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रुस्तम सौ, सोहराब हज़ारों रखती है.


आँखों में असबाब हज़ारों रखती है,
वो लड़की जो ख्वाब हज़ारों रखती है....

रोती है, जब चाँद सिकुड़ता थोड़ा भी,
पर खुद हीं आफ़ताब हज़ारों रखती है....

क्या जाने, क्यों होठों पे सौ रंग भरे,
जब उन में गुलाब हज़ारों रखती है..

मैं क्या हूँ! वो नाज़नीं अपने कदमों में
रुस्तम सौ, सोहराब हज़ारों रखती है..

वैसे तो गुमसुम रहती है लेकिन वो
हर आहट में आदाब हज़ारों रखती है..

-विश्व दीपक

जब बांध सब्र का टूटेगा, तब रोएंगे....


जब बांध सब्र का टूटेगा, तब रोएंगे....
अभी वक्त की मारामारी है,
कुछ सपनों की लाचारी है,
जगती आंखों के सपने हैं...
राशन, पानी के, कुर्सी के...
पल कहां हैं मातमपुर्सी के....
इक दिन टूटेगा बांध सब्र का, रोएंगे.....

अभी वक्त पे काई जमी हुई,
अपनों में लड़ाई जमी हुई,
पानी तो नहीं पर प्यास बहुत,
ला ख़ून के छींटे, मुंह धो लूं,
इक लाश का तकिया दे, सो लूं,....
जब बांध.....

उम्र का क्या है, बढ़नी है,
चेहरे पे झुर्रियां चढ़नी हैं...
घर में मां अकेली पड़नी है,
बाबूजी का क़द घटना है,
सोचूं तो कलेजा फटना है,
इक दिन टूटेगा......

उसने हद तक गद्दारी की,
हमने भी बेहद यारी की,
हंस-हंस कर पीछे वार किया,
हम हाथ थाम कर चलते रहे,
जिन-जिनका, वो ही छलते रहे....
इक दिन...

जब तक रिश्ता बोझिल न हुआ,
सर्वस्व समर्पण करते रहे,
तुम मोल समझ पाए ही नहीं,
ख़ामोश इबादत जारी है,
हर सांस में याद तुम्हारी है...
इक दिन...

अभी और बदलना है ख़ुद को,
दुनिया में बने रहने के लिए,
अभी जड़ तक खोदी जानी है,
पहचान न बचने पाए कहीं,
आईना सच न दिखाए कहीं!
जब बांध ....

अभी रोज़ चिता में जलना है,
सब उम्र हवाले करनी है,
चकमक बाज़ार के सेठों को,
नज़रों से टटोला जाना है,
सिक्कों में तोला जाना है...
इक दिन....

इक दिन नीले आकाश तले,
हम घंटों साथ बिताएंगे,
बचपन की सूनी गलियों में,
हम मीलों चलते जाएंगे,
अभी वक्त की खिल्ली सहने दे...
जब बांध..

मां की पथरायी आंखों में,
इक उम्र जो तन्हा गुज़री है,
मेरे आने की आस लिए..
उस उम्र का हर पल बोलेगा....

टूटे चावल को चुनती मां,
बिन बांह का स्वेटर बुनती मां,
दिन भर का सारा बोझ उठा,
सूना कमरा, सिर धुनती मां....

टूटे ऐनक की लौटेगी
रौनक, जिस दिन घर लौटूंगा...
मां तेरे आंचल में सिर रख,
मैं चैन से उस दिन सोऊंगा,
मैं जी भर कर तब रोऊंगा.....

तू चूमेगी, पुचकारेगी,
तू मुझको खूब दुलारेगी...
इस झूठी जगमग से रौशन,
उस बोझिल प्यार से भी पावन,
जन्नत होगी, आंचल होगा....
मां! कितना सुनहरा कल होगा.....

इक दिन टूटेगा बांध सब्र का, रोएंगे....


निखिल आनंद गिरि

सबकी किस्मत में नहीं होते ख़ुदा....


वो जो एक कमरा था बित्ते भर का,
और हम-तुम भी थे इत्ते भर के..
बंद कमरे में हंसी देर तलक,
चुप-सी दीवारें भी सुनती ही रहीं.....

एक मैं था कि तेरे कहने पर,
शाम तक गाता रहा खुश होकर,
तुम किसी बुत की तरह सुनती रहीं,
लफ्ज़ों के बीच सांसों के मानी....

वक्त ने पढ़ लिए थे छुप-छुप कर,
एक ख़त था जो तुम्हारी खातिर,
फिर हवाओं ने भी चुगली की थी,
मेरा सब लुट गया था, तुम चुप थे...

याद है एक सुबह बस का सफ़र,
फिर हवाओं ने साज़िश की थी,
पूरी कायनात मेरे बस में थी,
तुमने कांधे पे सर रखा था जब...

वो सहेली कि जिसकी खातिर,
मेरे जज़्बात रोज़ क़त्ल हुए,
मुझसे हंस-हंस के अब भी कहती है,
सबकी किस्मत में नहीं होते ख़ुदा,

एक वो दिन की मछलियों का शहर,
मुझपे कहर जैसा टूट कर बरसा,
इस क़दर तुम नज़र से गिरते रहे,
बह गया आंसुओं में सारा शहर....

आज हाथों में आईना लेकर,
ख़ुद को पहचानने की कोशिश है,
नया चेहरा है, नये मंज़र हैं,
तुम नहीं हो कहीं भी, दूर तलक...

पुरानी यादों के कैनवास से,
एक-एक कर मिटा दिए सब रंग,
23 जून..
बस यही तारीख़ है कि मिटती नहीं,
मेरी जां लेगी देखना इक दिन............

निखिल आनंद गिरि