फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

निरंतर वध


नरेंद्र कुमार तोमर की कविताएँ अक्सर असहज करने वाले प्रश्नों से जूझती नजर आती हैं। प्रचिलित मिथकीय तथ्यों को समकालीन सामाजिक संदर्भों मे इस्तेमाल करते हुए वे अपने समाज के बाजारीकरण के खिलाफ खड़े होते हैं और वक्त के यक्षप्रश्नों का सामना करने की कोशिश करते हैं। उनकी पिछली कविता दिसंबर माह मे चौथे स्थान पर प्रकाशित हुई थी। इस माह दो पायदान चढ़ते हुए प्रस्तुत कविता ने दूसरा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता: निरंतर वध

न होने पर भी
मैं धर्मराज नहीं
युधिष्ठिर नहीं मैं
मैने पांसे नहीं फैंके
जुआँ नहीं खेला
दांव पर नहीं लगाया कुछ,
पर मेरी द्रोपदी छिन गई
उठा ले गया उसे बाजार
दिलाने को साड़ियां
और करता रहा चीरहरण-
करोड़ों की तरह
मैं भी
उतरा नहीं युद्ध में कभी
मैने किसी को नहीं ललकारा
आग, बर्बादी और मौत उगलते
जीवन निगलते
बमों का सामना नहीं किया
पर हो गया लंजपुंज
बाहर आ गईं
अंतड़ियां मेरी भूख से
सूख गया भीतर तक प्यास से-
मैं योद्धा नहीं कहलाया
पर मारा गया बार बार
लड़ते हुए
थोपे हुए
अनचाहे युद्ध
नहीं था कुछ मेरे पास
सिवा हाथ-पांव के
पर मैं लुटता रहा
पिटता-कुटता रहा
सबसे ज्यादा
पूरी करने कामेच्छा अपने पिता की
मैने नहीं की थी भीष्मप्रतिज्ञा
पर मैं होता रहा लगातार
निर्वासित
नहीं था मैं पांचाली पुत्र
मेरा पिता नहीं कर कर रहा था
साम्राज्य के लिए युद्ध
मैं चक्रव्यूह भेदने नहीं गया
पर महारथी मेरा वध् करते रहे
विश्वामित्रों ने मुझे बना दिया त्रिशंकु
लटका दिया अधर में
सदा की तरह देवता
मुझे स्वीकार नहीं करते
अपने स्वर्ग में
और मंत्रशक्ति
मुझे नहीं उतरने देती है
धरती पर

महानता



  हिंद-युग्म अपने सभी पाठकों को गणतंत्र दिवस की इकसठवीं वर्षगाँठ पर बधाई देता है। स्वतंत्रता के बाद भी तमाम सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक समस्याओं से जूझते हमारे गणतंत्र के लिये ऐसे महत्वपूर्ण दिन सिर्फ़ गौरव के क्षण ही नही होते बल्कि वे हमें अपनी विकास-यात्रा के पुनरावलोकन का अवसर भी देते हैं।
   भारत की संस्कृति की जड़ें कोई  62-63 साल की नही वरन हजारों सालों के इतिहास मे गहरे तक गड़ी हैं। इस लंबे कालानुक्रम मे कई उतार-चढावों के बावजूद हमने अपनी जिजीविषा कायम रखी और अच्छे भविष्य के प्रति आशाएं भी जीवित रखीं। एक सुखद भविष्य और समरसतापूर्ण समाज की अवधारणा को बनाये रखने के लिये आत्मालोचन करते रहना भी अत्यावश्यक है। क्षणिक आत्मगौरव मे गर्वोन्मत्त हुए बिना अपने अतीत की समस्याओं को आलोचक दृष्टि से परखना और उनसे सीख लेना एक स्वस्थ समाज के लिये बहुत जरूरी प्रक्रिया होती है। तीन साल पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर ही कवि अवनीश गौतम की कविता ’अट्ठावन बरस गणतंत्र के’ ने स्वतंत्र भारत मे बढ़ती विसंगतियों की और इशारा किया था। और आज अगर हम इसे दोबारा पढ़ें तो देखते हैं कि वो सारी समस्याएं पहले की अपेक्षा अब अधिक मुँह बाये खड़ी हैं। दिसंबर माह की प्रतियोगिता की चौथी कविता भी हमे अपने अतीत के आत्मालोचन का एक मौका देती है। रचनाकार नरेंद्र तोमर की यह कविता सर्वज्ञात पौराणिक तथ्यों पर कुछ तल्ख सवाल उठाती है। किन्ही मद्दों पर असहमति होना कोई अस्वाभाविक बात नही, मगर जरूरत उन सवालों को खारिज करने की नही वरन बिना भावनात्मक हुए निष्पक्ष दृष्टि से उन प्रश्नों की वस्तुनिष्ठ समीक्षा करने की है।


पुरस्कृत कविता: महानता

महान है हमारा राष्ट्र
महान है हमारी संस्कृति सनातन
हमने रचे हैं वेद-उपनिषद-पुराण
 निर्मित की हैं संहिताऐं
उद्घोष किया है
वसुधैव कुटुंबकम्‌ का
पर वसुधा के इस कुटुंब में
सब जन समान नहीं।
अंगूठा काट दिया जाता है
एकलव्य का
मार देते हैं हमारे मर्यादा पुरूषेात्तम
शूद्र शंबूक को
कि प्रसन्न रहे ब्राह्मण।
हमारे पूर्वज, यशस्वी सम्राट
दशरथ. शांतनु और ययाति
मोहित होते रहते हैं
बेटी की आयु की
कैकईयों, गंगाओं पर
और डूबे रहते रात दिन भोग-विलास में
लेकर सैकड़ों माँओं से उत्पन्न
अपने पुत्रों की तरूणाई।
महान हैं हम
वशिष्ट हमारे देवताओं
ब्रह्मा विष्णु महेश
के बीच लगी रहती है होड़।
साबित करने को अपनी श्रेष्ठता,
सोम और सुंदरियों से सदा घिरे
सिंहासन से चिपके
सदा भयभीत
इंद्र
भेज कर अपनी
रंभाओं और मेनकाओं को
खंडित करते रहते हैं
तप
तपस्वियों की तपस्या।

मानो इंद्र की अलका नगरी
सिंहासन हथियाने को लक्षित थी
मोक्ष प्राप्ति के लिए नहीं।
डोल जाते हैं
कन्याओं पर
हमारे ब्रह्मचारी ऋषि-मुनी
रैक्व और अष्टावक्र और च्यवन।
भीष्म करते हैं प्रतिज्ञा
आजीवन अविवाहित रहने की
अपने बूढ़े बाप की कामेच्छा पूरी करने को
अन्याय से लड़ने के लिए नहीं
कौरव सभा में होने देते हैं
चीर हरण।
सांसारिक नहीं हम ब्रह्मलीन हैं
वेद की ऋचाएं आवाहन करती हैं
दैवीय शक्तियों का
धन-धान्य के लिए
सुख-संपन्नता के लिए
गायों और बैलों के लिए
संतति के लिए
युद्धों में विजय के लिए।
हमारे प्रतापी सम्राट करते हैं
अश्वमेध
 बढ़ाने को साम्राज्य
घोषणा होती है
वीर भोगे वसुंधरा
त्याग की तथाकथित संस्कृति में
सिर पर चढ़ भोग ही बोलता है
त्याग है ब्रह्मा की तीसरी संतान
मनुष्यों के लिए
हमारे देवता धारण करते हैं
अगणित आभूषण
बिठाए दिखते हैं अपनी रानियों को
सदा अपनी बगल में।
हमारे आदर्श महापुरुष
सर्वस्व लगा देते हैं दांव पर
धन संपदा की तरह
अपनी धर्मपत्नी तक को
गौतम मुनि की पत्नी
शिकार बनती है
भगवान इंद्र की हवस की
और पति के श्राप से
हो जाती है पत्थर
पर देवता बने रहते हैं इंद्र।

_________________________________________________________
पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।