्सर सामाजिक रूढ़ियों और विषमताओं का विरोध और समय के साथ बदलती रिश्तों की भूमिकाएँ उनकी कविता के केंद्र मे रहती हैं। इनकी पिछली कविता नवंबर माह मे पाँचवें स्थान पर रही थी। प्रस्तुत कविता ने दिसंबर माह की प्रतियोगिता मे बारहवाँ स्थान प्राप्त किया है।

कविता: पिछले दशकों में  

पिछले छ: दशक से
महीना-दर-महीना
कमा रहे हैं बाबा मेरे
फिर भी लाखों बाबा
नहीं पहना पा रहे
अपने बच्चों को
पूरे कपड़े
वो फिर रहे हैं नंगे
इन सर्द गलियों में

 पिछले पाँच दशक से
व्यंजन-दर व्यंजन
पका रही है रसोई में
मेरी अम्मा
फिर भी लाखों माएँ
नहीं दे पाती है
अपने बच्चों को
भरपेट खाना

पिछले चार दशक से
पारी-दर-पारी
मेरी बड़की बहन
लिख रही है
बच्चों की स्लेटों पर
हाथ पकड़ कर्
फिर भी सैकड़ों बच्चे
नहीं देख पा रहे
स्कूल का मुँह भी

पिछले तीन दशक से
अस्पताल-दर-अस्पताल
मेरा भाई
बाँट रहा है दवाइयाँ
आम आदमी के लिए
फिर भी सैकड़ों लोग
तोड़ देते हैं दम
इलाज के अभाव में

पिछले दो दशक से
किश्त-दर-किश्त
मेरे पति
बाँट रहे हैं ऋण
सरकारी खातों से
ज़रूरतमन्दों को
फिर भी आर्थिक मार से
ना जाने कितने लोग
कर लेते हैं आत्महत्या

पिछले एक दशक से
मेरी भाभी
कानों में
हीरे के झुमके पहन
छम्मक-छल्लो सी
घूम रही है घर में
और सैंकड़ों लोगों के
मुँह तक निवाला भी
मुश्किल से
पहुँचा रही है
ये हीरे की खदानें

पिछले एक वर्ष से
पृष्ठ-दर-पृष्ठ
मैं भी लिख रही हूँ कविता
कम्प्यूटर पर
इंटरनेट के सारे रास्ते
जान गई हूँ
की-बोर्ड दबा-दबा कर
ब्लॉग बनाने की रवायतें
और फेसबुक पर
अच्छे दोस्त तलाशने की
मुहिम छिड़ी है
और मेरे आस-पास की
गृहणियाँ तो दूर की बात है
मेरे पूरे मोहल्ले में
इस कोने से उस कोने तक
इस गली से उस पार तक
नहीं है मुहैया
बच्चों को भी
एक अदद कम्प्यूटर !!


संवेदना



दिसंबर माह की नवीं कविता की रचनाकार ऋतु वार्ष्णेय हिंद-युग्म पर प्रथम बार प्रकाशित हो रही हैं। बनारस की रहने वाली ऋतु ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी मे पी एच डी की उपाधि प्राप्त की है। ऋतु लेखन तथा अन्य साहित्यिक और शैक्षिक गतिविधियों मे काफ़ी सक्रिय रही हैं और यशपाल-साहित्य तथा लोककला से संबंधित कई शोधपत्र भी लिखे हैं। इनकी विभिन्न कविताएं व लेख तमाम राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होती रही हैं। दो पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। ऋतु वर्तमान मे वाराणसी मे प्रवक्ता पद पर कार्यरत हैं।

संपर्क: डी-48/76, मिसिर पोखरा
गोदौलिया, वाराणसी
पिन: 221010 (उ0प्र0)



पुरस्कृत कविता: संवेदना

माँ गीली मिट्टी है
जो पानी में सनकर
जिसमें पड़ने वाला निशान
एक छाप छोड़ देता है
कभी अधूरा कभी पूरा
जो कभी चाक पर घूमती हुई
तेरे आकार की प्रथम कड़ी है
और
मैं भी यहीं कहीं
हर पल तेरे आसपास मँडराता
हर वक्त तेरा नाम पुकारता
कभी तुझे फटकारता
गहराई और दर्द के साथ
तुझसे तेरी शिकायत करता
कभी मौन साध के
तेरे आकार की अंतिम कड़ी को
पूरा करने को
तुझे बाहर से पीटता हुआ
धाप लगाता
और
आँखों में आँसू पीता
तुझे साझा रूप देता हूँ
मैं माँ नहीं पर
तेरा पिता हूँ।
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पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

सच



सुधीर गुप्ता ’चक्र’  भी पिछले कुछ माहों से यूनिप्रतियोगिता से जुड़े हैं और इनकी पिछली कविता अक्टूबर माह मे पांचवें पायदान पर रही थी। दिसंबर माह मे इनकी प्रस्तुत कविता ग्यारहवें स्थान पर रही है।

सच

तुम्हें
सच को स्वीकारना ही होगा
किसी के प्रति
आँख फेर कर
तुम
क्या साबित करना चाहते हो
सच का केंद्रीयकरण
अकारण
उछाल नहीं लेता
हर बार
हिले होंठ अर्थहीन हों
जरूरी नहीं
सच अल्पसंख्यक हो सकता है
पर हरिजन नहीं
सच वाचाल तो हो सकता है
पर मूक नहीं
हठी भी हो सकता है पर
झूठ की तरह अडि‌यल नहीं
सच सूक्ष्म हो सकता है पर
झूठ के फेन सा
विस्तार नहीं ले सकता
सच केवल दृष्टि पर विश्वास नहीं करता
तुम्हारे धर्म और जाति से भी
उसे कोई मतलब नहीं
तुम्हारी निर्धनता से क्या लेना-देना उसे
तुम्हारी आशिक मिजाजी भी पसंद नहीं करता वह
वो तो आकर्षण की परिभाषा भी नहीं जानता
इन सबसे हटकर
सच केवल
राजा हरिश्चंद्र और
धर्मराज युधिष्ठर का अनुयायी है
सच गुलामी नहीं करता झूठ की
क्योंकि
जानता है वह
यदि झूठ का विस्तार होगा तो
बहस होगी
बहस होगी तो
दूरियाँ बढे‌गी
दूरियाँ बढे‌गी तो
संधि-विच्छेद होगा
इसलिए
सच की मौलिकता सच ही है
सच रामायण सा सरल है
सच संस्कारी भी है
चंद्रशेखर आजाद से
आजाद सच को
कभी कैनवास पर उतारो तो जानें
वैभवशाली सच
कभी मुरझा नहीं सकता
यातना से मोड़ लोगे झूठ को अपनी ओर
लेकिन सद्दाम हुसैन सा जिद्दी सच
झुक नहीं सकता
सच एकदम नंगा होता है
इसलिए
आदमी को भी नंगा करता है
कहते हैं
नंगों से तो
खुदा भी डरता है
कितना भी बुरा हो सच
पर खूनी नहीं हो सकता
कोई तो समर्थक होगा
सच का
तभी तो
इतिहास के सच की
आन-बान और शान वाली गाथाएँ
उकेरी हुई हैं आज भी भित्ति चित्रों में
सच प्रेयसी का आलिंगन है
सच तरूणी की अँगड़ाई है
सच तो सच है
आखिर
कितना दबाओगे सच को
शीत सा उभर ही आएगा
सच केवल वर्तमान ही नहीं
भूतकाल और भविष्यकाल में भी विजयी है
सच
झूठ की तरह दोहराया नहीं जाता
बस एक बार ही
सच कहा जाता है और
निर्णय हो जाता है
झूठ को मिटाने के लिए
तमाम एन्टी वायरस
प्रयोग किए जाते हैं
पर सच
वायरस रहित है
अनगिनत अंकों वाली
संख्याओं से घिरा दशमलव
सच ही तो है
क्योंकि
बढ‌ती जाती हैं
संख्या दर संख्या
फिर भी
अडिग है अपने स्थान पर
दशमलव वाला सच और
कितने सच जानोगे
तब मानोगे सच को
अच्छा हो यदि
अपनी सोच को बदलो तुम और
सच को
जेब में डालकर घूमने की जगह
अपने संस्कारों के साथ
मस्तिष्क में
करीने से सजाकर रखो
और सच
केवल सच कहो।


मुझको जग में आने दे माँ !



दिसंबर प्रतियोगिता की दसवीं कविता के रचनाकार डॉ अनिल चड्डा हैं। हिंद-युग्म के सक्रिय पाठक एवं कवि डॉ अनिल की कविताएं इससे पहले भी प्रतियोगिता की शीर्ष दस मे स्थान बनाती रही हैं। उनकी पिछली कविता नवंबर मे प्रकाशित हुई थी।

पुरस्कृत कविता: मुझको जग में आने दे मां !

कोख में तेरी पड़ी पड़ी
सोच रही ये घड़ी-घड़ी
मैं कैसा जीवन पाऊँगी
जब दुनिया में मैं आऊँगी
क्या दूजे बच्चों की मानिंद
मैं भी खेलूँगी, खाऊँगी
या तेरी तरह मेरी जननी
जीवन भर धक्के पाऊँगी
ग़र तू भी साथ नहीं देगी
तो बोल कहाँ मैं जाऊँगी
क्यों ऐसा होता आया है
कन्या ने जन्म जब पाया है
जन्मदाता के माथे पर
चिंता का बादल छाया है
ग़र धरती पर मैं बोझ हूँ माँ
क्यों ईश्वर ने  मुझे बनाया है
फिर दुनिया में आने से पहले
क्यों तूने मुझे मिटाया है
मुझको आजमाने से पहले
वजूद मेरा  झुठलाया है
मैं हाड-माँस की पुतली हूँ
कुछ मेरी भी  अभिलाषा है
सब की भाँति इस दुनिया में
जीने की मुझे भी आशा है
कुछ मुझमें भी तो क्षमता है
इस जग को दिखलाने दे माँ
खुद को साबित करने को
मुझको इस जग में आने दे माँ
पर सबसे पहले  मेरी माँ
मुझ पर विश्वास ज़रूरी है
उससे भी पहले जननी मेरी
खुद पर विश्वास ज़रूरी है
ग़र जन्म नहीं मैं पाऊँगी
क्या साबित कर दिखलाऊँगी
इस जग को कुछ दिखलाना है
मुझको इस जग में आना है
मुझको जग में आने दे मां !
मुझको जग में आने दे माँ !!
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पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

तू दर्दे-दिल को आईना बना लेती तो अच्छा था



प्रतियोगिता की आठवीं रचना भी एक ग़ज़ल है। रचनाकार वसीम अकरम नवंबर माह के यूनिकवि रह चुके हैं।

पुरस्कृत रचना: गज़ल

तू दर्दे-दिल को आईना  बना लेती  तो  अच्छा था
मोहब्बत की कशिश दिल में सजा लेती तो अच्छा था

बचाने के लिए तुम खुद को आवारा-निगाही से
निगाहे-नाज को खंजर बना लेती तो अच्छा था

तेरी पलकों के गोशे में कोई आंसू जो बख्शे तो
उसे तू खून का दरिया बना लेती तो अच्छा था

सुकूं मिलता जवानी की तलातुम-खेज मौजों को
किसी का ख्वाब आंखों में बसा लेती तो अच्छा था

ये चाहत है तेरी मरजी, मुझे  चाहे न चाहे तू
हां, मुझको देखकर तू मुस्कुरा देती तो अच्छा था

तुम्हारा हुस्ने-बेपर्दा  कयामत-खेज है कितना
किसी के इश्क को पर्दा बना लेती तो अच्छा था

तेरी निगहे-करम के तो दिवाने हैं सभी लेकिन
झुका पलकें किसी का दिल चुरा लेती तो अच्छा था

किसी के इश्क में आंखों से जो बरसात होती है
उसी बरसात में तू भी नहा लेती तो अच्छा था

तेरे जाने की आहट से किसी की जां निकलती है
खुदारा तू किसी की जां बचा लेती तो अच्छा था.
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पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

आज फिर विश्वास तुमने दृढ़ किया है



  प्रतियोगिता मे छठे स्थान पर रहे गीत के रचनाकार डॉ नागेश पांडेय ’संजय’ हैं। हिंद-युग्म से संजय जी का जुड़ाव नया है और उनकी पहली कविता ही शीर्ष दस मे अपना स्थान बनाने मे सफल रही है। डा. नागेश पांडेय 'संजय' एक बाल-साहित्यकार, बाल-साहित्य समीक्षक एवं कवि हैं। जन्म ०२ जुलाई १९७४ को  खुटार, शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) मे हुआ। माता श्रीमती निर्मला पांडेय एवं पिता श्री बाबूराम पांडेय हैं। नागेश जी की शिक्षा एम्. ए. (हिंदी, संस्कृत), एम्. काम., एम्. एड. और पी. एच. डी. (विषय : बाल साहित्य के समीक्षा सिद्धांत) तक रही और वो हिंदी शिक्षाशास्त्र मे स्लेट उपाधिधारक भी हैं। नागेश जी १९८६ से बाल साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। बाल साहित्य के अतिरिक्त बड़ों के लिए भी गीत एवं कविताओं का सृजन किया है। प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं में बच्चों के लिए कहानी, कविता, एकांकी, पहेलियाँ और यात्रावृत्त प्रकाशित हुए हैं। कई रचनाओं के तमाम भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं और इनकी रचनाएँ दूरदर्शन तथा आकाशवाणी के नई दिल्ली, लखनऊ, रामपुर केन्द्रों से प्रसारित होती रही हैं। बालसाहित्य, कविता और आलोचना विषयक कई किताबें प्रकाशित हैं। सम्प्रति बी. एड. राजेंद्र प्रसाद पी. जी. कालेज, मीरगंज, बरेली मे प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष हैं।
संपर्क: सुभाष नगर , निकट रेलवे कालोनी , शाहजहांपुर - २४२००१ (उ.प्र.)
   प्रस्तुत गीत हिंदी की श्रंगार-विषयक गीतकाव्य की समृद्ध और लोकप्रिय परंपरा की कड़ी है और अपनी मधुरता और कोमल भावसिक्तता से सहज ही आकर्षित करता है।

पुरस्कृत कविता: आज फिर विश्वास तुमने दृढ़ किया है

आज फिर विश्वास तुमने दृढ़ किया है।
आज संशय ने हृदय की देहरी पर
बैठकर मुस्कान कुछ ऐसी बिखेरी,
अकंपित लौ नेह की कुछ कँपकपाई
यों लगा जो लड़खड़ाई साध मेरी।
किंतु तुमने भ्रमित मन के कटघरे में
कौंधते हर प्रश्न का उत्तर दिया है।

ठीक समझीं तुम, कि मैं डरता बहुत हूँ,
क्या करूँ, है चोट खाई बहारों से।
सूर्य से उपहार में मुझको मिला तम,
इसलिए भयभीत रहता हूँ सितारों से।
वर्तिका-सी ही सही, पर जलीं तो तुम
और उर में ज्योति-सागर भर दिया है।

कामनाओं की चदरिया फट न जाए,
इसलिए था रख दिया उसको तहाकर।
ओढ़ने को था तुम्हारा नाम काफी
फिर रहा था उसे सीने से लगाकर।
किंतु कोरे पत्र पर हस्ताक्षर कर,
मुझे तो तुमने अनोखा वर दिया है।

मुझे तुमसे चाहिए कुछ भी नहीं, सच !
खुश रहो तुम सर्वदा, यह कामना है।
हाँ, कभी गिरने लगूँ यदि नेह-पथ से
तो हमारा हाथ तुमको थामना है।
और साथी! मैं गिरूँगा भी नहीं अब,
यह हुनर मुझमें तुम्हीं ने भर दिया है।
आज फिर विश्वास तुमने दृढ़ किया है॥
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पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।


आज दुनियाँ में क्या नहीं होता



धर्मेंद्र कुमार सिंह पिछले कुछ महीनों से ही हिंद-युग्म पर जुड़े हैं। मगर एक सक्षम कवि और गंभीर पाठक के तौर पर अपनी सार्थक और निरंतर उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। इनकी पिछली रचना नवंबर माह मे शीर्ष दस मे रही थी। दिसंबर माह मे भी इनकी प्रस्त्तुत गज़ल ने सातवाँ स्थान प्राप्त किया है।


पुरस्कृत रचना: गज़ल

प्यार तुझसे हुआ नहीं होता
तो मैं इंसान सा नहीं होता

तेरी यादों की गोंद ना होती
टूटकर मैं जुड़ा नहीं होता

मंदिरों में अगर ख़ुदा मिलता
एक भी मयक़दा नहीं होता

काट दी जाती हैं झुकी डालें
पेड़ यूँ ही बड़ा नहीं होता

ताज को छू के मौलवी तू कह
पत्थरों में ख़ुदा नहीं होता

झूठ ने फेंका है अणु बम जब से
पाँव पर सच खड़ा नहीं होता

शाम की लालिमा में ना फँसता
तो दिवाकर डुबा नहीं होता

लूट लेते हैं फूल को काँटे
आज दुनियाँ में क्या नहीं होता
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पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

महानता



  हिंद-युग्म अपने सभी पाठकों को गणतंत्र दिवस की इकसठवीं वर्षगाँठ पर बधाई देता है। स्वतंत्रता के बाद भी तमाम सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक समस्याओं से जूझते हमारे गणतंत्र के लिये ऐसे महत्वपूर्ण दिन सिर्फ़ गौरव के क्षण ही नही होते बल्कि वे हमें अपनी विकास-यात्रा के पुनरावलोकन का अवसर भी देते हैं।
   भारत की संस्कृति की जड़ें कोई  62-63 साल की नही वरन हजारों सालों के इतिहास मे गहरे तक गड़ी हैं। इस लंबे कालानुक्रम मे कई उतार-चढावों के बावजूद हमने अपनी जिजीविषा कायम रखी और अच्छे भविष्य के प्रति आशाएं भी जीवित रखीं। एक सुखद भविष्य और समरसतापूर्ण समाज की अवधारणा को बनाये रखने के लिये आत्मालोचन करते रहना भी अत्यावश्यक है। क्षणिक आत्मगौरव मे गर्वोन्मत्त हुए बिना अपने अतीत की समस्याओं को आलोचक दृष्टि से परखना और उनसे सीख लेना एक स्वस्थ समाज के लिये बहुत जरूरी प्रक्रिया होती है। तीन साल पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर ही कवि अवनीश गौतम की कविता ’अट्ठावन बरस गणतंत्र के’ ने स्वतंत्र भारत मे बढ़ती विसंगतियों की और इशारा किया था। और आज अगर हम इसे दोबारा पढ़ें तो देखते हैं कि वो सारी समस्याएं पहले की अपेक्षा अब अधिक मुँह बाये खड़ी हैं। दिसंबर माह की प्रतियोगिता की चौथी कविता भी हमे अपने अतीत के आत्मालोचन का एक मौका देती है। रचनाकार नरेंद्र तोमर की यह कविता सर्वज्ञात पौराणिक तथ्यों पर कुछ तल्ख सवाल उठाती है। किन्ही मद्दों पर असहमति होना कोई अस्वाभाविक बात नही, मगर जरूरत उन सवालों को खारिज करने की नही वरन बिना भावनात्मक हुए निष्पक्ष दृष्टि से उन प्रश्नों की वस्तुनिष्ठ समीक्षा करने की है।


पुरस्कृत कविता: महानता

महान है हमारा राष्ट्र
महान है हमारी संस्कृति सनातन
हमने रचे हैं वेद-उपनिषद-पुराण
 निर्मित की हैं संहिताऐं
उद्घोष किया है
वसुधैव कुटुंबकम्‌ का
पर वसुधा के इस कुटुंब में
सब जन समान नहीं।
अंगूठा काट दिया जाता है
एकलव्य का
मार देते हैं हमारे मर्यादा पुरूषेात्तम
शूद्र शंबूक को
कि प्रसन्न रहे ब्राह्मण।
हमारे पूर्वज, यशस्वी सम्राट
दशरथ. शांतनु और ययाति
मोहित होते रहते हैं
बेटी की आयु की
कैकईयों, गंगाओं पर
और डूबे रहते रात दिन भोग-विलास में
लेकर सैकड़ों माँओं से उत्पन्न
अपने पुत्रों की तरूणाई।
महान हैं हम
वशिष्ट हमारे देवताओं
ब्रह्मा विष्णु महेश
के बीच लगी रहती है होड़।
साबित करने को अपनी श्रेष्ठता,
सोम और सुंदरियों से सदा घिरे
सिंहासन से चिपके
सदा भयभीत
इंद्र
भेज कर अपनी
रंभाओं और मेनकाओं को
खंडित करते रहते हैं
तप
तपस्वियों की तपस्या।

मानो इंद्र की अलका नगरी
सिंहासन हथियाने को लक्षित थी
मोक्ष प्राप्ति के लिए नहीं।
डोल जाते हैं
कन्याओं पर
हमारे ब्रह्मचारी ऋषि-मुनी
रैक्व और अष्टावक्र और च्यवन।
भीष्म करते हैं प्रतिज्ञा
आजीवन अविवाहित रहने की
अपने बूढ़े बाप की कामेच्छा पूरी करने को
अन्याय से लड़ने के लिए नहीं
कौरव सभा में होने देते हैं
चीर हरण।
सांसारिक नहीं हम ब्रह्मलीन हैं
वेद की ऋचाएं आवाहन करती हैं
दैवीय शक्तियों का
धन-धान्य के लिए
सुख-संपन्नता के लिए
गायों और बैलों के लिए
संतति के लिए
युद्धों में विजय के लिए।
हमारे प्रतापी सम्राट करते हैं
अश्वमेध
 बढ़ाने को साम्राज्य
घोषणा होती है
वीर भोगे वसुंधरा
त्याग की तथाकथित संस्कृति में
सिर पर चढ़ भोग ही बोलता है
त्याग है ब्रह्मा की तीसरी संतान
मनुष्यों के लिए
हमारे देवता धारण करते हैं
अगणित आभूषण
बिठाए दिखते हैं अपनी रानियों को
सदा अपनी बगल में।
हमारे आदर्श महापुरुष
सर्वस्व लगा देते हैं दांव पर
धन संपदा की तरह
अपनी धर्मपत्नी तक को
गौतम मुनि की पत्नी
शिकार बनती है
भगवान इंद्र की हवस की
और पति के श्राप से
हो जाती है पत्थर
पर देवता बने रहते हैं इंद्र।

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पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।



विकास का तंत्र



अपने पाठकों को हम प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता की ओर लिये चलते हैं जिसके रचनाकार सुरेंद्र अग्निहोत्री हैं। सुरेंद्र अग्निहोत्री पिछले काफ़ी समय से हिंद-युग्म से जुड़े हैं और इनकी कविताएं पहले भी यहाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी पिछली कविता गतवर्ष मई माह मे आठवें स्थान पर रही थी।

पुरस्कृत कविता:  विकास का तंत्र


पूरे दिन भर
इतने सारे संघर्ष
जिनकी एक झलक
एक नयी सुनामी की तरह
पूरी सुनहरी बालू
कोयले और लोहे पर नजर
अपने कब्जे में लेना चाहते
सिर्फ कौड़ियों के दाम में
हड़पने के लिए विकास का तंत्र
सब पर आक्रमण
अब उनको हटाने के सिवाय
ढकेलना और वंचित करना
बदलाव की इस सोच पर
हर क्षेत्र मे बयार बह रही है
मौका गॅवा दिया तो,
फिर क्या होगा?
भूमि पर, नदी पर, पेड़ पर
निरंतर क्रांति का सपना पल रहा
हर कोई आत्मसुरक्षा के लिये
मुठ्ठी ताने खड़ा है पूँजीवाद की शैतानी प्रवृति पर
संघर्ष के लिए डटा है
संघर्ष जीतना इतना आसान नही है
वे जमीन पर कब्जा चाहते है
उन्होंने हम सभी को
विकास विरोधी लोग बता दिया है
हमारी शांति मे फैलाना चाहते
अशान्ति का अंतहीन सिलसिला
जिससे फैल जाये भयावहता
राजनैतिक जवाब नहीं देना चाहते
एक आत्महत्या कर रहा गाँव में
एक संघर्ष मे गोली खा रहा पाँव में
कोई नही जानना चाहता है उनके दुख दर्द
जिनके लिऐ बेचारे संघर्ष करते रहे हमदर्द
लोहे से लोहा काटने की नीति
किसी ने पायी हार, किसी ने जीती
अपनों से ही छले जा रहे हम
न खुशी रही अपनी न रहे गम!


कहाँ है भारतवर्ष?



प्रतियोगिता की दूसरी कविता के संग एक नया रचनाकार हिंद-युग्म से जुड़ा है। सौरभ राय ’भगीरथ’ की यह हिंद-युग्म पर प्रथम कविता थी और अपने पहले प्रयास मे ही वो द्वितीय स्थान पर आने मे सफल हुए हैं। 22 वर्ष के सौरभ का जन्म झारखंड के बोकारो नगर मे हुआ। वर्तमान में एम एस रामया इंजीनियरिंग कॉलेज में अंतिम वर्ष के छात्र सौरभ प्रोग्रामिंग में रूचि रखतें हैं। बचपन से ही कविताएँ लिखने का शौक रहा। हिंदी में कविताएँ लिखने के अलावा अंग्रेज़ी में लेख भी लिखते हैं जिन्हे अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित भी करते हैं। 'अनभ्र रात्रि की अनुपमा' नाम से अपनी कविताओं का संग्रह प्रकाशित कर चुके हैं। भारतीयता पर लिखे गए अंग्रेजी के लेखों का संग्रह भी प्रकाशनाधीन है, जिनका प्रकाशन एक अमरीकी प्रकाशक कर रहे है कवि महोदय कई वेबसाइट तथा मैगज़ीन में अपनी रचनात्मकता सिद्ध कर रहे हैं |
संपर्क: टाइप III, 8-बी, हटिया रेलवे कॉलोनी, हटिया, रांची-834003
फोन: 9742876892


पुरस्कृत कविता: भारतवर्ष

वो किस राह का भटका पथिक है ?
मेगस्थिनिज बन बैठा है
चन्द्रगुप्त के दरबार में
लिखता चुटकुले
दैनिक अखबार में।

सिकंदर नहीं रहा
नहीं रहा विश्वविजयी बनने का ख़्वाब
चाणक्य का पैर
घास में फंसता है
हंसता है महमूद गज़नी
घास उखाड़ कर घर उजाड़ कर
घोड़ों को पछाड़ कर
समुद्रगुप्त अश्वमेध में हिनहिनाता है
विक्रमादित्य फाह्यान संग
बेताल पकड़ने जाता है।

वैदिक मंत्रो से गूँज उठा है आकाश
नींद नहीं आती है शूद्र को
नहीं जानता वो अग्नि को, इंद्र को
उसे बारिश चहिए
पेट की आग बुझाने को।
सच है-
कुछ भी तो नहीं बदला
पांच हज़ार वर्षों में !
वर्षा नहीं हुई इस साल
बिम्बिसार अस्सी हज़ार ग्रामिकों संग
सभा में बैठा है
पास बैठा है अजातशत्रु
पटना के गोलघर पर
कोसल की ओर नज़र गड़ाए।
काशी में मारे गए
कलिंग में मारे गए
एक लाख लोग
उतने ही तक्षशिला में
केवल अशोक लौटा है युद्ध से
केवल अशोक लड़ रहा था
सौ चूहे मार कर
बिल्ली लौटी है हज से
मेरा कुसूर क्या है ?-
चोर पूछता है जज से।

नालंदा में रोशनी है
ग़ौरी देख रहा है
मुह्हमद बिन बख्तियार खिलजी को
लूटते हुए नालंदा
क्लास बंक करके
ह्वेन सांग रो रहा है
सो रहा है महायान
जाग रहा है कुबलाई खाँ।
पल्लव और चालुक्य लड़ रहें हैं
जीत रहा है चोल
मदुरै की संगम सभा में कवि
आंसू बहाता है
राजराज चोल लंका तट पर
वानर सेना संग नहाता है |

इब्नबतूता दौड़ा चला आ रहा है
पश्चिम से
मार्को पोलो दक्षिण से
उत्तर से नहीं आता कोई उत्तर
आता है जहाँगीर कश्मीर से
गुरु अर्जुन देव को
मौत के घाट उतारकर।
नहीं रही
नहीं रही सभ्यता
सिन्धु-सताद्रू घाटी में
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से
चीखता है भिंडरावाले

गूँज रहा है इन्द्रप्रस्थ
सौराष्ट्र
इल्तुतमिश भाला लेकर आता है
मल्ल देश के आखिरी पडाव तक
चंगेज़ खाँ की प्रतीक्षा में।
कोई नहीं रोकने आता
तैमूर लंग को
बहुत लम्बी रात है
सोमनाथ के बरामदे में
कटा हुआ हाथ है।
लड़ रहें हैं राजपूत वीर
आपस में
रानियाँ सती होने को
चूल्हा जलाती हैं।
चमक रहा है ताजमहल
धुल रहा है मजदूरों का खून
धुल रहा है
कन्नौज
मथुरा
कांगरा
कृषि कर हटाकर
तुगलक रोता है-
"पानी की किल्लत है
झूठ है
झूठ है सब
केवल राम नाम सत् है"

वास्को डि गामा ढूंढ रहा है
कहाँ है ?
कहाँ है भारतवर्ष ?
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कौन हो तुम


प्रतियोगिता की तीसरी कविता के रचनाकार अनिल कार्की हैं। पिथौरागढ़ के अनिल जुलाई-2009 के यूनिकवि रह चुके हैं। यह हिंद-युग्म पर उनकी दूसरी कविता है। हिंदी के शोधार्थी अनिल की प्रस्तुत कविता सुपरिचित कवि आलोक धन्वा की लंबी कविता ब्रूनो की बेटियाँ को पढ़ कर पैदा हुए अंतर्मंथन से निःस्रत है। कविता स्त्री-अस्तित्व की मूलभूत पहचान जैसे जटिल सवाल से जूझने की कोशिश करती है।

पुरस्कृत कविता: कौन हो तुम?

वो तुम नहीं थी
जिनकी याद जंग लगे टिन जितनी भी नहीं रही
और न ही तुम क्षितिज पर फसल काट रही औरतों मे
हो।
तुम कौन हो?
प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह
जिसका उत्तर
पूर्ण विराम के साथ नहीं दिया जा सकता।
एक पुरानी किताब,
या एक लम्बी कविता,
जिसका रचना-विधान जानने की कोशिश कर रहा हूँ
इन दिनों
जिसकी लय
जिसका अर्थ
जिसमें बुनी गयी हो फन्टेसी
प्रतीक-बिम्ब
अनुभूत यथार्थ, अजनबीयत, मिथक, नाटकीयता
और एक विचार विसंगतियों के बीच।
जिससे पनपता है
कविता जैसी किसी चीज का अस्तित्व

फिर भी कहीं किसी कोने में
केवल एक प्रश्न
सदैव के लिए
युगों से
युगों के बाद भी
जिसका एकान्त होने न होने के बीच सुलगता है
सदियों के भीतर

डनलप के गद्दों के बीच की स्थिति सा
माणा या गंजी की अन्तिम सीमा पर
देश की सीमा के साथ बाँधा गया भूभाग हो तुम
या फिर समझौता की कोई एक्सप्रेस
जिन्हें तय करते है देश के सत्ताधारी लोग
फिर भी इस आधी रात को
जब हीटर के तार सुलग रहे हैं
और तब कैसे सुलगती है कविता
सेंचुरी के पन्नों के भीतर
रेनोल्ड्स की इस कलम से
बेहतर शब्द निकाल लेने की जिद कहाँ तक जायज है

जब तुम सुलग रही हो
मध्य हिमालय की बर्फ ढ़की पहाड़ियों में कहीं
तब नदियाँ कैसे दे सकती है
शीतल पानी
फिर भी तुम्हारे अपने किले है
तुम्हारे अपने झण्ड़े है
तुम्हारे अपने गीत है
वही गीत जो तुम्हारा खसम गाता था
गुसांईयों के दरबार में
और तुम नाचती थी फटी धोती में
ओ हुड़किया की हुड़क्याणी
तुम भुन्टी थी
और तुम्हारा खसम सुन्दरिया
जिसने आजीवन दरवाजे पर बैठकर
गुसाईयों के घर में चाय पी-
गिलास धोकर उल्टा कर दिया
ताकि सूख सके
जिल्लत भरी जिन्दगी
तुम्हारे लिए कौन था?
तुम्हारे लिए कौन है?

काने धान की पोटली भर संवेदना थी तुम
या ठाकुरों के कुल देवता के मंदिर से बचा हुआ
गड्ड-मड्ड शिकार-भात
और कुछ नहीं
फिर भी कौन थी तुम
जिसके होने में महकता रहा
मध्य हिमालय का लोक जीवन।
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दिसंबर यूनिप्रतियोगिता के परिणाम


   हमारे निर्णायकों की कुछ निहित व्यस्तताओं के चलते दिसंबर माह की प्रतियोगिता के परिणामों को प्रकाशित करने मे कुछ विलम्ब हुआ, जिसके लिये हम पाठकों और प्रतिभागियों से क्षमाप्रार्थी हैं। कविता अपने समय से संवाद करने और उसकी धड़कनों को अपने जेहन के दस्तावेज मे दर्ज करने की सशक्त माध्यम है। तो यूनिप्रतियोगिता हमारे प्रतिभागियों के लिये कविता की कला को समझने और अपने आप को मांजने का महत्वपूर्ण माध्यम रही है। इसी वजह से तमाम कवि/कवियत्रियाँ परिणाम की फ़िक्र किये बिना निरंतर हर माह इसमे भाग लेते हैं।
   दिसंबर माह का संस्करण इस प्रतियोगिता के अबाध आयोजन की अड़तालिसवीं कड़ी था। प्रतियोगिता मे इस बार कुल 40 कविताएं शामिल हुई थीं। जिन्हे कि पांच निर्णायकों द्वारा दो चरणों मे आंका गया। पहले चरण के 3 निर्णायकों की पसंद के आधार पर 20 कविताओं ने दूसरे चरण मे जगह बनाई जिसमे दो निर्णायकों ने अपनी कसौटी पर उनको परखा। अंतिम अंक सूची के आधार पर कविताओं का वरीयता क्रम निर्धारित किया गया। निर्णायकों के मुताबिक इस माह कई अच्छी कविताओं के शामिल होने से शीर्ष कविताओं का क्रम निर्धारित कर पाना एक कठिन काम भी रहा, जो हमारे लिये खुशी की बात है। अंतिम अंक-तालिका के आधार पर स्वप्निल कुमार आतिश की कविता ’सड़क’ को इस बार की यूनिकविता का गौरव हासिल हुआ है। आतिश पिछले कई माह से युनिप्रतियोगिता के अहम हिस्सा रहे हैं और उनकी तमाम गज़लें और नज़्में पहले भी शीर्ष दस मे शामिल हुई हैं। मगर अभी तक उनकी कविताएं यूनिकविता बनने के पायदान से कुछ पीछे रह जाती थीं। मगर इस बार की उनकी कविता को सभी जजों ने शीर्ष पर रखा और इस तरह पिछले साल की अंतिम प्रतियोगिता के यूनिकवि का खिताब आतिश को हासिल हुआ है।

यूनिकवि: स्वप्निल कुमार ’आतिश’

   युवा कवि आतिश की पैदाइश गाजीपुर (उ.प्र.) की रही। घर मे पहले से ही पढ़ने-लिखने का माहौल था और साहित्यिक संस्कार और समझ अपनी माँ से हासिल हुए। दिल्ली मे ग्रेजुएशन के लिये आये और तब से इसी शहर के हो कर रह गये। आतिश ने बायोटेक से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। पहली बार जगजीत सिंह की गायी मिर्जा ग़ालिब की ग़ज़लें सुनते हुए ग़ालिब को समझने की ललक जागी। फिर उनकी शायरी का सफ़हा-दर-सफ़हा खूबसूरत सफ़र इतना दिलचस्प और मानीखेज लगा कि शायरी से गहरा रिश्ता कायम हो गया। उसके बाद रही कसर गुलज़ार साहब की नज़्मों ने पूरी कर दी। तब से गज़लों, नज्मों और कविताओं से शुरू हुआ सिलसिला बदस्तूर जारी है। गुलज़ार के अलावा निदा फ़ाज़ली, दुष्यंत कुमार, बच्चन और कुँअर बेचैन की रचनाओं ने भी गहरा असर डाला है। आतिश नज्मों-कविताओं के अलावा स्क्रिप्ट राइटिंग, अनुवाद वगैरह से भी जुड़े हैं। कई गज़लें-नज़्में पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित भी हुई हैं। किसी दिन मुम्बई जा कर खुद की स्क्रिप्टों पर काम करने की ख्वाहिश है। साथ ही अपनी मातृभाषा भोजपुरी को भी कला-साहित्य मे इज्जत दिलाने का मंसुबा भी रखते हैं। फिलहाल अपनी पहचान बनाने की कोशिश और तलाश जारी है। हिंद-युग्म पर एक कवि और पाठक के तौर पर खासे सक्रिय रहे हैं।
प्रस्तुत कविता सड़क को सरकारी विकास के प्रतीक के रूप मे इस्तेमाल करती है और इसी बहाने विकास के किसी समाज के भविष्य से कायम अनसुलझे रिश्ते की गिरहें खोलने की कोशिश करती है।
सम्पर्क:  8826308023

यूनिकविता: सड़क

अब पक्की हो गयी है,
कच्ची थी तो तन्नी सा
बरम बाबा के पास
रुक जाती थी,
अब भी रूकती है
पता है उसे
कि कच्चियै हो जायेगी
फिर एक दिन ..!

सड़क जब कच्ची थी
त फेंकूआ के घर
लड़का हुआ था,
सड़क पक्की होते होते
बच्चे का नाम
घूरा धरा गया,
नहीं बदलता
नाम रखने का तरीका
सड़क पक्की होने से...!

जब सडक कच्ची थी
गांव का एगो आसिक
सोचता था
“रख दें एक अँजूरी
जो भैंसही का पानी आसमान में
त फलानी
आजो चाँद देख लेगी,
सड़क पक्की हो गयी
पर ऊ
आजो वइसहीं सोचता है...!

सुदेसर बिदेसर के जाल में
आजो कुछ नहीं फंसता,
नदी में मछरी
सड़क पक्की हो जाने से
थोरही आ जायेगी ..!

चहेंटुआ पहले ठाकुर साब किहाँ
काम करता था
सड़क बनते ही
बम्बई भाग गया
अब बर्तन धोता है
एगो होटल में...!

सड़क पक्की होने से
खाली सड़क पक्की होती है
नहीं पक्का होता गांव का भाग्य,
हाँ
बढ़ जाता है खतरा
गांव के सहर चले जाने का
या सहर के गांव में आ जाने का ।
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पुरस्कार और सम्मान-   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

  इसके अतिरिक्त दिसंबर माह के शीर्ष 10 के अन्य कवि जिनकी कविताएं हम यहाँ प्रकाशित करेंगे और जिन्हे समयांतर की वार्षिक सदस्यता दी जायेगी, उनका क्रम निम्नवत है

सौरभ राय ’भगीरथ’
अनिल कार्की
नरेंद्र तोमर
सुरेंद्र अग्निहोत्री
डॉ नागेश पांडेय ’संजय’
धर्मेंद्र कुमार सिंह
वसीम अकरम
ऋतु वार्ष्णेय
डॉ अनिल चड्डा

  शीर्ष दस के अतिरिक्त हम जिन चार अन्य कविताओं का प्रकाशन इस प्रतियोगिता के अंतर्गत करेंगे, उनके रचनाकारों के नाम हैं

सुधीर गुप्ता ’चक्र’
संगीता सेठी
चारु मिश्रा ’चंचल’
राजेश पंकज

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 7 फ़रवरी 2011 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

  हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। प्रतियोगिता मे भाग लेने वाले शेष कवियों के नाम निम्नांकित हैं

अश्विनी कुमार राय
स्वामी आनंद प्रसाद मनसा
रिक्की पुरी
नूरैन अंसारी
सुधांशु शेखर पांडेय ’प्रफ़ुल्ल’
मृत्युंजय श्रीवास्तव साधक
पुष्पेंद्र पटेल
डिम्पल मलहोत्रा
शन्नो अग्रवाल
स्नेह सोनकर ’पीयूष’
बोधिसत्व कस्तुरिया
डाँ ज्योति शोनक
विवेक जैन
धर्मेंद्र मन्नू
जोमयिर जिनि
अनिरुद्ध यादव
सनी कुमार
नीरज पाल
दीपक कुमार
अनामिका घटक
विमला किशोर
मनोज सिंह भावुक
विनय मलिक
सीमा स्मृति मलहोत्रा
प्रदीप वर्मा
अनवर सुहैल


48वीं यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता में भाग लें


हिंद-युग्म की मासिक यूनिप्रतियोगिता के दिसंबर संस्करण के आयोजन की सूचना के साथ हम आपके समक्ष  हैं। विगत माहो की तरह दिसंबर 2010 माह के लिये  हम यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित करते हैं। यह इस प्रतियोगिता का 48वाँ आयोजन है। सभी प्रतिभागियों और पाठकों का निरंतर सहयोग और प्रोत्साहन इस प्रतियोगिता की उपलब्धि है।

प्रतियोगिता के विजेताओं को विचार एवं संस्कृति की चर्चित पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता दी जायेगी। प्रतियोगिता द्वारा चयनित यूनिकवि को हिंद-युग्म के वार्षिकोत्सव मे विख्यात साहित्यकार के द्वारा सम्मानित भी किया जायेगा।


नवंबर 2010 का यूनिकवि बनने के लिए-

1) अपनी कोई मौलिक तथा अप्रकाशित कविता 15 दिसंबर 2010 की मध्यरात्रि तक hindyugm@gmail.com पर भेजें।

(महत्वपूर्ण- मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के अतिरिक्त गूगल, याहू समूहों में प्रकाशित रचनाएँ, ऑरकुट की विभिन्न कम्न्यूटियों में प्रकाशित रचनाएँ, निजी या सामूहिक ब्लॉगों पर प्रकाशित रचनाएँ भी प्रकाशित रचनाओं की श्रेणी में आती हैं।)

2) कोशिश कीजिए कि आपकी रचना यूनिकोड में टंकित हो। यदि आप यूनिकोड-टाइपिंग में नये हैं तो आप हमारे निःशुल्क यूनिप्रशिक्षण का लाभ ले सकते हैं।

3) परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, इतना होने पर भी आप यूनिकोड-टंकण नहीं समझ पा रहे हैं तो अपनी रचना को रोमन-हिन्दी ( अंग्रेजी या इंग्लिश की लिपि या स्क्रिप्ट 'रोमन' है, और जब हिन्दी के अक्षर रोमन में लिखे जाते हैं तो उन्हें रोमन-हिन्दी की संज्ञा दी जाती है) में लिखकर या अपनी डायरी के रचना-पृष्ठों को स्कैन करके हमें भेज दें। यूनिकवि बनने पर हिन्दी-टंकण सिखाने की जिम्मेदारी हमारे टीम की। आप किसी अन्य फॉन्ट में भी अपनी कविता टंकित करके भेज सकते हैं, लेकिन ध्यान रखें कि रचना word, wordpad या पेजमेकर में हो, पीडीएफ फाइल न भेजें, साथ में इस्तेमाल किये गये फॉन्ट को भी ज़रूर भेजें।

4) एक माह में एक कवि केवल एक ही प्रविष्टि भेजे।



यूनिपाठक बनने के लिए

चूँकि हमारा सारा प्रयास इंटरनेट पर हिन्दी लिखने-पढ़ने को बढ़ावा देना है, इसलिए पाठकों से हम यूनिकोड (हिन्दी टायपिंग) में टंकित टिप्पणियों की अपेक्षा रखते हैं। टाइपिंग संबंधी सभी मदद यहाँ हैं।

1) 1 दिसंबर 2010 से 31 दिसंबर 2010 के बीच की हिन्द-युग्म पर प्रकाशित अधिकाधिक प्रविष्टियों पर हिन्दी में टिप्पणी (कमेंट) करें।

2) टिप्पणियों से पठनीयता परिलक्षित हो।

3) हमेशा कमेंट (टिप्पणी) करते वक़्त एक समान नाम या यूज़रनेम का प्रयोग करें।

4) हिन्द-युग्म पर टिप्पणी कैसे की जाय, इस पर सम्पूर्ण ट्यूटोरियल यहाँ उपलब्ध है।


कवियों और पाठकों को निम्न प्रकार से पुरस्कृत और सम्मानित किया जायेगा-

1) यूनिकवि को समयांतर की एक वर्ष की मुफ्त सदस्यता। हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र।
यूनिकवि को हिन्द-युग्म के वर्ष 2010 के वार्षिकोत्सव में प्रतिष्ठित साहित्यकारों के हाथों सम्मानित किया जायेगा।

2) यूनिपाठक को समयांतर की 12 महीने की मुफ्त सदस्यता और हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र।

3) दूसरे से दसवें स्थान के कवियों को तथा दूसरे से चौथे स्थान के पाठकों को समयांतर की 12 महीनों की निःशुल्क सदस्यता।

प्रतिभागियों से यह भी अनुरोध है कि पिछले महीनों मे भेजी गयी अपनी किसी प्रविष्टि को दोबारा प्रतियोगिता के लिये न भेजें। कवि-लेखक प्रतिभागियों से भी निवेदन है कि वो समय निकालकर यदा-कदा या सदैव हिन्द-युग्म पर आयें और सक्रिय लेखकों की प्रविष्टियों को पढ़कर उन्हें सलाह दें, रास्ता दिखायें और प्रोत्साहित करें।

प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले सभी 'नियमों और शर्तों' को पढ़ लें।