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मंदिर-मस्जिद न जाया करो, वहा झगड़े है बहुत


जून माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की अंतिम कविता के तौर पर आज हम प्रकाशित कर रहे हैं कुलदीप जैन की कविता। हालाँकि यह कविता 16वें स्थान पर ही थी, इसे हमें बहुत पहले प्रकाशित करना चाहिए था, लेकिन कवि कओ ओर से परिचय न प्राप्त होने के कारण हम नहीं प्रकाशित कर सके। इनका परिचय अब तक नहीं आया, फिर भी हम केवल नाम से प्रकाशित कर रहे हैं।

रचना- है बहुत

अरसों से चल रहा हूँ, दूर तलक चला हूँ
मगर सफ़र-अ-हयात अभी लम्बा है बहुत!

मुश्किले है सफ़र में, कांटे है राह भर में
तूफानों से कह दो, दिल में हौसले है बहुत!

भूखे को रोटी दो, बेसहारों को सहारा
मंदिर-मस्जिद न जाया करो, वहा झगड़े है बहुत!

वो फूटपाथों पे जागते है, तुम बंद बंगलों में सोते हो
अरे अब तो खिड़कियाँ खोलो, घर में तुम्हारे घुटन है बहुत!

किस पे भरोसा करें? मेहनत और बाजुओं के सिवा
यहाँ यारों के दरम्याँ दुश्मन भी है बहुत!

तुम्हें सुकून की तलाश है, तुम्हें अमन की दरकार है
चलो हमारे गाँव में, वहा परिंदे है बहुत!

हमने ठोकरे भी खाई और गिरे भी बहुत
चले आये हम वहा से, क्योंकि घर में तुम्हारे आराम है बहुत!

किसे बुलाऊँ किसे समझाऊँ? ये कलम, शेर और गजले
कौन समझेगा? लोग तुम्हारे शहर के बौने है बहुत.....


प्रथम चरण मिला स्थान-तीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- सोलहवाँ

भाव एक चीज़ हैं और शब्द बिल्कुल दूसरी, फिर क्या लिखूँ?


रविकांत अनमोल ने अप्रैल महीने की कविता में जहाँ शीर्ष 10 में स्थान बनाया, वहीं मई माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में शीर्ष 20 में बने रहे। जून माह की प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता शीर्ष 20 में है, आपके समक्ष प्रस्तुत है।

रचना- क्या लिखूँ?

"भाषा भावनाओं को प्रकट करती है"
यह पढ़ा था
लेकिन जब भावनाएँ
शब्दों में ढलने से इनकार कर दें
और जब शब्द
भावनाओं के हमजोली न हों।
तो तुम ही कहो
मैं क्या कहूँ, क्या लिखूँ?

तुम्हें मैं रोज़ ही एक चिट्ठी लिखता हूँ,
सोच के कागज़ पर
कल्पना की कलम से।
शब्द उसके कुछ धुँधले होते हैं
पर भाव सटीक साफ़।
और रोज़ ही
मुझे तुम्हारा उत्तर मिलता है।
रोज़ ही मैं तुमसे मिलता हूँ
अपनी कहता हूँ
तुम्हारी सुनता हूँ।
लेकिन शब्दों का सहारा लिए बिना।
क्योंकि मेरे लिए
भाव एक चीज़ हैं और शब्द बिल्कुल दूसरी
भाव सूक्ष्म हैं और शब्द स्थूल
भाव निर्मल हैं और शब्द मलिन
भाव ब्रह्म हैं और शब्द संसार
इसलिए भाव कभी शब्दों में नहीं बँधते।
इसीलिए शब्द भावों के हमजोली नहीं होते।
भाव लिखे नहीं जाते और न कहे जाते हैं।
फिर भी
तुम्हारे आग्रह पर ऐ दोस्त
मैं कागज़ कलम लिए बैठा हूँ
अब तुम ही बताओ
मैं क्या कहूँ?
क्या लिखूँ?


प्रथम चरण मिला स्थान-उन्नीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- अठारहवाँ

कुँठाएँ झुलसी हैं ईर्ष्या की दाह से


पिछले महीने हम आपका परिचय युवा कवि जितेन्द्र दवे से करवा चुके हैं। इस बार फिर इन्होंने शीर्ष 20 में स्थान बनाया है।

रचना- कुंठाएं

कागज़ पर पड़ी
उल्टी-सीधी रेखाएं
लक्ष्य-विहीन

अस्त-व्यस्त
दर्प से ग्रस्त
एक-दूसरे को
दबाने-काटने को उतारू

कुंठा से सनी
न उभर पाती
न ही उभरने देती
दूसरों के आस्तित्व को

इसी जद्दोजहद में
नहीं ढल पाती
किसी सुन्दर कृति में

सृजन की आंच की बजाय
जो झुलसी हैं
ईर्ष्या की दाह से
लिए हुए दर्द
एक-दूसरे को न निगल पाने का


प्रथम चरण मिला स्थान-पाँचवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- उन्नीसवाँ

संख्याओं का खेल अजब है, तू क्या जाने


प्रतियोगिता की 17वीं कविता के रचनाकार तरव अमित श्रीवास्तव पहली बार हिन्द-युग्म की प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं। जौनपुर (यू. पी.) में 6 जुलाई 1978 को जन्मे तरव अमित ने एम॰ ए॰ (हिन्दी साहित्य) की पढ़ाई की है और वर्तमान में उत्तराखंड के अपराध अनुसंधान विभाग (क्राइम ब्रांच) के हल्द्वानी खंड में पुलिस उपाधीक्षक हैं।

रचना- तू क्या जाने

मन अंतस में दर्द भरा,
तू क्या जाने!
हँसता हूँ हो दर्द हरा,
तू क्या जाने!

अन्दर का दावानल जब-जब हिलता है
कांपती है ये क्रूर धरा,
तू क्या जाने!

अब आँखों से बात बताना ठीक नहीं
पानी किसकी आँख मरा,
तू क्या जाने!

संख्याओं का खेल अजब है, तू क्या जाने
कौन जीता है कौन हारा,
तू क्या जाने!

तुझको पाने में और सुभीता होता है
जब जब तुमने स्वांग भरा,
तू क्या जाने!

नयी कोंपलें नव पत्ते आने से डरते
उल्लू से हो वृक्ष हरा,
तू क्या जाने!!


प्रथम चरण मिला स्थान-सातवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- सत्रहवाँ

बूँद कभी माँ, बेटी, बहिन तो कभी पत्‍नी बनती है


प्रतियोगिता की 15वीं कविता की रचयिता दीपाली पन्त तिवारी "दिशा" बैंगलौर में रहती हैं। जब ये बारहवीं कक्षा में पढ़ती थीं तभी से कविता लेखन का शौक लगा। खेलकूद, संगीत, नृत्य, तथा सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने की रूचि भी छुटपन से है। शादी से पूर्व शिक्षण कार्य भी किया और इलैक्ट्रोनिक मीडिया से भी जुडी रहीं। इन्होंने "रेडियो प्रसारण तथा पत्रकारिता एवं जनसंचार" का कोर्स किया है। आकाशवाणी रामपुर में रेडियो कलाकार के रूप में कार्य किया है। कई रेडियो वार्ताओं में भाग लिया है। बरेली के चेनल वी एम दर्पण में न्यूज रिपोर्टर, न्यूज एंकर तथा एंकर के रूप में कार्य किया है। कई स्टोरीज में तथा विज्ञापनों में आवाज़ दी है। और आजकल इंटरनेट पर खूब सक्रिय हैं।

रचना- बूँद और नारी

फूल पर गिरे बूँद, तो ओस बन जाती है
गर गिरे सीप पर तो मोती कहलाती है
आँखों से गिरती है, वो आंसू बनकर
खो देती है अस्तित्व, पानी में मिलकर
लेती है नित नया आकार
लेकिन देती है सबको आधार
कहती है कई बातें अनकही
बूँद बिना पानी भी कुछ नहीं
बूँद की तरह नारी भी कई रूप बदलती है
कभी माँ, बेटी, बहिन तो कभी पत्नी बनती है
करती हैं दोनों ही हर रूप में त्याग अपना
ताकि जन्म ले सके, फिर एक नया सपना


प्रथम चरण मिला स्थान- उन्नतीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- पंद्रहवाँ

तुम्हारी याद आई


प्रतियोगिता की चौदहवीं कविता के कवि गिरेजेश राव का जन्म 4 नवम्बर को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के एक ऊँघते से कस्बे रामकोला में रात को 11:25 पर हुआ, उस समय इनकी माँ के साथ थे केवल इनके पिता और उनके अति योग्य शिष्य जो आज बौद्ध दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान हैं। सदा से गुरुजनों के अति प्रिय रहे। कवि मानते हैं कि आज ये जो भी हैं गुरुजनों के और बरगद से व्यक्तित्त्व वाले पिता के कारण हैं। 1991 में सिविल इंजीनियरिंग में मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कॉलेज, गोरखपुर से स्नातक की पढ़ाई करने के बाद दो साल भटके, फिर रुड़की विश्वविद्यालय से परास्नातक – विश्वविद्यालय पदक के साथ किया और दो साल का भटकाव। 1997 से हिन्दुस्तान पेट्रोलियम में कार्यरत। सम्प्रति लखनऊ में कार्यकारी अधिकारी– रिटेल उन्नयन। प्रस्तुत कविता के बारे में लिखते हैं- "यह कविता रच गई थी आज से करीब 9-10 साल पहले जब श्रीमती जी पुत्री अलका के साथ मायके गई थीं। कविता तीन चार साल पहले पुरानी डायरी में मिली थी। प्रतियोगिता में डरते डरते भेजा था क्यों कि लग रहा था कि इस तरह की उपमाओं, भावों, बिंब, रूपक या शब्दों के साथ इतने वर्षों में दूसरों ने भी रचा होगा। निर्णायक मंडल को जँची, उनकी उदारता के लिए धन्यवाद।"

रचना- तुम्हारी याद आई

तुम्हारी याद आई
बाँसुरी के साथ री
बज उठी शहनाई।

सर सरकती
चिड़ी चहकती
बात करती हवा आई
बिटिया की खिलखिल बिना
बड़ी सूनी सी लगी
धूप सनी अँगनाई।

फूल महके
भँवरे बहके
झुनझुनी पायल नहीं
एक चूड़ी तनहाई।
गगन तारे
आज द्वारे
तकिये पर सिन्दूर ना रे
कानाफूसी रात बहकी
हँसी जैसे सिसकाई।

तुम्हारी याद आई।


प्रथम चरण मिला स्थान- सत्ताइसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- चौदहवाँ

'मैं' एक पूरा झूठ बन गई


आज हम लेकर उपस्थित हैं दिपाली 'आब' की एक कविता। उल्लेखनीय है कि इनकी एक कविता ने पिछले माह की प्रतियोगिता में भी शीर्ष 20 में स्थान बनाया था।

रचना- मैं और तू

'मैं' एक पूरा झूठ हूँ
और 'तू' एक मुकम्मिल सच

'तू' और 'मैं'
ज़िन्दगी की माला के छोर थे
जब बिछड़े तो
इश्क मोतियों की तरह बिखर गया

तू धागा ले गया कशिश का
मैंने इश्क के बिखरे मोती
आँखों में समेट लिए
तूने नए मोती तलाश लिए
मैंने अपने मोती
तेरी याद को तोहफे में दे दिए

'तू' मेरा प्यार है आज भी
'तू' आज भी मुकम्मिल सच है
तूने कहा था
'मैं' तेरी जान हूँ
'मैं' एक पूरा झूठ बन गई...!!


प्रथम चरण मिला स्थान- इक्कीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- तेरहवाँ

दिशाओं के निमंत्रण पर क्षितिज की माँग आ पहुँची


प्रतियोगिता की 12वीं कविता की रचयिता दीपा पन्त हमारे लिए बिलकुल नई हैं। 30 अगस्त को उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी में पैदा हुईं और पलीं-बढ़ीं दीपा ने मेरठ कॉलेज से सर्वोच्च अंकों के साथ एम॰ ए॰ (हिन्दी) एवं बी .एड .किया। विगत 18 वर्षों से हल्द्वानी स्थित एक सीनिअर सेकेंडरी स्कूल में हिन्दी पढ़ाती हैं। ये बचपन से ही कविताएँ लिखती थीं, स्कूल और कॉलेज में इन्हें कई पुरस्कार मिले, कई पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके एक काव्य संग्रह 'मन वृन्दावन' का शीघ्र ही विमोचन होने वाला है।

रचना- अधूरी कामनाएँ

अधूरी कामनाएँ फिर मेरे सपनों में आ पहुँची
कोई उद्दाम अभिलाषा सभी प्रतिबंध तोड़ेगी
नियम के साथ क्या मन को
हमेशा बाँधना होगा
खुले आकाश के नीचे
धरा को नापना होगा
दिशाओं के निमंत्रण पर क्षितिज की माँग आ पहुँची
उडानें पंछियों की फिर नए सम्बन्ध जोड़ेंगी
बड़ा अभिमान लहरों को
किनारे साध कर चलती
उसे मालूम क्या गति पर
नहीं बैसाखियाँ लगतीं
अनिश्चय बांटती राहें हमारे पास आ पहुँचीं
संभालो गाँव-घर अपने, नदी तटबंध तोड़ेगी
मिटाया विवशताओं ने
अधूरी रात का सपना
हमें कब तक ना आएगा
हृदय को बाँध कर रखना
ये तन-मन की निराशाएं मेरे सिरहाने आ पहुँचीं
कोई व्याकुल प्रतीक्षा अनछुए सन्दर्भ ढूँढ़ेगी
सदा पहरा नहीं चलता
बड़ी संवेदनाओं पर
बहुत बीमार हैं आँखें
नहीं रहतीं ठिकाने पर
उदासी बेखबर होकर मेरे आँगन में आ पहुँची
पुरानी ओढ़नी पर ये नए पैबंद जोड़ेगी


प्रथम चरण मिला स्थान- तीसरा


द्वितीय चरण मिला स्थान- बारहवाँ

काश यूँ भी हो


शीर्ष 10 कविताओं से आगे बढ़ते हैं। 11वें स्थान की कविता बहुत छोटी सी कविता है, जिसे जजों ने बहुत पसंद किया। इसके रचनाकार अनिरूद्ध शर्मा मध्यप्रदेश के एक कस्बे बागली के रहने वाले हैं। इंदौर से एमसीए की पढ़ाई करने के बाद पिछले 4 सालों से पुणे में बतौर सॉफ्टवेर इंजिनियर कार्यरत हैं। इनके परिवार में साहित्य का कोई माहौल नहीं था लेकिन बचपन में चम्पक पढ़ते-पढ़ते पढने का ऐसा शौक लगा कि वो जुनून बन गया। फिर इन्होंने सभी तरह की किताबें पढीं- उपन्यास, कहानियां, जीवनी, दर्शन, कविता, गज़लें आदि। पढ़ते-पढ़ते कब इनके अन्दर का कवि जाग गया इन्हें पता ही नहीं चला। शायरों में ग़ालिब इनके लिए पूजनीय हैं और आज के वक़्त में गुलज़ार। हालांकि 100 से ज्यादा गज़लें मैंने लिखी हुई हैं, लेकिन अब तक किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिये थे। इन्होंने पहली बार प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टी भेजी थ। कविता के अलावा हिंद युग्म के लिए लेख भी लिखते हैं जिन्हें बैठक पर पढ़ा जा सकता है।

रचना- काश

कई बार यूँ भी हुआ है कि
बेतरतीब से लफ्जों को समेट कर
तुम्हारे पहलू में रख दिया है मैंने
और पाई है
एक मुक़म्मल नज़्म
काश यूँ भी हो कि
एक बार
खुद को समेटकर
रख दूँ तुम्हारे पहलू में...


प्रथम चरण मिला स्थान- चौथा


द्वितीय चरण मिला स्थान- ग्यारहवाँ

खामोशी से हमें बांध में डूबोया जायेगा


शीर्ष 10 में अंतिम स्थान पर काबिज कविता के रचनाकार सचिन कुमार जैन हिन्द-युग्म से पहली बार में जुड़ रहे हैं। भोपाल में रहकर संस्थागत प्रयोग के जरिये जनमुद्दों पर हिंदी में ज्यादा से ज्यादा, गुणात्मक और विश्लेषण परक सामग्री तैयार करने का काम कर रहे हैं। इनका काम अंग्रेजी से अनुवाद करके हिंदी के विश्व को हरा-भरा करने से ज्यादा, दुनिया को हिंदी में देखना, समझाना और लिखना है।

पुरस्कृत रचना- बदलाव


सोचिये, जब उठेगा
एक कदम बदलाव का
कैसा तब समाज हमारा नजर आयेगा॥

यह वक्त-वक्त की बात है
गरीब की जंग लड़ने वाला
एक दिन नेता बनाया जायेगा॥

सफेदपोश आये थे नापने
जमीन का रकबा एक दिन
कहते थे विकास किया जायेगा॥

गांव में हो रही है हलचल अजीब सी
फिर मिली चेतावनी एक रात में
खामोशी से हमें बांध में डूबोया जायेगा॥

कोई नासमझ मिटाने भूख को चला है
प्रश्न अब खड़ा है भूखे बच्चे का चित्र
फिर कहाँ से खींचा जायेगा॥

भूखमरी और सूखे से मर रहे हैं कई लोग
यह जानकर सरकार में सब हो गये हैं सक्रिय
कर्ज लेने प्रतिनिधि मण्डल विदेश भेजा जायेगा॥

बंद कर ली थी हमने भी खिड़कियाँ कभी
जब पड़ोस पर छाई खाकी परछाई थी दिखी
सोचा न था एक दिन हमें भी यूं ही उठा लिया जायेगा॥

अमीरों की इमारत पर आतंकियों का आघात
खबर बाजार में अब यह गर्म है
दुनिया से आतंकवाद मिटाया जायेगा॥

हो चुकी हैं कोशिशें शुरू पुरजोर
योजना है एक दिन बम गिरेगा शहर पर
दूसरे दिन गेहूँ गिराया जायेगा॥

नये दौर में पुराना पड़ चुका है
जानवरों के शिकार का शौक
अब इन्सानों को विकल्प बनाया जायेगा॥

क्रांति की बात करते थे वे कभी
विपक्ष में बैठकर, सत्ता में आकर
तय हुआ है अब इतिहास को बदला जायेगा॥

बात जो करेगा यहाँ सरकार की
किसी आयोग की सिफारिश पर
उसे महान बनाया जायेगा॥॥


प्रथम चरण मिला स्थान- बत्तीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- दसवाँ


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।

नल, पानी, जीरा, कलछुल और दीवारों से कहने वाली लड़की


प्रतियोगिता की अगली कविता के रचयिता मुकुल उपाध्याय हिन्द-युग्म के लिए बिलकुल नये हैं। पाठकों के िलए जो संदेश इन्होंने लिख भेजा है, हम उसे अक्षरशः प्रकाशित कर रहे हैं-

"मेरी पहचान पहाड़ की है। लगभग 30 साल के इस जीवन में मैंने सबसे महत्त्वपूर्ण दिन अपनी मातृभूमि अल्मोड़ा, उतरांचल में बिताएं हैं ....नहीं बिताएं नहीं जियें हैं.....हाँ पिछलें 3 सालों से दिल्ली में एक विज्ञापन-कंपनी में कॉपी राइटर के तौर पर काम करते हुए वास्तव में जीवन बिता रहा हू।. घर में साहित्यिक माहौल नहीं था पर जीवन अपने विभिन्न रूपों में भरपूर बिखरा था....जो शायद अन्दर कहीं जमा होता चला गया और समय-समय पर कविताओं, कहानियों में प्रतिध्वनित होता रहा। जीवन में लगातार मिली मुश्किलों ने संवेदनशील बनाया तो अपने आसपास बिखरी कवितायेँ महसूस कर सक। गुलज़ार साहब के गीतों, नज्मों को सुन-सुन कर व प्रेमचंद, शरतचंद की कहानियों को पढ़-पढ़ कर साहित्यिक अंतर्द्रष्टि विकसित हुई। गुलज़ार साहब को अपने गुरु के रूप में महसूस करता हूँ क्यूँकि मुझे लगता है कविताओ को महसूस करना मैंने उन्ही के गीतों से सीखा है। मैं कविता को पहले जीने फिर लिखने में यकीन रखता हूँ। कविता मेरे लिए जीवन के रास्तों में आगे बढ़ने पर पीछे बनते चले जाते पदचिह्न की तरह है। मेरी भावनाओ के पदचिह्न जिन्हें मैंने जिया है। पिछले 10 सालों से ज़्यादा समय से लिख रहा हूँ पर अब तक बस 100 के आसपास नज्में, मुट्ठी भर गीत, मुट्ठी भर लघु कथाएँ व कालेज के दौरान कुछ कहानियों का नाट्य रूपांतरण व निर्देशन किया है...पत्र पत्रिकाओ में बहुत कम छपा हूँ, अपने पाठक मित्रो, दोस्तों और आसपास के लोगों के हृदय में तुलनात्मकरूप से ज्यादा। अब तक का सबसे बड़ा साहित्यिक पुरुस्कार अपनी एक कविता 'सोंधी खुशबू' के पाठ के दौरान गुलज़ार साहब की मुस्कुराहट और दुआ के रूप में मिले हैं। बाकी आपकी दुआ से सब ठीक ठाक है...."


पुरस्कृत रचना- चुप सी रहती हो


तुम कैसी खीज उतारती हो
बेगुनाह गैस के चूल्हे पर
जब सब्जी जल जाती है तुम्हारी
और तुम्हें कितना गुस्सा आता है
जब आटा वो गीला हो जाता है तुम्हारा
तेज़ हवा जब छू कर निकलती है तुम्हें
तुम्हारा दुपट्टा सरका जाती है
कमीज़ तुम्हारी हवाओं में लहरा जाती है
तुम उस पर भी कुछ बुदबुदाती हो मुंह ही मुंह में
पर तुम कितनी चुप सी रहती हो
कुछ भी नहीं कहती हो उनको
जो पूछते है तुमसे
घर से बस बहार ही निकलने पर
कहाँ जाती हो?
क्यूँ?
किसलिए?
तुम उन से तो कभी कुछ नहीं कहती हो!
उन मान्यताओं, परम्पराओं,धर्म और समाज को
जिन्होंने तुम्हें
तुम्हारे ड्राइंग रूम का शो-पीस भर बना कर रख दिया है
जिन्होंने तुम्हें तुम्हारी रसोई का बर्तन
चारपाई पर पड़ा बिस्तर
और किसी खूंटी पर टंके तौलिये के माफ़िक
सुविधाजनक बना दिया है
तुम उन से तो कभी कुछ नहीं कहती हो !
तुम उनसे कभी कुछ क्यूँ नहीं कहती हो?

नल से कहती हो, पानी से कहती हो
झाड़ू से कहती हो, कूड़े से कहती
सुई-धागे, कील-हथौड़े से कहती हो
परदे, चादर, गद्दे, लिहाफ़
सर्फ़, साबुन, दाग
सबसे झगड़ती हो
राशन, नून, तेल, चाय, शक्कर
जीरा, अजवाइन, आटे-दाल
सब पे बिगड़ती हो
और कभी-कभी तो मैंने तुम्हें
जली हुई रोटी को
हाँ रोटी को!
ओह शिट! कहते हुए भी सुना है
कहो ना मैंने सच ना कहा है ?
गैस सिलेंडर ने खाई है सुबह-सुबह गलियाँ तुम्हारी
वक़्त से पहले जब गैस ''हवा'' हुआ है
कभी साड़ी पे, कभी सेंडिल पे सवार रहती हो
कभी पायल, कभी झुमके से नाराज़ रहती हो
बालों पे झुंझलाती हो कंघे को आँख दिखाती हो
घर, दीवार, खिड़की, रौशनदान
सूरज, बादल, हवा, पानी
गीत, गजल, नज़्म, कहानी
सबने सुनी हैं झिडकें तुम्हारी
पर जहाँ बोलना होता है तुम्हें इतना भर
कि उन्हें सुनाई दे सके

तुम कितनी चुप सी रहती हो!
तुम उनसे कभी कुछ क्यूँ नहीं कहती हो?


प्रथम चरण मिला स्थान- नौवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- नौवाँ


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।

देख आया मैं एक बच्चे को


प्रतियोगिता के अगले विजेता जीष्णु हरिशरण मॉरिशस निवासी हैं। 12 दिसम्बर 1988 को जन्मे जीष्णु B. A. (Hons) हिन्दी के विद्यार्थी हैं। इन्हें जब कभी भी मौका मिलता है, कविता लिख देते हैं। अपनी सारी उपलब्धियों का श्रेय ये अपने परिवार और अपने गुरुजनों की सहायता/ प्रोत्साहन को देते हैं।

पुरस्कृत रचना- एक बच्चे को


आज,
न चाहकर भी देख आया मैं
स्कूल से लौटते हुए एक बच्चे को
फटे उसके गंदे जूतों को
पुराने कमीज़ के असाधारण रंग-बिरंगे बटनों को
पतलून के ज़िप पर लगे पिन को
मैले रंगहीन बसते को
देख आया मैं।

आँखों में उसके देखा
एक ओर थकान थी
तो दूसरी ओर खुशी
एक ओर व्यस्तता थी
तो दूसरी ओर शांति
एक ओर दारिद्रय था
तो दूसरी ओर पूर्ती
तब एका एक
दिल से दुआएं निकलीं
प्रार्थनाएँ निकलीं
दुःख हुआ पर खुशी भी मिली
कि अच्छा है-
संघर्ष है
सपने हैं
आशाएं हैं...
मंजिल भी मिल जाएगी
पर हे प्रभु!
इन छोटी-छोटी मासूम आँखों को
धोखा मत देना
देर ही सही
इन नन्हे पैरों को
अपनी मंजिल तक पहुVचा देना
लेकिन
इतना भी सहायक न बन जाना
कि ये ही पद
एक दिन
दूसरों को कुचल कर आगे बढ़ जाए.
इसलिए
इन्हें नियंत्रित रखना
मार्ग दिखाना
ठोकर देना
आँचल भी देना
आज
न चाहकर भी
देख आया मैं
स्कूल से लौटते हुए एक बच्चे को


प्रथम चरण मिला स्थान- चौदहवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- आठवाँ


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।

अतीत का वहशीपन


प्रतियोगिता के छठवें स्थान की कविता के रचयिता अनुज शुक्ला गंगा और कैमूर की पहाड़ियों के बीच मीरजापुर के एक छोटे से गाँव में पैदा हुए और वहीं की पाठशाला से प्रारम्भिक अध्ययन की शुरूआत की। १२वीं इलाहाबाद के सी.ए.वी. कॉलेज से और ग्रेजुएशन के लिये ई.सी.सी. में दाखिला लिया। यहीं से मन के ऊपर इलाहाबादी प्रभाव से राजनैतिक और साहित्यिक गतिविधियों मे सहभागिता शुरू हो गई। इस दरम्यान छात्रसंघ का प्रतिनिधित्व। वर्तमान समय में मीरजापुर के इलाके में सामाजिक कार्यों में व्यस्त सब में खुद को ढूँढ़ते हुए।

पुरस्कृत रचना- तुम्हारा अतीत


रोटी के चन्द टुकड़ों को
ढाल बनाकर और
पाँच गज कपड़े की आड़ में
हमारे ऊपर आक्रमण कर
तुम विश्व विजयी बन गये
और इतिहास के यशश्वी पुरोधाओं में
अपने नाम को शामिल कर
सदियों के लिये हमें गुलामी
की जंजीरों में बाँध दिया।

तुम्हारी डाइनिंग टेबल पर रखी
मिनरल वाटर की बोतलें और-
उनके ऊपर लगी इम्पोर्टेड शील
बार-बार तुम्हारे अतीत के दोगलेपन
को दर्शाती है,
तुम्हारे बंगले के किसी कमरे में
रात को एम.टी.वी. देखती
तुम्हारी लड़की और
किसी नाइट क्लब में,
किसी की बाहों में स्काच के-
नशे में झूमती तुम्हारी बीबी
और उनके तंग कपड़ों से
तुम्हारे अतीत का वहशीपन-
चित्कार रहा है।

चाँदी के चन्द सिक्कों की बदौलत
किसी अबला की आबरु को
वियाग्रा के दम पर
तार-तार करने वाले सिकन्दर,
महिला उत्थान वाले कार्यक्रमों के
चीफ़गेस्ट व
सामाजिक सुधारों के तथाकथित ठेकेदार
तुम्हारी घिनौनी ज़रूरतों की बदौलत
कवियों को विकल्पहीन होना पड़ा और पड़ रहा है
तुम्हारे अतीत कि जड़ों में लगी
दीमक
तुम्हारे वर्तमान और भविष्य
के पेड़ को सुखा देगी


प्रथम चरण मिला स्थान- तेरहवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- छठवाँ


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।

वो बात ग़ज़ल कहलाती है जो बात बहर में हो जाए


आज हम यूनिकवि प्रतियोगिता से ऋतु सरोहा की कविता प्रकाशित कर रहे हैं। इनकी कविता पिछली बार बारहवें स्थान पर रही थी। इस बार इन्होंने छलाँग लगाते हुए सुधार किया और पाँचवें स्थान पर रही हैं।

पुरस्कृत रचना


जब रहें हमसुखन हम दोनो और सारी महफ़िल सो जाए
वो बात ग़ज़ल कहलाती है जो बात बहर में हो जाए

इस रात पे उजले धब्बे हैं ये रात बहुत ही मैली है
बादल मे घोले सर्फ कोई और सारे तारे धो जाए

इक तार -ए- हक़ीक़त ला कर अब रक्खा है तुम्हारे कमरे मे
बांधो कस कर ये डोर ज़रा ,कहीं आँख ख्वाब मे खो जाए !

सरसो, गन्दुम, के साथ साथ महताब उगे इन खेतों मे
इक हरवाहा ढूँढ़ो ऐसा जो खेत मे खुशियाँ बो जाए

इक दिया खुशी का जलता है हर शाम ही इसके सीने मे
फिर हर शब इस नन्हे दिल मे ये सारा आलम रो जाए



प्रथम चरण मिला स्थान- आठवां


द्वितीय चरण मिला स्थान- पाँचवाँ


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।

ज़रा सी हलचल में घर बिखर गए हैं जो


यूनिकवि प्रतियोगिता में चौथे स्थान पर रहे हैं आलोक उपाध्याय ’नज़र इलाहबादी’। पेशे से सॉफ़्टवेयर इंजीनियर आलोक की दो कवितायें मेरे नुख्से कारगर हो सकते हैंइस बार आम की गुठलियाँ ले चलो अप्रैल व मई प्रतियोगिता में क्रमश: प्रकाशित हो चुकी हैं।

पुरस्कृत कविता

ख्वाब गुमसुम हैं आँख से उतर गए हैं जो
सच होने के नाम पर कभी मुकर गए हैं जो

क्या पाए इस जहाँ के रहम-ओ-करम फिर से
यक़ीन-ए-वफ़ा दिलाने में लोग मर गए हैं जो

बहुत गुंजाईश है सुधारने की उनकी बुनियादें
ज़रा सी हलचल में घर बिखर गए हैं जो

वो अपनों के आंसू को अपना लहू समझते है
अपने परिवार के लिए दूसरे शहर गए हैं जो

नहीं मानेंगे कि ये बड़ी मुश्किलों का दौर है
इन रास्तों से हँसते हँसते गुज़र गए हैं जो

कभी कुछ वक़्त तो अपना उनको भी दीजिये
फिक्र-ए रोज़गार में रिश्ते बिसर गए हैं जो

नहीं हो पायेंगे वो जिंदगी की दौड़ में शामिल
कामयाबी के इंतज़ार में रास्ते ठहर गए हैं जो

जिंदगी के मालिक को दिल में न खोज पाए
खुदा की तलाश में बन्दे दर-बदर गए हैं जो

देखते हैं महफ़िल में क्या सिक्का जमाते है
कुछ देर पहले ये पैगाम -ए 'नज़र' गए है जो




प्रथम चरण मिला स्थान- छठा


द्वितीय चरण मिला स्थान- चौथा


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।

बाँझ हो गइल बा, संवेदना के गाँव


प्रतियोगिता की तीसरे स्थान की कविता एक भोजपुरी कविता है। मनोज भावुक विग्त कई माह से हिन्द-युग्म से जुड़े हैं और हिन्द-युग्म की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

पुरस्कृत कविता

बाँझ हो गइल बा, संवेदना के गाँव
नेह हो गइल बा , बबूरवा के छाँव

प्यार-प्रीत के जमीन रेह हो गइल बा
आत्मा मरल मशीन देह हो गइल बा
लेत केहू नइखे इंसानियत के नाँव !

करे जे अगोरिया से चोर हो गइल बा
देश प लुटेरवन के जोर हो गइल बा
कोरा में के लइका के जाई केने पाँव?

जाति-पाति, धरम के उठेला लहरिया
रोटी बिना लइका के अँइठे अंतड़िया
कउवन के सभवा में होला काँव-काँव !

टुकी-टुकी गउवाँ आ टुकी-टुकी घर घरवा
घरवा में घरवा आ ओहू में दररवा
'भावुक' जिनिगिया ई लागी कवने ठाँव? '



प्रथम चरण मिला स्थान- दसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- तीसरा


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।

काई काई चाँद हुआ


स्वप्निल तिवारी "आतिश" की एक रचना पिछले महीने प्रकाशित हुई थी, लेकिन यह पहला अवसर है जब इनकी कविता शीर्ष 10 में स्थान बना पाई है।

पुरस्कृत कविता

सिमटी सी शर्मीली रात
भोली छैल छबीली रात

काई काई चाँद हुआ
जब भी आई गीली रात

चाँद किनारे खड़ा रहा
जब जी आया बह ली रात

चाँद सितारों की गिरहें हैं
फिर भी है कुछ ढीली रात

साया जब खोया मेरा तब
पैराहन में सी ली रात

यादों की परतें बिखरी हैं
मैंने कितनी छीली रात

खाबों में तू ठिठुरी थी
कल थी जब बर्फ़ीली रात

आधा ही महताब बचा है
तू भी है खर्चीली रात

हम भी क्या सुकरात से कम?
हमने तन्हा पी ली रात

अब तब हैं इसकी साँसें
दुबली, पतली, पीली रात

"आतिश" काली शब का मारा
आँच, परी सी, नीली रात



प्रथम चरण मिला स्थान- पहला


द्वितीय चरण मिला स्थान- दूसरा


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।