तेरी बेसबब हँसी
माहौल बन गई,
सारी बलाओं की
माखौल बन गई..
रूत उभरी तेरे गालों से
"डिंपल" खुदे गुलज़ारों से
रोगन-भरे कचनारों से
अधरों के दो रखवालों से...
रूत छाई तो कुछ यूँ हुआ,
हर सब्र हीं धूँ धूँ हुआ,
पतझड़ का सर कलम करके
दिल से अलग अलम करके
हम सहर नई जगा आए,
कलम वसंत की लगा आए....
तेरी बेसबब हँसी
एक ढब हो गई,
सज़दों से भी परे
मज़हब हो गई,
खुतबे न माँगे जो
ऐसा रब हो गई,
मेरे लिए मेरे होने का
मतलब हो गई.....
-विश्व दीपक






