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Wednesday, May 25, 2011

ये सफर अच्छे से बेहतर की तलाश में



प्रतियोगिता की पाँचवीं रचना एक गज़ल है, जिसके रचनाकार रोहित रुसिया हैं। अनियमित रूप से लिखने वाले रोहित की कविताएं अक्सर लंबे अंतराल के बाद आती हैं। इससे पहले उनकी पिछली कविता पिछले सितंबर माह मे प्रकाशित हुई थी।

पुरस्कृत रचना:  गज़ल


इंसानियत की जद में, उजालों की आस में
ये सफर अच्छे  से, बेहतर की  तलाश में।

किरदार  कैद  हैं  कई, पर्दों के दरमियाँ
फन उनके फिर से लायें, चलो हम उजास मे।

मिटटी  के घरौदें  हैं, महलों  की  ओट में
गिरवी रखी हैं खुशियाँ, महाजन के पास में।

संजीदा  बहस  होगी, दिल्ली  में भूख पर
मुद्दा  ये  जिक्र  में है, हर आमों-खास  में।

गुलशन की हवाओं में ये, कैसा ज़हर घुला
तितली भी  डर रही हैं, जाने को पास में।

मुद्दत से मौन ढूंढ रहा, क्या है ये हुजूम
खुशियों की चाह है या, सुकूं की तलाश में।
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तक।


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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

suvarna का कहना है कि -

किरदार कैद हैं कई, पर्दों के दरमियाँ
फन उनके फिर से लायें, चलो हम उजास मे।

badhiya sher hai . khoobsoorat shero se saji gazal ke lie badhaiyan

रंजना का कहना है कि -

किरदार कैद हैं कई, पर्दों के दरमियाँ
फन उनके फिर से लायें, चलो हम उजास मे।

यह शेर बहुत ही सुन्दर लगा...
बाकी सभी शेर भी लाजवाब हैं....मन को छूने वाले हैं...
इस सुन्दर ग़ज़ल को पढवाने के लिए आभार.

RITESH का कहना है कि -

मिटटी के घरौदें हैं, महलों की ओट में
गिरवी रखी हैं खुशियाँ, महाजन के पास में।

सुन्दर रचना हैं ,शब्दों की सरलता अच्छी लगी.........
दिल को छू लेने वाली पंक्तिया हैं ........

moun का कहना है कि -

aap sabhi ko dhanyawad

Disha का कहना है कि -

khoobsoorat gazal................

अनंत आलोक का कहना है कि -

मिट्टी के घरोंदे ,महलों की ओट में
गिरवी राखी हैं खुशियाँ ,महाजन के पास में |अति सुंदर शेअर |

Yogesh Kumar का कहना है कि -

एक प्रश्न है, मैने एक ग़ज़ल लिखी है जिसमे रदीफ और काफिया का इस्तेमाल किया है लेकिन बहर का कुछ अता पता नहीं है तो इसे क्या कहेंगे ग़ज़ल या कविता ?

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