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Sunday, July 05, 2009

जब बांध सब्र का टूटेगा, तब रोएंगे....


जब बांध सब्र का टूटेगा, तब रोएंगे....
अभी वक्त की मारामारी है,
कुछ सपनों की लाचारी है,
जगती आंखों के सपने हैं...
राशन, पानी के, कुर्सी के...
पल कहां हैं मातमपुर्सी के....
इक दिन टूटेगा बांध सब्र का, रोएंगे.....

अभी वक्त पे काई जमी हुई,
अपनों में लड़ाई जमी हुई,
पानी तो नहीं पर प्यास बहुत,
ला ख़ून के छींटे, मुंह धो लूं,
इक लाश का तकिया दे, सो लूं,....
जब बांध.....

उम्र का क्या है, बढ़नी है,
चेहरे पे झुर्रियां चढ़नी हैं...
घर में मां अकेली पड़नी है,
बाबूजी का क़द घटना है,
सोचूं तो कलेजा फटना है,
इक दिन टूटेगा......

उसने हद तक गद्दारी की,
हमने भी बेहद यारी की,
हंस-हंस कर पीछे वार किया,
हम हाथ थाम कर चलते रहे,
जिन-जिनका, वो ही छलते रहे....
इक दिन...

जब तक रिश्ता बोझिल न हुआ,
सर्वस्व समर्पण करते रहे,
तुम मोल समझ पाए ही नहीं,
ख़ामोश इबादत जारी है,
हर सांस में याद तुम्हारी है...
इक दिन...

अभी और बदलना है ख़ुद को,
दुनिया में बने रहने के लिए,
अभी जड़ तक खोदी जानी है,
पहचान न बचने पाए कहीं,
आईना सच न दिखाए कहीं!
जब बांध ....

अभी रोज़ चिता में जलना है,
सब उम्र हवाले करनी है,
चकमक बाज़ार के सेठों को,
नज़रों से टटोला जाना है,
सिक्कों में तोला जाना है...
इक दिन....

इक दिन नीले आकाश तले,
हम घंटों साथ बिताएंगे,
बचपन की सूनी गलियों में,
हम मीलों चलते जाएंगे,
अभी वक्त की खिल्ली सहने दे...
जब बांध..

मां की पथरायी आंखों में,
इक उम्र जो तन्हा गुज़री है,
मेरे आने की आस लिए..
उस उम्र का हर पल बोलेगा....

टूटे चावल को चुनती मां,
बिन बांह का स्वेटर बुनती मां,
दिन भर का सारा बोझ उठा,
सूना कमरा, सिर धुनती मां....

टूटे ऐनक की लौटेगी
रौनक, जिस दिन घर लौटूंगा...
मां तेरे आंचल में सिर रख,
मैं चैन से उस दिन सोऊंगा,
मैं जी भर कर तब रोऊंगा.....

तू चूमेगी, पुचकारेगी,
तू मुझको खूब दुलारेगी...
इस झूठी जगमग से रौशन,
उस बोझिल प्यार से भी पावन,
जन्नत होगी, आंचल होगा....
मां! कितना सुनहरा कल होगा.....

इक दिन टूटेगा बांध सब्र का, रोएंगे....


निखिल आनंद गिरि

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19 कविताप्रेमियों का कहना है :

अनुपम अग्रवाल का कहना है कि -

सुमधुर कल की आस जगाती

स्वप्न संजोती भाव दिखाती

मन ही मन यह है इठलाती


पर टूटेगा बाँध सब्र का, तब रोयेंगे....

Ambarish Srivastava का कहना है कि -

अभी वक्त की मारामारी है,
कुछ सपनों की लाचारी है,
जगती आंखों के सपने हैं...
राशन, पानी के, कुर्सी के...
पल कहां हैं मातमपुर्सी के....
इक दिन टूटेगा बांध सब्र का, रोएंगे.....

अभी वक्त पे काई जमी हुई,
अपनों में लड़ाई जमी हुई,
पानी तो नहीं पर प्यास बहुत,
ला ख़ून के छींटे, मुंह धो लूं,
इक लाश का तकिया दे, सो लूं,....

कविता के भाव बहुत अच्छे हैं | बधाई !
सादर,
अम्बरीष श्रीवास्तव

संगीता पुरी का कहना है कि -

बहुत सुंदर भाव .. अच्‍छी रचना !!

Anonymous का कहना है कि -

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे....

वाह-वाह...फैज़ की याद आ गई...
राजेश सोनी

Disha का कहना है कि -

bahut kuch karna hai baaki
vakt se ladana hai baaki
phursat hai kahan mujhko
abhi anjaam hai baaki
jab baandh tootega-----------

bahut hi khoob
Dhanyvad

Manish Kumar का कहना है कि -

वाह... अच्छा लिखा है निखिल,,काश वो दिन जल्द आए

Nirmla Kapila का कहना है कि -

रौनक, जिस दिन घर लौटूंगा...
मां तेरे आंचल में सिर रख,
मैं चैन से उस दिन सोऊंगा,
मैं जी भर कर तब रोऊंगा.....

तू चूमेगी, पुचकारेगी,
तू मुझको खूब दुलारेगी...
इस झूठी जगमग से रौशन,
उस बोझिल प्यार से भी पावन,
जन्नत होगी, आंचल होगा....
मां! कितना सुनहरा कल होगा.....
इस अभिव्यक्ति ने दिल छू लिया बहुत मार्मिक और सुन्दर रचना है आभार्

शोभना चौरे का कहना है कि -

उम्र का क्या है, बढ़नी है,
चेहरे पे झुर्रियां चढ़नी हैं...
घर में मां अकेली पड़नी है,
बाबूजी का क़द घटना है,
सोचूं तो कलेजा फटना है,
इक दिन टूटेगा..
bhut achha likha hai

manu का कहना है कि -

कल से पढ़ रहा हूँ,,
पर अब जाकर सब्र का बाँध टूट ही गया...
जब अम्बर झूम के नाचेगा और धरती नगमे जायेगी,,,
हाँ निखिल भाई,,,
वो सुबहा कभी तो आएगी,,

Ambarish Srivastava का कहना है कि -

टूटे ऐनक की लौटेगी
रौनक, जिस दिन घर लौटूंगा...
मां तेरे आंचल में सिर रख,
मैं चैन से उस दिन सोऊंगा,
मैं जी भर कर तब रोऊंगा.....

अगर दुनिया में कहीं सुकून है तो सिर्फ माँ के आँचल में ही........ !
लाजवाब रचना |
बधाई !

sada का कहना है कि -

टूटे ऐनक की लौटेगी
रौनक, जिस दिन घर लौटूंगा...
मां तेरे आंचल में सिर रख,
मैं चैन से उस दिन सोऊंगा,
मैं जी भर कर तब रोऊंगा.....

बहुत ही गहराई से हर शब्‍द को व्‍यक्‍त किया है आपने , बेहतरीन प्रस्‍तुति, बधाई

शारदा अरोरा का कहना है कि -

वाह-वाह , इस कविता ने लगातार बाँध कर रखा , ज्यादातर लम्बी कवितायें मैं पूरी नहीं पढ़ती , पर ये तो बार-बार पढने लायक है |

sanjeev का कहना है कि -

sahitya ka kam kya hai nahi kah sakta, lekin aapki kavita ne kahi bahut kone me chhipe ghav ko jaise kured diya ho. padhate waqt aakhe nam ho gai.padhane ke baad laga jaise sine par se ek boojh utar gaya ho.aapne sabdo ko malaham me tabdeel kar diya. bhagwan se nivedan karunga ki aapki lekhani mi ye sakti banaye rakhe.

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

सबका शुक्रिया....

rachana का कहना है कि -

टूटे ऐनक की लौटेगी
रौनक, जिस दिन घर लौटूंगा...
मां तेरे आंचल में सिर रख,
मैं चैन से उस दिन सोऊंगा,
मैं जी भर कर तब रोऊंगा.....
सही लिखा है .हाँ तभी रोऊंगा
माँ के स्नेह भरा हाथ अंदर की पीडा को पिघला देता है
बहुत सुंदर लिखा है आप को हमेशा ही बहुत अच्छा लिखते हैं
रचना

Shamikh Faraz का कहना है कि -

टूटे ऐनक की लौटेगी
रौनक, जिस दिन घर लौटूंगा...
मां तेरे आंचल में सिर रख,
मैं चैन से उस दिन सोऊंगा,
मैं जी भर कर तब रोऊंगा.....


जवाब नहीं जी .

Manju Gupta का कहना है कि -

कविता ने माँ की याद दिला दी

ravi_journalist@yahoo.com का कहना है कि -

मान गये उस्ताद...बेहतर...

aniruddha का कहना है कि -

bahut hi khoobsurat...
Nikhil ji ko sundar rachna padhwane ke liye dhanyawad..

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