प्रतियोगिता की तेरहवीं कविता चारू मिश्रा 'चंचल' की है। लखीमपुर (उ प्र) की रहने वाली चारु ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में डिग्री हासिल की है। इन दिनों स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता मे व्यस्त हैं। 'परिंदे', 'वाक', 'परिकथा' और 'गुफ्तगू' आदि पत्रिकाओं में कई कवितायेँ प्रकाशित हो चुकी है। हिंद-युग्म पर यह उनकी पहली रचना है।
कविता: मानसिकता का आरक्षण
मुस्कराता है वह
और हम भी
खिलखिलाते है
उसके साथ-साथ
तब
जब
उसकी हरकतें करती है
हमारा मनोरंजन।
बावजूद इसके
आज तक
हमने कभी भी
न तो उसे अपने हाथों से छुआ
और न ही कभी उसे
अपनी मानसिकता में ''अरक्षित'' घरौंदे में जगह दी !
इसलिए
हमेशा ही वह
आता है
जाता है
लेकिन बस
चौखट तक
बहुत कुछ-
सीख चुका है वह
शायद
अब तक
तभी तो
आगे कदम बढ़ाने से डरता है
और हमेशा ही कनखियों से
दरवाजे पर खड़ा खड़ा
टुकुर-टुकुर निहारता है
उन रंगीन दुनियावी लफ्जों को
जो अक्सर ही उछलते है
उसके सामने
पूरे कमरे में।
तब
जब
हम पढ़ रहे होते है
अपने टीचर से
किताबी पहाडा
तब वह
पढ़ रहा होता है
जिंदगी की असली पढ़ाई !
(सुना है नवनियुक्त झाड़ू वाले का छोकरा है वह)






