फटाफट (25 नई पोस्ट):

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फूल-सी लड़की के लिए...


वो बचपन की पहेली,

हम जिसे अब तक नहीं समझे..

तुम्हारा मुंह चिढ़ाती है,

ज़रा तुम भी चिढ़ाओ ना..

उठो, जल्दी से आओ ना...


वो एक तस्वीर अलबम की,

जिसमें मैं खड़ा आधा-अधूरा सा,

तुम्हें फुर्सत नहीं अपनी शरारत से...

तुम्हें तस्वीर का हिस्सा बनाने में,

मैं खींचता तो हूं...

मगर तस्वीर थोड़ा और पहले

खिंच ही जाती है....

मैं फिर खड़ा हूं,

सब खड़े हैं, हंसते चेहरे...

तुम कहां हो....

हथेली को बढ़ाओ ना...

उठो जल्दी से आओ ना...


मैं कितनी देर तक हंसता रहा था...

गुलाबी फ्रॉक वाली एक लड़की

लाल घूंघट में...

शरम से लाल होकर छिप रही थी..

मुस्कुराती थी....

...............

अचानक...

कौन था...जिसने की चोरी

सांसों की गठरी..

मैं कुछ क्यों कर नहीं पाया....

अचानक..

चार कंधों पर....

ये लंबी नींद की चादर.....

मैं कुछ क्यों कर नहीं पाया....


अभी गहरी उदासी में...

तुम्हें तो मुस्कुराना था...

अभी तो उम्र की कई सीढ़ियों के

पार जाना था...


मैं रोना चाहता हूं,

उस नए मेहमान की खातिर,

जिसे भरनी थी किलकारी

सभी की गोदियां चढ़कर...

खिलौने, दूध की बोतल

पटक कर तोड़ देनी थीं...

सुनाए कौन अब वो तोतली बोली,

दिल कैसे बहल जाए, बताओ ना...

उठो जल्दी से आओ ना...


अभी तो इक महकती

फूल-सी लड़की को

सारी रात जगकर...

मेरी आंखों में तकना था....

हंसना था, महकना था..

ज़िद तारों की करनी थी...

मेरे कंधे पे चढ़कर

चांद की ठुड्डी पकड़नी थी...

......................

मैं अब भी बंद आंखों से,

तुम्हारी राह तकता हूं...

मैं सोया हूं बहाने से....

ज़रा चुपके, सिरहाने से....

मेरा तकिया हिलाओ ना....

मैं सोया हूं, जगाओ ना...

मेरी छोटी बहन पूजा,

मेरी अच्छी बहन पूजा,

उठो जल्दी से आओ ना...

...................................
निखिल आनंद गिरि
(साल 2010 का पहली कविता....एक छोटी बहन थी जो डिलीवरी से पहले ही डॉक्टरों और ससुरालवालों की लापरवाही का शिकार हो गई...उससे जुड़ी यादों को सहेजने की कोशिश )