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Thursday, February 18, 2010

नमो चक्रधर


हिमालय से
सरके
हिमप्रस्तर
मौन मानुष
हिमनद
पिघल कर
सतत प्रवाही
माँ हो गए
तह अंगीकार विकार
सतह अमृत सिंचन
जलधि हिय समा
हवा की पालकी संग
कण कण तुषार
फिर हिमालय हो गए
सर्वत्र
यही परिलक्षित
अणु से आकाशगंगा
अनंत
अनिवारित चक्राधीन

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

नमो चक्रधर ..सुंदर शब्दों से सजी बढ़िया रचना..हाँ कविता के भाव को समझने में थोड़ी कठिनाई ज़रूर हुई..हम जैसों के लिए...

Devendra का कहना है कि -

अणु से आकाशगंगा
अनंत
अनिवारित चक्राधीन
..."नमो चक्रधर"
आपके शब्द चयन कि कुशलता देख कर तो कहना पड़ेगा...
...नमो "शब्द-धुरंधर"!

pt. श्यामसुंदर का कहना है कि -

लगता है हिन्द्य्कग्म का लेवल बहुत बढ़ गया है
इतने कम शब्दों में इतनी बड़ी बात हाईट वाली कविता लेखक को आशीर्वाद
pt. श्यामसुंदर

Anonymous का कहना है कि -

एक अच्छी कविता के लिए बहुत बहुत बधाई,
धन्यवाद
विमल कुमार हेडा

tarun_kt का कहना है कि -

kavi mahoday wa pathak bandhu ko bahut badhaai, kavitaa sahaj hi aakrshit karati hai , sundar rachanaa ke liye paathak man kaa aabhaar..

rachana का कहना है कि -

kavita ke bhav aur uske shabd ati sunder hain .aap ne ek sargarbhit kavita likhi hai aap ko bahut bahut badhai ho
saader
rachana

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