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Saturday, January 29, 2011

आज फिर विश्वास तुमने दृढ़ किया है



  प्रतियोगिता मे छठे स्थान पर रहे गीत के रचनाकार डॉ नागेश पांडेय ’संजय’ हैं। हिंद-युग्म से संजय जी का जुड़ाव नया है और उनकी पहली कविता ही शीर्ष दस मे अपना स्थान बनाने मे सफल रही है। डा. नागेश पांडेय 'संजय' एक बाल-साहित्यकार, बाल-साहित्य समीक्षक एवं कवि हैं। जन्म ०२ जुलाई १९७४ को  खुटार, शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) मे हुआ। माता श्रीमती निर्मला पांडेय एवं पिता श्री बाबूराम पांडेय हैं। नागेश जी की शिक्षा एम्. ए. (हिंदी, संस्कृत), एम्. काम., एम्. एड. और पी. एच. डी. (विषय : बाल साहित्य के समीक्षा सिद्धांत) तक रही और वो हिंदी शिक्षाशास्त्र मे स्लेट उपाधिधारक भी हैं। नागेश जी १९८६ से बाल साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। बाल साहित्य के अतिरिक्त बड़ों के लिए भी गीत एवं कविताओं का सृजन किया है। प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं में बच्चों के लिए कहानी, कविता, एकांकी, पहेलियाँ और यात्रावृत्त प्रकाशित हुए हैं। कई रचनाओं के तमाम भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं और इनकी रचनाएँ दूरदर्शन तथा आकाशवाणी के नई दिल्ली, लखनऊ, रामपुर केन्द्रों से प्रसारित होती रही हैं। बालसाहित्य, कविता और आलोचना विषयक कई किताबें प्रकाशित हैं। सम्प्रति बी. एड. राजेंद्र प्रसाद पी. जी. कालेज, मीरगंज, बरेली मे प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष हैं।
संपर्क: सुभाष नगर , निकट रेलवे कालोनी , शाहजहांपुर - २४२००१ (उ.प्र.)
   प्रस्तुत गीत हिंदी की श्रंगार-विषयक गीतकाव्य की समृद्ध और लोकप्रिय परंपरा की कड़ी है और अपनी मधुरता और कोमल भावसिक्तता से सहज ही आकर्षित करता है।

पुरस्कृत कविता: आज फिर विश्वास तुमने दृढ़ किया है

आज फिर विश्वास तुमने दृढ़ किया है।
आज संशय ने हृदय की देहरी पर
बैठकर मुस्कान कुछ ऐसी बिखेरी,
अकंपित लौ नेह की कुछ कँपकपाई
यों लगा जो लड़खड़ाई साध मेरी।
किंतु तुमने भ्रमित मन के कटघरे में
कौंधते हर प्रश्न का उत्तर दिया है।

ठीक समझीं तुम, कि मैं डरता बहुत हूँ,
क्या करूँ, है चोट खाई बहारों से।
सूर्य से उपहार में मुझको मिला तम,
इसलिए भयभीत रहता हूँ सितारों से।
वर्तिका-सी ही सही, पर जलीं तो तुम
और उर में ज्योति-सागर भर दिया है।

कामनाओं की चदरिया फट न जाए,
इसलिए था रख दिया उसको तहाकर।
ओढ़ने को था तुम्हारा नाम काफी
फिर रहा था उसे सीने से लगाकर।
किंतु कोरे पत्र पर हस्ताक्षर कर,
मुझे तो तुमने अनोखा वर दिया है।

मुझे तुमसे चाहिए कुछ भी नहीं, सच !
खुश रहो तुम सर्वदा, यह कामना है।
हाँ, कभी गिरने लगूँ यदि नेह-पथ से
तो हमारा हाथ तुमको थामना है।
और साथी! मैं गिरूँगा भी नहीं अब,
यह हुनर मुझमें तुम्हीं ने भर दिया है।
आज फिर विश्वास तुमने दृढ़ किया है॥
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पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।


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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

प्रवीण पाण्डेय का कहना है कि -

सबका यही दृढ़ निश्चय बना रहे।

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ का कहना है कि -

सुंदर गीत, बधाई

रंजना का कहना है कि -

गीत के भाव माधुर्य, शब्द चयन और प्रवाहमयता ने तो ह्रदय ही हर लिया है...

प्रशंसा को यथोचित शब्द कहाँ से लाऊं,समझ नहीं पा रही...

कृतिकार में जितनी भाव संप्रेषणता है उतनी ही मंजी हुई सिद्ध लेखनी भी है इनकी.....

Navin C. Chaturvedi का कहना है कि -

भाव प्रवण, स-रस गीत| बधाई|

सदा का कहना है कि -

मुझे तुमसे चाहिए कुछ भी नहीं, सच !
खुश रहो तुम सर्वदा, यह कामना है।

बहुत ही सुन्‍दर भावमय करते शब्‍द ।

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