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प्यार की दुनिया को फिर से, देख लो इक बार तुम


सितंबर प्रतियोगिता की चौदहवीं और अंतिम कविता आलोक गौड की है। प्रतियोगिता मे नियमित प्रतिभागी रहे आलोक की यह कविता राह से भटक कर हिंसात्मक गतिविधियों मे रत देश के तमाम युवाओं को संबोधित करती है और प्रेम एवं भाईचारे के शाश्वत मूल्यों मे भरोसा करने का आह्वान करती है।

कविता

प्यार की दुनिया को फिरसे, देखलो इकबार तुम
मान जाओ, आ-भी-जाओ, मत करो इनकार तुम
उस जगह तो प्यार कोई, कर न तुमको पाएगा
फिर चले आओ वहाँ, कभी थे जहाँ इकबार तुम

प्यार की दुनिया को फिरसे, देखलो इकबार तुम

कुछ गलत और कुछ सही, ज़िन्दगी तो है यही
होगा क्या उस जीत का, ये ही गर जो ना रही  
जो नेता मरने को कहे, रहो उससे होशियार तुम
उसपार की जाने ना कोई, खुश रहो इसपार तुम

प्यार की दुनिया को फिरसे, देखलो इकबार तुम

जो भी सुलझा है जहाँ में, जंग से सुलझा नहीं
उलझा मगर ज़रूर है, तुम मानो या मानो नहीं
मारती है लकड़ी भी, गर बनाओगे हथियार तुम
नाव आगे खे ही लोगे, बनाओ उसे पतवार तुम

प्यार की दुनिया को फिरसे, देखलो इकबार तुम

कभी हारना कभी जीतना, ज़िन्दगी में आम है
हर हाल में पर मुस्कुराना, आदमी का काम है
जो करोगे सो भरोगे, ये तो जानते हो यार तुम  
प्यार का फिर ज़िन्दगी को, दे-ही-दो उपहार तुम

प्यार की दुनिया को फिरसे, देखलो इकबार तुम

मौत से ठगती है तुमको, ये तुम्हारी ज़िन्दगी
तुम देखना रूठे नहीं, तुमसे तुम्हारी ज़िन्दगी
शक्ल से तो प्यारे हो, अक्ल से समझदार तुम
खांमखां ही मौत से, खा ना जाना मार तुम

प्यार की दुनिया को फिरसे, देखलो इकबार तुम
मान जाओ आ भी जाओ, मत करो इंकार तुम
उस जगह तो प्यार कोई, कर न तुमको पाएगा
फिर चले आओ वहाँ, कभी थे जहाँ इकबार तुम

प्यार की दुनिया को फिरसे, देखलो इकबार तुम


अक्षरों से बातें


सितंबर माह की यूनिप्रतियोगिता मे तेरहवें पायदान की कविता प्रियंका चित्रांशी की है। इनकी पिछली कविता जनवरी माह मे प्रकाशित हो चुकी है।

कविता: अक्षरों से बातें

अक्षरों
सुनो मेरी बात
आओ मेरे पास
मैं तुम्हारे लिए वेणी बनाउंगी
खयालो से भी नाज़ुक
जलपरी से भी खूबसूरत
ज़ज्बातो के जेवर पहना
एक अनुपम, अद्वितीय बाला बना
सोलह श्रृंगार कर
तुम्हे दुल्हन सा सजाऊँगी

तेरे रूप पे कुर्बान
कुछ फक्कड़, कुछ अनजान लोग
होंगे  तेरे  कद्रदान  
करेंगे तुम्हारी पहचान
रत्न को परखते जोहरी के मानिंद

कुछ खुसरो, तकी मीर या ग़ालिब जैसे
रहस्यवाद और छायावाद में गुसल करते
प्रसाद, निराला और पन्त जैसे
तुझे भक्तिमार्ग में ले जा रहीम, रसखान
मीरा में बदल दें तो
प्रसिद्धि मिल जायेगी

ये सारे
अलग-अलग नामो से पुकारेंगे तुम्हे
इन सब से प्यार करना
किसी के ह्रदय पर कविता बन राज करना
किसी के उर नज़्म बन समाँ  जाना
कोई शायरी कह आवाज दे शायद
तो किसी के लिए भीनी ग़ज़ल बन.....
जुबाँ से फिसल जाना

सभी के मन के अथाह सागर में
एक कोमल स्थान तो मिलेगा तुझे
ऐसा वादा है मेरा
एक निशब्द, अनजाना
लेकिन फिर भी जाना-पहचाना
अर्थयुक्त रिश्ता बन
बिन सवालों का जवाब तलाशे
दिल में राज करोगे तुम सारे

ऐसा नसीब सबका नहीं होता
कोई किसी के इतने करीब भी नहीं होता
मेरे निश्छल स्वभाव को पहचानो
चले आओ ......
कोई विनिमय नहीं
व्यापार नहीं
मेरा क्या ?
एक दिल ही है जों
बहल  जाएगा
तुम्हारी इज्ज़त में इजाफा हो जायेगा

तो हे अक्षरों, शब्दों, मात्राओं, चन्द्र-बिंदियों
चले आओ
साथ में  अल्प विराम और पूर्ण विराम
को भी लाओ
अब कैसी ये दूरी ?
कैसा फासला?
कैसा संकोच ?


ख्वाब कब तक मेरे ज़वाँ रहते


प्रतियोगिता की बारहवीं कविता के रचनाकार डॉ अनिल चड्डा यूनिप्रतियोगिता के नियमित प्रतिभागियों मे से एक हैं। इनकी कविताएं हिंद-युग्म पर पहले भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी पिछली कविता फ़रवरी माह की प्रतियोगिता मे छठे स्थान पर रही थी।

ग़ज़ल: ख्वाब कब तक मेरे ज़वाँ रहते

ख्वाब कब तक मेरे   ज़वाँ  रहते,
रस्ते हमेशा तो नहीं  आसाँ  रहते।

मरने पर  तो  ज़मीं  नसीब नहीं
जीते-जी कहो फिर कहाँ रहते।

शौक फर्मा रहे वो आग से खेलने का,
आबाद कब तक ये  आशियाँ रहते।

 अपना बना कर  ग़र न लूटते हमें,
जाने कब तक  मेरे राजदाँ  रहते।

काबू में रहती मन की बेईमानी अगर,
गर्दिशों में भी  हम  शादमाँ  रहते ।

सीखा न था मर-मर के जीना कभी,
आँधियों   के हम   दरमियाँ रहते ।

लाख सामाँ करो ’अनिल’ की बर्बादी का,
हम   तो  खुश रहते,   जहाँ  रहते ।


विद्रोही आँच


प्रतियोगिता की सातवीं कविता ज्योत्स्ना पांडेय की है। ’चाँदनी’ उपनाम से कविता लिखने वाली ज्योत्स्ना का जन्म जनवरी 1967 मे सीतापुर (उ.प्र.) मे हुआ। लखनऊ की रहने वाली ज्योत्स्ना ने हिंदी मे परास्नातक किया है। कविता का शौक मुख्यतया स्वांत-सुखाय रहा। वर्तमान मे गांधीनगर (गुजरात) मे निवास कर रही ज्योत्स्ना की हिंद-युग्म पर यह प्रथम कविता है।
प्रस्तुत कविता बढ़ते हुए सामाजिक तापमान की कारक विसंगतियों की तलाश हमारे आसपास करने की कोशिश करती है।

पुरस्कृत कविता: विद्रोही आँच

विषमताओं की विवशता,
विभेद से उपजी वैमनस्यता,
कारक हैं
विसंगतियों से विद्रोह का..

विद्रोही आँच से बढता
सामाजिक तापमान,
अंतस को भर देता है,
उमस और घुटन से...

कब, क्या, क्यों और कैसे
जैसे कई प्रश्नों का समाधान,
कागज़-दर-कागज़ होते हुए,
बन्द हो जाता है,
निरुत्तरित फाइलों में...

यदि कभी-कभार
सरकारी योजनाओं के छींटे,
तपते अंतस पर पड़ भी जाएँ
तो, भाप बन कर उड़ जाते हैं,
ऊँची-ऊँची कुर्सियों के हत्थे तक..

ऐसे में,
बढ़ी हुई उमस,
और अधकचरी, अपाच्य योजनाओं
के कारण,
उबकाइयां आती हैं...

समय रहते उपचार न हुआ ,
तो, उल्टियां भी आ सकती हैं,
फदकते हुए आक्रोश की...
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

जींस की यंत्रणा


सितंबर माह की यूनिप्रतियोगिता की ग्यारहवीं कविता अपर्णा भटनागर की है। इनकी एक कविता जुलाई माह मे पाँचवें स्थान पर रही थी।

कविता: जींस की यंत्रणा

झेल सकता है
मनोविज्ञान
तुम्हारा चेहरा आबनूसी काला हो सकता है
या झील में तेल की बूँद के चाँद सा
दाग,
अंधापन,
मूक होना
या दुनिया के लिए बहरापन
तुम इन सब में सीख लेते हो जीना !
पर इधर बहुत कुछ आनुवांशिक नहीं
किन्तु डर लगता है
क्योंकि इसे हम ठेल-ठेल कर
 भरते हैं
अपनी दिमागी आनुवांशिकता पर
एक दुरूह हैलिक संरचना
जिसमें रीतियों की कोशिकाएं
पनपती हैं -
और जन्म से पहले ही
नाम पाते हो  धर्म का
संस्कार का -
जिसमें तुम्हारे ईश्वर की दी कोशिकाएं
धमनियां
नसें
मांस- मज्जा
रूपित-विरूपित होती हैं...,
इंसान से अलग
तुम्हारे नाम अलग होने को चिन्हित करती ..
बस इसी में -
धड़कना सीखता है दिल ...
दिमाग की मशीन
और शरीर के सारे कल-पुर्जे
इश्तहार की तरह
प्रचारित करते हैं
अपनी अस्मिता ...l
गुफाओं में चित्र अंकित करते
न जाने कब
तुमने अलगाव में रहना सीखा?
कब तुम्हारे समूह
स्पर्धाओं की सीमा बुनते गए?
कब इतिहास की सीवन उधेड़कर
तुमने जताना सीखा
कि तुम श्रेष्ठ हो?
कभी तुमने नग्न सौन्दर्य को जिया है...?
तहखानों के बाहर की जिन्दगी...
बहुत दिनों से
बंद हो..!
चिपकी हुई सीलन
सड़ांध
पिस्सू
मकड़ियां...
इन सबके बाहर...
जलता सूरज
हवाओं के जलतरंग
पानी के धरातल के
चिकने-समतल दर्पण हैं ..
झांककर देखो
तुम इंसान हो न !
वंशानुगत
या आनुवांशिक ?

तुम किस परत में मिलोगे


प्रतियोगिता के छठी कविता की रचनाकार के रूप मे एक नया नाम हिंद-युग्म से जुड़ा है। जया पाठक श्रीनिवासन की यह हिंद-युग्म पर प्रथम कविता है। जया का जन्म 1977 मे मुम्बई मे हुआ। पुने के सिम्बिओसिस संस्थान से प्रबंधन मे परास्नातक जया वर्तमान मे गुड़गाँव मे मार्केटिंग क्षेत्र मे कार्यरत हैं। पढ़ने-लिखने के अतिरिक्त चित्रकला मे अभिरुचि रखने वाली जया का काम कई प्रदर्शनियों मे भी प्रदर्शित हुआ है।
प्रस्तुत है उनकी कविता जो एक भावनात्मक धरातल पर मानवीय संबंधों की पहचान के स्तरों की पड़ताल करने की कोशिश करती है।

पुरस्कृत कविता: तुम किस परत में मिलोगे

तुम किस परत में मिलोगे-
वह परत बताएगी
कि तुम कब थे
और कब तक थे
बताएगी
तुम्हारे साथ और क्या था
कब तक था
हाँ वही परत बताएगी
तुम कौन थे
कैसे थे
तुम्हारा नाम क्या था
कितना था
पर बस...
इतना ही हो तुम केवल??
वह जो ह्रदय
धड़कता है तुम्हारे में
उसकी धड़क
वह जो धौंकनी सी चलती है
संघर्षरत तुम्हारे में
उसकी धधक
और वह जो कविता बुनते हो तुम
रोज़ रोज़
उसकी खनक
उसका क्या होगा...
मिटटी कैसे संजो कर रख सकेगी
इतना सब अपनी परतों में
और वह,
जो निकालेगा एक दिन तुम्हे
कुरेद कर उन परतों में से
उसकी अंगुलियाँ
कैसे समझ सकेंगी
इतना सब...
वह तो टटोलेंगी
बस तुम्हारी अस्थियाँ
तुम्हारी चीज़ें-बर्तन-सामान कुछ
और कुछ महल मंदिर
क्या तुम्हारी शिनाख्त इनसे हो जाएगी
पूरी की पूरी?
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इन्द्रधनुषी सपने


प्रतियोगिता की दसवें स्थान की कविता शील निगम की है। पिछले कुछ महीनों से प्रतियोगिता की नियमित प्रतिभागी रही शील जी की पिछली कविता जून माह की प्रतियोगिता के अंतर्गत प्रकाशित हो चुकी है।

पुरस्कृत कविता: इन्द्रधनुषी सपने

 अवसादों के घने साए में,
जब खो जाती हैं आशाएं,
शाम के सुरमई अंधेरों में,
जब मन देता है सदायें,
तो चन्द्र-किरणों के रथ पर हो सवार,
लिए झिल-मिल तारों की सौगात,
रुपहली-सुनहरी यादों के सिरहाने बैठ,
आँखों के कोरों से बहते टप-टप,
आँसुओं से भीगी चादर हटा कर,
अपनी प्रेम ऊष्मा से आलिंगन कर,
मन में छिपे किसी अतीत की याद में,
अल्हड़ स्मृतियों में चंचलता भर कर,
आकांक्षाओं का संसार सजा जाते हैं,
ये सपने, इन्द्रधनुषी सपने.

धुंधली राहों में जब खो जाते हैं अपने,
तो स्वप्निल नयनों में अश्रुकण झलकाते,
कभी अंतस के गहन अवचेतन में,
आशाओं के दीप जलाते,
मन के उजले आँगन में,
रंग-बिरंगे रंग सजाते...
ये सपने...ये इन्द्रधनुषी सपने.

कुछ मूक प्रश्न, कुछ अनुत्तरित प्रश्न,
बसे अन्तस्तल में खोजते उत्तर,
बंद पलकों में, मौन नयनों के भीतर,
चित्रलिपि की भाषा में शब्द बाँचते,
अनसुलझी पहेलियाँ सुलझाते और...
कभी भविष्यवेत्ता बन कर और भी
रहस्यमय बन जाते...
ये सपने...ये इन्द्रधनुषी सपने.

अंतस के तम को हरते,
कभी हँसाते,कभी रुलाते,
कभी जिज्ञासु मन के कौतूहल पर,
मंद-मंद मुस्काते ...ये सपने.
सत्य-असत्य की सीमारेखा पर,
छोड़ जाते अवाक मन...
ये सपने...ये इन्द्रधनुषी सपने.
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बात पर बात होता बात ओराते नइखे


मनोज सिंह भावुक की एक रचना अभी कुछ दिन पहले ही हमने यहाँ साझा की थी। भोजपुरी साहित्य के ख्यातिप्राप्त रचनाकार भावुक की प्रस्तुत भोजपुरी ग़ज़ल प्रतियोगिता मे पाँचवें स्थान पर रही है, और प्रतियोगिता को आँचलिक रंग दे रही है।

पुरस्कृत ग़ज़ल: बात पर बात होता बात ओराते नइखे

बात पर बात होता बात ओराते नइखे
कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे

भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा
मर गइल का बा सुरुज रात ई जाते नइखे

लोग सिखले बा बजावे के सिरिफ ताली का
सामने जुल्म के अब मुठ्ठी बन्हाते नइखे

कान में खोंट भरल बा तबे तऽ केहू के
कवनो अलचार के आवाज़ सुनाते नइखे

ओद काठी बा, हवा तेज बा,किस्मत देखीं
तेल भरले बा, दिया-बाती बराते नइखे

मन के धृतराष्ट्र के आँखिन से सभे देखत बा
भीम असली ह कि लोहा के, चिन्हाते नइखे

बर्फ हऽ, भाप हऽ, पानी हऽ कि कुछुओ ना हऽ
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

दफ्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत, ए ‘भावुक’
छंद के बंध में सब काहें समाते नइखे
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कवि और अधिकारी



प्रतियोगिता की आठवें स्थान की कविता के रचनाकार के रूप मे हम धर्मेन्द्र कुमार सिंह ’सज्जन’ का परिचय अपने पाठकों से करा रहे हैं। धर्मेंद्र सिंह का जन्म 22 सितंबर 1979 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) मे हुआ। इनकी शिक्षा प्रौद्योगिकी स्नातक (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), प्रौद्योगिकी परास्नातक (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की) तक हुई है। अभी एनटीपीसी लिमिटेड, कोलडैम, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश में वरिष्ठ अभियन्ता (सिविल निर्माण विभाग - बाँध) के पद पर कार्यरत हैं। तीन पुस्तकें “‘सज्जन’ की मधुशाला”, “गीत विद्रोही” और “मेरी कल्पनाएँ”, पोथी डॉट कॉम पर प्रकाशित हैं और अनुभूति हिन्दी में कई नवगीत प्रकाशित हुए हैं। सज्जन जी साथ मे कविता कोश कार्यकारिणी टीम के सदस्य हैं एवं कविता कोश में लगभग ४२०० पन्नों का योगदान किया है। इनकी यह हिंद-युग्म पर प्रथम कविता है।

पुरस्कृत कविता: कवि और अधिकारी

कवि तड़प उठता है,
सड़क पर भीख माँगते अनाथ बच्चे को देखकर;
उसके आँसू निकल आते हैं,
किसी अन्धे को अकेले,
सड़क पार करने की कोशिश करते देखकर;
उसके भीतर कविता उमड़ती है,
आग सी लग जाती है,
देश में बढ़ते भ्रष्टाचार को देखकर;
कवि चाय की दूकान से,
दो रूपये की चाय पीता है;
वहीं बगल के चापाकल से पानी पी लेता है,
दस रूपये का कढ़ी चावल खाकर भी पेट भर लेता है;
भूख से मरते गरीब और गोदामों में सड़ते हुए अनाज,
के विरुद्ध प्रदर्शन करता है,
धरना देता है,
अखबारों में लिखता है।

अधिकारी बरिस्ता की दो सौ रूपये की कॉफ़ी पीता है,
वो बड़ी बड़ी बैठकों में शामिल होता है,
जहाँ देश का पैसा गंदे चुटकुले सुनकर,
और सुनाकर,
बर्बाद करता है;
अधिकारी भ्रष्टाचार करने के नए नए तरीके खोजता है,
और फिर उन्हें अमल में लाता है;
बड़ी बड़ी पार्टियों में हराम की खाता है,
और जो नहीं खा पाता उसे बर्बाद करता है;
बोतलबंद पानी पीता है,
मँहगी से मँहगी शराब पीता है;

इन दोनों आत्माओं में ये अलग अलग गुण होना,
अचरज की बात नहीं है;
आश्चर्य तो इस बात का है,
कि ये दोनों आत्माएँ अक्सर,
एक ही आदमी के भीतर रह लेती हैं,
बिना कोई संघर्ष किए,
पूरे सुख और चैन के साथ।
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बेदखल किसान


   सितंबर माह की दूसरे स्थान की कविता आरसी चौहान की है। हिंद-युग्म पर यह उनकी पहली ही कविता है।
   मार्च 1979 को बलिया (उत्तर प्रदेश) मे जन्मे आरसी जी ने हिंदी साहित्य और भूगोल से परास्नातक और पत्रकारिता का डिप्लोमा प्राप्त किया है। साहित्यानुरागी आरसी जी की गीत, कथा व लेख आदि लिखने मे विशेष रुचि रही है और इनकी रचनाएं देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होती रही हैं। कुछ रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी पर भी हुआ है। इसके अतिरिक्त इन्होने कुछ शैक्षिक पाठ्यपुस्तकों का लेखन भी किया है। वर्तमान मे टिहरी-गढ़वाल मे भूगोल के प्रवक्ता हैं।
सम्पर्क: चरौवाँ, बलिया, उत्तर प्रदेश, पिन-221718
 दूरभाष: 9452228335

पुरस्कृत कविता: बेदखल किसान

वो अलग बात है
बहुत दिन हो गये उसे किसानी छोड़े
फिर भी याद आती है
लहलहाते खेतों में
गेहूं की लटकती बालियां
चने के खेत में
गड़ा रावण का बिजूखा
ऊख तोड़कर भागते
शरारती बच्चों का हूजुम
मटर के पौधों में
तितलियों की तरह, चिपके फूल
याद आती है
अब भी शाम को खलिहान में
इकट्‌ठे गाँव के
युवा, प्रौढ़ व बुजुर्ग लोगों से
सजी चौपाल
ठहाकों के साथ
तम्बू सा तने आसमान में
आल्हा की गुँजती हुई तानें
हवा के गिरेबान में पसरती हुई
चैता-कजरी की धुनें
खेतों की कटाई में टिडि्‌डयों सी
उमड़ी हुई
छोटे बच्चों की जमात
जो लपक लेते थे
गिरती हुई गेहूँ की बालियाँ
चुभकर भी इनकी खूँटिया
नहीं देती थी
आभास चुभने का
लेकिन ये बच्चे
अब जवान हो गये हैं
दिल्ली व मुंबई के आसमान तले
नहीं बीनने जाते गेहूँ की बालियाँ
अब यहीं के होकर रह गये हैं
या बस गये हैं
इन महानगरों के किनारे
कूड़े कबाडों के बागवान में
इनकी बीवियां सेंक देतीं हैं रोटियां
जलती हुई आग पर
और पीसकर चटनी ही परोस देतीं हैं
अशुद्ध जल में
घोलकर पसीना
सन्नाटे में ठंडी बयार के चलते ही
सहम जाते हैं लोग
कि गाँव के किसी जमींदार का
आगमन तो नहीं हो रहा है
जिसने नहीं जाना
किसी की बेटी को बेटी
बहन को बहन और माँ को माँ
हमने तो हाथ जोड़कर कह दिया था
कि- साहब ! गाँव हमारा नहीं है
खेत हमारा नहीं है
खलिहान हमारा नहीं है
ये हँसता हुआ आसमान हमारा नहीं है
नींद और सपनों से जूझते
सोच रहा था
वह बेदखल किसान
महानगरों से चीलर की तरह
चिपकी हुई झोपड़ी में
कि क्यों  पड़े हो हमारे पीछे
शब्द् भेदी बाण की तरह
क्या अभी भी नहीं बुझ पायी है प्यास
सुलगती आग की तरह।
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टप्पल मे कौशल किशोर की कविता


कौशल किशोर की एक कविता हमने पिछले माह प्रकाशित की थी। इस माह इनकी यह कविता नवें स्थान पर रही है। प्रस्तुत कविता टप्पल के हालिया जमीन के अनुदान विवाद पर किसानों के आक्रोश को अपना विषय बनाती है।

पुरस्कृत कविता: टप्पल मे

टप्पल में
धरने पर जो बैठे हैं
वे सरकार के विरोध में खड़े है।
सरकार चाहती है
धरना खत्म हो
किसान जायें अपने घर
शान्ति आये
ले और देकर
मामला रफा और दफा हो जाय।
पर किसान हैं
बैठ गये तो बैठ गये
पलहत्थी मार जमीन पर
टेक दी है लाठी
रख दिया है गमछा
सज गया है चौपाल
नेता हो या मंत्री
अफसर हो या संतरी
जिसको आना है यहीं आये
हम नहीं हटेंगे।
कहते हैं -
साठ साल से हम हटे हैं
हटते ही रहे हैं
हटना है तो सरकार हटे
हम तो डटे हैं
अब यहीं डटेंगे
आखिर क्यों दे अपनी ऊपजाऊ जमीन
कंपनियों को
कि वे आयें
और बनायें चमचमाती सड़कें
मॉल और मल्टी पलेक्स
सजे उनके बाजार
दौड़े उनकी गाड़ियाँ
भरे उनकी तिजोरियाँ
वे खेलें खेल में खेल
उनके इस खेल के लिए
क्यों छोड़े हम खेत
और लगा दें अपने भविष्य पर ताला
मुआवजा तो तैयार भोजन है
खाया और हजम
फिर तो सब खतम
जीवन और सपने सब
इसीलिए
अब लाठी चले या गोली
पानी की तेज धार हो
या आंसू गैस
हम नहीं हटने वाले
ऐसी ही जिद्द है इनकी
जिस पर अड़े हैं
टप्पल में
धरने पर जो बैठे हैं
वे सरकार के विरोध में खड़े हैं।
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पुरस्कार -  विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता |


रज्जो की चिट्ठी


 जितेंद्र ’जौहर’ की कविता सितंबर माह मे तीसरे स्थान पर रही है। हिंद-युग्म के लिये यह उनकी पहली कविता है। जुलाई 1971 मे कन्नौज मे जन्मे जितेंद्र ने अंग्रेजी से परास्नातक एवं बी एड की शिक्षा प्राप्त की है और रेणुसागर (सोनभद्र) मे अंग्रेजी अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। जितेंद्र जी ने गीत, गज़ल, दोहा, समीक्षा, व्यंग्य आदि अनेक विधाओं मे लिखा है। इनकी रचनाओं का टीवी तथा आकाशवाणी पर प्रसारण हो चुका है और काव्य-मंचों पर भी गरिमापूर्ण उपस्थिति रही है। कई काव्य व गज़ल संग्रहों का हिस्सा बन चुके जितेंद्र की रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होती रहती हैं। अनेक सम्मान एवं पुरस्कार जैसे पं. संतोष तिवारी स्मृति सम्मान, साहित्यश्री (के.औ.सु.ब. इकाई मप्र), नागार्जुन सम्मान, साहित्य भारती, महादेवी वर्मा सम्मान आदि के अतिरिक्त विभिन्न प्रशस्तियाँ व स्मृति-चिह्न प्राप्त हुए हैं।
सम्पर्क: आई आर- 13/6,  रेणुसागर, सोनभद्र, (उ.प्र.) 231218
मोबाइल  +91 9450320472.

पुरस्कृत कविता: रज्जो की चिट्ठी
                              
दिल के सब अरमान,
हाय! फाँसी पर झूल गये।
पिया! शहर क्या गये,
गाँव का रस्ता भूल गये!

अरसा बीत गया
घर का न हाल लिया कोई।
चिट्ठी लिखी न अब तक
 टेलीफोन किया कोई।

भूले से भी
कभी डाकिया आया न द्वारे।
फोन के लिए
 मिसराइन से पूछ-पूछ हारे!

 होली पे गुझिया को
 अबकी तरस गये बच्चे।
बिना तेल चूल्हे पे
पापड़ भून लिये कच्चे!

 फटा जाँघिया टाँक-टाँक
 कलुआ को पहनाया।
कई दिनों से घर में
सब्ज़ी-साग नहीं आया!

कुल्फी वाला जब
अपने टोले में आता है।
सबको खाते देख छुटन्कू
लार गिराता है!

दलिया के लालच में कल
‘इस्कूल’ गया छुटुआ।
उमर नहीं थी पूरी सो,
 ‘इडबीसन’ नहीं हुआ !

सही कहत बूढ़े-बुजुर्ग
कि जहाँ जाए भूखा।
किस्मत का सब खेल
राम जी! वहीं पड़त सूखा।

एक रोज बोलीं मुझसे
 जोगिन्दर की माईं।
’ए रज्जो ! तोहरे पउवाँ में,
बिछिया तक नाहीं!’

का बतलाऊँ..? मरे लाज के,
बोल नहीं निकरा।
हमरे घर का हाल,
गाँव अब जानत है सिगरा!

सुबह-शाम बापू की रह-रह,
 साँस उखड़ जाती।
फूटी कौड़ी नहीं
दवाई जो मैं ले आती!

का लिखवाऊँ हाल,
हाय रे... बूढ़ी मइया का ?
‘कम्पोडर’ का पर्चा,
दो सौ तीस रुपैय्या का!


रोज-रोज की गीता
आखिर किस-किससे गाएँ?
कर्ज माँगने किस-किस के
 दरवाजे पे जाएँ?

ठकुराइन पहले ही रोज,
 तगादा करती है।
कल बोली,
 ‘रज्जो.. तू झूठा वादा करती है!’

तू-तड़ाक-तौहीन
 झेलकर, बहुत बुरा लागा।
कर्ज-कथा ठकुराइन
 घर-घर सुना रही जा-जा।

इससे ‘जादा’ और
 ‘बेजती’ क्या करवाओगे ?
अम्मा पूछ रहीं हैं,
 "लल्ला...घर कब आओगे?"

बापू को
सूती की एक लँगोटी ले आना।
और सभी के लिए
 पेटभर रोटी ले आना!

मुन्नू चच्चा से कहकर
 ये चिट्ठी लिखवाई।
जल्दी से पहुँचइयो दिल्ली,
 ....हे दुर्गा माई !
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आशीष पंत की कविता मे परजीवी


सितंबर माह की प्रतियोगिता मे आशीष पंत की कविता तीसरे पायदान पर रही है। पिछले कुछ माहों से प्रतियोगिता के नियमित प्रतिभागी रहे आशीष हिंद-युग्म पर पहले भी प्रकाशित हो चुके है। इससे पहले इनकी एक कविता ने जून माह मे सोलहवाँ स्थान बनाया था।

पुरस्कृत कविता:  परजीवी

अकेलापन ले जाता है
अपने ही आप से दूर
खुद से बाहर होकर
खुद में झाँकने की
ज़रूरत नहीं मालूम होती

दूर से ही दिखती हैं अपनी
खुशियाँ खेलती, रंजिश कांपती
ख़्वाब आँखें मलते,
उबासी लेता गम और
करवट लेती इच्छाएं

साफ़ दिखता है कि
मेरी ही सोच बढाती है उनको
जब वो चलती है उन में
रगों में खून के सतत
बहाव की तरह

हर विचार एक
ऊर्जा का संचार करता है
इनमें से किसी में
और वो और बढ़ते हैं

ताल में  पत्थर फैंकने से
निकली तरंगों की तरह

जब मैं बाहर हूँ इन सबके
तो ये सब मेरे नहीं हैं
कहीं और के हैं
जो मुझ में जी रहे हैं
एक परजीवी की तरह

और मैं इनका परिचारक
ता उम्र जीता रहा हूँ
इनके पोषण के लिए
इन्होने शनै: शनै:
मारा है मुझे

मेरी सोच को
नाभि रज्जू कि तरह
इस्तेमाल करके
इन्होने बूँद बूँद
चूसा है मुझे

पर ये सब मैं नहीं
तो मैं कौन हूँ
ये मुझसे नहीं
मैं इनसे नहीं
तो मैं किस से हूँ

यही विचार
तोड़ देता है
मेरा बुलबुले सा अकेलापन
और मैं 'जी' उठता हूँ
परजीवियों के जीने के लिए

नहीं, मैं मरने लगता हूँ
फिर से |

शायद मरने लगना ही
जीने भर का नाम है|

मैं जानता हूँ
पानी में बढती तरंगों की तरह ही
एक दिन ये परजीवी भी
इतने बढ़ेंगे
कि अपना अस्तित्व खो देंगे
संसृति के इसी ताल में

और फिर से कोई एक और पत्थर फ़ेंक देगा।
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सितंबर माह यूनिप्रतियोगिता के परिणाम: महेंद्र वर्मा बने यूनिकवि


   हम सितंबर 2010 की यूनिप्रतियोगिता के परिणाम ले कर उपस्थित हैं। कुछ निर्णायकों की अतिशय व्यस्तता के चलते परिणाम घोषित करने मे 3 दिन का विलम्ब हुआ, जिसके लिये हम क्षमाप्रार्थी हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि सितंबर माह की यूनिकवि प्रतियोगिता हिंद-युग्म के इस मासिक कविता आयोजन का 45वाँ पड़ाव है। हर माह प्रतियोगिता से कई नये प्रतिभागियों का जुड़ना इस आयोजन की बढ़ती लोकप्रियता का प्रमाण है। आशा है कि आगे भी नयी प्रतिभाएँ यूनिप्रतियोगिता के माध्यम से सामने आती रहेगीं और उन्हे पाठकों की गंभीर प्रतिक्रियाओँ का प्रतिसाद मिलता रहेगा।
   यहाँ हम एक बात कहना चाहेंगे कि प्रतियोगिता के नियमों मे स्पष्ट कर देने के बावजूद कई प्रतिभागियों की पूर्वप्रकाशित या ब्लॉग आदि पर प्रकाशित प्रविष्टियाँ भी आ जाती हैं, जिन्हे कि हमें खेद सहित अस्वीकृत करना पड़ता है। अतः हम भावी प्रतिभागियों से अनुरोध करेंगे कि कृपया भविष्य मे पूर्णतः अप्रकाशित व मौलिक रचनाएँ ही प्रतियोगिता के लिये भेजें। साथ ही पिछले माहों मे भेजी जा चुकी किसी रचना को दोबारा प्रतियोगिता के लिये न भेजें।
   इस बार प्रतियोगिता मे कुल 46 प्रविष्टियाँ सम्मिलित थीं। प्रथम चरण के 3 निर्णायकों द्वारा प्रदत्त अंकों के आधार पर कुल 18 कविताएँ द्वितीय चरण के लिये चयनित हुईं। द्वितीय चरण मे 2 निर्णायकों ने उन्हे आँका। दोनों चरणों के कुल प्राप्तांकों के औसत के आधार पर सभी 18 कविताओं का क्रम निर्धारित किया गया। कुल अंकों के आधार पर महेंद्र वर्मा की ग़ज़ल को सितंबर माह की यूनिकविता बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। इस बार कुछ अरसे के बाद एक ग़ज़ल यूनिकविता के रूप मे चुन कर आयी है। महेंद्र वर्मा पिछले कुछ माहों से ही यूनिप्रतियोगिता से जुड़े हैं। इनकी एक कविता जुलाई माह मे 13वें स्थान पर रही थी। वैसे तो इनका परिचय हम पाठकों से पहले करा चुके हैं, मगर यहाँ एक बार पुनः सितंबर माह के यूनिकवि का परिचय हम अपने पाठकों से बाँट रहे हैं।

यूनिकवि: महेंद्र वर्मा

जन्म - 30 जून 1955 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग ज़िले के गांव बेरा में।
शैक्षणिक योग्यता - बी.एस-सी.,एम.ए.,दर्शनशास्त्र।
व्यवसाय- व्याख्याता
पता - जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बेमेतरा,जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़।
रुचियां - साहित्य, संगीत,विविध कलाएं और अध्ययन-लेखन।
साहित्यिक उपलब्धियां- बचपन से ही साहित्य पढ़ने लिखने का शौक। विविध विधाओं मे रचनाएं जैसे, आलेख, निबंध, गजलें, बाल कविताएं आदि के रूप में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। नवभारत,अमृत संदेश, सापेक्ष,सुरति योग आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। आकाशवाणी रायपुर से ग़ज़लें एवं वार्ताएं प्रसारित। अंतर्जाल की पत्रिका रचनाकार में ग़ज़लें प्रकाशित, सृजनगाथा एवं आखर कलश में ग़ज़लें प्रकाशनार्थ स्वीकृत। छत्तीसगढ़ की विद्यालयीन पाठ्य पुस्तक में एक गीत सम्मिलित। निष्ठा साहित्य समिति, बेमेतरा द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ‘‘निनाद‘‘ का संपादन। ‘सुरति योग‘ आध्यात्मिक पत्रिका के चार विशेषांकों का संपादन। विगत 25 वर्षों से वार्षिक स्मारिका शिक्षक दिवस का सम्पादन।

यूनिकविता: ग़ज़ल

आपकी दीवानगी बिल्कुल लगे मेरी तरह,
ये अचानक आप  कैसे हो गए मेरी तरह।

इक अकेला मैं नहीं कुछ और भी हैं शहर में,
जेब में  रक्खे हुए दो चेहरे,  मेरी  तरह।

भीड़ से पूछा किसी ने, किस तरह हो आदमी,
हो गई मुश्किल, कि सारे कह उठे मेरी तरह।

लोग, जो सब जानने का कर रहे दावा मगर,
दरहक़ीकत वे नहीं कुछ जानते  मेरी तरह।

किसलिए यूँ  आह के  पैबंद  टांके जा रहे,
क्या जिगर मे छेद हैं अहसास के मेरी तरह।

खुदपरस्ती  के अंधेरे में भला कैसे  जिएँ,
देख  जैसे जल रहे हैं ये दिये  मेरी तरह।

मजहबी धागे  उलझते जा रहे थे, और वे,
नोक से तलवार की सुलझा रहे मेरी तरह।

पुरस्कार और सम्मान-   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों को समयांतर पत्रिका की वार्षिक सदस्यता देंगे तथा उनकी कविता यहाँ प्रकाशित की जायेगी उनके क्रमशः नाम हैं-


आरसी चौहान
आशीष पंत
जितेंद्र जौहर
मनोज सिंह ’भावुक’
जया पाठक
ज्योत्स्ना पांडे
धर्मेंद्र कुमार  सिंह सज्जन
कौशल किशोर
शील निगम


हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त भी बहुत सी उल्लेखनीय कविताओं का प्रकाशन करते हैं। इस बार हम निम्नलिखित
4 अन्य कवियों की कविताएँ भी एक-एक करके प्रकाशित करेंगे-


मनुपर्णा भटनागर
डॉ अनिल चड्डा
प्रियंका चित्रांशी
आलोक गौड़


उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 31 अक्टूबर 2010 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

  हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। शीर्ष 18 कवियों के नाम अलग रंग से लिखित है।

अनिल कुलश्रेष्ठ
संतोष कुमार सिंह
कैलाश जोशी
वसीम अकरम
देवी नागरानी
राम डेंजारे
शेखर तिवारी
राजीव श्रीवास्तव
पवन तिवारी
योगेंद्र वर्मा व्योम
सोहन चौहान
संजीवन मयंक
रिम्पा परवीन
प्रवीण आर्य
सुरेंद्र अग्निहोत्री
अनिरुद्ध यादव
राकेश पुरी रिक्की
नूरैन अंसारी
अश्विनी राय
सनी कुमार
बोधिसत्व कस्तुरिया
नीरज पाल
जोमयिर जिनि
मुकुल उपाध्याय
अजय दुरेजा
प्रकाश यादव निर्भीक
श्याम गुप्ता
मंजरी शुक्ला
ऋषभ कुमार
अशोक शर्मा
अरविंद कुरील सागर
तोशा दुबे

नोट- हम यूनिपाठक/यूनिपाठिका का सम्मान वार्षिक पाठक सम्मान के तौर पर सुरक्षित रख रहे हैं। वार्षिक सम्मानों की घोषणा दिसम्बर 2010 में की जायेगी और उसी महीने हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव 2010 में उन्हें सम्मानित किया जायेगा।