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प्यार की तीखी टीस


प्यार की तीखी टीस
ज़मानों बाद टभकती है क्यों?
अश्क़ अम्ल हो जाते हैं
यूँ याद फफकती है क्यों?

पतझड़ के पत्तों के सरीखे
सीने में बिखरे जज़्बात
और इन उपलों पर पड़ती
दूर के सूरज-सी तेरी बात,
कुतर-कुतर स्वाहा कर पूछे,
अरे! आग भभकती है क्यों?

अश्क़ अम्ल हो जाते हैं,
तेरी याद फफकती है क्यों?

ठिठुर-ठिठुर के रात काटते
कंकालों-सा मेरा मन,
एक-आध कतरों से बुनकर
डाल रखा उस पर संयम,
हिचक-हिचक ना टूट पड़े....
तेरी आँख भटकती है क्यों?

अश्क़ अम्ल हो जाते हैं,
तेरी याद फफकती है क्यों?

उन्हीं चार लम्हों से लेकर
माटी, गारे, खप्पर, बाँस,
लुढक-ढुलक जोड़ी है मैंने
कई सदियों में थोड़ी आस,
आज मगर फिर तुझे सोच,
मेरी साँस टपकती है क्यों?

अश्क़ अम्ल हो जाते हैं,
तेरी याद फफकती है क्यों?

-विश्व दीपक

कड़वी सुपारी है..


कड़वी सुपारी है!

आँखों की आरी से,
दो-दो दुधारी से,
तिल-तिल के,
छिल-छिल के,
काटी है बारी से...

बोलूँ क्या? तोलूँ क्या?
ग़म सारे खोलूँ क्या?
टुकड़ों की गठरी ये
पलकों की पटरी पे
जब से उतारी है,
धरती से, सख्ती से
किस्मत की तख्ती से
अश्कों की अलबेली
बरसात ज़ारी है..

आशिक कहे कैसे,
चुपचाप है भय से,
लेकिन ये सच है कि
चाहत की बेहद हीं
कीमत करारी है..

कड़्वी सुपारी है!

ओठों के कोठों पे
हर लम्हा सजती ये
हर लम्हा रजती ये
हर राग भजती है!
कोई न जाने कि
इसको चखे जो
सलाखों के पीछे
इतना धंसे वो
कि
दिल का मुचलका
जमा करने पर भी
तो
बाकी जमाने हीं
भर की उधारी है..

कैसा जुआरी है?

आँखों से पासे
जो फेंके अदा से,
उन्हीं में उलझ के
कहीं और मँझ के
किसी की हँसी पे
बिना सोचे रीझ के
ये मन की तिजोरी
से मुहरें गँवा दे..
तभी तो
कभी तो
बने ये भिखारी है..
आशिक भी यारों
बला का जुआरी है..

मानो, न मानो
पर सच तो यही है-
मोहब्बत बड़ी हीं
कड़वी सुपारी है..

-विश्व दीपक

तारीखें तारीक सही..


तारीखें तारीक सही,
उम्मीदें बारीक सही.....
तालु से तलवों में उतरी
अपनी हर तहरीक सही...

पर
हम सब का
हाल-ओ-मुस्तकबिल
तब हीं तो काबिल होगा,
जब
माज़ी के मरघट का यारों
हर दिल हीं कातिल होगा...
जब
मौज़ूं हर मेहनत होगी
और हौसला भी कामिल होगा..

इस
हिन्द के सख्त सफ़ीने का
जो माज़ी है माझी बन बैठा
उसे ठेलकर
नया दौर जब
दंगल में दाखिल होगा
ठीक उसी दिन
मौजें होंगी
और नया साहिल होगा..

मुझे यकीं है-
जल्द ये मंज़र
हक़ीक़त को हासिल होगा...

फिर क्या गम
कि
अपनी सब
तारीखें तारीक रहीं,
आने वाली नस्लें अब
दुहराएँगी लीक नहीं..

-विश्व दीपक

रुस्तम सौ, सोहराब हज़ारों रखती है.


आँखों में असबाब हज़ारों रखती है,
वो लड़की जो ख्वाब हज़ारों रखती है....

रोती है, जब चाँद सिकुड़ता थोड़ा भी,
पर खुद हीं आफ़ताब हज़ारों रखती है....

क्या जाने, क्यों होठों पे सौ रंग भरे,
जब उन में गुलाब हज़ारों रखती है..

मैं क्या हूँ! वो नाज़नीं अपने कदमों में
रुस्तम सौ, सोहराब हज़ारों रखती है..

वैसे तो गुमसुम रहती है लेकिन वो
हर आहट में आदाब हज़ारों रखती है..

-विश्व दीपक

सो ना हीं लूँ तो है सही..


नाम लिया तो बदनाम हो जाऊँगा..

सो ना हीं लूँ तो है सही..

क्योंकि
उसकी लटों से फ़ँसके मैं,
उसकी लतों से हँसके मैं
गुजरा अगर जो
सामने
दुनिया के,
उसको थामने
तो जानता हूँ
पाक़-साफ़
इस जहां की
तंग-सी हर एक गली मे
इश्क़ के मैं नाम पर
दुश्नाम(गाली) हो जाऊँगा.
बदनाम हो जाऊँगा........

ग़ालिबन
यह ठीक हो कि
ज़ौक की
शायरी का शौक ले
मैं
दाग़ के हर शेर पे
ढेर होता हीं रहूँ,
मीर के तुनीर से
निकले हुए हर तीर से
ज़ख्म खाके
आशिक़ी के ज़ेर (नीचे) होता हीं रहूँ,
या कि किसी साहिर की
राह का मुसाफ़िर हो
बह चलूं और
वादियों की आड़ में
खिल रहे गुलज़ार से
उड़्ती इन आब-ओ-हवा को
लूटने को
मेड़ होता हीं रहूँ..

जो भी हो
या
जो भी हो लूँ
लेकिन मैं यह जानता हूँ
ज्योंहिं मैने
नाम लेके
एक लफ़्ज़ भी कहा
तो बाखुदा
वो लफ़्ज़ हीं कलाम हो जाएगा...
कलाम क्या..
वो एक पूरा दीवान हो जाएगा..
और फिर
मजरूह मैं
बेकार सब
सौदाईयों का हमनाम हो जाऊँगा..
बदनाम हो जाऊँगा...

इसलिए यह सोचता हूँ कि
ना हीं लूँ तो है सही..

-विश्व दीपक

तो बड़ा शायर हूँ..


मैं चाँद को दरीचों में उतारूँ तो बड़ा शायर हूँ,
मैं रात से गलीचों को सवारूँ तो बड़ा शायर हूँ,
मैं ख़्वाब में तारों की पनाह लूँ तो बड़ा शायर हूँ,
मैं आग से साँसों की निबाह लूँ तो बड़ा शायर हूँ,
मैं रूह की ये राख उड़ा दूँ तो बड़ा शायर हूँ,
मैं जिस्म की हर फ़ाँक जला दूँ तो बड़ा शायर हूँ।

मैं हर बात वो कर जाऊँ जो मुमकिन हीं नहीं,
शब्दों में वो पा जाऊँ जो हासिल हीं नहीं,
आँखों पे टाँक दूँ मैं कोई और हीं जहां,
कानॊं में ठेलता रहूँ उलझी-सी दास्तां,
पलकों को उबासी से पशेमान मैं कहूँ,
कदमों को सज़ायाफ़्ता परेशान मैं कहूँ,
सीने में खोंस आऊँ मैं बुलबुल कोई घायल,
रानाईयाँ इतनी भरूँ, कुदरत भी हो कायल,
लैला के सुर्ख होठों को दैर-ओ-हरम कहूँ,
मजनूं की मौत आए तो हक़ बेशरम कहूँ,
मैं हद कोई रहने न दूँ लिखने जभी बैठूँ,
हर हर्फ़ सौ गुना करूँ, हर ख्याल मैं ऐठूँ,
मैं बंद की बंदिश हीं मिटा दूँ तो बड़ा शायर हूँ,
हर चंद को मुफ़लिस जो बना दूँ तो बड़ा शायर हूँ।

पर मैं अगर जो सीधे-सादे लफ़्ज़ों में इतना कहूँ,
जी नही पाऊँगा तुझ बिन, बोल दे कैसे रहूँ,
या कि मैं ऐसा कहूँ कि झूठों का ये दौर है,
डूबते इस देश का अब भ्रष्ट हीं सिरमौर है,
या कि खुश हो लूँ कभी तो बोल मैं यूँ कर लिखूँ,
भूल कर सारे गमों को ज़िंदगी बेहतर लिखूँ,
मैं अगर कुछ ना लपेटूँ, ना कहीं अतिशय करूँ,
तो मुझे डर है कि यूँ मैं स्तर ना नीचे करूँ।

....

मैं यहाँ सिर्फ़ मैं नहीं वो सभी शायर हूँ जो,
सोच में बदलाव से शापित हैं कि मरते रहो,
वो जो पहले लिखते थे कुछ और, अब कुछ और हीं,
पहले लिखते दिल से थे, अब तो दिल लगता नही,
लेकिन करते भी तो क्या, वक्त की ये माँग है,
"कोई नई उपमा रचो, लिखो वो जो ऊट-पटाँग है,
फिर तभी हरेक से पूछे और पूजे जाओगे,
फिर नई कविता के दम पे पुस्तकों में आओगे,
और हाँ, अपने सड़े-से सब पुराने छंदों को,
दूर फेंको कि नज़र न आए हुनर-पसंदों को"
बस इसी कारण ये सारे हुनर अपना त्याग के,
भेड़-चाल में लगे हैं रात-रात जागके,
बस इसी का डर है कि दौड़ में छूटे नहीं,
लेखनी से रिश्ता जो था, अब कहीं टूटे नहीं।

इस तरह लेखन जो हो तो लिखने का क्या फ़ायदा,
नई सोच हीं सही सोच है- ये है कहाँ का कायदा?
गर मुक्तछंद हीं है सही तो छंद को जनना न था,
वेदों को फिर छंद-युक्त पोथियाँ बनना न था,
जो निराला ने लिखा, निस्संदेह वो अतुल्य है,
पर गुप्त का, प्रसाद का, दिनकर का भी तो मूल्य है,
इसलिए इतनी गुजारिश करता हूँ तुमसे ओ मित्र!
एक-सी नज़रों से देखो इन चितेरों के ये चित्र,
फिर तभी तो एक युग में हर तरह के रंग होंगे,
देखकर कविता की खुशियाँ, सब हितैषी दंग होंगे।

....

जो कहा इतना हीं कुछ है, तो ये भी कहता चलूँ,
वो लिखो जो हर किसी को समझ आए, दे सुकूं,
"गर सभी समझें कवि को तो कवि काहे का वो",
परसाई जी की बात ये एक व्यंग्य है,तुम जान लो,
इसलिए तुम शब्द दो सुलझे हुए ख़्यालात को,
जो अना आगे बढे तो रोक लो जज़्बात को,
ना लिखो ऐसा कि लोग डर से बस अच्छा कहें,
कि अगर कुछ ना कहा तो सब न फिर बच्चा कहें,
बेवज़ह-से लफ़्ज़ को हर शेर से तुम नोंच लो,
छूना हो जो दिल अगर तो सोच को कुछ लोच दो।

और ये भी ध्यान हो कि शायरी बेमोल है,
तो भला कैसे यहाँ छोटा-बड़ा का तोल है,
फिर भी गर कोई धर्म-कांटा आए तो ऐसा न हो,
शब्द सारे "बाट" हों और भाव का रूतबा न हो,
या कि बस हीं भाव हो और शब्द सारे गौण हों
ज्यों कोई ज्ञानी, सुधर्मी जन्म से हीं मौन हो,
इसलिए मेरा मानना है- एक उचित अनुपात हो,
फिर तभी तो जब किसी शायर से कोई बात हो,
तो वो बस दिल की कहे और बस दिल की सुने,
और दिल हीं दिल में वो बस यही बातें गुने-
किसी दिल में जो पनाह लूँ तो बड़ा शायर हूँ,
अगर खुद से हीं निबाह लूँ तो बड़ा शायर हूँ।

-विश्व दीपक

साढे साती


मुझे डर था बस इसी बात का,
कि ये हश्र न हो मुलाकात का।

तूने मन को मार के क्या पाया,
बुझा ध्रुवतारा तेरी रात का।

हँसी अब जो काटती है तुझको,
है ये असर नेक ख्यालात का।

वो जो किस्मत बाँटते हैं उनके,
शनि घर में है साढे सात का।

जिसे कमतर आँकते थे सारे,
वो था अंतर शह और मात का।

-विश्व दीपक

लिच्छवि की एक छवि लेकर..


लिच्छवि की एक छवि लेकर गणतंत्र गढा, शिरोधार्य है ये,
पर कोस-कोस पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?
वो आम्रपाली थी नगरवधू, मूल अधिकारों से वंचित थी,
पर दलित न थी, विगलित न थी, हर सुख-सुविधा से संचित थी,
यौवन वह किसके नाम करे, निर्णय उसका, कोई जोर न था,
पर आज दबी है आम्रपाली, क्या कहे वह निज दु:ख-दर्द, व्यथा,
कि वह लुटी अस्मिता कहाँ धरे, पूछे किससे कौमार्य है ये?
एक-एक कोस पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?

तुमने जो स्वप्न में देखा था, यह गणतंत्र क्या वह हीं है?
थे दुराचारी क्या इतने हीं, क्या स्वप्न भी यूँ दुस्सह हीं है?
तुम उत्तर दो- क्या अनाचार ऐसे हीं चहुंदिश फैला था,
कौड़ी के मोल बिके थे सब, विधि का विधान भी मैला था,
यदि यह न था तो देखो तुम- क्या सोचा था क्या पाया है,
अब आम्रपाली बस नारी नहीं, संविधान की काली छाया है,
संताप करो तुम सब क्योंकि किन्हीं अपनों का हीं कार्य है ये,
एक-एक पृष्ठ पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?

लिच्छवि की एक छवि लेकर गणतंत्र गढा, शिरोधार्य है ये,
पर लुटी अस्मिता निज घर में, अब कौन पूछे- कौमार्य है ये?

-विश्व दीपक

तेरी बेसबब हँसी


तेरी बेसबब हँसी
माहौल बन गई,
सारी बलाओं की
माखौल बन गई..

रूत उभरी तेरे गालों से
"डिंपल" खुदे गुलज़ारों से
रोगन-भरे कचनारों से
अधरों के दो रखवालों से...

रूत छाई तो कुछ यूँ हुआ,
हर सब्र हीं धूँ धूँ हुआ,
पतझड़ का सर कलम करके
दिल से अलग अलम करके
हम सहर नई जगा आए,
कलम वसंत की लगा आए....

तेरी बेसबब हँसी
एक ढब हो गई,
सज़दों से भी परे
मज़हब हो गई,
खुतबे न माँगे जो
ऐसा रब हो गई,
मेरे लिए मेरे होने का
मतलब हो गई.....

-विश्व दीपक

ये तेरे इशारे..


तेरे इशारों पर रात की रिहाई हो,
तेरे इशारों पर चाँद की जम्हाई हो,
तेरे इशारों पर तीरगी निखर जाए,
जैसे अमावस की खुलती कलाई हो।

तेरे इशारे इशारे नहीं हैं,
ये तिनके हैं बहते अथाह सागरों में
जहाँ आस जीने की ज़िंदा नहीं है
न साँसें बची है, न हीं हौसले हैं
न उम्मीद है कुछ, न जिद्द हीं कहीं है
मनु ने भी नाव उतारे नहीं हैं
जहाँ डूबी जाती है पूरी हीं सृष्टि
किसी को भी दिखते सहारे नहीं हैं,
तभी तेरी नज़रों से चलके ये तिनके
कहीं पुल कहीं बाँध बनने लगे हैं
ठिठक-से गए हैं ये सागर भी देखो
जो तिनके फ़लक एक जनने लगे हैं.,
ये तिनके जिन्हें सब इशारे कहे हैं,
इन्हीं से तो सारे नज़ारे हुए हैं,
नया एक जन्म जो मिला है सभी को
तभी तो ये सारे तुम्हारे हुए हैं।
तभी तो ये चंदा खिसकता नहीं है,
तभी तो कुहासे तुझे ढाँपते हैं,
तभी तो मुहाने पे आके सहर भी
बिना पूछे तुझसे उबरती नहीं है,
तुझे क्या बताऊँ असर तेरा क्या है
कि रब भी तेरे पीछे हीं बावला है
तभी तो न घटता है ये हुस्न तेरा
उमर भी ये तेरी तो बढती नहीं है।

मेरी बात सुन ले, मैं सच कह रहा हूँ,
ये तेरे इशारे इशारे नहीं है,
ये तुझमें दबे कुछ तिलिस्म है जिनको
समझने के साधन करारे नहीं हैं..
तभी तो मैं खुद भी इसी में पड़ा हूँ,
न फल जानता हूँ, न हल जानता हूँ,
पर मेरा मुकद्दर इन्हीं में कहीं है
और इस कारण हीं मैं तुझसे जुड़ा हूँ।

तेरे इशारे ये एकलौते शय हैं,
मुझे है पता ये बस तुझे हीं मिले हैं,
मुझे है पता...
मुझे है पता कि ये तेरे इशारे
हैं शबनम कभी, कभी है शरारे,
हैं मझधार खुद, खुद हीं हैं किनारे,
है ताज्जुब यही, इन्हें जो निहारे
हैं जीते वहीं, इन इशारों के मारे!
ये तेरे इशारे!!!

-विश्व दीपक

देवता तक आज आते हीं नहीं...


लोग हैं कि दुश्मनी के रास्ते गढते यहाँ,
और तुम कि दोस्ती से बाज आते हीं नहीं...

मान भी लो दुनिया तेरे सोचने जैसी नहीं,
मान भी लो तुमको ये अंदाज आते हीं नहीं....

मौन हो लो क्योंकि तेरे कहने का ना फ़ायदा,
होठ सी लो जैसे कि अल्फ़ाज़ आते हीं नहीं....

ज़ख्म है ये जानता हूँ पर मुनासिब है यही,
सोच लो कि कोढ के ये खाज आते हीं नहीं...

कौन होगा जो कहेगा लूटने दो मुझको भी,
इस तरह उनके तो तख्तो-ताज आते हीं नहीं...

खूब तुमको है पड़ी जो कालिखें उतारने की,
यार देखो! देवता तक आज आते हीं नहीं...

-विश्व दीपक

आखिरी रहनुमा


ज़िंदगी बोनसाई हुई क्यूँकर,
मौत की चारपाई हुई क्यूँकर..

शाम से सहर की उसने घुटके,
रात से(में) बेवफ़ाई हुई क्यूँकर..

आप तो आखिरी रहनुमा न थे,
आप से आशनाई हुई क्यूँकर..

जातियाँ आपकी तो बपौती नहीं,
प्यार पे कारवाई हुई क्यूँकर..

घाव दो जब भी तो नयापन रखो,
साजिशें आजमाई हुई क्यूँकर..

-विश्व दीपक

माफ़ीनामा


हर घड़ी रोने को जी करता है!

रात के तीसरे पहर में
जब चमगादड़ों की फ़ौज़
कर रही होती है कदमताल,
तभी आँख के गलियारे में
"रेटिना" के कुछ पास
घुसपैठियों-सा
उभर आता है एक चेहरा!

वह चेहरा तुम्हारा हीं है,
जानता हूँ मैं...

बरसों पहले
तुमने हीं गढा था यह देश
और मैने
दे दिया तुम्हें देशनिकाला
या यूँ कहो देहनिकाला...

अब भी उस जुर्म में
लाईन हाज़िर होता हूँ मैं
हर रात
तीसरे पहर...

आँसू उतार-उतार कर
थक चुका हूँ,
अगली बार आओ तो
ले आना कुछ तेजाब
और डुबोके
मेरे "माफ़ीनामे" में
छिड़क देना
साँसों के इर्द-गिर्द..

सोते-सोते मौत मिले
तो गम कम होगा.......है ना?

-विश्व दीपक ’तन्हा’

वह कुछ बहकी-बहकी-सी बातें करती है!


वह कुछ बहकी-बहकी-सी बातें करती है!
चाँदनी की छलनी लिए
रात का कालापन
छानती है पूरी शब..
नीम-नशा में लुढकती हवाओं को
खोंसती है
घास के नाखूनों में
और
बुहारकर चाँद का चेहरा
जमा करती है ओस के कुछ फ़ाहे-
शायद गढनी होती है उसे
एक चादर मीठी-सी
जिसे बिछा सके वो
घास की हड्डियों पर..।
बड़ी फिक्र है उसे
मेरे ख्वाबों की
जो हर बार हीं
लांघकर
अधखुली आँखों को
चल पड़ते हैं
सर्पीली पगडंडियों पर
शायद ढलने उसकी नींदों में।

वह
हर शब
चढाती है आसमान पर
जामुनी रंग का एक कैनवास
और छिड़क देती है
उसपर
दिन भर की उजली,खुशरंग यादे..
वह चाँद
यादों का बही-खाता है
और उसकी सोलह कलाएँ
यादों की जमापूँजी।

वह
कहती है-
चौरासी लाख योनियाँ
कुछ और नहीं
मेरे और उसके प्यार के
विभिन्न पड़ाव हैं
और मनुष्य योनि
हमारा मिलन......
उसकी माने तो
बस शबभर हीं
इंसान इंसान होता है
और दिन आते
उग आती है कीड़े-मकौड़ों की जमात!

वह
हर लम्हा जीती है
मेरे लिए
और हर शब
यूँ हीं बहकी-बहकी बातें करती है।
मैं
शायद नहीं चाहता उसे
या फिर कुछ नहीं चाहता
तभी तो नहीं बहकता उसकी बातों से।
वह
गिनती है
महीने में बस एक हीं अमावस
और मैं
रूह के तीस अमावस
और देह के शून्य अमावस
पर ज़िंदा हूँ।

वह
एक बहकी बातें करने वाली
सुलझी लड़्की
क्यूँ चाहती है मुझे...
क्या पता,
मैं तो उसे उसी तरह सुनता हूँ
जैसे सुनता हूँ अपनी ज़िदगी को।
दोनों इतने से ही खुश हैं शायद..............

-विश्व दीपक ’तन्हा’

कुछ अनसुलझे ख़्याल


१.
आँखें निकालकर
खोंस डाली हैं सीने में मैने।
क्यों कहते हो कि दिल धड़कता है?

२.
खुरदरा चरित्र
हर जगह चिपक जाता है।
दोष मेरा नहीं, खुरदरी दुनिया का है।

३.
उनके हवाले
मेरे ज़ख्मों की तिमारदारी है।
हरे ज़ख्म नासूर बने अच्छे लगते हैं।

४.
बुरी बातों से
बद्दुआ नहीं लगती।
गैरों के सिम्त तेरी दुआ न हो तो बात बने।

५.
इशारों की मियादी
बुनियादी समस्या है
तुम्हारी।
तुमने ऊँगलियों में आँखें टाँक रखी है,
और आँखों की सीपी में
बोलते नगीने जब्त हैं
क्यों कहती हो कि
तुम कुछ कहती नहीं,
इशारों से पहले हीं शब्द "लीक" हो जाते हैं
तुम्हारे!!!!!!!

-विश्व दीपक ’तन्हा’