मुझे डर था बस इसी बात का,
कि ये हश्र न हो मुलाकात का।
तूने मन को मार के क्या पाया,
बुझा ध्रुवतारा तेरी रात का।
हँसी अब जो काटती है तुझको,
है ये असर नेक ख्यालात का।
वो जो किस्मत बाँटते हैं उनके,
शनि घर में है साढे सात का।
जिसे कमतर आँकते थे सारे,
वो था अंतर शह और मात का।
-विश्व दीपक






