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रुस्तम सौ, सोहराब हज़ारों रखती है.


आँखों में असबाब हज़ारों रखती है,
वो लड़की जो ख्वाब हज़ारों रखती है....

रोती है, जब चाँद सिकुड़ता थोड़ा भी,
पर खुद हीं आफ़ताब हज़ारों रखती है....

क्या जाने, क्यों होठों पे सौ रंग भरे,
जब उन में गुलाब हज़ारों रखती है..

मैं क्या हूँ! वो नाज़नीं अपने कदमों में
रुस्तम सौ, सोहराब हज़ारों रखती है..

वैसे तो गुमसुम रहती है लेकिन वो
हर आहट में आदाब हज़ारों रखती है..

-विश्व दीपक

साढे साती


मुझे डर था बस इसी बात का,
कि ये हश्र न हो मुलाकात का।

तूने मन को मार के क्या पाया,
बुझा ध्रुवतारा तेरी रात का।

हँसी अब जो काटती है तुझको,
है ये असर नेक ख्यालात का।

वो जो किस्मत बाँटते हैं उनके,
शनि घर में है साढे सात का।

जिसे कमतर आँकते थे सारे,
वो था अंतर शह और मात का।

-विश्व दीपक

देवता तक आज आते हीं नहीं...


लोग हैं कि दुश्मनी के रास्ते गढते यहाँ,
और तुम कि दोस्ती से बाज आते हीं नहीं...

मान भी लो दुनिया तेरे सोचने जैसी नहीं,
मान भी लो तुमको ये अंदाज आते हीं नहीं....

मौन हो लो क्योंकि तेरे कहने का ना फ़ायदा,
होठ सी लो जैसे कि अल्फ़ाज़ आते हीं नहीं....

ज़ख्म है ये जानता हूँ पर मुनासिब है यही,
सोच लो कि कोढ के ये खाज आते हीं नहीं...

कौन होगा जो कहेगा लूटने दो मुझको भी,
इस तरह उनके तो तख्तो-ताज आते हीं नहीं...

खूब तुमको है पड़ी जो कालिखें उतारने की,
यार देखो! देवता तक आज आते हीं नहीं...

-विश्व दीपक

आखिरी रहनुमा


ज़िंदगी बोनसाई हुई क्यूँकर,
मौत की चारपाई हुई क्यूँकर..

शाम से सहर की उसने घुटके,
रात से(में) बेवफ़ाई हुई क्यूँकर..

आप तो आखिरी रहनुमा न थे,
आप से आशनाई हुई क्यूँकर..

जातियाँ आपकी तो बपौती नहीं,
प्यार पे कारवाई हुई क्यूँकर..

घाव दो जब भी तो नयापन रखो,
साजिशें आजमाई हुई क्यूँकर..

-विश्व दीपक