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Saturday, January 09, 2010

तेरी बेसबब हँसी


तेरी बेसबब हँसी
माहौल बन गई,
सारी बलाओं की
माखौल बन गई..

रूत उभरी तेरे गालों से
"डिंपल" खुदे गुलज़ारों से
रोगन-भरे कचनारों से
अधरों के दो रखवालों से...

रूत छाई तो कुछ यूँ हुआ,
हर सब्र हीं धूँ धूँ हुआ,
पतझड़ का सर कलम करके
दिल से अलग अलम करके
हम सहर नई जगा आए,
कलम वसंत की लगा आए....

तेरी बेसबब हँसी
एक ढब हो गई,
सज़दों से भी परे
मज़हब हो गई,
खुतबे न माँगे जो
ऐसा रब हो गई,
मेरे लिए मेरे होने का
मतलब हो गई.....

-विश्व दीपक

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

देवेन्द्र पाण्डेय का कहना है कि -

रूत छाई तो कुछ यूँ हुआ,
हर सब्र हीं धूँ धूँ हुआ,
पतझड़ का सर कलम करके
दिल से अलग अलम करके
हम सहर नई जगा आए,
कलम वसंत की लगा आए....
----नई राह चलते ही नई सहर जग जाय और वसंत की कलम लग जाय इससे अच्‍छा और क्‍या हो सकता है.... अच्‍छी कवि‍ता के लि‍ए बधाई.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' का कहना है कि -

रूत उभरी तेरे गालों से
"डिंपल" खुदे गुलज़ारों से
रोगन-भरे कचनारों से
अधरों के दो रखवालों से...

सुन्दर चित्रण!
बधाई!

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

तेरी बेसबब हँसी
माहौल बन गई,
सारी बलाओं की
माखौल बन गई..

एक खूबसूरत कविता!!!

Anonymous का कहना है कि -

पतझड़ का सर कलम करके
दिल से अलग अलम करके

तेरी बेसबब हँसी
एक ढब हो गई,
सज़दों से भी परे
मज़हब हो गई,
खुतबे न माँगे जो
ऐसा रब हो गई,
मेरे लिए मेरे होने का
मतलब हो गई....
कविता क्या ये तो प्यारी सी रूहानी ग़ज़ल हो गई. विश्व दीपक जी बधाई. सर्द मौसम और नए साल में नए अहसास कराने के लिए आभार.

निर्मला कपिला का कहना है कि -

तेरी बेसबब हँसी
एक ढब हो गई,
सज़दों से भी परे
मज़हब हो गई,
खुतबे न माँगे जो
ऐसा रब हो गई,
मेरे लिए मेरे होने का
मतलब हो गई....
वाह तारीफ करूँ क्या उसकी जिसने इसे शब्दों से सजाया बधाई सुन्दर कविता के लिये

rachana का कहना है कि -

तेरी बेसबब हँसी
एक ढब हो गई,
सज़दों से भी परे
मज़हब हो गई,
खुतबे न माँगे जो
ऐसा रब हो गई,
मेरे लिए मेरे होने का
मतलब हो गई.....
kya hi pyare shbd sunder bhav
bahut achchha likha hai aap ne
saader
rachana

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