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Thursday, July 09, 2009

बाँझ हो गइल बा, संवेदना के गाँव


प्रतियोगिता की तीसरे स्थान की कविता एक भोजपुरी कविता है। मनोज भावुक विग्त कई माह से हिन्द-युग्म से जुड़े हैं और हिन्द-युग्म की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

पुरस्कृत कविता

बाँझ हो गइल बा, संवेदना के गाँव
नेह हो गइल बा , बबूरवा के छाँव

प्यार-प्रीत के जमीन रेह हो गइल बा
आत्मा मरल मशीन देह हो गइल बा
लेत केहू नइखे इंसानियत के नाँव !

करे जे अगोरिया से चोर हो गइल बा
देश प लुटेरवन के जोर हो गइल बा
कोरा में के लइका के जाई केने पाँव?

जाति-पाति, धरम के उठेला लहरिया
रोटी बिना लइका के अँइठे अंतड़िया
कउवन के सभवा में होला काँव-काँव !

टुकी-टुकी गउवाँ आ टुकी-टुकी घर घरवा
घरवा में घरवा आ ओहू में दररवा
'भावुक' जिनिगिया ई लागी कवने ठाँव? '



प्रथम चरण मिला स्थान- दसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- तीसरा


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

manoj bhaiya ..bhojpuri me etna badhiya geet bahut din bad sune ke milal ..... aanad aa gayil .....

Disha का कहना है कि -

बढिया रचना
धन्यवाद व बधाई

Nirmla Kapila का कहना है कि -

बडिया रचना बधाई

अर्चना तिवारी का कहना है कि -

सुंदर कविता लिखी है...बधाई

मुहम्मद अहसन का कहना है कि -

हेई बबुआ तोहरी कबिता पढ़ी के हम भए भोर बिभोर
का बढ़िया देस- गाँव का नक्सा खींचा, लगाई के कबित्त का जोर
-मुहम्मद अहसन

manu का कहना है कि -

sunder kavitaa hai..
bhaavuk ji..

Shamikh Faraz का कहना है कि -

टुकी-टुकी गउवाँ आ टुकी-टुकी घर घरवा
घरवा में घरवा आ ओहू में दररवा
'भावुक' जिनिगिया ई लागी कवने ठाँव?

मुझे यह पंक्तियाँ सबसे अच्छी लगी.

sada का कहना है कि -

जाति-पाति, धरम के उठेला लहरिया
रोटी बिना लइका के अँइठे अंतड़िया
कउवन के सभवा में होला काँव-काँव !

बहुत ही सुन्‍दर लिखा आपने आभार्

Manju Gupta का कहना है कि -

मानवीय पहलू से ओत प्रोत कविता है. बधाई

neelam का कहना है कि -

बाँझ हो गइल बा, संवेदना के गाँव

माननीय कवि महोदय जी,बाँझ के जगह पर का ठूंठ शब्द ज्यादा बढ़िया नहीं रहता , बकी आपकेर मर्जी
काहे की कवितवा आपकेर बा |
बाकी कविता बढ़िया बा ,नीक बा

rachana का कहना है कि -

प्यार-प्रीत के जमीन रेह हो गइल बा
आत्मा मरल मशीन देह हो गइल बा
लेत केहू नइखे इंसानियत के नाँव !
क्या सुंदर है भावः है
आप ने बहुत सुंदर लिखा है
सादर
rachana

BRAHMA NATH TRIPATHI का कहना है कि -

वाह मनोज जी
कविता पढ़ रहा था ले अपने आप बंध गयी लगा ही नहीं की ये भाषा मुझे नहीं आती खुद ब खुद शब्द निकलते गए
बहुत अच्छी कविता बधाई

Ambarish Srivastava का कहना है कि -

प्यार-प्रीत के जमीन रेह हो गइल बा
आत्मा मरल मशीन देह हो गइल बा
लेत केहू नइखे इंसानियत के नाँव !

का हो बबुआ ! अईसेन खूब लिखले बाडू के
आपन जियरए कांपि गईला |
एकदम यथार्थ
बधाई |

pragya का कहना है कि -

आप क भोजपुरी कविता बड़ी नीक लागल और होखे त पढ़ले क मौका दीं

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