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Tuesday, May 31, 2011

गोपी ढाबे वाला और दुखों के बर्फ तक हमारा पहुँचना


काव्यसदी की दूसरी कड़ी में आप सुरेश सेन निशांत की कविताएँ पढ़ रहे हैं। आज हम इनकी तीन नई कविताएँ लेकर उपस्थित हैं। सुरेश सेन की कविताओं के विन्यास में पहाड़ी सुख-दुख अपनी संपूर्ण वास्तविकता के साथ मौज़ूद है। इनकी कविताओं की खिड़की से कूदकर कब हम उस पहाड़ी जीवन में शामिल हो जाते हैं, हमें पता भी नहीं चलता।

गोपी ढाबे वाला

बहुत दिनों बाद हुआ आना
इस पुराने शहर में
वहीं रुकता हूँ
वहीं खाता हूँ खाना
उसी बरसों पुरानी मेज पर
उस पुराने से ढाबे में।

कुछ भी नहीं बदला है
नहीं बदली है गोपी ढाबे वाले की
वह पुरानी-सी कमीज
काँधें पे पुराना गमछा
बातचीत का उसका अंदाज।

वैसा ही था
तड़के वाली दाल का भी स्वाद
तंदुरी रोटी की महक।

कुछ भी नहीं बदला
यहाँ तक की ग्राहकों की शक्लें
उनकी बोल-चाल का ढंग
ढाबे के बाहर खड़े सुस्ता रहे
खाली रिक्शों की उदासी तक।

उस कोने वाली मेज पर
वैसे ही बैठा खा रहा है खाना
चुपचाप एक लड़का
कुछ सोचता हुआ-सा, चिन्तित
शायद वह भी ढूँढ़ रहा है ट्यूशन
या कोई पार्ट टाईम जॉब
शायद करना है जुगाड़
अभी उसे कमरे के किराया का।

सोच-सोच कर कुम्हला रहा है उसका मन
कि कर भी पाएगा पढ़ाई पूरी
या धकेल देगा वापिस यह शहर
उन पथरीले पहाड़ों पर
जहाँ उगती है ढेर सारी मुसीबतें-ही-मुसीबतें
जहाँ दीमक लगे जर्जर पुलों को
ईश्वर के सहारे लाँघना पड़ता है हर रोज।

जहाँ जरा-सा बीमार होने का मतलब है
जिन्दगी के दरवाजे पर
मौत की दस्तक।

हैरान हूँ और खुश भी
दस वर्षों के बाद भी
नहीं भूला है गोपी
अपने ग्राहकों की शक्लें
पूछता रहा आत्मीयता से
घर-परिवार की सुख शान्ति।

इस बीच बहुत कुछ बदल गया
इस शहर में
बड़े-बड़े माल सेन्टरों ने
दाब लिया है
बड़े-बड़े लोगों का व्यापार
बड़ी-बड़ी अमीर कंपनियाँ
समा गई हैं बड़ी विदेशी
कंपनियों के पेट में।

नाम-निशान तक नहीं रहा
कई नामचीन लोगों का।

पुराने दोस्त इस तरह मिले
इतना भर दिया वक्त
जैसे पूछ रहा हो कोई अजनबी उनसे
अपने गंतव्य का पता।

निरन्तर विकसित हो रहे इस शहर में
उस गोपी ढाबे वाले की आत्मीयता ने
बचाए रखी मेरे सामने मेरी ही लाज।

सभी पुराने दोस्तों के बारे में भी
पूछता रहा बार-बार।

खास हिदायत देकर कहा उसने
रोटी बाँटने वाले लड़के को
बाबू जी खाना खाते हुए
पानी में नींबू लेते हैं जरूर।

मैं हैरान था और खुश भी
कि इस तरह की बातें तो
माँएँ ही रखती हैं याद
अपने बेटों के बारे में।

क्या इतना गहरे बैठे हुए थे
उसके अंतस में हम।

खाने के बाद गोपी ढाबे वाले ने
मुझसे पैसे नहीं लिये रोटी के
मेरे लाख अनुनय के बावजूद।

मैं इस तरह निकला वहाँ से
आँखें पोंछता हुआ
जैसे माँ की रसोई से निकला होऊँ
बरसों बाद खाना खा कर।


पहुँचना

मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे दिन भर
काम पे गयी
थकी माँ पहुँचती है
अपने नन्हे बच्चे के पास।

सबसे कीमती पल होते हैं
इस धरती के वे
उसी तरह के
किसी कीमती पल-सा
पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास।

मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे बरसों बंजर पड़ी
धरती के पास पहुँचते हैं
हलवाहे के पाँव
बैलों के खुर
और पोटली में रखे बीज
धरती की खुशियों में उतरते हुए
मैं पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास।

मैं चाहता हूँ
बारिश के इस जल सा
धरती की नसों में चलते-चलते
पेड़ों की हरी पत्तियों तक पहुँचूँ
फलों की मुस्कुराहट में उतरूँ
उनकी मीठास बन
तुम्हारे ओंठों तक पहुँचना चाहता हूँ

अँधेरे घर में
ढिबरी में पड़े तेल सा
जलते हुए
तुम्हारे साथ-साथ
अँधेरे से उजाले तक का
सफर तय करना चाहता हूँ।

निराशा भरे इस समय में
मैं तुम्हारे पास
संतों के प्रवचनों-सा नहीं
विज्ञापनों में फैली
व्यापारियों की चिकनी भाषा-सा नहीं
मैं कविता की गोद में बैठी
किसी सरल आत्मीय पंक्ति-सा
पहुँचना चाहता हूँ।

मैं चाहता हूँ
मैं पहुँचूँ तुम्हारे पास
जैसे कर्जे में फँसे
बूढ़े किसान पिता के पास
दूर कमाने गये
बेटे का मनीऑर्डर पहुँचता है।

आँखों में खुशी के आँसू छलकता
एक उम्मीद-सा
मैं पहुँचना चाहता हूँ
तुम्हारे पास
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारी आँखों में।

दुखों भरी बर्फ

दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
तो खिलेंगे फूल-ही-फूल
इन पतझरी वृक्षों पर।
इन घासनियों में
उग आएगी नर्म हरी घास खूब
हम खुशी-खुशी घूमेंगे
इन घाटियों में अपने मवेशियों संग
मन पसंद गीत गुनगुनाते हुए।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
दोस्त बिना बुलाए ही
आ जाएँगे हमारे घर
अचानक आ मिली खुशी की तरह
आ बैठेंगे हमारी देहरी पर
गुनगुनी धूप-सा मुस्कराते हुए।
हवा में भीनी गंध
अपने पंखों पे लादे
आ बैठेगी बसंत की चिड़िया
हमारे आँगन में
चहल कदमी करता
दूर से देखेगा हमें
हमारा छोटा-सा शर्मिला सुख।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
हमारी जंग लगी दरातियों के चेहरों पर
आ जाएगी अनोखी उत्साह से भरी चमक
खेतों के चेहरे खिल उठेंगे
धूप हमारी आगवानी में
निखर-निखर जाएगी
हम मधुमक्खियों की तरह गुनगुनाते हुए
निकलेंगे अपने काम पर
नहीं फिसलेंगे
उस फिसलन भरी पगडंडी पर
किसी मवेशी के पाँव
नहीं मरेगी किसी की दुधारू गाय
नहीं बिकेगा कभी किसी का कोई खेत।
दुख भरी बर्फ का रंग
पहाड़ों पर गिरी इस मासूम बर्फ-सा
सफेद नहीं होता।
वह बादलों से नन्हें कणों के रूप में
नहीं झरती हमारे खेतों, घरों और देह पर
वह गिरती है कीच बनकर
धसकते पहाड़ों पर से
वह गिरती है शराब का रूप धर
पिता के जिस्म पर
माँ के कलेजे पर
हमारे भविष्य पर।
बदसलूकी की तरह गिरती है
जंगल में लकड़ियाँ लाने गई
बहिन की जिंदगी पर।
दुखों भरी बर्फ रोक देती है
स्कूल जाते बच्चों के रास्ते
उनके ककहरों के रंगों को
कर देती है धुंधला
छीन लेती है उनके भविष्य के चेहरों से
मासूम चमक
उनके हथेलियों को
बना देती है खुरदरा
भर देती है जख्मों से
उनके नन्हें कोमल पाँव।
दुखों भरी बर्फ पर
सूरज की तपिश का
नहीं होता कोई असर
अपने आप नहीं पिघलती।
वह पिघलती है
बुलंद हौंसलों से
विचारों की तपिश से
हमारे लड़ने के अंदाज से।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
तो खिलेंगे फूल-ही-फूल
इन पतझरी वृक्षों पर।

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4 कविताप्रेमियों का कहना है :

देवेन्द्र पाण्डेय का कहना है कि -

तीनो कविताएं बेहतरीन हैं।

गोपी ढाबे वाला की पंक्तियाँ...

मैं हैरान था और खुश भी
कि इस तरह की बातें तो
माँएँ ही रखती हैं याद
अपने बेटों के बारे में।

पहुंचना की ये पंक्तियाँ...

मैं चाहता हूँ
मैं पहुँचूँ तुम्हारे पास
जैसे कर्जे में फँसे
बूढ़े किसान पिता के पास
दूर कमाने गये
बेटे का मनीऑर्डर पहुँचता है।

....जहां रूला देती हैं वहीं दुखभरी बर्फ की ये पंक्तियाँ मन में नई उर्जा भर देती है...

दुख भरी बर्फ...

वह पिघलती है
बुलंद हौंसलों से
विचारों की तपिश से
हमारे लड़ने के अंदाज से।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
तो खिलेंगे फूल-ही-फूल
इन पतझरी वृक्षों पर।
.....इन्हें पढ़ाने के लिए आभार।

चैन सिंह शेखावत का कहना है कि -

मैं चाहता हूँ
मैं पहुँचूँ तुम्हारे पास
जैसे कर्जे में फँसे
बूढ़े किसान पिता के पास
दूर कमाने गये
बेटे का मनीऑर्डर पहुँचता है।

kya shaandar bhaav h...
ek se badhkar ek bimb ukere h..
badhai..

अनंत आलोक का कहना है कि -

"नहीं बदला उसका बात चीत का अंदाज ...वाही दाल की महक ,वाही तंदूरी "....वाह क्या! जिंदगी की हकीकत |

Trần Bá Đạt _CTPG_ का कहना है कि -

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