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Thursday, August 12, 2010

तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है


जुलाई माह की सातवीं कविता एक ग़ज़ल है। इसके रचयिता स्वप्निल तिवारी आतिश की ग़ज़लें लम्बे समय से हिन्द-युग्म पर प्रकाशित होती रही हैं।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

वो इक कागज़ के टुकड़े को सफीना* मान लेता है
फ़क़त हँसने-हँसाने को वो जीना मान लेता है

हवस इंसान के सर चढ़ के जिस पल बोलती है तब
वो इक बीमार कुतिया को हसीना मान लेता है

मई ओ जून में हम सब दुआएँ माँगते हैं जो
उन्हें झट से दिसम्बर का महीना मान लेता है

अगर दिल के ग़मों को मुहज़बानी ना बताये माँ
तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है

पढ़े गुलज़ार को कोई, उन्हीं पे जान देता है
वो उनके गाँव "दीना" को मदीना मान लेता है

फ़क़त इक आँच ही तारीफ कुछ उसकी अगर कर दे
तो आतिश खुद को इक महँगा नगीना मान लेता है

(सफीना- नाव)

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

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16 कविताप्रेमियों का कहना है :

Majaal का कहना है कि -

बाकी सब तो अच्छा था आतिश साहब, बस वो कुतिया वाला मिजाज कुछ शायराना नहीं लगा. देखने वाले क़यामत की नज़र रखते है, और सोचने वाले तो कुदरतन खतनाक ही होते है. जरा ख़याल रखिये तो बेहतर.

M VERMA का कहना है कि -

वो इक कागज़ के टुकड़े को सफीना* मान लेता है
क्या कहने
कागज का सफीना हो
हौसले की पतवार
जीजिविषा गर सलामत रहे
तो उतरेंगे उस पार

aanch का कहना है कि -

:)

Avinash Chandra का कहना है कि -

वो इक कागज़ के टुकड़े को सफीना* मान लेता है
फ़क़त हँसने-हँसाने को वो जीना मान लेता है

अगर दिल के ग़मों को मुहज़बानी ना बताये माँ
तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है

पढ़े गुलज़ार को कोई, उन्हीं पे जान देता है
वो उनके गाँव "दीना" को मदीना मान लेता है

आज बहुत मन कर रहा है की आपसे ही कुछ शब्द छीन लूँ.... और कह दूँ, "कतल कतल कतल"
इन तीनो के लिए और कुछ है भी नहीं...

और बिना शक..आप एक बेहद चमकदार और बेशकीमत नगीना तो हैं ही.

निर्मला कपिला का कहना है कि -

अगर दिल के ग़मों को मुहज़बानी ना बताये माँ
तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है
लाजवाब शेर बधाई।

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

उस दिन ये गज़ल सुनाते तो कितना बढ़िया रहता...मंच पर सुनाने लायक बेहतरीन गज़ल है....
मां वाला शेर सचमुच बहुत खूबसूरत है....गज़ल में भाव के साथ बहर मेंटेंन रखने में आप माहिर हैं...कुतिया को हसीना सुनने में चलताऊ लगता है, मगर है बहुत मारक शेर.....तन्हाई को टाटा कर टाइप.....आप अच्छा लिखते हैं...

sada का कहना है कि -

अगर दिल के ग़मों को मुहज़बानी ना बताये माँ
तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है !

बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां दिल को छूते हुये शब्‍द अनुपम प्रस्‍तुति ।

Sadhogopal Ram का कहना है कि -

Bahut hi Umda Ghazal kahi hai.. aapne Swapnil bhai.. aur woh bimar kutia wala sher,., toh bahut hi gajab tha. :)

vandana का कहना है कि -

bahut acchi ghazal hui hai swapnil


अगर दिल के ग़मों को मुहज़बानी ना बताये माँ
तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है

पढ़े गुलज़ार को कोई, उन्हीं पे जान देता है
वो उनके गाँव "दीना" को मदीना मान लेता है

फ़क़त इक आँच ही तारीफ कुछ उसकी अगर कर दे
तो आतिश खुद को इक महँगा नगीना मान लेता है
ye teeno sher lajavaab hain....

parveen kumar snehi का कहना है कि -

अगर दिल के ग़मों को मुहज़बानी ना बताये माँ
तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है
kya baat hai janab..!!!!...
padhkar man me jo bhav aaye samajh me nahi aata.. unhe peeda kahooon.. dard kahoonn.. ya kuchh or...
dil se vah-vah!!! nikli hai.. kabool kijiye.

manu का कहना है कि -

चलताऊ नहीं...
अच्छा शे'र लगा..बीमार कुतिया वाला...
हाँ, ग़ज़ल के अदब और तौर से मेल नहीं खाता..पर अच्छा लगा...
चलता है...

आपके मकते अलग ही होते हैं...उस दिन भी नोट किया था...

manu का कहना है कि -

तन्हाई को टाटा कर..
कुछ तो सैर सपाटा कर...


:)

:)

rachana का कहना है कि -

वो इक कागज़ के टुकड़े को सफीना* मान लेता है
फ़क़त हँसने-हँसाने को वो जीना मान लेता है
अगर दिल के ग़मों को मुहज़बानी ना बताये माँ
तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है
bahut sunder
badhai
rachana

Anonymous का कहना है कि -

श्याम सुन्दर सारस्वत का कहना है कि -

शेर के दोनों मिसरो (पंक्तियों ) में आपस में राब्ता यानी सबंध होना चाहिए .....मगर उस शेर में ऐसा नहीं है ...
मई ओ जून में दुआएं मांगते है जो ... उन्हें झट से दिसंबर मान लेता है....क्या है ये ....

हवस इंसान के सर चढ़ के जिस पल बोलती है तब
वो इक बीमार कुतिया को हसीना मान लेता है
अदब में कुत्ते , कुत्तिया आदी लफ़्ज़ों का इस्तेमाल ठीक नहीं माना जाता है...
इन शायर साहेब से अगर आपका तार्रुफ़ है तो इन्हें समझाए .....
August 26, 2010 5:17 PM







shayd kahin ka kament kahin chhap gaya hai

Anonymous का कहना है कि -

http://kavita.hindyugm.com/2010/03/blog-post_8353.html

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

shyam sundar ji ...:)

jo aapne poocha...ki kya hai wo sirf ...ek rahat ki baat hai ...dhundh lijiye na ho to ..rahat...garmi se ..pyaas se..dhoop se ...

rahi adab kee baat ....to haan adabi mahfilon me ..main ye sher sunane se bachunga...kyunki maine wahaan sannata taari hote hue dekha hai ...

rahi bat aisa kuch likhne ki to wo main likhunga ... kyunki ghazal sirf nazuk ladki nahi hai mere liye ..ye meri har abhivyakti ka madhyam hai ....
baharhaal bahut bahut shuqriyaa aap ka ...

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