लोग हैं कि दुश्मनी के रास्ते गढते यहाँ,
और तुम कि दोस्ती से बाज आते हीं नहीं...
मान भी लो दुनिया तेरे सोचने जैसी नहीं,
मान भी लो तुमको ये अंदाज आते हीं नहीं....
मौन हो लो क्योंकि तेरे कहने का ना फ़ायदा,
होठ सी लो जैसे कि अल्फ़ाज़ आते हीं नहीं....
ज़ख्म है ये जानता हूँ पर मुनासिब है यही,
सोच लो कि कोढ के ये खाज आते हीं नहीं...
कौन होगा जो कहेगा लूटने दो मुझको भी,
इस तरह उनके तो तख्तो-ताज आते हीं नहीं...
खूब तुमको है पड़ी जो कालिखें उतारने की,
यार देखो! देवता तक आज आते हीं नहीं...
-विश्व दीपक






