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Saturday, May 28, 2011

रंग की हों पपड़ियाँ उचली किसी दीवार से



शामिख फ़राज का नाम हमारे नियमित पाठकों के लिये नया नही है। कुछ वक्त पहले तक शामिख मंच के खूब सक्रिय कवि और पाठकों मे से रहे हैं। इधर कुछ समय से उनकी रचनाओं का क्रम कुछ अनियमित हुआ है। इससे पहले उनकी एक कविता गत वर्ष जनवरी माह मे आयी थी। इस अप्रैल माह की प्रतियोगिता मे उनकी प्रस्तुत रचना ने छठा स्थान हासिल किया है।

अब क्योंकि हाथ ख़ाली
 लौटा हूँ बाज़ार से,
हाथ ही सर पे
फिरा दूंगा मैं उसके प्यार से,
ज़िन्दगी लगती है यूँ
जो दोस्तों से दूर हूँ,
रंग की हों पपड़ियाँ
उचली किसी दीवार से,
आना जाना उसका
अब भगवानों के घर पे नहीं,
लौटा होगा ख़ाली जो
भगवानों के वो द्वार से,
चीख भूखे फिर किसी बच्चे की
मुझको ही क्यों
है सुनाई देती
उस पाजेब की झंकार से,
लोग सब अपने घरों को
लौट जाते हैं फ़राज़
तू परेशां से दिखे
खुद में हुई तकरार से।
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पुरस्कार:हिंद-युग्म की ओर से पुस्तक।


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2 कविताप्रेमियों का कहना है :

ज्योति सिंह का कहना है कि -

अब क्योंकि हाथ ख़ाली
लौटा हूँ बाज़ार से,
हाथ ही सर पे
फिरा दूंगा मैं उसके प्यार से,
bahut sundar ,isme hi rahat hai

अनंत आलोक का कहना है कि -

बहुत सुंदर रचना |खाली हाथ लोटा हूँ तो उसके सर पर आशीर्वाद का हाथ तो फिर ही सकता हूँ |

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