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Wednesday, March 30, 2011

भालू नाच




जनवरी प्रतियोगिता की तेरहवीं कविता के रचनाकार रमाशंकर सिंह हिंद-युग्म पे पहली बार प्रकाशित हो रहे हैं। रमाशंकर सिंह का जन्म 1 जुलाई 1981 को उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े जिले गोण्डा के एक छोटे से गाँव सिसई में हुआ। इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा पास ही के एक कस्बे में से हासिल की और 2004 में प्राचीन इतिहास में प्रथम श्रेणी में परास्नातक साकेत कालेज, अयोध्या से पूरा किया । 2005 से 2009 तक रचनात्मक कार्यों में लगे रहे हैं। रमा जी को 2009 में यू.जी.सी. की जूनियर रिसर्च फेलोशिप मिली है और वर्तमान में गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के प्रो.बद्री नारायण के निर्देशन में निम्न जातियों के सामुदायिक अधिकारों पर शोध कर रहे हैं। कालेज की वार्षिक पत्रिका का संपादन किया है एवं वाक के अंक 6 में दो कविताएँ छप चुकी हैं।

कविता: भालू नाच 

बचपन में गर्म लोहे की छड़ से
दागे गये तलुओं की
पीड़ा की स्मृति में
मदारी के डंडे के डर से
नाचता है भालू
डमरू की धुन पर
उसके नाच में नाच रही होती है
उसकी पीड़ा और भूख
एक पीड़ा और भूख
नाच रही होती है मदारी की आँख
और जमूरे के पेट में भी

मेरे बचपन के ये बिंब
मेरे साथ घट रहे हैं
पेट पालने की जिद
और ज्यादा इकट्ठा करने की हवा में
मैं नाचता हूँ साहबों और नेताओं के आगे
बिना डंडा दिखाये या डमरू बजाये ही

आदमी ऐसे ही बनता है भालू
और नाचता रहता है मजमे में ।



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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

‘सज्जन’ धर्मेन्द्र का कहना है कि -

रचना की शुरुआत अच्छी है, मगर अंत तक जाते जाते एक अधूरापन सा रह गया है। रचनाकार को बधाई

www.puravai.blogspot.com का कहना है कि -

bachpan ki yad dila di.behtarin prastuti.badhai.

hamarivani का कहना है कि -

मेरी लड़ाई Corruption के खिलाफ है आपके साथ के बिना अधूरी है आप सभी मेरे ब्लॉग को follow करके और follow कराके मेरी मिम्मत बढ़ाये, और मेरा साथ दे ..

Anita का कहना है कि -

भालू बेबस था जमूरा भी पीड़ित था सो माफ़ किया जा सकता है मगर नेता और साहब के आगे नाचने वाला लोभी तो कुछ और ही कहा जायेगा दोनों की तुलना जंचती नहीं !

मुकेश कुमार तिवारी का कहना है कि -

सीधे बिम्बों से अपनी बात कहती हुई कविता पाठक से सीधा संवाद स्थापित करती है। आदमी को लेकर मेरा मत है कि यह वो चीज है कि अपने आप को किसी भी रूप में ढाल सकता है भालू भी और मदारी भी अब बात सिर्फ खुद को पहचानने की है समझ गये तो मदारी नही तो जो समझा वो तुम्हें भालू बना लेगा......

अच्छी कविता के लिये श्री रमाशंकर सिँह जी को बधाई.....

हिन्द-युग्म टीम को उनके सद्प्रयासों के लिये साधुवाद.........

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

RITESH का कहना है कि -

खूब कही
अच्छा लगा !
..............................धन्यवाद

Asola YOb का कहना है कि -

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