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मेरे प्यारे भैया.. राखी का त्यौहार मुबारक तुम्हें


जब भी बाँधी है
तेरी कलाई पे
अपनी दुआओं की तितली मैंने
तुझे हर पल, हर घडी मुश्किल की
साथ पाया भी है मैंने
अबकी फिर से सोचती हूँ
एक तितली दुआओं की
सजा के स्नेह के रंगों से
बाँध दूँ फिर से तेरी कलाई पे
शायद फिर से तेरी नज्मों की गुल्लक से
निकाल के कुछ शब्द
बुन के दे दे मुझे
एक नज़्म तू तोहफे में
मैं दुआएं दूँ तुझे लम्बी उम्रों की
तू वचन दे मुझे साथ रहने का
और चलता चले हर डगर पे सदा
होता जाये सुगम फिर ये जीवन सदा !

मेरे प्यारे भैया.. राखी का त्यौहार मुबारक तुम्हें

कवयित्री- दीपाली आब

मेरी बहनें बाँध जाती हैं


सभी पाठकों को रक्षाबंधन की बधाइयाँ। आज हम इस अवसर लेकर आये हैं, इसी विषय पर एक कविता, जिसके रचनाकार हैं स्वप्निल तिवारी ' आतिश'। स्वप्निल की कविताएँ पिछले 2 महीनों से हम लगातार प्रकाशित कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविता- मेरी बहनें

जैसे इक
काँच की आवाज़ से
रंगा गया हो उन्हें,
उड़ती हैं तितलियों सी
तो पंख बजते हैं,
कितनी रंगीन आवाजें
उभर के आती हैं,
आसमां तक जो ये पहुंचें
तो धनक बनता है ...
चमन-चमन
वो बहती हैं
हवाओं की तरह,
पहली बरसात के
पानी की तासीर लिए ...

हर एक गुल पे
बैठ-बैठ के
थक जाती है जब,
धनक से होते हुए
और बारिशों को छुए
लिए कांच की तितलियाँ
ये मेरी बहनें
बाँध जाती हैं
आके मेरी कलाई पे तब,
जैसे राखी के धागों से
उन्हें बुना हो खुदा ने........


प्रथम चरण मिला स्थान- प्रथम


द्वितीय चरण मिला स्थान- आठवाँ


पुरस्कार और सम्मान- सुशील कुमार की ओर से इनके पहले कविता-संग्रह 'कितनी रात उन घावों को सहा है' की एक प्रति।

काश! मेरी बहना होती




इस रचना को लिखे 21 वर्ष हो गये किंतु आज भी इनके भीतर के पंक्तियों की पीड़ा मुझे व्यथित करती है। राखी के पावन अवसर पर हिन्द युग्म के पाठकों को शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है मेरे हृदय के करीब की एक कविता:


काश! मेरी बहना होती

चंचल भोली भाली सी
नटखट सी इतराती सी
गुल के जैसी मुस्काती सी
लहरों सी लहराती सी
हर एक हँसी पर उसके मैं
दुनिया की खुशी लुटा देता
उसकी जो माँग हुई होती
नभ के तारे भी ला देता
छीन लिये लेता सारे
मैं उसकी आँखों के मोती
काश मेरी बहना होती

कितनी खुशियों का पल होता
हम साथ साथ खेला करते
खींचा-तानी शैतानी भी
लड़ते भी, रूठा भी करते
वो मुझे मनाया करती फिर
मैं और ऐंठ जाया करता
ऊपर से आँख लाल करता
दिल ही दिल मुस्काया करता
जाओ तुमसे ना बोलेंगे
तब यह कहती, वह रोती
काश मेरी बहना होती

दुल्हन जब भी बनती बहना
हाँथों से उसे सजाता मैं
उठती डोली, दिल थाम खड़ा
नम आँखों से मुस्काता मैं
भैया भैया कहती वह फिर
सीने से लिपट जाती मेरे
मैं सहलाता फिर बालों को
जा पी के घर तू, प्रिय तेरे
और दूर चली फिर वो जाती
दिल में भारी बोझा ढोती
काश मेरी बहना होती

मेरी सूनी कलाई तड़प उठती
खाली मस्तक हा! रोता है
राखी के पावन दिन में तो
दिल मेरा टूटा होता है
मेरे मन कोमल के टुकड़ों में
आग लगी सी जाती है
जब मैं यह सोचा करता हूँ
धूं धूं कर जलती छाती है
मेरी खुशियों की तस्वीरें
काश नहीं सपना होती
काश मेरी बहना होती।

*** राजीव रंजन प्रसाद
7.9.1986