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Tuesday, January 11, 2011

अब तेरे शहर से कोई नामाबर नहीं आता


नवंबर माह की चौदहवीं और अंतिम रचना आशीष पंत की है। आशीष की पिछली कविता ने सितंबर माह मे तीसरा स्थान बनाया था।

 कविता

तू  उठे  तो उठ जाते हैं  कारवाँ
मेरे जनाजे में ऐसा काफिला नहीं आता,

तू थी  तो हर्फ़-हर्फ़  इबादत  था
तेरे बिना दुआओं में भी असर नहीं आता

कभी हर राह की मंजिल थी  तेरी गली
अब तेरे शहर से कोई नामाबर नहीं आता

एक आंसू नहीं  बहाने का  वादा  था
निभाया, अब लहू आता है अश्क नहीं आता

मेरे दिल के  दर्द  रूह  के  सुकूं
जान जाती है मेरी तू नज़र नहीं आता


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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

नया सवेरा का कहना है कि -

... bahut badhiyaa !!

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ का कहना है कि -

सुंदर रचना, बधाई

khush का कहना है कि -

bahut khoobsurat rachna hai...
kon hai wo?

प्रवीण पाण्डेय का कहना है कि -

प्रतीक्षा का चरम।

Navin C. Chaturvedi का कहना है कि -

सुंदर काव्य कृति आशीष भाई

mridula pradhan का कहना है कि -

bahut achchi lagi.

अभिषेक पाटनी का कहना है कि -

बेहतरीन...लाजवाब...उम्दा प्रस्तुति....बधाई...बधाई

अभिषेक पाटनी का कहना है कि -

बेहतरीन...लाजवाब...उम्दा प्रस्तुति....बधाई...बधाई

sada का कहना है कि -

बहुत ही सुन्‍दर ।

sumit का कहना है कि -

एक आंसू नहीं बहाने का वादा था
निभाया, अब लहू आता है अश्क नहीं आता

मेरे दिल के दर्द रूह के सुकूं
जान जाती है मेरी तू नज़र नहीं आता

ye do sher bahut acche lage.....

मान जाऊंगा..... ज़िद न करो का कहना है कि -

ab lahoo aata hai, ashq nahin aata...

bahut barhiya... kaafi zazbaati hai...

Anonymous का कहना है कि -

दर्द कि शहजादी तो रचना में है
पर आशीष का अक्स नजर नहीं आता .
मज़ा आ गया आशीष भाई .

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