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’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो



   अप्रैल माह की सातवीं और अंतिम रचना एक गीत है जिसके रचनाकार निशीथ द्विवेदी की यह हिंद-युग्म पर पहली दस्तक है। अक्टूबर 1979 मे जन्मे निशीथ शाजापुर (म.प्र) से तअल्लुक रखते हैं। निशीथ ने रासायनिक अभियांत्रिकी मे आइ आइ टी रुड़की से बी टेक और आइ आइ टी दिल्ली से एम टेक की उपाधि हासिल की है। कविताकर्म मे रुचि रखने वाले निशीथ सम्प्रति आयुध निर्माणी भंडारा मे कार्यरत हैं।
   हम यहाँ माँ विषयक हृदयस्पर्शी कविताएं पहले भी पढ़ते रहे हैं, वही पिता के जिम्मेदारी और अनुशासन के तले दबे व्यक्तित्व का कोमल पक्ष अक्सर कविताओं मे उतनी प्रमुखता से उजागर नही हो पाता है। प्रस्तुत कविता अपने पारंपरिक कलेवर मे एक पिता की ऐसी ही अनुच्चारित भावनाओं मे छिपे प्रेम और विवशता को स्वर देती है।

पुरस्कृत कविता: गीत

माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मेरे भी पास रहो !
’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो !
मैनेँ भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेटे हैँ,
ज़ाहिर नही किया, न सोचो पापा के दिल मेँ प्यार न हो!

थी मेरी ये ज़िम्मेदारी घर मे कोई मायूस न हो,
मैँ सारी तकलीफेँ झेलूँ और तुम सब महफूज़ रहो,
सारी खुशियाँ तुम्हेँ दे सकूँ, इस कोशिश मे लगा रहा,
मेरे बचपन मेँ थी जो कमियाँ, वो तुमको महसूस न हो!

हैँ समाज का नियम भी ऐसा पिता सदा गम्भीर रहे,
मन मे भाव छुपे हो लाखोँ, आँखो से न नीर बहे!
करे बात भी रुखी-सूखी, बोले बस बोल हिदायत के,
दिल मे प्यार है माँ जैसा ही, किंतु अलग तस्वीर रहे!

भूली नही मुझे हैँ अब तक, तुतलाती मीठी बोली,
पल-पल बढते हर पल मे, जो यादोँ की मिश्री घोली,
कन्धोँ पे वो बैठ के जलता रावण देख के खुश होना,
होली और दीवाली पर तुम बच्चोँ की अल्हड टोली!

माँ से हाथ-खर्च मांगना, मुझको देख सहम जाना,
और जो डाँटू ज़रा कभी, तो भाव नयन मे थम जाना,
बढते कदम लडकपन को कुछ मेरे मन की आशंका,
पर विश्वास तुम्हारा देख मन का दूर वहम जाना!

कॉलेज के अंतिम उत्सव मेँ मेरा शामिल न हो पाना,
ट्रेन हुई आँखो से ओझल, पर हाथ देर तक फहराना,
दूर गये तुम अब, तो इन यादोँ से दिल बहलाता हूँ,
तारीखेँ ही देखता हूँ बस, कब होगा अब घर आना!

अब के जब तुम घर आओगे, प्यार मेरा दिखलाऊंगा,
माँ की तरह ही ममतामयी हूँ, तुमको ये बतलाऊंगा,
आकर फिर तुम चले गये, बस बात वही दो-चार हुई,
पिता का पद कुछ ऐसा ही हैँ फिर खुद को समझाऊंगा!
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तक।



ख्वाबों की शॉल







सुबह सुबह हालातों की भेड़.
भरी पूरी नज़र आती है,
दिन भर
वक्त के उस्तरे की धार तेज़ कर
उम्मीद का ऊन निकाल कर
एक ख्वाब बुनता हूँ,
ताकि
हसरतों को हताशा की
ठिठुरन ना जकड़े,
ख्वाब की शॉल
जब हसरतों को ओढ़ाता हूं,
तो अक्सर,
उसका एक सिरा उधड़ा पाता हूं,
विश्वास मुझे समझाता है,
मन फिर उधेड़-बुन में लग जाता है,
इस तरह उम्मीद उधेड़ता बुनता जाता हूं,
हर दिन इसी सोच के साथ,
कभी ख्वाब पूरा बुन जाएगा,
सुबह उसका कोई सिरा खुला नज़र नहीं आयेगा । 

यूनिकवि: पंकज रामेन्दू



रंग की हों पपड़ियाँ उचली किसी दीवार से



शामिख फ़राज का नाम हमारे नियमित पाठकों के लिये नया नही है। कुछ वक्त पहले तक शामिख मंच के खूब सक्रिय कवि और पाठकों मे से रहे हैं। इधर कुछ समय से उनकी रचनाओं का क्रम कुछ अनियमित हुआ है। इससे पहले उनकी एक कविता गत वर्ष जनवरी माह मे आयी थी। इस अप्रैल माह की प्रतियोगिता मे उनकी प्रस्तुत रचना ने छठा स्थान हासिल किया है।

अब क्योंकि हाथ ख़ाली
 लौटा हूँ बाज़ार से,
हाथ ही सर पे
फिरा दूंगा मैं उसके प्यार से,
ज़िन्दगी लगती है यूँ
जो दोस्तों से दूर हूँ,
रंग की हों पपड़ियाँ
उचली किसी दीवार से,
आना जाना उसका
अब भगवानों के घर पे नहीं,
लौटा होगा ख़ाली जो
भगवानों के वो द्वार से,
चीख भूखे फिर किसी बच्चे की
मुझको ही क्यों
है सुनाई देती
उस पाजेब की झंकार से,
लोग सब अपने घरों को
लौट जाते हैं फ़राज़
तू परेशां से दिखे
खुद में हुई तकरार से।
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पुरस्कार:हिंद-युग्म की ओर से पुस्तक।


ये सफर अच्छे से बेहतर की तलाश में



प्रतियोगिता की पाँचवीं रचना एक गज़ल है, जिसके रचनाकार रोहित रुसिया हैं। अनियमित रूप से लिखने वाले रोहित की कविताएं अक्सर लंबे अंतराल के बाद आती हैं। इससे पहले उनकी पिछली कविता पिछले सितंबर माह मे प्रकाशित हुई थी।

पुरस्कृत रचना:  गज़ल


इंसानियत की जद में, उजालों की आस में
ये सफर अच्छे  से, बेहतर की  तलाश में।

किरदार  कैद  हैं  कई, पर्दों के दरमियाँ
फन उनके फिर से लायें, चलो हम उजास मे।

मिटटी  के घरौदें  हैं, महलों  की  ओट में
गिरवी रखी हैं खुशियाँ, महाजन के पास में।

संजीदा  बहस  होगी, दिल्ली  में भूख पर
मुद्दा  ये  जिक्र  में है, हर आमों-खास  में।

गुलशन की हवाओं में ये, कैसा ज़हर घुला
तितली भी  डर रही हैं, जाने को पास में।

मुद्दत से मौन ढूंढ रहा, क्या है ये हुजूम
खुशियों की चाह है या, सुकूं की तलाश में।
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तक।


उम्मीद भरा गीत



अप्रैल माह की तीसरे स्थान की कविता चैन सिंह शेखावत की है। चैन सिंह जी राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा विभाग मैं हिंदी व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं और राजस्थानी तथा हिंदी दोनो मे काव्य-सृजन करते हैं। .विभिन्न समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। हिंदी कविता की ई-पत्रिकाओं में भी कविताओं का प्रकाशन हो चुका है। इसके अतिरिक्त राजस्थान के शिक्षा विभाग द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में भी रचनाएँ संकलित हुई हैं। हिंद-युग्म पर चैन सिंह शेखावत के यह प्रथम कविता है। कविता का प्रबल आशावाद इसकी प्रमुख शक्ति है।


पुरस्कृत कविता: उम्मीद  भरा  गीत 

शब्दों का ही सामर्थ्य है
दिन अभी इतने मैले नहीं हुए हैं
निथर जाएगा सब आकाश
चाँद फिर तुम्हें मनुहारने
झाड़ियों की ओट तक
चला आएगा

एक कविता इतनी उम्मीद भरा गीत है
सत्ता और शोषण की
तमाम नाकेबंदियों में
आदमी आज़ाद है तो
इसी दम पर

कोई पुचकारने या सहलाने नहीं आएगा
हमें अपने अपने हिस्से के पात्र
स्वयं गढ़ने होंगे
कुंद हुए किनारों पर
अंगूठे से धार चखनी है

तुम रहो या ना रहो
तुम्हारे पुराने कपड़ों में कोई और होगा
बीत चुके सावन में लगाए पेड़ों पर
तुम्हारी ही शक्ल के लोग
झूला झूलते होंगे

एक दिन जरूर ऐसा आएगा
धरती का बाँझपन
और युद्धरत मनुष्यता
तुम्हारे सामने बौने नज़र आएँगे
तब तुम समझोगे
मेरे शब्द की ताक़त क्या है।
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पुरस्कार: हिंद-युग्म से पुस्तक।


फर्क



माह के सोमवारों को महीने के यूनिकवि की अन्य नयी कविताओं को पाठकों तक पहुँचाने की हमारी कोशिश होती है। इस बार प्रस्तुत है अप्रैल माह के यूनिकवि पंकज रामेंदु की कविता।


फर्क

आदर्श होना बेहतर है,
बस शर्त ये रहे,
दोहराए जा रहे आदर्श
बल्ली की तरह हों,
भीतर और बाहर से एक जैसे,
ठोस रुप लिए,
जो आदर्श बांस की तरह
खोखले और लचर हैं,
उनकी नियति में
ठठरी की तरह बंधना ही है ।

पुरुषोत्तम होने में कुछ बुरा नहीं
मर्यादा का ख्याल रखने में कुछ ग़लत नहीं,
बुरा है, ग़लत है,
बिना सोचे समझे बस
आज्ञा में सिर हिला देना
फिर चाहे जंगल में भटकना हो
या एक औरत का पांच पुरूषों में बंटना।

शांत चित्त होने में खराबी कुछ नहीं
बस ये फर्क मालूम रहे,
किस जगह पर गाल बढ़ाना है
किस जगह पर हाथ उठाना है
क्रोध भी जीवन का सृष्टा हो सकता है
औऱ शांत मन
एक कदम के फासले पर कायर ।


इंद्रियाँ और दिमाग़



धर्मेंद्र कुमार सिंह की रचनाओं ने यूनिप्रतियोगिता मे हर माह शीर्ष पायदानों पर रहने की आदत ही बना ली है। इनकी कविताएं और ग़ज़लें पाठकों की भी पसंद बनती रही हैं। पिछले माह दूसरे स्थान पर धर्मेंद्र की गज़ल प्रकाशित हुई थी। तो इस बार उनकी प्रस्तुत कविता ने चौथा मुकाम हासिल किया है। प्रस्तुत कविता इंद्रियों और दिमाग के अंतर्संबंध के इशारे से हमारी सामाजिक व्यवस्था के इतिहास की सच्चाई बयाँ करने की कोशिश करती है।


पुरस्कृत कविता: इंद्रियाँ और दिमाग़

इंद्रियाँ तो कठपुतलियाँ हैं
सबसे ऊपर बैठे दिमाग़ की
उसी के इशारों पर नाचती हैं
इंद्रियों को तो पता भी नहीं होता
कि वो आखिर कर क्या रही हैं
आवश्यकता से अधिक सुख सुविधाएँ
जिन्हें वो गलत तरीके से इकट्ठा कर रही हैं
उन्हें या तो निकम्मा बना देंगी
या रोगी
और अगर पकड़ी गईं
तो सारी सजा मिलेगी इंद्रियों को
बलि की बकरियाँ हैं इंद्रियाँ।

इंद्रियाँ करें भी तो क्या करें
आदिकाल से
नियम ही ऐसे बनते आये हैं
जिससे सारी सजा इंद्रियों को ही मिले,
हर देवता, हर महात्मा ने
हमेशा यही कहा है
कि इंद्रियों पर नियंत्रण रखो
दिमाग़ की तरफ़ तो
कभी भूल कर भी उँगली नहीं उठाई गई
कैसे उठाई जाती
उँगली भी तो आखिरकार
दिमाग़ के नियंत्रण में थी।

मगर कलियुग आने का
पुराने नियमों से विश्वास उठने का
एक फायदा तो हुआ है
अब यदा कदा कोई कोई
उँगली दिमाग़ की तरफ भी उठने लगी है,
ज्यादातर तो तोड़ दी जाती हैं
या जहर फैल जाएगा कहकर काट दी जाती हैं
मगर क्या करे दिमाग़
अनिश्चितता का सिद्धांत तो वो भी नहीं बदल सकता
कि उठने वाली हर उँगली तोड़ी नहीं जा सकती,
कोई न कोई उँगली बची रह ही जाएगी
तथा उस उँगली की सफलता को देखकर
उसके साथ और भी उँगलियाँ उठ खड़ी होंगी,
अन्ततः दिमाग को
उँगलियों की सम्मिलित शक्ति के सामने
सर झुकाना ही पड़ेगा
अपनी असीमित शक्ति का दुरुपयोग
रोकना ही पड़ेगा।
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तक।

निरंतर वध


नरेंद्र कुमार तोमर की कविताएँ अक्सर असहज करने वाले प्रश्नों से जूझती नजर आती हैं। प्रचिलित मिथकीय तथ्यों को समकालीन सामाजिक संदर्भों मे इस्तेमाल करते हुए वे अपने समाज के बाजारीकरण के खिलाफ खड़े होते हैं और वक्त के यक्षप्रश्नों का सामना करने की कोशिश करते हैं। उनकी पिछली कविता दिसंबर माह मे चौथे स्थान पर प्रकाशित हुई थी। इस माह दो पायदान चढ़ते हुए प्रस्तुत कविता ने दूसरा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता: निरंतर वध

न होने पर भी
मैं धर्मराज नहीं
युधिष्ठिर नहीं मैं
मैने पांसे नहीं फैंके
जुआँ नहीं खेला
दांव पर नहीं लगाया कुछ,
पर मेरी द्रोपदी छिन गई
उठा ले गया उसे बाजार
दिलाने को साड़ियां
और करता रहा चीरहरण-
करोड़ों की तरह
मैं भी
उतरा नहीं युद्ध में कभी
मैने किसी को नहीं ललकारा
आग, बर्बादी और मौत उगलते
जीवन निगलते
बमों का सामना नहीं किया
पर हो गया लंजपुंज
बाहर आ गईं
अंतड़ियां मेरी भूख से
सूख गया भीतर तक प्यास से-
मैं योद्धा नहीं कहलाया
पर मारा गया बार बार
लड़ते हुए
थोपे हुए
अनचाहे युद्ध
नहीं था कुछ मेरे पास
सिवा हाथ-पांव के
पर मैं लुटता रहा
पिटता-कुटता रहा
सबसे ज्यादा
पूरी करने कामेच्छा अपने पिता की
मैने नहीं की थी भीष्मप्रतिज्ञा
पर मैं होता रहा लगातार
निर्वासित
नहीं था मैं पांचाली पुत्र
मेरा पिता नहीं कर कर रहा था
साम्राज्य के लिए युद्ध
मैं चक्रव्यूह भेदने नहीं गया
पर महारथी मेरा वध् करते रहे
विश्वामित्रों ने मुझे बना दिया त्रिशंकु
लटका दिया अधर में
सदा की तरह देवता
मुझे स्वीकार नहीं करते
अपने स्वर्ग में
और मंत्रशक्ति
मुझे नहीं उतरने देती है
धरती पर

अप्रैल 2011 की यूनिकवि प्रतियोगिता के परिणाम



 
     अप्रैल 2011 की युनिकवि प्रतियोगिता के परिणाम आ गये हैं, जिन्हे ले कर हम आपके समक्ष उपस्थित हैं। पिछले कुछ माहों मे निर्णय आने मे होने वाले विलम्ब की वजह से परिणाम प्रकाशित करने की अवधि मे थोड़ा व्यतिक्रम होता गया है, जिसे हम दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे हैं। अप्रैल माह के आयोजन के द्वारा प्रतियोगिता ने अपने बावन महीनों का पड़ाव पार कर लिया है। प्रतिभागियों का जोश और पाठकों का नियमित प्रोत्साहन इस प्रतियोगिता की महत्वपूर्ण उपलब्धि रही है।

     अप्रैल माह की प्रतियोगिता के लिये हमारे पास कुल 38 जायज प्रविष्टियाँ आयीं, जिनको दो चरणों मे परखा गया। पहले चरण मे चार निर्णायक तय किये गये, इन निर्णायकों द्वारा दिये गये अंकों के आधार पर 21 कविताओं को दूसरे यानी अंतिम चरण के निर्णय के लिए भेजा गया। अंतिम चरण में 2 निर्णयक थे, जिनके द्वारा दिये गये अंकों और पुराने औसत अंकों के औसत के आधार पर कविताओं का अंतिम वरीयता क्रम निर्धारित किया गया। हालाँकि इस बार निर्णायकों को यह भी लगा कि कविताओं का सामूहिक स्तर पिछले माहों की तुलना मे कुछ कमतर रहा है। इसलिये हमने शीर्ष की सिर्फ़ सात कविताओं को प्रकाशित करने का निर्णय किया है। कविता अपने मन के भावों को अभिव्यक्त करने के माध्यम के अलावा शब्दों के हथौड़े से सामाजिक-सांस्कृतिक-वैचारिक जड़ता की दीवारों को तोड़ने और हमारी सोच की हदों को और विस्तृत करने का औजार भी होती है। एक अच्छी कविता कहलाये जाने के लिये उसमे कथ्य/शिल्प स्तर पर मौलिकता का समावेश होना जरूरी शर्त होता है। जो कविताएँ प्रचिलित लीक को चुनौती दे कर मौलिकता की इस कसौटी पर खरी उतरती हुई अपने समय के सच को शब्दों की रोशनी मे लाने की हिम्मत करती हैं, वही कविताएं कालातीत हो पाती हैं और अपने वक्त का दस्तावेज बन जाती हैं। आशा है कि हमारे उत्साही प्रतिभागी हर बार अपनी अभिव्यक्ति की सीमाओं को चुनौती देते हुए हर रचना के संग परिपक्वता के नये मुकाम पार करते रहेंगे। शीर्ष की तीनों कविताओं के बीच इस बार ज्यादा फ़र्क नही रहा है मगर सारे निर्णायकों की पसंद के आधार पर पंकज रामेंदु अप्रैल माह के लिये हिंद-युग्म के यूनिकवि घोषित हुए हैं।

युनिकवि: पंकज रामेंदु 


  पंकज रामेंदु का जुड़ाव हिंद-युग्म से काफ़ी पुराना रहा हैं मगर इधर एक लंबे अंतराल के बाद उनकी हिंद-युग्म पर वापसी हुई है। उनकी पिछली कविता 2008 मे हिंद-युग्म पर प्रकाशित हुई थी। हमारे पुराने पाठक संभवतः उनसे परिचित होंगे मगर नये पाठकों के लिये हम एक बार पुनः उनका परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं।

पंकज का जन्म मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 29 मई 1980 को हुआ। इनको पढ़ने का शौक बचपन से है, इनके पिताजी भी कवि हैं, इसलिए साहित्यिक गतिविधयों को इनके घर में अहमियत मिलती है। लिखने का शौक स्नातक की कक्षा में आनेपर लगा या यूँ कहिए की इन्हें आभास हुआ कि ये लिख भी सकते हैं। माइक्रोबॉयलजी में परास्नातक करने के बाद एक बहुराष्ट्रीय कंपनी मे कुछ दिनों तक काम किया, लेकिन लेखक मन वहाँ नहीं ठहरा, तो नौकरी छोड़ी और पत्रकारिता में स्नात्तकोत्तर करने के लिए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय जा पहुँचे। डिग्री के दौरान ही ई टीवी न्यूज़ में रहे। एक साल बाद दिल्ली पहुँचे और यहाँ जनमत न्यूज़ चैनल में स्क्रिप्ट लेखक की हैसियत से काम करने लगे। वर्तमान में स्क्रिप्ट लेखक हैं और लघु फ़िल्में, डाक्यूमेंट्री तथा अन्य कार्यक्रमों के लिए स्क्रिप्ट लिखते हैं। कई लेख जनसत्ता, हंस, दैनिक भास्कर और भोपाल के अखबारों में प्रकाशित।

     पंकज की प्रस्तुत कविता जो इस बार की यूनिकविता चयनित हुई है, साहित्य के एक बेहद महत्वपूर्ण मगर उपेक्षित नाम भुवनेश्वर को याद करने के बहाने वर्तमान हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर गहरा कटाक्ष करती है। हम अपने पाठकों को बताते चलें कि भुवनेश्वर का जन्म 1910 मे शाहजहाँपुर (उ प्र) मे हुआ था। अपने कुछ नाटकों और कहानियों के बल पर परिपक्वता के मामले मे वो अपने समय के साहित्य से कहीं आगे निकल गये थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध कहानी ’भेड़िये’ हंस मे सर्वप्रथम 1938 मे प्रकाशित हुई थी, जिसे कई आलोचक हिंदी की पहली आधुनिक कहानी मानते हैं। मगर अपने बेहद स्वाभिमानी और तल्ख स्वभाव के चलते वो तत्कालीन साहित्य के राजपथ से निर्वासित और समकालीन साहित्यकारों मे सर्वथा उपेक्षित ही रहे। उनकी मृत्यु 1955 मे गहरी गुमनामी और फ़ाकाकशी के दौर मे हुई। गत 2010 भुवनेश्वर की जन्मशती का वर्ष था।

युनिकविता: पीड़ा (भुवनेश्वर के बहाने) 

वो लिखता था,
लिखता क्या था आतंक,
आंतक उनके लिए
जो मान बैठे थे खुद को खुदा,
शब्दों का ब्रह्मा,
जो ये मानते थे कि वो जानते हैं,
जो ये मानते थे कोई नहीं जानता,
जो ये मानते थे जानना भी उन्हे आता है,
जो ये मानते थे कलम उनके बाप की है,
जो ये मानते थे लिखना उन्हें आता है,
वे आतंकित हो गये थे,
नये शब्दों के चयन से
एक असुरक्षा घिर गई थी उनके मन में
उसकी लेखनी में आम सा कुछ था,
कुछ साधारण सा लगने वाला
जिसे हर कोई समझ जाता था
जो हर एक की बात थी,
उसमें कुछ आधुनिकता थी
कुछ ऐसा जो अब तक नहीं लिखा गया था
या जिसे लिखने की हिम्मत नहीं जुटा सका था कोई।
वो भय बन गया था अचानक
उसे सब समझते थे जिसे हम आम कहते हैं
औऱ जिसे नासमझ भी कहा जाता है
वो उनकी बोली उनकी भाषा की बात थी
उसने वो बात भी कही या लिखी
जो शायद उस दौर की सोच में नही थी।
बस आलोचनाओं के कीड़े
धीरे धीरे कुतरने लग गये उसे,
बुद्धिजीवियों के पिरान्हा रूपी समूह ने
साहित्यिक मांस को नोच डाला था
शब्दों के गोश्त को चबा-चबा कर
सब कुछ पचा गये
और सुबह की जुगाली में
दांत में फंसे हुए गोश्त के टुकड़े को
किसी पैनी चीज़ से कुरेद कर निकाल फेंका था,
वो टुकड़ा जो किसी कहानी, किसी कविता का हिस्सा था
हवा में विलीन हो गया,
सुना है वो जो आतंक था
वो सर्दी के आतंक से ठिठुर गया था।
आजकल साहित्य का मांस नोचने वाले
जिनके पुरखों ने उसके गोश्त का मज़ा चखा था
उसके शब्दों के मांस का फिर लुत्फ उठा रहे हैं,
उसके मरने पर अफसोस जता रहे हैं
उसकी याद में गोष्ठी पर गोष्ठी सजा रहे हैं,
जिसमें कहानी के किसी टुकड़े को
एकांकी के किसी कतरे को
कविता के किसी पल को याद किया जा रहा है
और उसे भी, जो कभी आतंक था
उसे भुनाया जा रहा है
कैसा अजीब है ये रवैया
तिल तिल कर मरना,
फिर एक दिन चुपचाप खामोश हो जाना,
कितना मुश्किल है
दुनिया में अमर हो पाना ।
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पुरस्कार और सम्मान: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें तथा प्रशस्तिपत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

  इसके अतिरिक्त अप्रैल माह की शीर्ष की जिन छ: कविताओं का हम प्रकाशन करेंगे, उनके रचनाकारों का क्रम निम्नवत है-

नरेंद्र कुमार तोमर
चैन सिंह शेखावत
धर्मेंद्र कुमार सिंह
रोहित रुसिया
शामिख फ़राज़
निशीथ द्विवेदी

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ  7 जून 2011 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

     हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। प्रतियोगिता मे भाग लेने वाले शेष कवियों के नाम निम्नांकित हैं (शीर्ष 21 के अन्य प्रतिभागियों के नाम अलग रंग से लिखित हैं)

राकेश जाज्वल्य
विशाल बाग
संगीता सेठी
आलोक उपाध्याय
शोभा रस्तोगी
सुरेंद्र अग्निहोत्री
सनी कुमार
निशा त्रिपाठी
रेणु दीपक
अनंत आलोक
गौरव कुमार ’विकल’
दीपक वर्मा
अरविंद कुमार पुरोहित
विजय विगमल
शील निगम
कमल जोशी पथिक
सीमा स्मृति मलहोत्रा
गंगेश ठाकुर
प्रवीण कुमार
यानुचार्या मौर्य यानु
मेयनुर खत्री
जोमयिर जिनि
वंदना सिंह
अनिल चड्डा
स्नेह सोनकर पीयुष
बलराम मीना दाऊ
दीपक कुमार
डॉ गौरव गर्ग
अनुपम चौबे
विभोर गुप्ता
एकनाथ उत्तम तेलतुंबडे

विशेष:  इस बार किसी पाठक को यूनिपाठक सम्मान हेतु योग्य नही पाया गया है। हमारा अपने पाठकों से अनुरोध है कि अपनी रचनात्मक और निष्पक्ष प्रतिक्रियाओं से रचनाकारों का मार्गदर्शन करें।

अप्रैल माह की यूनिप्रतियोगिता मे भाग लें



हिंद-युग्म की मासिक यूनिप्रतियोगिता के अप्रैल संस्करण की विज्ञप्ति आपके समक्ष है। यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के 52वें आयोजन के लिये सभी प्रतिभागियों से प्रविष्टियाँ आमंत्रित हैं। प्रतियोगिता मे अब तक सभी प्रतिभागियों और पाठकों का निरंतर सहयोग और प्रोत्साहन के लिये हम सभी के आभारी हैं।

अप्रैल माह के यूनिकवि को हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें तथा प्रशस्तिपत्र भेंट किया जायेगा। यूनिकवि के पास अपनी कविता के ’समयांतर’ पत्रिका मे प्रकाशन का अवसर भी होगा। जबकि शीर्ष दस के अन्य कवियों को हिंद-युग्म प्रकाशन की ओर से पुस्तकें दी जायेंगी।  प्रतियोगिता द्वारा चयनित यूनिकवि को हिंद-युग्म के वार्षिकोत्सव मे विख्यात साहित्यकार के द्वारा सम्मानित भी किया जायेगा। प्रतियोगिता मे प्रविष्टि भेजने की अंतिम तिथि 18 अप्रैल है। प्रतियोगिता के परिणाम मई प्रथम सप्ताह मे अपेक्षित हैं।


अप्रैल 2011 का यूनिकवि बनने के लिए-

1) अपनी कोई मौलिक तथा अप्रकाशित कविता 18 अप्रैल 2011 की मध्यरात्रि तक hindyugm@gmail.com पर भेजें।

(महत्वपूर्ण- मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के अतिरिक्त गूगल, याहू समूहों में प्रकाशित रचनाएँ, ऑरकुट की विभिन्न कम्यूनिटीज्‌ में प्रकाशित रचनाएँ, निजी या सामूहिक ब्लॉगों पर प्रकाशित रचनाएँ भी प्रकाशित रचनाओं की श्रेणी में आती हैं।)

2) कोशिश कीजिए कि आपकी रचना यूनिकोड में टंकित हो। यदि आप यूनिकोड-टाइपिंग में नये हैं तो आप हमारे निःशुल्क यूनिप्रशिक्षण का लाभ ले सकते हैं।

3) परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, इतना होने पर भी आप यूनिकोड-टंकण नहीं समझ पा रहे हैं तो अपनी रचना को रोमन-हिन्दी ( अंग्रेजी या इंग्लिश की लिपि या स्क्रिप्ट 'रोमन' है, और जब हिन्दी के अक्षर रोमन में लिखे जाते हैं तो उन्हें रोमन-हिन्दी की संज्ञा दी जाती है) में लिखकर या अपनी डायरी के रचना-पृष्ठों को स्कैन करके हमें भेज दें। यूनिकवि बनने पर हिन्दी-टंकण सिखाने की जिम्मेदारी हमारे टीम की। आप किसी अन्य फॉन्ट में भी अपनी कविता टंकित करके भेज सकते हैं, लेकिन ध्यान रखें कि रचना word, wordpad या पेजमेकर में हो, पीडीएफ फाइल न भेजें, साथ में इस्तेमाल किये गये फॉन्ट को भी ज़रूर भेजें।

4) एक माह में एक कवि केवल एक ही प्रविष्टि भेजे।



यूनिपाठक बनने के लिए

चूँकि हमारा सारा प्रयास इंटरनेट पर हिन्दी लिखने-पढ़ने को बढ़ावा देना है, इसलिए पाठकों से हम यूनिकोड (हिन्दी टायपिंग) में टंकित टिप्पणियों की अपेक्षा रखते हैं। टाइपिंग संबंधी सभी मदद यहाँ हैं।

1) 1 अप्रैल 2011 से 30 अप्रैल 2011 के बीच की हिन्द-युग्म पर प्रकाशित अधिकाधिक प्रविष्टियों पर हिन्दी में टिप्पणी (कमेंट) करें।

2) टिप्पणियों से पठनीयता परिलक्षित हो।

3) हमेशा कमेंट (टिप्पणी) करते वक़्त एक समान नाम या यूज़रनेम का प्रयोग करें।

4) हिन्द-युग्म पर टिप्पणी कैसे की जाय, इस पर सम्पूर्ण ट्यूटोरियल यहाँ उपलब्ध है।


कवियों और पाठकों को निम्न प्रकार से पुरस्कृत और सम्मानित किया जायेगा-

1) यूनिकवि को हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें। हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। यूनिकवि को हिन्द-युग्म के वर्ष 2011 के वार्षिकोत्सव में प्रतिष्ठित साहित्यकारों के हाथों सम्मानित किया जायेगा।

2) यूनिपाठक को हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें और हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र।

3) दूसरे से दसवें स्थान के कवियों हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

प्रतिभागियों से यह भी अनुरोध है कि पिछले महीनों मे भेजी गयी अपनी किसी प्रविष्टि को दोबारा प्रतियोगिता के लिये न भेजें। कवि-लेखक प्रतिभागियों से भी निवेदन है कि वो समय निकालकर यदा-कदा या सदैव हिन्द-युग्म पर आयें और सक्रिय लेखकों की प्रविष्टियों को पढ़कर उन्हें सलाह दें, रास्ता दिखायें और प्रोत्साहित करें।

प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले सभी 'नियमों और शर्तों' को पढ़ लें।