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Friday, June 18, 2010

ज़िंदगी और ख़्वाब


युवा कवयित्री ऋतु सरोहा की कविताएँ अक्सर ही निर्णायकों का ध्यान खींचती रही हैं। मई माह की यूनिप्रतियोगिता में इनकी कविता ने ग्याहरवाँ स्थान बनाया।

कविता: ख़्वाब

मेरा ही कोई
ख्वाब था शायद.,
"छत
किसी काई भरे
तालाब की तरह
पिघली-सी थी,
पंखा तैरता था
कभी डूबता था...

ख़्वाब टूटा तो
आँख
स्याह पानी से भरी थी,
मुस्कुराहट तैरती थी
तो कभी डूब जाती थी....

उफ़ ..!
ज़िन्दगी ख्वाबों में और
ख्वाब आँखों में घुल गए हैं.....

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

मनोज कुमार का कहना है कि -

कविता की पंक्तियां बेहद सारगर्भित हैं।

डा.राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

निःसन्देह जिन्दगी एक ख्वाब है
अच्छा या बुरा हमारे दृषिकोण और कर्मों पर निर्भर करता है.

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

:)

विपुल का कहना है कि -

आँख स्याह पानी से भरी थी,
मुस्कुराहट तैरती थी
तो कभी डूब जाती थी....


यह बात अच्छी लगी । उम्दा कविता ।

sumita का कहना है कि -

जिन्दगी को बहुत सलीके से वर्णित किया है..बधाई!

M VERMA का कहना है कि -

उफ़ ..!
ज़िन्दगी ख्वाबों में और
ख्वाब आँखों में घुल गए हैं.....
शायद ज़िन्दगी ख्वाबो का एक सिलसिला है
सिलसिलेवार सजाया है कविता को

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