हर तरफ़ फैली हुई ये ज़ुल्मतें
रौशनी होंगी तेरी कब रहमतें
शह्र को अब कर रहे हैं सब सलाम
हज़्म कर ली शह्र ने सब ज़िल्लतें
कुछ कंदीलें जल रही मरहूमों पर
गिन नहीं पाते हैं इतनी मैय्यतें
दो मिनट का मौन रखना सीख ले
कारगर होती हैं अच्छी सोहबतें
मौत का साया धुआं बन कर उड़ा
बढ़ गई इक दूसरे से कुर्बतें
ये सियासत है संभल कर के चलो
हो सके तो सीख लो सब तोहमतें
अलविदा पर ख़त्म है ये दास्ताँ
कौन रखेगा किसी से चाहतें
(अर्थ: ज़ुल्मतें = अंधेरे, जिल्लतें = अपमान, कंदीलें = मोमबत्तियां, मरहूम = मृत व्यक्ति, मैय्यतें = अर्थियां, कारगर = उपयोगी, सोहबत = संगत, साथ, कुर्बतें = करीबियां, सियासत = राजनीति, तोहमतें = इल्जाम)
ग़ज़लगो--प्रेमचंद सहजवाला



























6 टिप्पणी:
"सहज जिनके वास्ते लिखते हैं हम,
हैं कहाँ पढने की उनको फुरसतें...?"
दर्द से भरी...अच्छी ग़ज़ल.....
अच्छी रचना बधाई!
अलविदा पर ख़त्म है ये दास्ताँ
कौन रखेगा किसी से चाहतें
दो मिनट का मौन रखना सीख ले
कारगर होती हैं अच्छी सोहबतें
हर तरफ़ फैली हुई ये ज़ुल्मतें
रौशनी होंगी तेरी कब रहमतें
प्रेम जी धन्यवाद
मनु जी ,
एक लाइन याद आ रही है ,
पढ़ना लिखना सीखो ,मनु जी के चाहने वालों |
कृपया मुझे ग़लत न लें ..
"बे-तक्ख्ल्लुस" के निशाने पे वो थे,
जिनकी फैलाई हुयी हैं .ज़ुल्मतें
दो मिनट का मौन रखना सीख ले
कारगर होती हैं अच्छी सोहबतें
मौत का साया धुआं बन कर उड़ा
बढ़ गई इक दूसरे से कुर्बतें
अच्छे लगे ये शेर
सादर
रचना
ये सियासत है संभल कर के चलो
हो सके तो सीख लो सब तोहमतें
अलविदा पर ख़त्म है ये दास्ताँ
कौन रखेगा किसी से चाहतें
वाह वाह क्या कहने
हर शेर लाजवाब है
Post a Comment