अपने पाठकों को हम प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता की ओर लिये चलते हैं जिसके रचनाकार सुरेंद्र अग्निहोत्री हैं। सुरेंद्र अग्निहोत्री पिछले काफ़ी समय से हिंद-युग्म से जुड़े हैं और इनकी कविताएं पहले भी यहाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी पिछली कविता गतवर्ष मई माह मे आठवें स्थान पर रही थी।
पुरस्कृत कविता: विकास का तंत्र
पूरे दिन भर
इतने सारे संघर्ष
जिनकी एक झलक
एक नयी सुनामी की तरह
पूरी सुनहरी बालू
कोयले और लोहे पर नजर
अपने कब्जे में लेना चाहते
सिर्फ कौड़ियों के दाम में
हड़पने के लिए विकास का तंत्र
सब पर आक्रमण
अब उनको हटाने के सिवाय
ढकेलना और वंचित करना
बदलाव की इस सोच पर
हर क्षेत्र मे बयार बह रही है
मौका गॅवा दिया तो,
फिर क्या होगा?
भूमि पर, नदी पर, पेड़ पर
निरंतर क्रांति का सपना पल रहा
हर कोई आत्मसुरक्षा के लिये
मुठ्ठी ताने खड़ा है पूँजीवाद की शैतानी प्रवृति पर
संघर्ष के लिए डटा है
संघर्ष जीतना इतना आसान नही है
वे जमीन पर कब्जा चाहते है
उन्होंने हम सभी को
विकास विरोधी लोग बता दिया है
हमारी शांति मे फैलाना चाहते
अशान्ति का अंतहीन सिलसिला
जिससे फैल जाये भयावहता
राजनैतिक जवाब नहीं देना चाहते
एक आत्महत्या कर रहा गाँव में
एक संघर्ष मे गोली खा रहा पाँव में
कोई नही जानना चाहता है उनके दुख दर्द
जिनके लिऐ बेचारे संघर्ष करते रहे हमदर्द
लोहे से लोहा काटने की नीति
किसी ने पायी हार, किसी ने जीती
अपनों से ही छले जा रहे हम
न खुशी रही अपनी न रहे गम!







