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Monday, May 30, 2011

ख्वाबों की शॉल







सुबह सुबह हालातों की भेड़.
भरी पूरी नज़र आती है,
दिन भर
वक्त के उस्तरे की धार तेज़ कर
उम्मीद का ऊन निकाल कर
एक ख्वाब बुनता हूँ,
ताकि
हसरतों को हताशा की
ठिठुरन ना जकड़े,
ख्वाब की शॉल
जब हसरतों को ओढ़ाता हूं,
तो अक्सर,
उसका एक सिरा उधड़ा पाता हूं,
विश्वास मुझे समझाता है,
मन फिर उधेड़-बुन में लग जाता है,
इस तरह उम्मीद उधेड़ता बुनता जाता हूं,
हर दिन इसी सोच के साथ,
कभी ख्वाब पूरा बुन जाएगा,
सुबह उसका कोई सिरा खुला नज़र नहीं आयेगा । 

यूनिकवि: पंकज रामेन्दू



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3 कविताप्रेमियों का कहना है :

ranjana का कहना है कि -

उम्मीदों की उधेड़ बुन यूँ ही जारी रखिये, ख्वाबों की शाल ज़रूर पूरी होगी...और थोडा बहुत उधड़े रहना बुरा भी नहीं क्योंकि वक्त के उस्तरे की धार तेज़ कर
उम्मीद का ऊन निकलना तभी तक जारी रहता है जबतक उम्मीदें पूरी नहीं होती..शुभकामनाये

asha kumar kundra का कहना है कि -

achee hai jari rakhe

Anil kumar Singh का कहना है कि -

Nice

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