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Tuesday, January 26, 2010

लिच्छवि की एक छवि लेकर..


लिच्छवि की एक छवि लेकर गणतंत्र गढा, शिरोधार्य है ये,
पर कोस-कोस पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?
वो आम्रपाली थी नगरवधू, मूल अधिकारों से वंचित थी,
पर दलित न थी, विगलित न थी, हर सुख-सुविधा से संचित थी,
यौवन वह किसके नाम करे, निर्णय उसका, कोई जोर न था,
पर आज दबी है आम्रपाली, क्या कहे वह निज दु:ख-दर्द, व्यथा,
कि वह लुटी अस्मिता कहाँ धरे, पूछे किससे कौमार्य है ये?
एक-एक कोस पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?

तुमने जो स्वप्न में देखा था, यह गणतंत्र क्या वह हीं है?
थे दुराचारी क्या इतने हीं, क्या स्वप्न भी यूँ दुस्सह हीं है?
तुम उत्तर दो- क्या अनाचार ऐसे हीं चहुंदिश फैला था,
कौड़ी के मोल बिके थे सब, विधि का विधान भी मैला था,
यदि यह न था तो देखो तुम- क्या सोचा था क्या पाया है,
अब आम्रपाली बस नारी नहीं, संविधान की काली छाया है,
संताप करो तुम सब क्योंकि किन्हीं अपनों का हीं कार्य है ये,
एक-एक पृष्ठ पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?

लिच्छवि की एक छवि लेकर गणतंत्र गढा, शिरोधार्य है ये,
पर लुटी अस्मिता निज घर में, अब कौन पूछे- कौमार्य है ये?

-विश्व दीपक

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

Unknown का कहना है कि -

Nice one VD ! :)

Rakesh Kaushik का कहना है कि -

लिच्छवि की एक छवि लेकर गणतंत्र गढा, शिरोधार्य है ये,
पर लुटी अस्मिता निज घर में, अब कौन पूछे- कौमार्य है ये?
तीखी लेकिन सत्य और सही - धन्यवाद् विश्व दीपक जी.

निर्मला कपिला का कहना है कि -

laajavaab adbhut sundar gantantar divas kee shubhakamanayen

Vinaykant Joshi का कहना है कि -

दीपक जी,
बहुत सुन्दर,
इस मंच पर उपलब्ध श्रेष्ठ कवितों में से एक !
बधाई.
सादर,
विनय के जोशी

देवेन्द्र पाण्डेय का कहना है कि -

गणतंत्र दिवस के दिन इससे अच्छी शब्दांजली और क्या हो सकती है भला!
...बहुत-बहुत बधाई इस संवेदनशील एवं विचारोत्तेजक अभिव्यक्ति के लिए.

Unknown का कहना है कि -

बहुत सुन्दर और भयावह भी-अच्छी रचना पर बधाई

कौड़ी के मोल बिके थे सब, विधि का विधान भी मैला था,
यदि यह न था तो देखो तुम- क्या सोचा था क्या पाया है,
“नूर‘का अन्दाज यूं रहा
धन के हाथ बिके हैं सब कानून
अब किसी जुर्म की कोई सजा ही नहीं

Unknown का कहना है कि -

इतिहास और वर्तन्मान का सुन्दर तालमेल रचना को और गरिमामय बना गया पुन: बधाई

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

तुमने जो स्वप्न में देखा था, यह गणतंत्र क्या वह हीं है?
थे दुराचारी क्या इतने हीं, क्या स्वप्न भी यूँ दुस्सह हीं है?
तुम उत्तर दो- क्या अनाचार ऐसे हीं चहुंदिश फैला था,
कौड़ी के मोल बिके थे सब, विधि का विधान भी मैला था,
यदि यह न था तो देखो तुम- क्या सोचा था क्या पाया है,

विश्व दीपक जी सत्यता को समेटते हुए बहुत ही सुंदर बात रखी आपने...लाज़वाब रचना..बधाई हो!!

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