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Wednesday, February 17, 2010

एक और इम्तिहान है-गज़ल


है जान तो जहान है
फिर काहे का गुमान है

क्या कर्बला के बाद भी
एक और इम्तिहान है

इतरा रहे हैं आप यूँ
क्या वक्त मेहरबान है

हैं लूट राहबर रहे
जनता क्यों बेजुबान है

है श्याम बेवफ़ा नहीं
इतना तो इत्मिनान है

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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

निर्मला कपिला का कहना है कि -

बहुत अच्छी गज़ल है श्यामसखा जी को बधाई आपका धन्यवाद्

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

हैं लूट राहबर रहे
जनता क्यों बेजुबान है

Badhiya Gazal..Sundar bhav...dhanywaad shyam ji is gazal ki prstuti ke liye....

M VERMA का कहना है कि -

है श्याम बेवफ़ा नहीं
इतना तो इत्मिनान है
इस बात का हमें भी इत्मिनान है
बहुत खूब

sunil gajjani का कहना है कि -

इतरा रहे हैं आप यूँ
क्या वक्त मेहरबान है
kya khoob kaha hai, rachana ji ne, sadhuwad ek umda gazal ke.ek acchi gazal padhane ke liye shyam ji ko bhi badgae

Anonymous का कहना है कि -

है जान तो जहान है
फिर काहे का गुमान है

बहुत ही अच्छी पंक्तिया श्यामजी को बहुत बहुत बधाई
धन्यवाद
विमल कुमार हेडा

Kavi Kulwant का कहना है कि -

wah wah.. bahut khoob..

manu का कहना है कि -

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है साहब...
बधाई..

रंजना का कहना है कि -

WAAH...BAHUT KHOOB....

SUNDAR RACHNA...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

क्या कर्बला के बाद भी
एक और इम्तिहान है

इतरा रहे हैं आप यूँ
क्या वक्त मेहरबान है
:)

vivek kumar का कहना है कि -

ek shayar kee soch kee beharatareen baangi hai. shubhkamnayen

vivek kumar का कहना है कि -

ek shayar kee soch kee beharatareen baangi hai. shubhkamnayen

vivek kumar का कहना है कि -

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