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मुल्क का चेहरा


मैं एक चेहरा बनाना चाहता हूँ
पर अधूरा रह जाता है बार-बार
न जाने क्यों बनता ही नहीं
मेरे पास हर तरह के रंग हैं
लाल, पीले, नीले, चटख
सफेद और काले भी
मेरी तूलिका में भी कोई खराबी नहीं है
इसी से मैंने अपनी तस्वीर बनायी है
बिल्कुल साफ-सुथरी
मैं पूरा दिखता हूँ उसमें
जो भी मुझे पहचानता है
तस्वीर भी पहचान सकता है
उसकी आँखों में झांककर
पढ़ सकता है मेरा मन।

इसी तूलिका से मैंने कई
और भी तस्वीरें बनायी हैं
सब सही उतरी हैं कैनवस पर
मैंने एक मजदूर की तस्वीर बनायी
उसके चेहरे पर अभाव और भूख
साफ-साफ झलकती है
उसे कोई भी देखे तो लगता है
वह तस्वीर से बाहर निकल कर
कुछ बोल पड़ेगा
बता देगा कि उसकी बीवी
किस तरह बीमार हुई और चल बसी
उसका बच्चा क्यों पढ़ नहीं सका
वह स्वयं तस्वीर की तरह
जड़ होकर क्यों रह गया है।

मैंने एक सैनिक की तस्वीर बनायी
वह अपनी पूरी लाचारी के साथ
मेरे रंगों से निकल कर
कैनवस पर आ गया
वहां घना जंगल है
वहां दो देशों की सीमाएं मिलती हैं
वहां आपस में गुत्थमगुत्था होते लोग हैं
एक-दूसरे को मार डालने पर आमादा
सैनिक के पास बंदूक है
उसे लड़ने का हुक्म भी है
पर वह तब तक गोलियां
नहीं चला सकता
जब तक उसकी जान खतरे में न हो
तस्वीर देखने पर लगता है
वह कभी भी पागल हो सकता है।

मैंने एक बच्चे की
तस्वीर बनायी
वह हंस रहा था
वह मेरी तूलिका और
रंग से खेलना चाहता था
वह कैनवस पर आ ही नहीं रहा था
वह मुझे चकमा देकर
निकल जाना चाहता था
कभी रंगीन गुब्बारा उठाता और
उसे फोड़कर खिलखिला पड़ता
कभी बैट उठा लेता और
भाग जाना चाहता मैदान की ओर
कभी रोनी-सी सूरत बनाकर
मां को आवाज देता
भविष्य को ठेंगे पर रखे
कभी चिल्लाता, कभी
सरपट दौड़ लगा देता
कभी मेरा चश्मा उतार लेता
तो कभी मेरी पीठ सवार हो जाता
वह तस्वीर में है, पर नहीं है।

मैंने एक आधुनिक संत की तस्वीर बनायी
मैं नहीं जानता कैसे वह पूरा होते होते
शैतान जैसी दिखने लगी
उसके चेहरे पर लालच, क्रूरता
निर्ममता, धूर्तता सब कुछ
दिखायी पड़ रही है।
मैं उसे देख बुरी तरह डर गया हूँ
लोगों को सावधान करना चाहता हूँ
पर कोई मेरी बात सुनता ही नहीं
लोग आते है, झुककर माथा नवाते है
कीर्तन करने लगते हैं,
गाते-गाते होश खो बैठते हैं
और चीखते, चिल्लाते
सब हार कर इस तरह लौटते हैं
कि लौटते ही नहीं कभी।

मेरी तूलिका ने हमेशा मेरा साथ दिया
मेरे रंग कभी झूठे नहीं निकले
पर मैं हैरान हूँ, इस बार
सिर्फ एक चेहरे की बात है
मैं बनाना चाहता हूँ
एक ऐसा चेहरा
जिसे मैं मुल्क कह सकूँ
जिसमें सभी खुद को निहार सकें
पर बनता ही नहीं
कभी कैनवस छोटा पड़ जाता है
कभी पूरा काला हो जाता है
मुझे शक है कि मुल्क का चेहरा
है भी या नहीं।

यूनिकवि: सुभाष राय

बनमानुस...


एक दुनिया है समझदार लोगों की,
होशियार लोगों की,
खूब होशियार.....
वो एक दिन शिकार पर आए
और हमें जानवर समझ लिया...
पहले उन्होंने हमें मारा,
खूब मारा,
फिर ज़बान पर कोयला रख दिया,
खूब गरम...
एक बीवी थी जिसके पास शरीर था,
उन्होंने शरीर को नोंचा,
खूब नोचा...
जब तक हांफकर ढेर नहीं हो गए,
हमारे घर के दालानों में....

हमारी बीवियों ने मारे शरम के,
नज़र तक नहीं मिलाई हमसे
उल्टा उन्हीं के मुंह पर छींटे दिए,
कि वो होश में आएं
और अपने-अपने घर जाएं...
ताकि पक सके रोटियां
खूब रोटियां...

वो होश में आए तो,
जो जी चाहा किया...
हमे फिर मारा,
उन्हें फिर नोंचा...
हमारी रोटियां उछाल दी ऊंचे आकाश में....
खूब ऊंचा....
वो हंसते रहे हमारी मजबूरी पर,
खूब हंसे...


भूख से बिलबिला उठे हम....
जलता कोयला निकल गया मुंह से...
जंगल चीख उठा हमारी हूक से....
पहाड़ कांप उठे हमारी सिहरन से....
नदियों में आ गया उफान,
खूब उफान....

उनके हाथ में हमारी रोटियां थीं,
उनकी गोद में हमारी मजबूर बीवियां थीं...
उनकी हंसी में हमारी चीख थी, भूख थी....
हमने पास में पड़ा डंडा उठाया
और उन्हें हकार दिया,
अपने दालानों से....
वो नहीं माने,
तो मार दिया.....

जंगल से बाहर की दुनिया
यही समझती रही,
हम आदमखोर हैं, बनमानुस...
जंगली कहीं के....
वाह रे समझदार...
वाह री सरकार.....

निखिल आनंद गिरि