फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

गज़ल: मेरी आंखों मे जरा इंक़लाब रहने दे



किसी जगह के लिए इंतख़ाब रहने दे
मैं एक सवाल हूँ मेरा जवाब रहने दे।


मैं जानता हूँ तू लिबास पसंद है लेकिन
मैं बेनक़ाब सही, बेनक़ाब रहने दे।


मैं बाग़ी नहीं पर उसके समझने के लिए
मेरी आंखों मे जरा इंक़लाब रहने दे।


तमाम उम्र गुनहगार जिया हूँ या रब
मेरे हक़ में मगर एक सवाब रहने दे।


तमाम शहर मेरे ख़्वाब तले सोया है
मत बेदार कर, तू ज़ेर-ए-ख़्वाब रहने दे।



रचनाकार: वसीम अकरम (नवंबर माह के यूनिकवि)

लोकतंत्र में लोक



प्रतियोगिता की दूसरी कविता वसीम अकरम की है। यूनिप्रतियोगिता के नियमित प्रतिभागी वसीम की कविताओं के केंद्र मे सामाजिक और आर्थिक विसंगतियाँ होती हैं, रूढियों और अन्याय के प्रतिरोध का स्वर हो्ता है और सामाजिक परिवर्तन का आह्वान भी होता है। नवंबर माह के यूनिकवि रह चुके वसीम अकरम की एक ग़ज़ल पिछले माह भी शीर्ष दस मे रही थी।

पुरस्कृत कविता: लोकतंत्र में लोक

तुम अनाज उगाओगे
तुम्हे रोटी नहीं मिलेगी,
तुम ईंट पत्थर जोड़ोगे
तुम्हें सड़क पर सोना होगा,
तुम कपड़े बुनोगे
और तुम नंगे रहोगे,
क्योंकि अब लोकतंत्र
अपनी परिभाषा बदल चुका है
लोकतंत्र में अब लोक
एक कोरी अवधारणा मात्र है,
सत्ता तुम्हारे नहीं
पूंजी के हाथ में है
और पूंजी
नीराओं, राजाओं
कलमाडियों और टाटाओं के हाथ में है,
तुम्हारी ज़बान, तुम्हारी मेहनत
तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारा अधिकार
सिर्फ संवैधानिक कागजों में है
हकीकत में नहीं,
तभी तो
तुम्हारी चंद रुपये की चोरी
तुम्हें जेल पहुंचा देती है
मगर
उनकी अरबों की हेराफेरी
महज एक
राजनितिक खेल बनकर रह जाती है।
____________________________________
पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

तू दर्दे-दिल को आईना बना लेती तो अच्छा था



प्रतियोगिता की आठवीं रचना भी एक ग़ज़ल है। रचनाकार वसीम अकरम नवंबर माह के यूनिकवि रह चुके हैं।

पुरस्कृत रचना: गज़ल

तू दर्दे-दिल को आईना  बना लेती  तो  अच्छा था
मोहब्बत की कशिश दिल में सजा लेती तो अच्छा था

बचाने के लिए तुम खुद को आवारा-निगाही से
निगाहे-नाज को खंजर बना लेती तो अच्छा था

तेरी पलकों के गोशे में कोई आंसू जो बख्शे तो
उसे तू खून का दरिया बना लेती तो अच्छा था

सुकूं मिलता जवानी की तलातुम-खेज मौजों को
किसी का ख्वाब आंखों में बसा लेती तो अच्छा था

ये चाहत है तेरी मरजी, मुझे  चाहे न चाहे तू
हां, मुझको देखकर तू मुस्कुरा देती तो अच्छा था

तुम्हारा हुस्ने-बेपर्दा  कयामत-खेज है कितना
किसी के इश्क को पर्दा बना लेती तो अच्छा था

तेरी निगहे-करम के तो दिवाने हैं सभी लेकिन
झुका पलकें किसी का दिल चुरा लेती तो अच्छा था

किसी के इश्क में आंखों से जो बरसात होती है
उसी बरसात में तू भी नहा लेती तो अच्छा था

तेरे जाने की आहट से किसी की जां निकलती है
खुदारा तू किसी की जां बचा लेती तो अच्छा था.
________________________________________________________
पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

जरूरी संवादों के संग नवंबर यूनिप्रतियोगिता के परिणाम


   संक्रामक गति से से बढते बाजारीकरण के बीच जहाँ कि हमारे जीवन की मूलभूत चीजें भी उत्पादों मे तब्दील होती जा रही हों और आर्थिक ताकतें हमारे विचारों पर भी कब्जा जमाती जा रही हों, वहाँ साहित्य बाजारवाद के इन बढ़ते खतरों से परे नही है। पठनीयता के क्षरण के इस दौर मे जबकि सार्थक लेखन हाशिये पर धकेला जा रहा है, शब्दों का अपने अस्तित्व के प्रति संघर्ष और ज्यादा अहम होता जा रहा है। साहित्य की तमाम विधाओं के संग कविता भी बाजारी-अतिक्रमण के इसी संकट से जूझ रही है। नितदिन बढ़ती चुनौतियों के बीच तमाम गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं का कोमा मे पहुँचते जाना, समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं मे कविता के सिकुड़ते कॉलम, कविता-संग्रहों के संस्करणों के घटते प्रकाशन और साहित्यिक मंचों पर लोकप्रिय कविताओं का जमीनी सरोकारों से परे होते जाना कविता के इसी संक्रमण-काल के संकेत हैं।
    घटती पठनीयता के इस दौर मे इंटरनेट संचार और संवाद के सबसे त्वरित और ग्लोबल माध्यम के रूप मे उभरा है। हिंद-युग्म पर हमारा प्रयास इंटरनेट की इसी ताकत का सहारा लेते हुए सामयिक साहित्य को आम पाठक से जोड़े रखने का रहा है। हमारी मासिक यूनिप्रतियोगिता इसी की एक कड़ी है जिसकी लोकप्रियता ही इसकी सफ़लता का सबूत है। प्रतियोगिता को हर माह तमाम प्रतिभागियों और पाठकों से मिलता समर्थन हमारे लिये अत्यधिक उत्साह की बात है। यह इंटरनेट के वैश्विक पाठक वर्ग के बीच हिंदी के प्रचार के हमारे प्रयासों के सफ़लता ही है कि हिंद-युग्म के कविता पृष्ठ को प्रतिदिन एक हजार से कहीं अधिक हिट्स मिलते हैं।  मगर इंटरनेट पर सार्थक पठनीयता की मशाल जलाये रखने के लिये और वर्तमान कविता के अपने समय के साथ आम आदमी और उसके सरोकारों से जुड़े रहने के इन प्रया्सों के लिये हमारे पाठकों का समर्थन और सक्रिय मार्गदर्शन सबसे जरूरी शर्त है।

   इस बार यूनिप्रतियोगिता के नवंबर-2010 संस्करण के परिणाम ले कर हम उपस्थित हैं। परिणामों पर जाने से पहले हम सभी प्रतिभागियों और सारे पाठकों का आभार प्रकट करना चाहेंगे जिनके निरंतर समर्थन और मार्गदर्शन से यूनिप्रतियोगिता अपने 47 संस्करण निर्बाध पूरे कर सकी है। नवंबर माह मे कुल 41 कवियों ने भाग लिया। पिछले माहों की तरह इस बार भी अंक-निर्धारण दो चरणों मे किया गया। इस बार कविताओं की कुल संख्या भले ही पिछले महीनों से कुछ कम रही हो, मगर एक साथ कई समान रूप से अच्छी कविताएँ आने से निर्णायकों का काम कुछ मुश्किल रहा और कविताओं के बीच अंकों का अंतर भी कम रहा। पहले चरण के 3 निर्णायकों के दिये अंकों के आधार पर कुल 21 कविताएं दूसरे चरण मे गयीं। दूसरे चरण मे दो निर्णायकों ने उन कविताओं को उनके शिल्प, विषय की सामयिकता, कथ्य की नवीनता और स्रजनशीलता जैसे मानकों पर आँक कर उन्हे अंक दिये। इस तरह अंतिम वरीयता के आधार पर कुल 14 कविताएं हिंद-युग्म पर प्रकाशन के लिये छाँटी गयीं। नवंबर माह के यूनिकवि का सम्मान वसीम अकरम को मिला जिनकी कविता ’संवाद जरूरी है’ इस माह की यूनिकविता बनी है।

यूनिकवि: वसीम अकरम

   वैसे हिंद-युग्म के नियमित पाठकों के लिये वसीम अकरम कोई नया नाम नही हैं। इससे पहले इनकी दो कविताएं हिंद-युग्म पर प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी पहली कविता ’खाप सरपंच’ मई माह मे चौथे स्थान पर रही थी, फिर जून माह मे इनकी कविता ’दहशतगर्दी’ भी बारहवें स्थान पर प्रकाशित हुई थी। वसीम अकरम का जन्म उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद मे हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साहित्यिक अंग्रेजी मे स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल करने वाले वसीम बचपन से ही पठन-पाठन मे सक्रिय रहे हैं। इन्होने गज़ल, कविता, लेख, कहानी आदि कई विधाओं मे हाथ आजमाया है और इनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित भी होती रही हैं। इनकी रुचि लेखन के अलावा गायन मे भी रही है और इनके शब्दों और सुरों से सजा हुआ एक एलबम ’नैना मिला के’ भी रिलीज हो चुका है और एक अन्य एल्बम पर काम चल रहा है। अभी दिल्ली मे स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से कार्य कर रहे हैं और मयूर विहार, दिल्ली मे निवास कर रहे हैं। इनके लेख तमाम समाचार पत्रों मे आते रहते हैं।
वसीम अकरम की ज्यादातर कविताएं हमारे बीच मौजूद सामयिक समस्याओं को अपना विषय बनाती हैं और सामाजिक विसंगतियों के मुकाबिल अपनी आवाज बुलंद करती हैं। प्रस्तुत कविता भी शोषण के खिलाफ़ वंचितों के संघर्ष के इसी स्वर को परवाज देते हुए हमारे समय के सबसे जरूरी प्रश्नों को टालने की बजाय उनका सामना करने की जरूरत पर बल देती है।
संपर्क: 9899170273


यूनिकविता: संवाद ज़रूरी है

संवाद ज़रूरी है
सुबह, शाम और रात के उन लम्हों से
जो ख़ूबसूरत होते हुए भी
कुछ के लिए
किसी भयानक टीस की तरह हैं।

संवाद ज़रूरी है
उन मुट्ठियों से
जो हक़ के लिए तनने से पहले ही
डर जाती हैं कि कहीं
पूरा हाथ ही न काट दिया जाये।

स्ंवाद ज़रूरी है
उस घर से
जिस घर में युवराज के
छद्म कदम तो पड़ते हैं
मगर रोटी के चंद टुकड़ों के
लड़खड़ाते क़दम भी नहीं पड़ते।

स्ंवाद ज़रूरी है
उस पैसे से
जो अनाज के दानों पर लिखे
ग़रीब, मज़दूर के नामों को काट कर
उस पर अमीरों का नाम लिख देता है।

संवाद ज़रूरी है
उन आर्थिक नीतियों से

जो देश को महाशक्ति तो बनाती हैं
मगर भूखों के पेट में
दो दाने भी नहीं उड़ेल पातीं।

संवाद ज़रूरी है
धर्म के उन ठेकेदारों से
जो ईंट, पत्थर से बनी बेजान इमारतों के लिए
इंसान को इंसान के ख़ून का
प्यासा बना देते हैं।

स्ंवाद ज़रूरी है
उस आधी दुनिया से
जिसका दामन हक़ से खाली है,
और जो बाजारवाद की बलिबेदी पर
मजबूर है चढ़ने के लिए।

संवाद ज़रूरी है
उन ग़रीब के बच्चों से
जिनकी आंखों में
आसमां छूने का ख़्वाब तो है
मगर जूठे बरतन धोने के सिवा
कोई पंख नहीं है उनके पास।

संवाद ज़रूरी है
हर उस शय से
जिसकी ज़द में आकर
तहज़ीब, रवायत और इंसानियत
सब अपना वजूद खो रहे हैं।
______________________________________________________________
पुरस्कार और सम्मान-   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

  इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों को समयांतर पत्रिका की वार्षिक सदस्यता देंगे तथा उनकी कविता यहाँ प्रकाशित की जायेगी उनके क्रमशः नाम हैं

डॉ॰ सुरेश तिवारी
शाहिद मिर्जा शाहिद
उमेश पंत
संगीता सेठी
नवीन चतुर्वेदी
आलोक उपाध्याय
स्वप्निल तिवारी 'आतिश'
धर्मेंद्र कुमार सिंह
आलोक तिवारी

हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त अन्य भी कई कविताएं प्रकाशित करते हैं। इस बार जिन चार अन्य कवियों की कविता प्रकाशित करेंगे उनके नाम हैं-

सुधांशु शेखर पांडेय ’प्रफ़ुल्ल’
रंजना डीन
अनिल जिंगर ’फ़राग’
आशीष पंत

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 31 दिसंबर 2010 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

  हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। प्रतियोगिता मे भाग लेने वाले शेष कवियों के नाम निम्नांकित हैं

प्रशांत श्रीवास्तव
रानी विशाल
नीलेश माथुर
आकुल
नरेंद्र कुमार तोमर
देवेश पांडे
स्नेह सोनकर पीयुष
अशोक शर्मा
पूज़ा तोमर
नूरैन अंसारी
सनी कुमार
डॉ श्याम गुप्ता
बोधिसत्व कस्तुरिया
अश्विनी राय
विमला किशोर
धर्मेंद्र मन्नू
शीलक राम जांगड़
मिहिर रंजन पात्र
मयंक सिंह सचान
राकेश पुरी
डॉ राजीव श्रीवास्तव
इस्मत जैदी ’शेफ़ा’
शोभा रस्तोगी
डॉ अनिल चड्डा
योगेश कुमार ध्यानी
ऋषभ मिश्रा
रवि शंकर पांडे

नोट- जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं कि यूनिपाठक/यूनिपाठिका का सम्मान हम वार्षिक पाठक सम्मान के तौर पर सुरक्षित रख रहे हैं। वार्षिक सम्मानों की घोषणा वर्ष के अंत में की जायेगी और हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव 2010 में उन्हें सम्मानित किया जायेगा।

दहशतगर्दी


प्रतियोगिता की बारहवीं कविता वसीम अकरम की है। पाठक वसीम अकरम से परिचित हो चुके हैं। पिछले महीने इनकी एक कविता
'खाप सरपंच' को पाठकों ने खूब पसंद किया था।

पुरस्कृत कविता: दहशतगर्दी

अभी तो शहर को पूरी तरह से शहर होना था
अभी तो रौनक़े-बाज़ार मुग्रो-सहर होना था

अभी तो धूप की तासीर का आगाज़ होना था
अभी तो रुख़ हवा का और बेअंदाज़ होना था

अभी तो शाम के सारे मनाजिर रक्स करने थे
अभी तो माहो-अख़्तर के दिलों में रंग भरने थे

अभी तो बुलबुलों के परों का परवाज़ बाक़ी था
अभी तो शहरे-मौसिक़ी का हसीं साज़ बाक़ी था

अभी तो वक्त के सारे तकाज़े आने थे बाक़ी
अभी तो लम्हों-लम्हों के जनाज़े आने थे बाक़ी

के तुमने ख़ुश हवा में ज़हर बमों का मिला डाला
ये गलियों में मिला डाला,वो कूचों में मिला डाला

लगाकर मौत का सामान ख़ुद परवाज़ कर बैठे
बहाकर ख़ून इंसां का ख़ुदी पर नाज़ कर बैठै

न तुमने ये कभी सोचा कि ख़ूं इंसान का होगा
न तो हिंदू का ख़ूं होगा न मुसलमान का होगा

बिछाकर मज़हबी शतरंज चाल दहशत की चलते हो
जेहादी नाम से इंसानियत का सर कुचलते हो

मासूमियत का तुम जो क़त्लेआम करते हो
ख़ुदा वाले ख़ुदा की ज़ात को बदनाम करते हो

ख़ून मज़लूम का हो ये मेरा ईमां नहीं कहता
करो तुम दीन को रुसवा कोई कुर्‌आँ नहीं कहता

इस जेहाद से रब की मुहब्बत मिल नहीं सकती
बहाकर ख़ून इंसां का वो जन्नत मिल नहीं सकती

खाप सरपंच


यूनिप्रतियोगिता की चौथे स्थान की कविता के द्वारा एक नये कवि हिंद-युग्म के मंच से जुड़ रहे हैं। कविता के रचनाकार वसीम अकरम की हिंद-युग्म पर यह पहली कविता है। उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद से तअल्लुक रखने वाले वसीम वर्तमान मे दिल्ली मे स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर रहे हैं। वसीम को कविता लिखने का शौक 15 वर्ष की आयु से ही है और इन्होने गज़ल, कविता, नज़्म जैसी तमाम विधाओं मे हाथ अजमाया है। इनकी कई कविताएं, ग़ज़लें और लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित हो चुके हैं।

प्रस्तुत सामयिक कविता हमारे समय के एक ज्वलंत विषय को उठाते हुए खाप पंचायत के पहरुओं से कुछ तीखे सवाल करती है।

पुरस्कृत कविता: खाप सरपंच

कानून और संविधान को
ठेंगे पर रखकर
फैसला सुनाते हो तुम
मानो किसी की जिंदगी 
तुम्हारे ही हाथ में हो जैसे।

नये हो तुम
मगर तुम्हारे लिबास
बर्बर परंपराओं के 
रूढ़ धागों से बने हैं,
तुम इन्हें नहीं उतारते
कहीं तुम आदमी न बन जाओ
तुम इन्हें नहीं फेंकते
कहीं तुम आधुनिक न हो जाओ
वो इसलिए कि फिर
पुरातनपंथी और रुढ़ियों की
बंजर हो रही तुम्हारी दुकान
कौन चलायेगा तुम्हारे बाद।

सगोत्र विवाह की सज़ा के नाम पर
उस लड़की के साथ
सामूहिक बलात्कार करते हो तुम
और ये भूल जाते हो
कि वो तुम्हारे ही गांव की
तुम्हारे ही गोत्र की 
तुम्हारी ही बहन है।

यह कैसी ठेकेदारी है
परंपरा की और धर्म की 
जहां किसी ग़लती की सज़ा 
सामूहिक बलात्कार के बाद 
सरे आम मौत है। 
______________________________________________
पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।