प्रतियोगिता की अगली कविता के रचयिता मुकुल उपाध्याय हिन्द-युग्म के लिए बिलकुल नये हैं। पाठकों के िलए जो संदेश इन्होंने लिख भेजा है, हम उसे अक्षरशः प्रकाशित कर रहे हैं-
"मेरी पहचान पहाड़ की है। लगभग 30 साल के इस जीवन में मैंने सबसे महत्त्वपूर्ण दिन अपनी मातृभूमि अल्मोड़ा, उतरांचल में बिताएं हैं ....नहीं बिताएं नहीं जियें हैं.....हाँ पिछलें 3 सालों से दिल्ली में एक विज्ञापन-कंपनी में कॉपी राइटर के तौर पर काम करते हुए वास्तव में जीवन बिता रहा हू।. घर में साहित्यिक माहौल नहीं था पर जीवन अपने विभिन्न रूपों में भरपूर बिखरा था....जो शायद अन्दर कहीं जमा होता चला गया और समय-समय पर कविताओं, कहानियों में प्रतिध्वनित होता रहा। जीवन में लगातार मिली मुश्किलों ने संवेदनशील बनाया तो अपने आसपास बिखरी कवितायेँ महसूस कर सक। गुलज़ार साहब के गीतों, नज्मों को सुन-सुन कर व प्रेमचंद, शरतचंद की कहानियों को पढ़-पढ़ कर साहित्यिक अंतर्द्रष्टि विकसित हुई। गुलज़ार साहब को अपने गुरु के रूप में महसूस करता हूँ क्यूँकि मुझे लगता है कविताओ को महसूस करना मैंने उन्ही के गीतों से सीखा है। मैं कविता को पहले जीने फिर लिखने में यकीन रखता हूँ। कविता मेरे लिए जीवन के रास्तों में आगे बढ़ने पर पीछे बनते चले जाते पदचिह्न की तरह है। मेरी भावनाओ के पदचिह्न जिन्हें मैंने जिया है। पिछले 10 सालों से ज़्यादा समय से लिख रहा हूँ पर अब तक बस 100 के आसपास नज्में, मुट्ठी भर गीत, मुट्ठी भर लघु कथाएँ व कालेज के दौरान कुछ कहानियों का नाट्य रूपांतरण व निर्देशन किया है...पत्र पत्रिकाओ में बहुत कम छपा हूँ, अपने पाठक मित्रो, दोस्तों और आसपास के लोगों के हृदय में तुलनात्मकरूप से ज्यादा। अब तक का सबसे बड़ा साहित्यिक पुरुस्कार अपनी एक कविता 'सोंधी खुशबू' के पाठ के दौरान गुलज़ार साहब की मुस्कुराहट और दुआ के रूप में मिले हैं। बाकी आपकी दुआ से सब ठीक ठाक है...."
पुरस्कृत रचना- चुप सी रहती होतुम कैसी खीज उतारती हो
बेगुनाह गैस के चूल्हे पर
जब सब्जी जल जाती है तुम्हारी
और तुम्हें कितना गुस्सा आता है
जब आटा वो गीला हो जाता है तुम्हारा
तेज़ हवा जब छू कर निकलती है तुम्हें
तुम्हारा दुपट्टा सरका जाती है
कमीज़ तुम्हारी हवाओं में लहरा जाती है
तुम उस पर भी कुछ बुदबुदाती हो मुंह ही मुंह में
पर तुम कितनी चुप सी रहती हो
कुछ भी नहीं कहती हो उनको
जो पूछते है तुमसे
घर से बस बहार ही निकलने पर
कहाँ जाती हो?
क्यूँ?
किसलिए?
तुम उन से तो कभी कुछ नहीं कहती हो!
उन मान्यताओं, परम्पराओं,धर्म और समाज को
जिन्होंने तुम्हें
तुम्हारे ड्राइंग रूम का शो-पीस भर बना कर रख दिया है
जिन्होंने तुम्हें तुम्हारी रसोई का बर्तन
चारपाई पर पड़ा बिस्तर
और किसी खूंटी पर टंके तौलिये के माफ़िक
सुविधाजनक बना दिया है
तुम उन से तो कभी कुछ नहीं कहती हो !
तुम उनसे कभी कुछ क्यूँ नहीं कहती हो?
नल से कहती हो, पानी से कहती हो
झाड़ू से कहती हो, कूड़े से कहती
सुई-धागे, कील-हथौड़े से कहती हो
परदे, चादर, गद्दे, लिहाफ़
सर्फ़, साबुन, दाग
सबसे झगड़ती हो
राशन, नून, तेल, चाय, शक्कर
जीरा, अजवाइन, आटे-दाल
सब पे बिगड़ती हो
और कभी-कभी तो मैंने तुम्हें
जली हुई रोटी को
हाँ रोटी को!
ओह शिट! कहते हुए भी सुना है
कहो ना मैंने सच ना कहा है ?
गैस सिलेंडर ने खाई है सुबह-सुबह गलियाँ तुम्हारी
वक़्त से पहले जब गैस ''हवा'' हुआ है
कभी साड़ी पे, कभी सेंडिल पे सवार रहती हो
कभी पायल, कभी झुमके से नाराज़ रहती हो
बालों पे झुंझलाती हो कंघे को आँख दिखाती हो
घर, दीवार, खिड़की, रौशनदान
सूरज, बादल, हवा, पानी
गीत, गजल, नज़्म, कहानी
सबने सुनी हैं झिडकें तुम्हारी
पर जहाँ बोलना होता है तुम्हें इतना भर
कि उन्हें सुनाई दे सके
तुम कितनी चुप सी रहती हो!
तुम उनसे कभी कुछ क्यूँ नहीं कहती हो?
प्रथम चरण मिला स्थान- नौवाँ
द्वितीय चरण मिला स्थान- नौवाँ
पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह
'बिखरे मोती' की एक प्रति।