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लिच्छवि की एक छवि लेकर..


लिच्छवि की एक छवि लेकर गणतंत्र गढा, शिरोधार्य है ये,
पर कोस-कोस पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?
वो आम्रपाली थी नगरवधू, मूल अधिकारों से वंचित थी,
पर दलित न थी, विगलित न थी, हर सुख-सुविधा से संचित थी,
यौवन वह किसके नाम करे, निर्णय उसका, कोई जोर न था,
पर आज दबी है आम्रपाली, क्या कहे वह निज दु:ख-दर्द, व्यथा,
कि वह लुटी अस्मिता कहाँ धरे, पूछे किससे कौमार्य है ये?
एक-एक कोस पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?

तुमने जो स्वप्न में देखा था, यह गणतंत्र क्या वह हीं है?
थे दुराचारी क्या इतने हीं, क्या स्वप्न भी यूँ दुस्सह हीं है?
तुम उत्तर दो- क्या अनाचार ऐसे हीं चहुंदिश फैला था,
कौड़ी के मोल बिके थे सब, विधि का विधान भी मैला था,
यदि यह न था तो देखो तुम- क्या सोचा था क्या पाया है,
अब आम्रपाली बस नारी नहीं, संविधान की काली छाया है,
संताप करो तुम सब क्योंकि किन्हीं अपनों का हीं कार्य है ये,
एक-एक पृष्ठ पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?

लिच्छवि की एक छवि लेकर गणतंत्र गढा, शिरोधार्य है ये,
पर लुटी अस्मिता निज घर में, अब कौन पूछे- कौमार्य है ये?

-विश्व दीपक